ठहरी हुई नाव और सतरंगा मोरपाखी


यह एक उपन्यास है। औपन्यासिक कृति का पढ़ना सामान्यत: मेरे लिये श्रमसाध्य काम है। पर लगभग पौने दो साल पहले मैने श्रीमती निशि श्रीवास्तव का लिखा एक उपन्यास पढ़ा था – “कैसा था वह मन”। उस पुस्तक पर मैने एक पोस्ट भी लिखी थी – कैसा था वह मन – आप पढ़ कर देखें! अबContinue reading “ठहरी हुई नाव और सतरंगा मोरपाखी”

खजूरी, खड़ंजा, झिंगुरा और दद्दू


शुरू से शुरू करता हूं। मिर्जापुर रेस्ट हाउस से जाना था मुझे झिंगुरा स्टेशन। मिर्जापुर से सीधे रास्ता है नेशनल हाई-वे के माध्यम से – ऐसा मुझे बताया गया। पर यह भी बताया गया कि वह रास्ता बन्द है। अत: डी-टूर हो कर जाना होगा वाया बरकछा। सवेरे मैने विण्ढ़म फॉल देखा था। यह नहींContinue reading “खजूरी, खड़ंजा, झिंगुरा और दद्दू”

विण्ढ़म प्रपात के आस पास


सुरेश विश्वकर्मा के मोबाइल पर फोन आते ही रिंगटोन में एक महिला अपने किसी फिल्मी पैरोडी के गायन में आश्वस्त करने लगती थी कि भोलेनाथ ने जैसे अनेकानेक लोगों का उद्धार किया है; उसी तरह तुम्हारा भी करेंगे। समस्या यह थी कि यह उद्धार उद्घोषणा बहुत जल्दी जल्दी होती थी। वह मेरे वाहन का ड्राइवरContinue reading “विण्ढ़म प्रपात के आस पास”

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