बार-बार देखो; हजार बार देखो!


मेरे एक मित्र हैं. सारी टिप्स लेने और सारी गणना करने के बाद एक शेयर खरीदते है. फिर पांच मिनट बाद उसकी वैल्यू चेक करते हैं. अगर पांच पैसे बढ़ गयी तो दस लोगों को बताते हैं कि उनकी स्टॉक रिसर्च कितनी जबरदस्त है. उनका सेंस आफ टाइम कितना एक्यूरेट है. ये जितने ब्लॉगर हैं,Continue reading “बार-बार देखो; हजार बार देखो!”

मुझे बिग-बाजार में क्या गलत लगता है?


मैं किशोर बियाणी की पुस्तक पढ़ रहा हूं – “इट हेपण्ड इन इण्डिया.”* यह भारत में उनके वाल-मार्टिया प्रयोग का कच्चा चिठ्ठा है. कच्चा चिठ्ठा इसलिये कि अभी इस व्यवसाय में और भी कई प्लेयर कूदने वाले हैं. अंतत: कौन एडमण्ड हिलेरी और तेनसिंग बनेंगे, वह पता नहीं. पर बियाणी ने भारतीय शहरों में एकContinue reading “मुझे बिग-बाजार में क्या गलत लगता है?”

कुछ सफल और आत्म-मुग्ध (हिन्दी ब्लॉगर नहीं) लोग!


मेरा लोगों से अधिकतर इण्टरेक्शन ज्यादातर इण्टरकॉम-फोन-मीटिंग आदि में होता है. किसी से योजना बना कर, यत्न कर मिलना तो बहुत कम होता है. पर जो भी लोग मिलते है, किसी न किसी कोण से रोचक अवश्य होते हैं. अधिकतर लोग मेरे मुख्यालय में सोमवार की महाप्रबन्धक महोदय की रिव्यू मीटिंग में मिलते हैं. येContinue reading “कुछ सफल और आत्म-मुग्ध (हिन्दी ब्लॉगर नहीं) लोग!”

सुबोध पाण्डे की याद


सुबोध पाण्डे मेरे सीनियर थे रेल सेवा में. जब मैने रेलवे ज्वाइन की, तब वे पश्चिम रेलवे में मुम्बई मण्डल के वरिष्ठ परिचालन अधीक्षक थे. बाद में विभिन्न पदों पर वे मेरे अधिकारी रहे. मैं यहां उनके सनिध्य को बतौर रेल अधिकारी याद नहीं कर रहा. रिटायरमेण्ट के बाद वे अभी कहां पर हैं, यहContinue reading “सुबोध पाण्डे की याद”

नेगोशियेशन तकनीक : धीरे बोलो, हिन्दी बोलो


मैं अपनी बताता हूं. जब मैं आवेश में होता हूं – भाषण देने या ऐसी-तैसी करने के मूड़ में होता हूं तो अंग्रेजी निकलती है मुंह से. धाराप्रवाह. और जब धीरे-धीरे बोलना होता है, शब्दों को तोल कर बोलना होता है तब हिन्दी के सटीक शब्द पॉपकॉर्न की तरह एक-एक कर फूट कर सामने आतेContinue reading “नेगोशियेशन तकनीक : धीरे बोलो, हिन्दी बोलो”

गुज्जर आन्दोलन,रुकी ट्रेनें और तेल पिराई की गन्ध


परसों रात में मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल मुझे उठाता रहा. साहब, फलाने स्टेशन पर गुज्जरों की भीड़ तोड फोड कर रही है. साहब, फलने सैक्शन में उन्होने लेवल क्रासिंग गेट तोड दिये हैं. साहब, फलानी ग़ाड़ी अटकी हुयी है – आगे भी दंगा है और पीछे के स्टेशन पर भी तोड़ फोड़ है…. मैं हूं उत्तर प्रदेशContinue reading “गुज्जर आन्दोलन,रुकी ट्रेनें और तेल पिराई की गन्ध”