भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
काशी विश्वनाथ (विश्वेश्वर महादेव) दर्शन कर मेरे बेटी-दामाद और मेरी सलहज गेट नम्बर चार के आसपास एक गोलगप्पे वाले के पास रुके।
विवेक और वाणी धार्मिक जीव हैं। नवरात्रि, डाला छठ और हिंदुइज्म के जो भी आचापांचा व्रत उपवास होते हैं, करते हैंं। जो भी मंदिर दीखते हैं, वहां पूरी श्रद्धा से दर्शन करने जाते हैं। उनकी पांच सात प्रतिशत आस्था मुझमें होती तो मैं थोड़ा प्रयत्न कर एक बाबा टाइप जरूर बन जाता; या कम से कम यू-ट्यूबर बाबा बन जाता। पर वह दृढ़ आस्था मुझमें नहीं है। :sad:
विश्वनाथ मंदिर दर्शन के बाद कुछ जलपान को तलाश रहे थे वे लोग कि ये गोल गप्पे वाले का ठेला दिख गया। वाणी ने मुझे बाद में बताया कि बहुत स्पेशल था गोल गप्पे वाला। आठ-नौ प्रकार के गोलगप्पे के पानी बना रखे थे उसने। इसके अलावा बहुत ही साफ सुथरा। जबरदस्त हाईजीन। इन लोगों ने जम कर अलग अलग प्रकार के गोलगप्पे के पानी के साथ गोलगप्पे चखे और फिर भांति भांति के पानी का अलग से स्वाद लिया। उसके बाद सर्वसम्मति से तय किया कि छब्बीस जनवरी को विवस्वान पाण्डेय (विवेक वाणी के पुत्र और मेरे नत्तू पांड़े) के यज्ञोपवीत संस्कार में ऐसा ही गोलगप्पे का स्टॉल होना चाहिये।
अभिषेक मिश्र, गोलगप्पे वाले
गोलगप्पे वाले अभिषेक कुमार मिश्र को प्रस्ताव दिया तो वे कूद कर तैयार हो गये। उन्होने बताया कि हाल ही में वे बिहार में इसी तरह की स्टॉल एक समारोह में लगा चुके हैं। इस तरह के समारोहों में उत्कृष्ट सेवा देने में वे माहिर हैं।
सो तय हुआ है कि बनारस से बोकारो जायेंगे अभिषेक मिश्र, गोलगप्पे वाले। यहां से उनके गोलगप्पे के पानी का 8-10 तरह का मसाला और तैयार गोलगप्पे भी ले जाये जायेंगे। उनके अपने वाले स्वाद के लिये वे लोकल झारखण्डी गोलगपा नहीं, अपना वाला ही इस्तेमाल करेंगे। हजारों मेहमानों की भीड़ के लिये गोलगप्पे कैसे ले जाये जायेंगे, यह भी देखने की बात होगी।
विकास (मेरे छोटे साले साहब) ने बताया कि अभिषेक मिसिर के लिये एक सेट कुरता-धोती का इंतजाम भी बोकारो में किया जा रहा है। जिसे पहल कर वे खांटी बनारसी लुक देते हुये गोलगप्पा सर्व करेंगे!
काशीनाथ सिंह ने बनारस के पप्पू चाय वाले को फेमस कर दिया। अब विवेक वाणी अभिषेक मिसिर को बनारस से बोकारो घुमा कर फेमस कर देंगे। या अभिषेक पहले से ही फेमस हैं? पता नहीं। चित्र में अभिषेक जो कागज दिखा रहे हैं उसमें उनका मोबाइल नम्बर, बैंक अकाउण्ट नम्बर आदि सब कुछ है। उनके बारे में ज्यादा डीटेल्स मुझे नहीं मिली हैं। क्या सुझाव है – मोबाइल नम्बर डायल कर अभिषेक से ही पूछा जाये?
पता नहीं बनारस में अभिषेक जैसे कितने तराशे और/या अनगढ़ हीरे होंगे!
