टोला डुमरी से देवघर


15 मार्च 23

आज रास्ता लम्बा था। छप्पन किलोमीटर का। मुझे यकीन नहीं था कि प्रेमसागर उसे पूरा चल पायेंगे। पर शायद प्रेमसागर को था। सवेरे छ बजे के पहले निकले होंगे वे टोला डुमरी खास से। रेत का इलाका जल्दी ही खत्म हो गया। घण्टे भर में ही। उसके बाद पहाड़ और जंगल। दो घाटियां पड़ीं – चकाई और रांगा। प्रेमसागर के शब्दों में रास्ता अंग्रेजी का डब्ल्यू बनाता था। ऊपर नीचे होता हुआ।

चकई घाटी में एक अजीब घटना हुई। एक बूढ़ा और अपंग आदमी एक लाइन होटल वाले से खाने को मांग रहा था और होटल वाले ने उसे दुत्कार दिया। प्रेमसागर को दुत्कारना बुरा लगा। बूढ़े से बातचीत की तो उसने बताया कि पास के गांव का है वह। उसकी पतोहू जंगल से लकड़ी काट कर लाती है। उसे बेच कर वे भोजन का इंतजाम करते हैं। पतोहू बीमार है। जंगल नहीं जा पा रही। खाने को नहीं है। तो उसने दो दिन से खाना नहीं खाया है।

प्रेमसागर ने अपने पास मौजूद चिवड़ा और चीनी उस वृद्ध को दिया। अपने पास से एक प्लास्टिक की बोतल में उसे पानी भी दिया।

प्रेमसागर ने अपने पास मौजूद चिवड़ा और चीनी उस वृद्ध को दिया। साथ में रोती उसकी पोती को दस रुपये बिस्कुट लेने को दिये। अपने पास से एक प्लास्टिक की बोतल में उसे पानी भी दिया। चिवड़ा-चीनी-पानी का भोजन पा कर वृद्ध ने आशीर्वाद दिया – आगे तुम्हारी यात्रा सकुशल और सफल होगी।

चिवड़ा-चीनी-पानी का भोजन पा कर वृद्ध ने आशीर्वाद दिया – आगे तुम्हारी यात्रा सकुशल और सफल होगी।

सहायता करने और वह आशीर्वाद पाने से प्रेमसागर जरूर रोमांचित हुये होंगे। उन्होने तुरंत फोन कर मुझे इस घटना की जानकारी दी। लगा कि महादेव स्वयम परीक्षा ले रहे हों प्रेमसागर की करुणा और दया की। और वे उसमें पास हो गये हों।

आगे ऊंचाई और नीचाई पड़ी जंगली इलाके की। पलाश फूला था चटका लाल लाल। “भईया, ऐसा लग रहा था मानो माई यात्रा में मुझे आशीर्वाद दे रही हों लाल रंग के फूल बिछा कर।” माता को लाल रंग प्रिय है।

कई जगह सड़क छोड़ पगडण्डी पकड़ चले प्रेमसागर। उससे आराम भी रहा और दूरी भी कुछ कम हुई। “फिर भी बहुत चलना पड़ा भईया आज। और ऊंचाई-नीचाई के कारण मेहनत भी रही। लेकिन गया वाले दिन (उस दिन 74 किमी चलना पड़ा था गया में जगह न मिल पाने से) से कम ही चलना पड़ा। कच्चे रास्ते चलते हुये मैं सीधे माधोपुर पंहुचा। वहां से बिहार-झारखण्ड बार्डर पास ही है। मन में बाबा धाम में पंहुचने का जोश तो था ही।” – प्रेमसागर ने शाम के समय बाबा धाम – देवघर पंहुच कर बताया।

“भईया, ऐसा लग रहा था मानो माई यात्रा में मुझे आशीर्वाद दे रही हों लाल रंग के फूल बिछा कर।”

