घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर


मेरे बचपन में दहेज का मानक था — घड़ी, साइकिल और बाजा – रेडियो। तेल से चुआती जुल्फी टेये नई शादी वाला दुलहा गांव में साइकिल ले कर घड़ी पहने और रेडियो पर बिनाका गीत माला सुनता निकलता था। जलवा होता था। अब समय बहुत बदल गया है। बगल में शादी तय हुई है। छेकईयाContinue reading “घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर”

घर के बगीचे के कोने की दुनियाँ


घर के सामने की दांये कोने पर कम ही जाता हूं। वहां गूलर, नीम और पीपल के तीन पेड़ हैं। त्रिदेव की तरह। वहां रामसेवक घर की किचन गार्डनिंग करते हैं। एक कोने में दुमुही – सैंडबोआ और धामिन – असाढ़िया चूहे खाने वाले सांप की भी उपस्थिति है। कभी कभी तीतर भी अपना परिवारContinue reading “घर के बगीचे के कोने की दुनियाँ”

संहजन की फलियां सुखाई जा रही हैं


हमारे घर में संहजन नहीं है। एक लगाया था पर उसकी पत्तियां और फलियाँ कड़वी होती थीं। सो उसे हटा दिया। उसकी जगह कोई और फलदार पौधा लगा है। सुभाष जी को मालुम था कि हमारे यहां संहजन नहीं है। तो उन्होने ढेर सारी फलियाँ भेज दीं। काफी तो हमने दाल में उबाल कर चूसContinue reading “संहजन की फलियां सुखाई जा रही हैं”

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free