फोड़ के साइकिल व्यवसायियों के बारे में पुन:


बोकारो आने पर कोयला अवैध खनन के बाद उसे साइकिल पर ले कर चलने वालों को देखना मेरे लिये सदैव कौतूहल का विषय रहा है। एक दशक से ज्यादा समय से उन्हें देखता रहा हूं।

कल भी रास्ते में कई कोयला ले कर चलने वाले दिखे। एक दो जगह उन्हें मोटर साइकिल से धक्का लगाते सहकर्मी भी नजर आये। साथ चल रहे तिवारी बाबा ने बताया कि मोटर साइकिल वाले उन्हें तेज चलने में सहायता करते हैं। कहीं फ़ंसने की नौबत आती है तो वे साइकिल वाले को छोड़ कर भाग लेते हैं। साइकिल वाले भी पकड़े जाने पर साइकिल और कोयला फ़ैंक कर सटकने में यकीन करते हैं।

एक बस स्टाप पर कोयले की साइकिल खड़ी थी। उसके पास ही उसे धक्का देने वाली मोटर साइकिल भी थी।

मैने वाहन चालक इमरान को एक जगह कोयले लदी साइकिलों के पास वाहन रोकने को कहा। एक बस स्टाप पर कोयले की साइकिल खड़ी थी। उसके पास ही उसे धक्का देने वाली मोटर साइकिल भी थी। मुझे वाहन से उतर कर चित्र लेते देख मोटर साइकिल वाला अपनी मोटर साइकिल चालू कर निकल लिया।

मैं दो अन्य रुकी हुई साइकिलों के चित्र भी ले पाया।

एक एक साइकिल पर लदा इतना कोयला और उस जैसी सैकड़ों साइकिलें चलती हुईं। कितना अवैध (फ़ुटकर) कोयला खनन होता होगा? और इस अवैध अर्थव्यवस्था में जाने कितने लोगों को ठीकठाक रोजगार मिलता होगा? उनके रोजगार को कहीं आंकड़ों में दर्ज किया जाता है या वे बेरोजगार की श्रेणी में आते हैं?


आलसी आंख की शल्य चिकित्सा


जुलाई के महीने में डा. आलोक ने मेरी पत्नीजी की दांयी आंख की शल्य चिकित्सा की थी। मोतियाबिन्द की। उसके दो महीने बाद बांयी आंख का ऑपरेशन करना था; पर वह दशहरा-दीपावली-छठ के पर्व के कारण हम टालते गये। अब नवम्बर मे‍ं संयोग बना।

पत्नीजी की बांई आंख में, बकौल डा. आलोक एम्ब्लायोपिया – Amblyopia है। उस आंख के कमजोर होने के कारण बचपन से ही शरीर उस आंख का प्रयोग कम करता गया है। जिस अंग का प्रयोग कम हो तो उसका क्षरण होता ही है। बकौल डाक्टर साहब यह रोग बीस हजार में से एक को होता है। सो उस हिसाब से मेरी पत्नीजी विशिष्ट है‍!

बचपन में ही अगर यह एम्ब्लायोपिया नोटिस होता तो शायद कोर्स करेक्शन हो पाता। पर परिवारों में उतना सूक्ष्म निरीक्षण नहीं हो पाता – वह भी एक बड़े कुटुम्ब में रहते हुये। आज कल जहां न्यूक्लियर परिवार में एक दो बच्चे मात्र होते हैं, माता-पिता वह सूक्ष्म निरीक्षण कर पाते हों, शायद। अन्यथा समय के साथ साथ वह एम्ब्लायोपिया से प्रभावित आंख और भी कमजोर होती जाती है। उस आंख का चश्मा और भी मोटा होता जाता है और मोटे भारी लेंस के बावजूद भी सामान्य दृष्यता नहीं मिल पाती।

इस ऑपरेशन का लाभ यह हुआ है कि धुंधला आभास भर देने वाली आलसी आंख अब चैतन्य हो गयी है और दूर की लिखावट भी पढ़ने में सक्षम हो गयी है।

एम्ब्लायोपिया को साधारण भाषा में आलसी आंख – Lazy Eye कहा जाता है। मेरी पत्नीजी की बांयी आंख आलसी थी। उस आंख का मोतियाबिन्द ऑपरेशन के पहले उसकी दृष्यता, डाक्टरी भाषा मे‍ एफ़सी (Finger Counting) 2 थी। अर्थात दो मीटर दूर से वे यह भर बता पाती थीं कि सामने कितनी उंगलियां हैं। चक्षु परीक्षण का मानक चार्ट पढ़ने की सम्भावना ही नहीं थी।