रास्ते में सड़क किनारे कई जगह टेबल लगाये सत्तू का शर्बत बेचते लोग थे। जहां भी वे मिले, प्रेमसागर ने सत्तू पिया। उससे ऊर्जा भी मिली और शरीर को पानी भी। करीब 8-9 जगह सत्तू का शर्बत पिया होगा, प्रेमसागर बोले। दस रुपये का एक ग्लास सत्तू। उसके अलावा रास्ते में एक जगह रसगुल्ला खा कर पानी पिया। इन्ही के बल पर 56 किमी की यात्रा सम्पन्न की।

देवघर से पहले नदी पड़ती है। मयूराक्षी नाम है गूगल मैप पर। मैंने उसके बारे में पूछा।

“भईया अंधेरा हो गया था सो फोटो नहीं ले पाया। नदी में पानी रहता है पर पहले कहीं पानी रोकने का फाटक लगा है। पानी सिंचाई के काम लाते होंगे। इसलिये पानी कम था। बरसात के मौसम में खूब पानी होता है। और इस साल बारिश भी कम ही हुई है। पानी कम होने का वह भी कारण है।”

मोनू पण्डा जी ने बाबा बैजनाथ के मंदिर पर दण्डवत के बाद पास की दुकान में जलपान कराया।

बाबाधाम में अनेक बार कांवर के साथ आने के कारण बहुत से लोग प्रेमसागर के परिचित हैं। मोनू पण्डा जी ने उनके रहने का इंतजाम किया है। सामान रख बाबा बैजनाथ को प्रणाम करने गये प्रेमसागर। रात हो गयी थी, तो मंदिर बंद हो गया था। बाहर से ही बाबा को दण्डवत किया। कल वे सवेरे पुन: आयेंगे दर्शन करने। दर्शन के बाद ही रवाना होंगे वासुकीनाथ के लिये।


मेरे अनुसार, प्रेमसागर में लम्बी यात्राओं से बड़े सार्थक परिवर्तन हुये हैं। प्रकृति के दर्शन और ईश्वर के प्रति श्रद्धा में कोई विरोधाभास नहीं है – यह उन्हें समझ में आया है। गूगल नक्शे का बेहतर प्रयोग करने लग गये हैं। भौगोलिक स्थिति का अध्ययन, लोगों का व्यवहार, आदतें आदि देखने समझने की ड्रिल ने उनके व्यक्तित्व को निखारा है।

और दिन यात्रा विवरण लिखने में मुझे बहुत प्रश्न करने होते हैं और बहुत से इनपुट मुझे खुद को खंगालने होते हैं। आज वह उतना नहीं करना पड़ा। बाबाधाम प्रेमसागर का अपना क्षेत्र है और वहां पंहुचने की ललक ने प्रेमसागर को स्वत: मुखर बना दिया है। अपने से ही वे छोटी छोटी जानकारियां देते गये मुझे। इसके अलावा पलाश वन की लालिमा के साथ माई के आशीर्वाद की कल्पना करना अच्छा लगा। प्रेमसागर यात्रा विवरण देने-लिखने की बारीकियां समझने लगे हैं। जानने लगे हैं कि वह मात्र चित्र देना या घटना की बेसिक जानकारी देना भर नहीं होता। उसमें यह भी जानने की जिज्ञासा का भाव लाना होता है कि कोई चीज कैसी क्यों है। मयूराक्षी में पानी अगर कम है तो क्यों है। रास्ता अगर अनड्यूलेटिंग है तो उसे डब्ल्यू कहा जा सकता है। हां, उस बूढ़े की अपंगता नहीं बताई उन्होने अपने से। वह तो चित्र में साइकिल का चक्का देख मैंने पूछा, तब उन्होने बताया कि वह अपंग था और ट्राईसाइकिल से चल रहा था।

मेरे अनुसार, प्रेमसागर में लम्बी यात्राओं से बड़े सार्थक परिवर्तन हुये हैं। प्रकृति के दर्शन और ईश्वर के प्रति श्रद्धा में कोई विरोधाभास नहीं है – यह उन्हें समझ में आया है। गूगल नक्शे का बेहतर प्रयोग करने लग गये हैं। भौगोलिक स्थिति का अध्ययन, लोगों का व्यवहार, आदतें आदि देखने समझने की ड्रिल ने उनके व्यक्तित्व को निखारा है। पर लोगों, स्थानों आदि के नाम सही सही सुनना और याद रखना उनका बहुत ही कमजोर पक्ष सतत बना हुआ है। इसको ले कर कभी कभी बहुत खीझ होती है। इस विषय पर समय मिलता रहेगा लिखने के लिये। :lol:


