उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार


“नहीं भईया, नागा लोगों का दिया धन पचाना आसान बात नहीं है। मेरे मना करने पर भी पचास रुपया और दिये नागा बाबा। … कपड़ा-लंगोट कुछ नहीं पहने थे। बस एक गमछा लपेट लिये थे लोगों के सामने आने के समय।”

कुछ और चलें – गाडरवारा से उदयपुरा


मुझे अपनी दशा सम्पाती की तरह लगी। वह और किसी प्रकार से वानरों की सहायता नहीं कर सकता था। वह केवल यह देख सकता था कि लंका कितनी दूर है और सीता कहां पर हैं। मैं भी केवल यह बता सकता था कि प्रेमसागर का गंतव्य कितना दूर है।

गाडरवारा, गाकड़, डमरू घाटी और कुम्हार


मेरी पत्नीजी यह सुन देख कर कहती हैं – बेचारे प्रेमसागर! तुमने उस शरीफ आदमी को कुम्हार की बस्ती खोजने में लगा दिया! शंकर भगवान तुम पर किचकिचा रहे होंगे। तुम उनका शोषण कर रहे हो ‌‌डिजिटल एक्स्प्लॉइटेशन! :-)

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