डा. आलोक के अनुसार मेरी पत्नीजी की बांयी आंख में मोतियाबिन्द ज्यादा नहीं था। मात्र बीस प्रतिशत भर था। पर शल्य चिकित्सा द्वारा उनका ध्येय आंख में मल्टीफ़ोकल लेंस डाल कर उस आंख की दृष्यता बढ़ाना था।

वह छोटी सी लड़की नुमा पैरामेडिक जो यूं लगता था कि दसवीं कक्षा की छात्रा होगी; ने परीक्षण कुशलता से किया।

चुंकि बांयी आंख आलसी आंख थी, उसके लिये मोतियाबिन्द का मल्टीफ़ोकल लेंस भी ज्यादा पावर का चाहिये था। वह विशेष लेंस अरेन्ज करने में डाक्टर साहब को समय लगा। जब उन्होने उसकी उपलब्धता की हामी भरी तो हम अपने गांव से बोकारो आये। हमारे आने के कुछ घण्टे बाद ही डाक्टर साहब को कुरीयर ने लेंस का पैकेट उपलब्ध कराया। डा. आलोक के क्लीनिक/अस्पताल जाते ही पत्नीजी की आंख का परीक्षण हुआ और घण्टे भर में उस आलसी आंख का ऑपरेशन भी हो गया।

डा. आलोक के अस्पताल की दक्षता से मैं प्रभावित हुआ – फ़िर एक बार। …. वह छोटी सी लड़की नुमा पैरामेडिक जो यूं लगता था कि दसवीं कक्षा की छात्रा होगी; ने परीक्षण कुशलता से किया। उसके बाद डा. आलोक ने अपनी ओर से भी देख परख कर पत्नीजी को ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश कराया।

डा. आलोक के अस्पताल की दक्षता से मैं प्रभावित हुआ – फ़िर एक बार।

हम लोग – पत्नीजी, मेरे बिटिया-दामाद और मैं डा. आलोक के अस्पताल सोमवार दोपहर ढाई बजे गये थे और चार बजे तक सब सम्पन्न हो चुका था।

ऑपरेशन के बाद आधा घण्टा एक बिस्तर पर लेटना था रीता पाण्डेय को। मेरी बिटिया उनके साथ बराबर मौजूद थी। दामाद जी – विवेक भी आसपास बने थे। उनके आजु बाजू रहने के कारण रीता पाण्डेय का तनाव जरूर कम रहा होगा।

पोस्ट ऑपरेशन आराम करने का कैबिन। ” एक वृद्ध तो अकेले थे। थोड़ी देर बाद वे खुल उठे और अपनी लाठी टटोल कर टेकते हुये जा कर गैलरी में बैठ गये।”

दो और मरीज थे वहां। एक वृद्ध तो अकेले थे। थोड़ी देर बाद वे खुद उठे और अपनी लाठी टटोल कर टेकते हुये जा कर गैलरी में बैठ गये। एक मरीज बाद में आये। ऑपरेशन के बाद वे सज्जन ज्यादा ही वाचाल हो गये थे। उनकी पत्नी उनके पांव दबा रही थी और बार बार उन्हें शान्त हो लेटने की कह रही थी। पर वह तो अपने ऑपरेशन के अनुभव इस प्रकार बता रहे थे कि मानो भूल जाने के पहले सब उगल देना चाहते हों। बेचारी पत्नी जो अपने पति की बलबलाहट भी समझ रही थी और यह भी जान रही थी कि सार्वजनिक स्थान पर उसे यह सब अनर्गल नहीं कहना-बोलना चाहिये; उसे बार बार चुप रहने को कहती हुई उसकी टांगे और तलवे सहलाती जा रही थी – मानो ऑपरेशन आंख का भले ही हुआ हो, उसको दर्द टांग में हो रहा हो! :lol:

बिटिया-दामाद वाणी और विवेक डा. आलोक के क्लीनिक में

अगले दिन सवेरे हम दस बजे डा. साहब के चक्षु क्लीनिक पर गये आंख की पट्टी हटवाने। डा. साहब ने आंख का पोस्ट-ऑपरेशन परीक्षण कर देखा और बताया कि रेटीना पर लैंस अच्छी तरह सेट हो गया है। आंख की लालिमा समय के साथ दो चार दिन में समाप्त हो जायेगी।