देवघर में अपने सहायक कुछ मित्रों के साथ प्रेमसागर। बीच में हैं शंकर जी और दांये हैं ताराकांत झा।

मोनू पण्डा जी ने बाबा बैजनाथ के मंदिर पर दण्डवत के बाद पास की दुकान में जलपान कराया। रात में भोजन भी उन्हे के सौजन्य से होगा। रहने की व्यवस्था तो है ही। अगले दिन बैजनाथ धाम दर्शन के बाद आगे निकलेंगे प्रेमसागर वासुकीनाथ के लिये। वासुकीनाथ दर्शन के बाद उन्हें बंगाल में धंसना है।

जब यात्रा प्रारंभ की तो मध्यप्रदेश था. उसके बाद उत्तर प्रदेश और फिर बिहार। अब झारखंड। चार प्रांतों की धरती पर चल चुके हैं प्रेम सागर!

हर हर महादेव! जय बाबा बैजनाथ! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

नेवादा – सिकंदरा – टोला डुमरी


13 मार्च 23

प्रेमसागर में चलने का उत्साह बरकरार है, या यूं कहा जाये कि उठना और निकल लेना उनकी आदत बन चुकी है। चार बजे सवेरे उठ कर रवाना हो गये हैं। सवेरा होने पर एक चाय की दुकान का चित्र है। खास बात यह है कि एक महिला दीखती है दुकान में चाय बनाते हुये।

उसके बाद उनके लाइव लोकेशन के सेम्पल, जब कभी नेट ठीक होने पर ही मिलते हैं, उससे उनकी चाल काफी तेज होने का आभास होता है।

सवेरा होने पर एक चाय की दुकान का चित्र है। खास बात यह है कि एक महिला दीखती है दुकान में चाय बनाते हुये।

लाइव लोकेशन आज कम ही मिली। नेटवर्क शायद ठीक काम नहीं कर रहा था। दोपहर तीन बजे रास्ते से दूर किसी और जगह नजर आयी उनकी लोकेशन। फोन कर पता किया तो बताया कि सिकंदरा में टनटन मुंशी जी मिल गये थे। मुंशी जी लखीसराय में कोर्ट के मुंशी हैं और बाबाधाम के प्रेमसागर के सोमवारी कांवर जोड़ीदार रहे हैं। उन्होने ने प्रेमसागर को अपनी मोटर साइकिल से लखीसराय ले जाने और कल भोर में वापस सिकंदरा छोड़ने को राजी कर लिया। अपने घर पर बढ़िया, शुद्ध चने का सत्तू बनवाये हैं मुंशी जी ने प्रेमसागर के लिये। यात्रा में सत्तू साथ होना जरूरी है।

लोकेशन में वे सिकंदरा से लखीसराय के रास्ते पर थे, टनटन मुंशी के साथ उनकी मोटर साइकिल पर।

इलाका प्रेमसागर के परिचित कांवर-संगी लोगों से भरा है। जैसे जैसे देवघर पास आयेगा, और भी लोग मिलेंगे! प्रेमसागर 101 बार सुल्तानगंज से बैजनाथ धाम कांवर ले कर जल चढ़ा चुके हैं। यह काम वे दो साल तक प्रति सोमवार करते रहे हैं। इसके अलावा तीन बार दण्ड यात्रा – लेट लेट कर दूरी पार करना – भी कर चुके हैं। इसलिये इलाके में लोग उन्हें सुम्मारी (सोमवारी) बाबा या दण्डी बाबा के नाम से भी सम्बोधित करते हैं।