सर्दी में ठिठुरता देहात ऊष्मा की तलाश में बहुत सा समय लगाता है। आदमी, औरत, बच्चे – सभी अपने दिन का महत्वपूर्ण समय लकड़ी, टहनी, सूखे पत्ते आदि बीनने में लगाते हैं। उस समय का उपयोग किसी और अर्थपूर्ण कार्य में लग सकता था। मसलन बच्चे पढ़ाई कर सकते थे, महिलायें और पुरुष कोई ऐसा काम कर सकते थे जिससे आमदनी हो या घर बेहतर बन सके। पर उस सब की बजाय अलाव के लिये ईंधन बटोरने में लगी है गंवई आबादी।
मेरे घर के बगल में टुन्नू (शैलेंद्र दुबे) का अहाता निर्बाध खुला है पास के गांव वालों के लिये। टुन्नू ने चारदीवारी तो बनवाई है पर उसमें (शायद जानबूझ कर) गेट नहीं लगवाया। आसपास के पसियान, चमरऊट, केवट बस्ती के लोग उनके परिसर के पेड़, पौधों, वस्तुओं (मसलन हैण्ड पम्प) को अपना मान कर इस्तेमाल करते हैं। इतना उदात्त मैं कभी नहीं बन सका। और शायद बन भी नहीं सकूंगा। … मैं अपने व्यक्तिगत स्पेस में कोई अतिक्रमण सह नहीं सकता।
टुन्नू के अहाता में दो दर्जन से ज्यादा पेड़ हैं। ज्यादातर उनके दिवंगत पिताजी (मेरे श्वसुर जी) ने लगाये थे। उनमें कई सागौन के वृक्ष हैं। आजकल उनके पत्ते झरते हैं। हवा चलती है तो ज्यादा ही झरे मिलते हैं। गांव भर के बच्चे आ आ कर उन पत्तों को बीनते हैं।
एक सागौन की सूखी पत्ती कितने कैलोरी या जूल एनर्जी देती होगी? यह खोजने के लिये मैं गूगल सर्च करता हूं। बदल बदल कर सवाल पूछने पर भी इण्टरनेट कोई सही जवाब नहीं देता। इण्टरनेट शहराती लोगों का झुनझुना है। उसे गांवदेहात की पत्ता बीनती सर्दी से कोई लेना देना नहीं हुआ होगा।
उस दिन हवा तेज थी और पत्ते खूब झर रहे थे। दो बच्चे दौड़ दौड़ कर उन्हें बीन रहे थे। इकठ्ठा करने के लिये उन्होने कपड़े के चादर नुमा टुकड़े बिछा रखे थे। एक बोरी भी थी उनके पास। एक जगह के सभी पत्ते बीन कर वे कपड़े की पोटली उठा कर दूसरी जगह बिछा कर वहां के आसपास बीनते थे। बीनने को खूब था।
सूखे पत्ते जैसी तुच्छ वस्तु, जिसका कोई मोल नहीं लगाता और जो कूड़ा-करकट की श्रेणी में आती है, किसी को इतनी प्रसन्नता दे सकती है?! गरीबी की प्रसन्नता!
बच्चे नंगे पैर हैं पर शरीर पर कपड़े पर्याप्त हैं। उनमें से एक की पैण्ट (या लोअर) ढीली है। वह बार बार उसे ऊपर सरकाता है। पत्तों की पोटली बनाने के लिये वह झुकता है तो पैण्ट नीचे सरक जाती है। वह तो अच्छा है कि उसके अण्डरवीयर जैसा कुछ पहन रखा है। आखिर अब इतनी कम उम्र का भी नहीं है वह कि शरीर दिखाता घूमे।
उनमें गरीबी है, पर वैसी विकट गरीबी नहीं जो मैंने अपने बचपन में देखी है। फिर भी सर्दी उन्हें सूखे पत्ते और टहनियां जैसी निर्मोल चीजें बीनने में दिन के तीन चार घण्टे बिताने को बाध्य करती है। मेरा ड्राइवर बताता है कि इनके घर के आसपास जो भी जमीन है, उसमें पत्ते जमा कर रखे हैं परिवारों ने। सुबह शाम कऊड़ा जलाने के लिये पत्तियां निकालते जाते हैं। पत्तियाँ ऊष्मा बहुत देती हैं पर जल्दी से बुझ भी जाती हैं। एक सागौन की सूखी पत्ती कितने कैलोरी या जूल एनर्जी देती होगी? यह खोजने के लिये मैं गूगल सर्च करता हूं। बदल बदल कर सवाल पूछने पर भी इण्टरनेट कोई सही जवाब नहीं देता। इण्टरनेट शहराती लोगों का झुनझुना है। उसे गांवदेहात की पत्ता बीनती सर्दी से कोई लेना देना नहीं हुआ होगा।
बच्चे नंगे पैर हैं पर शरीर पर कपड़े पर्याप्त हैं। उनमें से एक की पैण्ट (या लोअर) ढीली है। वह बार बार उसे ऊपर सरकाता है। पत्तों की पोटली बनाने के लिये वह झुकता है तो पैण्ट नीचे सरक जाती है।
सूखा पत्ता बीनता बचपन; पत्ता समेटता गांव … यह वह अनुभव है जो यहां होने वाला ही देख, जान सकता है!