सात नवम्बर को ऑपरेशन हुआ था। पांच दिन बाद 11 नवम्बर को डा. आलोक के क्लीनिक में आंख की दृष्यता का परीक्षण हुआ। आंख की विजन जो ऑपरेशन के पहले मात्र दो मीटर दूर की उंगलियो‍ की संख्या भर बताने की थी, अब छ फ़िट दूर की लिखावट उसी प्रकार पढ़ पाने की हो गयी थी जो सामान्य दृष्यता का व्यक्ति 24 फ़िट दूर की लिखावट पढ़ने की रखता है। अर्थात विजन 6/24 हो गया था। डाक्टर साहब के अनुसार महीने भर में यह और बेहतर हो कर 6/18 तो हो ही जायेगा। इस ऑपरेशन का लाभ यह हुआ है कि धुंधला आभास भर देने वाली आलसी बांयी आंख अब चैतन्य हो गयी है और दूर की लिखावट भी पढ़ने में सक्षम हो गयी है।

रीता पाण्डेय और डा. आलोक अग्रवाल

आलसी आंख छ दशक बाद चैतन्य – देशज भाषा में कहें तो छटपट – बनी! देर से ही सही, मेरी लुगाई जी पुनर्योवना हो रही हैं और हम जो हैं सो ही हैं! :-)


मोबाइल गर्ल्स कूट्टम की तर्ज पर गोली, गिन्नी और गुन्जा


पिछले सप्ताह मैने एक पुस्तक का रिव्यू पढ़ा – “मोबाइल गर्ल्स कूट्टम – वर्किन्ग वीमेन स्पीक। पुस्तक की लेखिका हैं मधुमिता दत्ता। इसमे‍ कान्चीपुरम की नोकिया फ़ेक्टरी में काम करने वाली पांच महिलाओं की आपसी बातचीत है। वे महिलायें एक दो कमरे के फ़्लैट में रह रही हैं। सन 2013 की कथा है यह। सभी महिलायें अलग अलग पृष्ठभूमि से हैं। ग्रामीण महिलायें। हर एक के अपने अभाव हैं, अपनी आकांक्षायें। इस दो कमरे के फ़्लैट में रहते हुये और नोकिया की नौकरी मिलने के साथ वे अपने को अधिक आजाद, अधिक वर्जना से मुक्त और अधिक एम्पॉवर्ड पाती हैं जो उनकी आपस की बातचीत से झलकती है।

मधुमिता दत्ता कि पुस्तक का कवर
मधुमिता दत्ता कि पुस्तक का कवर

मधुमिता दत्ता से उनकी बातचीत का पॉडकास्ट, रेडियो पोट्टी के नाम से 2013 में स्पॉटीफ़ाई पर प्रस्तुत किया था। इसमें उन महिलाओं की बातचीत तमिळ में है जिसका भाषाई रूपान्तर वाला यह पॉडकास्ट उस समय बहुत लोकप्रिय हुआ था।

यह पुस्तक उसी पॉडकास्ट का पुस्तकाकार रूप है।


मैं फ़ेमिनिस्ट नहीं हूं। महिलाओं से बातचीत करना मेरे बस की बात नहीं। उनके प्रति मन में सम्वेदना भले हो, उनसे तादात्म्य स्थापित करना कठिन है।

बात यहीं खत्म हो जाती, या ज्यादा से ज्यादा मधुमिता दत्ता की किताब किण्डल पर खरीद कर पढ़ भर लेता। पर उससे अलग एक बात हुई। मैने अपने मित्र नागेश्वर से इस पॉडकास्ट/पुस्तक के बारे में बात की। छूटते ही नागेश्वर ने कहा – “अरे, ये कान्चीपुरम की लड़कियां तो मिस वाईपी की किचन की तीन लड़कियों की तरह हैं!”