टनटन मुंशी को रास्ते में ही कोई अर्जेण्ट काम आ पड़ा। वे सुम्मारी बाबा को वापस सिकंदरा ला कर छोड़े। सिकंदरा में प्रेमसागर को मिले ललन मिश्र। ललन मिसिर भी कांवर यात्री रह चुके हैं। वे हर पूर्णिमा को जल चढ़ाने बाबा धाम जाते रहे। ललन मिसिर सिकंदरा में हनुमान मंदिर के पुजारी हैं। चित्र में काफी बड़ा दीखता है हनुमान मंदिर। प्रेमसागर ने बताया कि मंदिर परिसर में पांच कमरे हैं जिनमें गंगोत्री यात्रा करने वाले श्रद्धालु लौटानी में विश्राम करते हैं या शादी-ब्याह में उन कमरों की बुकिंग होती है। वहीं प्रेमसागर के रहने का इंतजाम हुआ है।

जगत जननी जगदम्बा की काले रंग की प्रतिमा बहुत सुंदर है। बहुत सुंदर हैं उनकी आंखें।

ललन मिश्र जी ने प्रेमसागर को जगत जननी जगदम्बा मंदिर के दर्श भी कराये। सन 1977 में बना है यह मंदिर और माँ की काले रंग की प्रतिमा बहुत सुंदर है। बहुत सुंदर हैं उनकी आंखें। माथे पर तीसरा नेत्र भी है। उतने सुंदर तरीके से चित्र आ नहीं पाया।

ललन मिश्र जी ने प्रेमसागर को रहने का इंतजाम किया। भोजन उनके घर पर नहीं हो सका। सूतक में था ललन का परिवार। आगे यात्रा के अगले दिन के पड़ाव का इंतजाम उन्होने कर दिया है। सिकंदरा से 44 किमी आगे टोला डुमरी में।

ताड़ के कई गाछ दीखते हैं

इलाके की बात करते प्रेमसागर बताते हैं कि ताड़ के कई गाछ दीखते हैं इस रास्ते पर। सरकार ने सड़क किनारे साखू (सागौन) और सफेदा भी लगाया है। पेड़ बड़े हो गये हैं। खेती तो सामान्य सी है। सड़क किनारे पेड़ हैं तो छांव मिलती जाती है।

14 मार्च 23

गया के आसपास की धरती शापित है। प्रेमसागर यह बार बार कहते हैं। नदियों में पानी नहीं है। पर शाप का असर बहुत धीरे धीरे कम हो रहा है। लोग कहते हैं कि बीस कोस तक शाप था सीता माई का। पर उससे ज्यादा दीखता है।

आज कुछ देर से निकले प्रेमसागर। शायद छ बजे। उन्हें सिकंदरा से खैरा के रास्ते जमुई जिले में दक्षिण की तरफ उतरते टोला डुमरी तक जाना है। खैरा के आगे पड़ता है मंगोबदर और फिर सोने तहसील। किसी बर्नार नदी के समांतर चलना है। सोने के पहले बर्नार पार होती है। नक्शे में बड़ी नदी दीखती है। पर नदी क्या है? रेत की नदी। एक बूंद पानी नहीं। रेत ही रेत। लोगों को रेत उत्खनन के पट्टे मिले हैं। जेसीबी मशीन और ट्रेक्टर-डम्पर काम पर लगे हैं। कई जगह लोगों के रेत के जखीरे लगे हैं।

सीता माई का शाप एक तरफ; इस रेतीले फिनॉमिना का कोई भौगोलिक कारण तो होगा? गया, नेवादा, लखीसराय का दक्षिणी भाग, जमुई, खैरा और अब यह सोने-टोला डुमरी – यहां जमीन पर पानी नहीं पर पचास फिट नीचे पानी है। मॉनसून का मौसम नदियों में बाढ़ लाता है। पर बाढ़ से उपजाऊ मिट्टी नहीं आती। रेत भर आती है। उस रेत में ताड़ के पेड़ उगते हैं। या सरपत। कुल मिला कर वही जी रहा है जो रेत से जद्दोजहद करने का माद्दा रखता है।

प्रेमसागर की यह यात्रा नहीं होती तो मैं इस फिनॉमिना को महसूस ही नहीं कर पाता। मैं तो यही मान कर चलता कि बरसात में बाढ़ आती है और उसके बाद खूब अच्छी फसल लेते हैं बिहारी। पर गरीबी का एक बड़ा घटक – फालगू और बर्नार जैसी नदियों का शापित होना है।

यहां नहरें क्यों नहीं आयीं? नहरें शायद सही विकल्प नहीं होतीं। सोन नदी – या जो भी नदी हो, उसका, पानी यहां आते आते 20-30 प्रतिशत सूख जाता नहरों में। शायद बड़ी पाइप के जरीये पानी आ सकता था या आ सकता है। बड़ी पाइप की नहरों का जाल!