ज्ञानदत्त पाण्डेय – मैं भदोही, उत्तरप्रदेश के एक गांव विक्रमपुर में अपनी पत्नी रीता के साथ रहता हूं। आधे बीघे के घर-परिसर में बगीचा हमारे माली रामसेवक और मेरी पत्नीजी ने लगाया है और मैं केवल चित्र भर खींचता हूं। मुझे इस ब्लॉग के अलावा निम्न पतों पर पाया जा सकता है।
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वे कहते हैं कि नब्बे के आसपास होंगे। इलाके में बूढ़ों की उम्र ज्यादा बताने का फैशन है। जितना कहा जाता है उसमें 8-10 साल तक मजे से घटाया जा सकता है और तब भी आपका आकलन गलत होने की सम्भावना नहीं होती।
मैं पास के गांव भगवानपुर तक साइकिल चला रहा था। कई चक्कर लगा चुका था। तभी वे लाठी टेकते भगवान पुर की ओर जाते दिखे। मैंने पीछे से उनका चित्र लिया नोकिया के 3111 मोबाइल से; और उनसे आगे निकल गया। मेरे वापस लौटने तक वे कुछ ही कदम चले होंगे। सामने से उनका चित्र लेते समय उन्होने मुझे रोक लिया।
वे लाठी टेकते भगवान पुर की ओर जाते दिखे। मैंने पीछे से उनका चित्र लिया नोकिया के 3111 मोबाइल से; और उनसे आगे निकल गया।
वे सज्जन मुझे जानते थे। मैंने भी पहले देख रखा था। नाम नहीं जानता था। यह भी नहीं जानता था कि वे भगवानपुर के मिसिर हैं या राय। पर अपरिचय नहीं जताया और उनका नाम भी नहीं पूछा। वह तो बातचीत में निकला कि वे राजमणि राय हैं। उम्र उन्होने बताई – नब्बे होये। (नब्बे के आसपास होगी)।
नब्बे साल का व्यक्ति एक किलोमीटर चल कर सब्जी ले कर लौट रहा हो – यह तो बड़ी बात थी! पर जब उन्होने बात बात में बताया कि मेरे श्वसुर जी उनसे उम्र में कुछ बड़े रहे होंगे तो लग गया कि उनकी बताई उम्र में दस साल आसानी से घटाया जा सकता है। मेरे श्वसुर जी की पैदाइश 1938 की होगी। अत: वे अस्सी साल के आसपास होंगे। पर अस्सी भी कोई कम उम्र नहीं होती!
राजमणि राय।
मैंने उनसे पूछा कि उनके पास कोई मोबाइल है, जिससे बाद में बात कर उनसे मिलने उनके घर जाया जा सके। अस्सी साल के आदमी से उनके संस्मरण सुनना भी अच्छी खासी ‘मानसिक हलचल’ खुदबुदाता सकता है। बुढापे के बावजूद उनकी आवाज स्पष्ट थी और लगता था कि उन्हें डिमेंशिया जैसा कुछ भी नहीं है। सिवाय एक पतली सी लाठी ले कर चलने के, उनमें कोई शारीरिक अक्षमता भी नहीं लगती थी। थोड़ा ऊंचा सुनते लगते थे, पर इतना भी नहीं कि बातचीत न की जा सके।
फिर भी उन्होने कहा – “अब शरीर में जोर नहीं है। कमजोर हो गया है। फिर भी इस उम्र में मुझे ही अपना खाना बनाना होता है। घर में कोई नहीं है। बड़ा घर है। सब सुविधा है। पानी का नल भी लगा है। पर हूं मैं अकेला।”
राजमणि कि पत्नी का देहावसान हो चुका है। उनके बच्चे काम के चक्कर में महानगरों में हैं और उनके परिवार भी उनके साथ हैं। वे अकेले यहां बड़े मकान में जमीन जायजाद अगोर रहे हैं। अपना सारा काम – भोजन बनाना भी – खुद करते हैं।
मोबाइल है उनके पास। जेब में रखा था पर उसका पैसा खत्म हो गया था। उन्होने कहा कि कभी महराजगंज जायेंगे और रीचार्ज करायेंगे, तब चालू होगा।
मैंने पूछा – मोबाइल का नम्बर मालुम है?