श्रीमती वाईयी की किचन मे‍ गोली, गिन्नी और गुंजा
मिस वाईपी की किचन मे‍ गोली, गिन्नी और गुंजा

नागेश्वर मेरी उम्र का है। अभी इसी साल जुलाई में 67 का हुआ है। खब्ती और जुनूनी जीव है। उसके बारे में फ़िर कभी। वह बासठ-चौंसठ साल की मिस वाईपी (यशोधरा पुरन्दर) से कैसे मिला, उसके बारे में भी फ़िर कभी। वैसे मिस पुरन्दर बहुत अनूठी (पढ़ें दरियादिल) महिला हैं।

खैर न यह ब्लॉग कहीं गया है, न नागेश्वर नाथ और न यशोधरा पुरन्दर। आज तो मुझे उनके बारे में नहीं, मिस वाईपी के किचन की तीन लड़की नुमा महिलाओं – गोली, गिन्नी और गुन्जा की बात करनी है।

नागेश्वर ने बताया कि गोली, गिन्नी और गुन्जा उन लड़कियों के वास्तविक नाम नहीं हैं। मिस वाईपी को ग अक्षर पसन्द है। सो उनके अपने घरेलू नाम करण उन्होने ही किये है। उनकी किचन में वे नाम इतने प्रचलित हैं कि लड़कियां भी अपने को उसी नाम से आईडेण्टीफ़ाई करती हैं। उनके अपने घरों के नाम अलहदा हों, उससे कोई घालमेल नहीं होता।

तीनो लड़कियों की जिन्दगी, उनका परिवेश ब्ल्यू कॉलर क्लास का है। उनकी अपेक्षायें अपने और अपने परिवार को आगे बढ़ाने की हैं। जल्दी से जल्दी वे मध्य वर्ग में आ जाना चाहती हैं। उनके बच्चे हैं। सुख दुख हैं। टीवी है, फ़ोन और स्मार्टफ़ोन है। और भी छोटी मोटी सुविधायें और ढेरों अभाव हैं। पर वे यहां मिस वाईपी के किचन में आने के बाद चहकती रहती हैं। आपस में सहयोग भी करती है, लड़ती भी हैं और एक दूसरे की चुगली भी करती हैं। पर उनमें और मिस वाईपी में एक प्रगाढ़ बॉण्ड बन गया है।

नागेश्वर नाथ मेरी तरह गांवदेहात में नहीं रहता। वह शहरी जीव है। पर उसमें गांव की, गरीबी की, अभाव की समझ और तमीज है। एक तरह से वह मेरा शहरी क्लोन है, या मैं उसका गांव का रूप हूं। हां, वह ह्वाट्सएप्प और टेलीग्राम, जूम और वीडियो कॉन्फ़्रेन्सिन्ग के युग में भी सम्प्रेषण के लिये ई मेल का ही प्रयोग करता है।

नागेश्वर मे बताया कि मिस वाईपी गोली, गिन्नी और गुन्जा के बारे में वैसा ही विस्तार से बताने को तत्पर हो गयी हैं, जैसा मधुमिता दत्ता की किताब में नोकिया की लड़कियों के पॉडकास्ट और पुस्तक में है। वे लड़कियां हिन्दी बोलती है। इसलिये उनको समझने में मिस वाईपी को किसी टेली-रूपान्तर की जरूरत नहीं होगी। उनके कुछ देशज शब्द अर्थ के साथ जस का तस रखे जा सकते हैं।

मोबाइल गर्ल्स का पॉडकास्ट 8-9 अंकों का है। पुस्तक भी तीन सौ पेज से कुछ कम की है। गोली, गिन्नी और गुंजा को ले कर उसी आकार का प्रयोग हम – मिस वाईपी, नागेश्वर और मैं कर सकते है।

इस प्रयोग की सीमायें है। मिस वाईपी के साथ मेरा सम्पर्क नहीं होगा। वह नागेश्वर ही बतायेगा। वह भी ज्यादातर ई-मेल के माध्यम से। यदा कदा मैं उसे फ़ोन करूगा। वैसे वह फ़ोन अपने अलमारी में बन्द कर रखता है। वह सुविधाओं के होने के बावजूद मिनिमलिस्ट जीवन जीने का हिमायती है।

तो यह एक परिचयात्मक पोस्ट है। आगे हम गिन्नी, गुन्जा और गोली की बातचीत मिसेज वाईपी और नागेश्वर के माध्यम से करेंगे। क्या पता वह करते करते तीन सौ पेज की एक किताब ही बन जाये! :lol:

मोबाइल गर्ल्स कुत्तम के पात्र
मोबाइल गर्ल्स कुट्टम के पात्र

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