रुक्ष भूगोल के बावजूद जीवन है। खेतों में गेंहू पक गया है। कटाई हो रही है। पिछली फसल का पुआल दीखता है। चीजें उतनी खराब नहीं, जितनी मैं सोचता हूं।

मैंं जिला भदोही के एक गांव में बैठा डियाकर (डिजिटल यात्रा कथा लेखक) सोचे जा रहा हूं। कहीं बेहतर सोचा होगा जल प्रबंधन करने वाले विद्वानों नें। पर हुआ कुछ नहीं। बरनार जैसी नदियां रेत की नदियां हैं।

टोला डुमरी बड़ा गांव है। दस हजार की आबादी होगी। खास बात यह है कि बहुत भव्य मंदिर हैं यहां पर। देवी पार्वती और शंकर भगवान का मंदिर। और भी देव हैं। विष्णु भी हैं, लक्ष्मी भी और हनुमान जी भी। एक सज्जन को फोन थमा देते हैं प्रेमसागर। वे मुझे बताते हैं टोला डुमरी का प्राचीन इतिहास। यह जगह आदि काल में कंचनपुर था। शिव जी का जो मंदिर है वह कंचनेश्वर महादेव है। अभी का मंदिर नया है। पर यह तीन बार विस्थापित होने पर बना है। पास में किसी पुराने मंदिर के भग्नावशेष हैं। एक पत्थर भी है वहां जिसपार पाली (?) में कुछ लिखा है। वे बताते हैं कि औरंगजेब काल में इसे तोड़ा गया। नया मंदिर किसी गिद्दर महराज ने बनवाया।

प्रेमसागर ने मंदिर और वहां के लोगों के चित्र भेजे हैं। ज्यादा न जोड़ते हुये वे मैं यहां प्रस्तुत कर देता हूं।

आज रास्ते में सिकंदरा से निकलते ही प्रेमसागर का पिट्ठू फट गया। गमछे से बांध कर वे पंद्रह बीस किमी चले। फिर खैरा में नया बैग खरीदा। “भईया, पहला बैग कपड़े का था। चार सौ किलोमीटर साथ दिया। मेंअ बात है कि पीठ पर पसीने और रगड़ से फट गया। अब यह नया बेहतर है। साढ़े आठ सौ का है। चमड़ा और रेक्सीन लगा है। मजबूत दीखता है।”

फटे पिट्ठू पर ट्वीट

पदयात्रा में एक अच्छा पिट्ठू और अच्छी लाठी – यही प्रेमसागर की जरूरत है।

नया पिट्ठू

टोला डुमरी में बहुत लोग मिले प्रेमसागर को। पुजारी जी ने उनके लिये दूध-चिवड़ा का इंतजाम किया। एक और उम्रदराज सज्जन बोले – बाबा, मेरे घर में लहसुन प्याज के बिना भोजन बनता है। वहीं से आपके लिये रोटी-सब्जी ले कर आया हूं।

दूध चिवड़ा, रोटी सब्जी और मंदिर के फर्श पर डेरा। प्रेमसागर के लिये तो इस जगह पिकनिक मन गयी!

कल देवघर का रास्ता लम्बा है। रास्ते में जंगल भी है। शायद सीता माता का शाप पूरी तरह खत्म हो जाये तब तक। कल बिहार से झारखण्ड में घुस जायेंगे प्रेमसागर।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

दिनेश पगला



सवेरे मडैयाँ डेयरी का दृश्य। दूध के बाल्टों, ड्रम तथा दूध देने आये किसानों से भरी जगह के बीच छोटे से स्पेस में वह उछल कर, आगे कूद कर, हाथ लहरा कर, नमस्कार कर और मेरे बारे में पता चलने पर मुझे बार बार चरण छूने का प्रयास कर जो कुछ कर रहा था, वह बहुत रोचक था। डेयरी के उस दूध कलेक्शन सेण्टर पर उजाला बहुत ज्यादा नहीं था। चित्र बहुत साफ नहीं आये। एक छोटे वीडियो में उसकी आकृति भी धुंधली है। पर उसका चरित्र बहुरंगी था।

