लता और प्रदीप ओझा


होशंगाबाद से लौटते समय मेरे पास एक काम था – प्रदीप ओझा के घर जाना। प्रदीप भोपाल रेल मण्डल में वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक हैं। जब मैं उत्तर-मध्य रेलवे में मालगाड़ी परिचालन का कार्य देखता था, तो प्रदीप इलाहाबाद मण्डल के वरिठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक हुआ करते थे। वे एक ऐसे अफसर हैं जो सोते-जागतेContinue reading “लता और प्रदीप ओझा”

एक विभागीय हिन्दी पत्रिका से अपेक्षा


कुछ दिन पहले यहां पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय में राजभाषा की त्रैमासिक बैठक हुई। बैठक में सामान्य आंकड़ेबाजी/आंकड़े-की-बाजीगरी के अलावा वाणिज्य विभाग के हिन्दी कार्यों की प्रदर्शनी थी। महाप्रबन्धक महोदय ने उसका निरीक्षण किया और ईनाम-ऊनाम भी दिया। रूटीन कार्य। हिन्दी की बैठकें रूटीनेत्तर कम ही होती हैं। एक बात हुई। महाप्रबन्धक महोदय ने हिन्दी पत्रिकाContinue reading “एक विभागीय हिन्दी पत्रिका से अपेक्षा”

लाहे लाहे नेटवर्किंग करो भाई!


फ़ेसबुक में यह प्रवृत्ति देखता हूं। लोगों के पास आपका कहा, लिखा और प्रस्तुत किया पढ़ने की तलब नहीं है। आप उनका फ़्रेण्डशिप अनुरोध स्वीकार करें तो दन्न से मैसेंजर में उनका अनुरोध आता है फोन नम्बर मांगता हुआ। वे नेट पर उपलब्ध मूल भूत जानकारी भी नहीं पढ़ते। मसलन वे मेरे बारे में जानना चाहेंContinue reading “लाहे लाहे नेटवर्किंग करो भाई!”

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