पद्मजा पाण्डेय के नये साल के ग्रीटिंग्स

इसमें चीनी पाण्डेय ने बहुत कुछ सीखा। अपने रोज के मिलने वाले, घर में काम करने वालों और आसपड़ोस के बच्चों से जुड़ाव सीखना एक सही बात है! गांव की समझ उससे मजबूत होती है।

पद्मजा (चीनी, चिन्ना) बहुत दिनोंं से कह रही थी नये साल को मनाने के लिये। स्कूल बंद होने से बच्चे को कोई नया करने को चाहिये। तब मैंने चीनी के साथ सोचा कि ग्रीटिंग कार्ड बनाये जायें। जब मेरे बच्चे छोटे थे तब यह सब मैं खाली समय में उनके साथ करती थी। ढाई तीन दशक बाद अब फिर मन हुआ वही सब करने के लिये अपनी पोती के साथ।

ग्रीटिंग कार्ड

महराजगंज के दुकान वाले सज्जन ने ग्रीटिंग कार्ड के बारे में पूछने पर कहा – आजकल ग्रीटिंग कौन खरीदता है मैडम ह्वाट्सएप्प के जमाने में!

स्कूल नहीं चल रहे तो दुकान में बच्चों के लिये चार्ट पेपर भी मिलना कठिन था, पर उनकी दुकान पर मोटा कागज पड़ा मिल गया। इतना मोटा भी नहीं था, पर कामचलाऊ तो था ही। दुकानदार को मैंने बताया कि घर पर ही पोती को सिखायेंगे ग्रीटिंग कार्ड बनाना।


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मोटा पेपर देख कर चिन्ना बहुत उत्साहित हुई। उसने कहा कि ग्रीटिंग कार्ड बनाने हैं और वाल हेंगिंग भी। कितने बनाने हैं उसकी गिनती होने लगी। एक एक बच्चे को ग्रीटिंग कार्ड देने में संख्या बहुत बड़ी हो रही थी। इसलिये यह तय किया गया कि एक परिवार को एक कार्ड और एक चाकलेट दिया जायेगा। उसमें उस परिवार के सारे बच्चे कवर हो जायेंगे।

वाल हैंगिंग

अपनी बिटिया के साथ तो मैं सुतली की वाल हैंगिंग, रुमाल में कढ़ाई, गुड़िया बनाना, साइंस की वर्कबुक में चित्र बनाना और तरह तरह के अन्य प्रॉजेक्ट्स में व्यस्त रहती थी। ड्राइंग और क्राफ्ट उनकी पढ़ाई का जरूरी हिस्सा हुआ करता था। अब पता नहीं स्कूलों में इस तरह के क्लास हुआ करते हैं या नहीं। चिन्ना के साथ साथ आगे पता चलेगा। आखिर, बच्चों के पूरे विकास के लिये हर तरह की क्रियेटिविटी तो बहुत जरूरी है।

ड्राइवर अशोक को ग्रीटिंग देती पद्मजा

इस साल चिन्ना स्कूल बंद होने के कारण अपने बाबा के साथ घर के बगीचे में घूम घूम कर साइंस और भूगोल की जानकारी लेती रहती है। घर के पेड पौधों, जीवों, सूरज के सवेरे से शाम तक घूमने और रात में चांद तारों की पोजीशन देखने परखने से उसे बहुत कुछ समझ आ रहा है। पर यह क्राफ्ट वाली रचनात्मकता भी मेरे ख्याल से जरूरी है।

ग्रीटिंग आदान प्रदान के बाद नीलम आण्टी (पतली वाली) और कुसुम आण्टी के साथ पद्मजा । नीलम और कुसुम घर में काम करती हैं।

मेरा नाती, विवस्वान तो अब छठी कक्षा में है। वह तबला बजाना, स्केच और पेण्टिंग करना सीख चुका है। आजकल कोडिंग सीख कर एप्प बनाने लगा है। चिन्ना को भी वह सब या उसी तरह की अपनी रुचि के मुताबिक करना है। इसकी डांस में रुचि है। गांव में उसे नृत्य कैसे सिखाया जा सकता है, अभी समझ नहीं आ रहा। वह कप्यूटर पर अपने बाबा के साथ पावरप्वाइण्ट बना कर अपनी बात समझाने की कला सीख गयी है। कभी लगता है वह अच्छी टीचर बनेगी।

पेपर वाले अंकल को ग्रीटिंग देते समय पद्मजा। अखबार वाले अपने साथ सेल्फी ले रहे थे चिन्ना की!

फिलहाल हम लोगों ने ग्रीटिंग्स और वाल हैंगिंग बनाये। इसमें चीनी पाण्डेय ने बहुत कुछ सीखा। अपने रोज के मिलने वाले और घर में काम करने वालों से पारिवारिक जुड़ाव सीखना एक सही बात है! गांव की समझ उससे मजबूत होती है।

उसके अलावा आस पड़ोस के बच्चे भी आये जिनको ग्रीटिंग कार्ड में ज्यादा रुचि नहीं थी, पर जो चिन्ना की दी चॉकलेट, घर के परिसर में खेलने और झूले पर बैठने-झूलने तथा चिन्ना की साइकिल चलाने में ज्यादा उत्साहित थे। वे दिन भर आते रहे और चीनी हो भी सामाजिक व्यवहार करने के अवसर मिले। हम लोग बच्चों के शोर से ऊब गये पर चिन्ना नहीं!

और यह सब तुच्छ से कागज पर कलर पेंसिल से कुछ उकेर कर ग्रीटिंग कार्ड बनने से हो पाया।


Author: Rita Pandey

I am a housewife, residing in a village in North India.

One thought on “पद्मजा पाण्डेय के नये साल के ग्रीटिंग्स”

  1. चीनी पाण्डेय का सर्वांगीण विकास हो रहा है । शहर में रहने वाले बच्चो को यह सुख नही मिल पाता क्योंकि उनके पास बाबा दादी जैसे शिक्षक नही।

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