भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
आज सवेरे सवेरे प्रेमसागर ने फोन किया – भईया, सुल्तानगंज से दिन में बारह बजे गंगा जी से जल उठायेंगे।
वे सुल्तानगंज पंहुचने वाले थे। दस बजे तक पंहुच ही जायेंगे। सुल्तानगंज और देवघर उनका जाना पहचाना है। सौ से अधिक बार सुल्तानगंज से जल ले कर बैजनाथ धाम की कांवर यात्रा कर चुके हैं।
बैजनाथ धाम के लिये गंगा जी से जल उठाने का कृत्य। बैजनाथ धाम, देवघर, बारहवाँ ज्योतिर्लिंग। कांवर यात्रा सम्पन्न होने का अंतिम चरण।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
पिछले साल तीन सितम्बर की पोस्ट में, जब प्रेमसागर मेरे घर से रवाना हो रहे थे अमरकण्टक की पदयात्रा पर; तब मैंने लिखा था – मोटे तौर पर उनके पास भारत की ऋतुओं और स्थानों की प्रकृति का लाभ पर्यटन में लेने की योजना की रूप रेखा है। वे अपेक्षा रखते हैं कि दो साल से कहीं कम समय में अपना पद यात्रा अनुशासन से द्वादश ज्योतिर्लिंग दर्शन का कार्य पूरा कर लेंगे।
दो साल नहीं; एक ही साल से कम समय में प्रेमसागर अपनी द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा सम्पन्न कर लेंगे।
प्रेमसागर ने ट्विटर पर यह चित्र शेयर किया था। चार धाम की यात्रा के बाद उनके बाल और दाढ़ी बेतरतीब, बाबा की तरह, बढ़े हुये थे। अब वे एक सामान्य व्यक्ति की तरह लग रहे हैं।
पिछले साल जब वे यात्रा प्रारम्भ कर रहे थे तो मेरा अनुमान था (आशंका थी) कि वह यात्रा सम्भवत: आगे चल ही नहीं पायेगी। पर न केवल वह चली, उसके अनुभवों के चालीस प्रतिशत का मैं साक्षी भी रहा। प्रेमसागर को तो यात्रा की सम्पन्नता पर परम सतोष की अनुभूति होगी ही; मुझे भी उससे जुड़ाव का आत्मीय-भाव बहुत गहरा है।
सुल्तानगंज के रास्ते में प्रेमसागर (बीच में)। उनके दांये सुशील सिंह और बांये टी-शर्ट में अमरदीप पाण्डेय।
सावन का महीना अभी प्रारम्भ नहीं हुआ है। आषाढ़ांत की पूर्णिमा कल है और देवघर में जल चढ़ाने का कार्य परसों सावन के साथ प्रारम्भ होगा। प्रेमसागर ने बताया कि आज भीड़ बढ़ गयी है सुल्तानगंज में जल उठाने वालों की। प्रेमसागर भी आज जल उठा कर परसों श्रावण प्रथमा को बैजनाथ धाम में जल चढ़ा कर अपनी द्वादश ज्योतिर्लिंग पद यात्रा की इतिश्री कर लेंगे।
मैंने रेलवे ज्वाइन की 1984 में। स्टीम इंजन और फट्टे वाले सेमाफोर सिगनल तब भी काम कर रहे थे। बम्बई-दिल्ली ट्रंक रूट पर भी सवारी गाड़ी स्टीम इंजन से चल रही थी। उस रूट पर कुछ हिस्से इकहरी लाइन वाले भी थे और काफी सारा रूट सेमाफोर सिगनल वाला था। तब मेरे पास कैमरा नहीं हुआ करता था, नियमित डायरी लेखन का अनुशासन भी नहीं था। सो यादों में बहुत कुछ धुंधला हो गया है। पर बहुत कुछ अब भी शेष है।
