लौकी की बेल की झाड़ फूंक


नजर झाड़ना, ओझाई-सोखाई, डीहबाबा की पूजा, सत्ती माई को कढ़ईया चढ़ाना – ये सब ऑकल्ट कृत्य अभी भी चल रहे हैंं! हर लाइलाज मर्ज की दवा है इन कृत्यों में। मैंने गुन्नीलाल पाण्डेय जी से पूछा – कोई कोरोना की झाड़ फूंक वाले नहीं हैं?

चार जनवरी की सुबह और कोहरा


कोहरा मेरा प्रिय विषय है। जब रेल का अफसर था तो बहुत भय लगता था कोहरे से। बहुत सारी दुर्घटनायें और ट्रेन परिचालन के बहुत से सिरदर्द कोहरे के नाम हैं। पर रेल सेवा से मुक्त होने पर कोहरे का रोमांच बहुत लुभाता है।

सूर्यमणि तिवारी जी और मानस पाठ


सच तो यह है कि न जाने कितनो की रोजी रोटी उनसे जुड़ी हुई है और उन सबके घर में शाम का चूल्हा उनके अथक परिश्रम से जलता है। उनका बीमार होना उन सबके मानसिक पटल पर भी एक तनाव लाता होगा।
ऐसे कर्मठ लोगों की समाज को बहुत आवश्यकता है।

राजकुमार उपाध्याय की ह्वाट्सएप्प टाइमलाइन


आपको इन टाइमलाइन टुकड़ों से अंदाज हो जायेगा कि राजकुमार हम जैसे मनई हैं। स्नॉब नहीं हैं। शिकागो में भी माधोसिन्ह/औराई जिंदा रखे हैं और हिंदी पर अच्छी खासी पकड़ भी है उनकी।

फर्स्ट डे, फर्स्ट ब्लॉग 2022


गलन वाली सर्दी में घर में सबको नहला देने का पुनीत संकल्प उनका नव वर्ष का पहला प्रतीक है कि रीता पाण्डेय घर की बिनोवेलेण्ट तानाशाह हैं! 😆