पास के गांव का रहने वाला है वह। नाम है दिनेश बिंद। मुझे चलते समय वह अपना परिचय देता है – आप को कौनों काम हो, पता कर लीजियेगा। लोग मुझे दिनेश पगला के नाम से जानते हैं। हर कोई मेरे बारे में बता देगा।

डेयरी के उस मेक-शिफ्ट रंगमंच पर जो प्रहसन वह कर रहा था उसकी स्क्रिप्ट में कोई ट्रक या वाहन था। उसका यह क्लीनर। कट्टा लहराते लुटेरे थे और इसने मालिक का “इतना-इतना (वह हाथ से बहुत मोटी गड्डी नोटों की बना कर दिखाया)” पैसा बचा लिया। उस प्रहसन से जो निकल कर आया वह यह कि दिनेश पगला ईमानदार, कर्मठ और दिलेर है।

दिनेश ‘पगला’ बिंद और मैं।

ऐसे चरित्र रोज रोज नहीं मिलते। पहले मुझे लगा कि वह कुछ मानसिक रूप से सरका हुआ है। पर उसने बताया कि गांव के आसपास के भगत लोगों के साथ उत्तराखण्ड, झारखण्ड, गया आदि कई जगहों पर पैदल यात्रा कर चुका है। भगत लोग अपने साथ उसे सामान ले कर चलने या छोटा मोटा काम करने के लिये साथ ले कर जाते हैं। कुल मिला कर उनका कुली होता है वह। … मैं अगर (और यह शेखचिल्ली सोच है) साइकिल से भारत भ्रमण पर निकलूं तो साथ में इस जोकर को बतौर कुली एक साथ की साइकिल पर ले कर चल सकता हूं। मैंने सोचा!

उसके साथ मैंने एक चित्र खिंचवाया। डेयरी के सुभाष ने खींचा। पर रोशनी अच्छी न होने और शायद क्लिक करनें में सुभाष के दक्ष न होने से चित्र अच्छा नहीं आ पाया। … ऐसे लोगों के साथ यादगार बनी रहनी चाहिये।

डेयरी से निकल साइकिल पर भी हाथ लहराते, अपने से कुछ बोलते बड़बड़ाते वह जा रहा था। साइकिल बढ़िया चला रहा था। मुझे फिर लगा कि वह मेरा यात्रा-कुली बन सकता है।

पर अगले दिन सुभाष ने मेरी सोच पर पानी फेरा – “दिनेश बिंद है तो ठीक पर हमेशा नशे में रहता है। नशे के लिये कुछ भी मिल जाये उसे। किसी भी चीज से परहेज नहीं। काम मन लगा कर करता है। पर कहीं टिकता भी नहीं। मर्जी का मालिक है।”

अब यात्रा कुली साथ ले कर हमेशा उसके नशे का इंतजाम तो कर नहीं सकता। और कभी वह टुन्न हो कर गरियार बरदा (वह बैल जो कोंचने और डण्डे से मारने पर भी हल चलाने को तैयार न हो) की तरह अड़ जाये तो बहुत बड़ी लायबिलिटी होगा।

पर, फिलहाल, उस दिन उसका प्रहसन बहुत रोचक लगा। वह डेयरी पर किस लिये आया था, पता नहीं। शायद पता करने आया था कि डेयरी पर दूध दिया जा सकता है या नहीं।

हो सकता है, वह वहां दूध ला कर देते रोज दिखने लगे! संभावना कम है।

गांवदेहात में कोई थियेटर या सिनेमा तो है नहीं। दिनेश पगला जैसे लोग उसकी कमी पूरी करते हैं। उसके पांच मिनट के प्ले से मजा भी आया और आईडियाज भी आये दिमाग में! :-)

फिर मिलना चाहिए, दिनेश पगला!


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