उनकी स्मृति ठीक ठाक थी। अन्यथा उनकी उम्र के लोग अपना मोबाइल नम्बर याद नहीं रखते। उन्होने मोबाइल नम्बर बताया और मैंने साइकिल पर बैठे बैठे उनका रीचार्ज कर दिया – सौ रुपये खर्च हुये मेरे। उनके मोबाइल पर चार्ज होने के बाद मैंने घण्टी दे कर सुनिश्चित भी कर लिया कि सही मोबाइल का रीचार्ज हुआ है।
उन्हें बिना कोई उद्यम किये, खड़े-खड़े तुरंत मोबाइल चालू होने पर आश्चर्य हुआ। इस काम के लिये वे लाठी टेकते कस्बे के बाजार जाते! उन्होने कहा कि अभी उनके पास पैसे नहीं हैं। मैंने यह भी नहीं कहा कि आप बाद में दे दीजियेगा। यह मान कर चल रहा हूं कि सौ रुपये उनसे मुलाकात पर खर्च कर दिये।
राजमणि कि पत्नी का देहावसान हो चुका है। उनके बच्चे काम के चक्कर में महानगरों में हैं और अपने बीवी-बच्चे अपने साथ ले गये हैं। वे अकेले यहां बड़े मकान में जमीन जायजाद अगोर रहे हैं। अपना सारा काम – भोजन बनाना भी – खुद करते हैं।
उनकी बातों से लगा कि वे मेरी सिम्पैथी चाहते हैं पर अकेले जीने में बहुत बेचारगी का भाव भी जताना नहीं चाहते। राजमणि ने अकेले जिंदगी गुजारने के कुछ सार्थक सूत्र जरूर खोज-बुन लिये होंगे। इन सज्जन से भविष्य में मिलना कुछ न कुछ सीखने को देगा। वे बोलते बहुत हैं। कुछ ज्यादा सुनना पड़ेगा; पर जानकारी लेने के लिये उतना झेला जा सकता है।
वे रास्ते में खड़े खड़े और भी बातें करने के मूड में थे। हाथ में सब्जी की दो प्लास्टिक की थैलियाँ लिये थे। शाम ढलने को थी। पर उन्हें घर पंहुचने, भोजन बनाने की जल्दी नहीं थी। मेरे दिवंगत श्वसुर जी की याद में उनकी ब्लॉक प्रमुखी की कथायें सुना रहे थे। लगता था कि थोड़ी नमक-मिर्च लगा कर रोचक बनाते सुना रहे हैं। उनके समय की बातें मुझे सुननी जरूर हैं। पर गांव की सड़क रोक कर उसके बीचोंबीच खड़े हो कर नहीं। मैंने उनसे विदा ली यह कह कर कि उनसे जल्दी ही मिलूंगा। उन्होने भी कहा कि वे मेरे घर आयेंगे।
अस्सी साल का अकेला आदमी, अपना भोजन खुद बनाता हुआ। ब्लॉग के लिये बहुत सही पात्र हैं राजमणि राय। उनसे मिलूंगा जरूर। इस गांव के पिछले तीन दशक को ब्लॉग पर उतारना है। करीब 100 पोस्टें उसपर लिखनी हैं। करीब एक लाख शब्द। इस संकल्प के लिये राजमणि बहुत उपयोगी होंगे। सौ रुपये का उनका मोबाइल रीचार्ज उन सौ पोस्टों के लिये मेरा एक छोटा इनवेस्टमेण्ट है! :lol:
ज्ञानदत्त पाण्डेय – मैं भदोही, उत्तरप्रदेश के एक गांव विक्रमपुर में अपनी पत्नी रीता के साथ रहता हूं। आधे बीघे के घर-परिसर में बगीचा हमारे माली रामसेवक और मेरी पत्नीजी ने लगाया है और मैं केवल चित्र भर खींचता हूं। मुझे इस ब्लॉग के अलावा निम्न पतों पर पाया जा सकता है।
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