दूध लेते जाते मैं रोज वह पत्तियों का ढेर और भरसायँ देखता था। भरसायँ यानी मिट्टी का वह गोलाकार चूल्हा जिसमें दाना — चना, मक्का — भूना जाता है। गाँव में अभी भी दिख जाती है सड़क किनारे। मुझे रोज यह भी नजर आता है कि पत्तियों का जखीरा बढ़ रहा है। पर दाना भूननेContinue reading “धनरा भुंजईन की भरसायँ “
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महामृत्युंजय पाठ का भंडारा – अगियाबीर की एक शाम
कल प्रेमनारायण मिश्र जी रात पौने नौ बजे आये। वे चित्रकूट धाम से लौट रहे थे और आज होने वाले भंडारे का निमंत्रण देने आये थे। रात का समय, यात्रा की थकान, और उसके बावजूद उनका आग्रह—इससे ही आयोजन का भाव समझ में आ रहा था। प्रेमनारायण जी के यहां सात दिवसीय महामृत्युंजय मंत्र-जाप हुआContinue reading “महामृत्युंजय पाठ का भंडारा – अगियाबीर की एक शाम”
पूरन वर्मा की झंझरी
< गांवदेहात डायरी > तापक्रम चालीस डिग्री छूने लगा है। अब मिट्टी का मटका लेने का समय आ गया है। बाबू सराय में अमूल दूध वाले महेंद्र सिन्ह जी से पूछा—“आसपास कहीं मटकी की दुकान है? टोंटी लगी मटकी वाली?” उन्होंने बताया—“आगे करीब दो सौ मीटर पर एक दुकान है, अच्छी-अच्छी मिट्टी की चीजें मिलतीContinue reading “पूरन वर्मा की झंझरी”