कभी कभी लगता है कि अगर संस्मरण लिखे जायें तो वे यद्यपि ‘लगभग’ सही होंगे पर उनमें तथ्यों की गलती की गुंजाइश होगी ही। और कभी लगता है कि उनको लिखने में खुद जीडी की बजाय एक काल्पनिक पात्र गढ़ कर लिखा जा सकता है। तब यह बंधन भी नहीं होगा कि तथ्य पूरी तरह सही नहीं हैं। मैंने एक नाम भी सोचा है – नागेश्वर नाथ। एक दस्तावेज बने – नागेश्वर नाथ की डायरी। या इसी तरह का कुछ! पर वह अभी तक मूर्त रूप नहीं ले पाया है। नागेश्वर नाथ अभी मन में है। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की तरह वह “व्योमकेश शास्त्री” जैसा जीवंत पात्र नहीं बन सके हैं।
नागेश्वर नाथ अगर बने तो वह सन 2000 के पहले के रेल युग के ब्लॉगर होंगे। ब्लॉगर युग के पहले के ब्लॉगर। वह, जिनके पास कलम भर होगी, चित्र नहीं। वह कभी कभी दूसरों के चित्रों का उद्धरण देते हुये प्रयोग करेंगे।
एक दिन मेग्जटर एप्प पर यूं ही लेंस पत्रिका के पुराने अंक खंगाल रहा था तो फरवरी 2022 के ईश्यू में कवर पेज पर शरबत गुला नामक बालिका का चित्र दिखा। यह चित्र स्टीव मेक-करी द्वारा 1984 में लिया गया था। स्टीव मेक-करी नेशनल ज्योग्राफिक के कालजयी फोटोग्राफर हैं, जिनका अफगानी बालिका का चित्र बहुत से लोगों के जेहन में होगा। इसी चित्र नें स्टीव को जगत प्रसिद्ध बना दिया था। उसी कालखण्ड में स्टीव भारत भी आये थे और यहां के कई जानदार चित्र भी उपलब्ध हैं।
लेंस पत्रिका में स्टीव मेक-करी के साक्षात्कार का चित्र। स्क्रीनशॉट में बांयी ओर अफगानी बालिका शरबत गुला का चित्र है।
वे 1980+ के समय में भारत में थे और उनका 1983 में खींचा एक स्टीम इंजन का चित्र भी पत्रिका में है। ताजमहल के बैकग्राउण्ड में स्टीम इंजन का वह चित्र नागेश्वर नाथ जी की पुरानी यादेंं कुरेद गया। जिस कालखंड में स्टीव ने चित्र खींचा होगा, नागेश्वर नाथ उसी के आसपास (1984-85 में) रेलवे के प्रोबेशनरी अफसर थे। उनकी रेलवे यातायात सेवा की ट्रेनिंग लगभग आधी सम्पन्न हो चुकी थी और फील्ड ट्रेनिग के लिये वे आगरा में थे। ईदगाह स्टेशन के पास के रेस्ट हाउस में वे रह रहे थे। वहां से वे आगरा फोर्ट स्टेशन पर किसी इंजन में बैठ कर या कभी कभी पैदल ही जाया करते थे। स्टीम इंजन के शेड में, आगरा फोर्ट, ईदगाह और जमुना ब्रिज के स्टेशनों और रेलवे यार्डों में उन्होने अकेले बहुत फील्ड ट्रेनिंग सम्पन्न की थी। अपनी ट्रेनिग को कुछ ज्यादा ही गम्भीरता से लेने वाले व्यक्ति थे वे।
स्टीव मेक-करी का 1983 का आगरा का एक चित्र। साभार लेंस पत्रिका
स्टीव मेक-करी के चित्र जैसी याद नागेश्वर नाथ जी के जेहन में ताजा है! ट्रेनिग के दौरान मिले पात्रों के नाम लगभग भूल चुके हैं नागेश्वर। पर चूंकि जगहों को उसने पैदल नापा है और कई कई बार वहां से गुजरे हैं; उस सबकी यादें भूली नहीं हैं। अभी भी वह तेज सांस लेते हैं तो नाक में कोयले और भाप की गंध तथा कानों में स्टीम इंजन की निकलती छक-छूं की आवाज गूंजती है। कभी कभी वे इस अंदाज में आंख मलते हैंं मानो स्टीम इंजन के उड़ते कोयले की किरकिरी आंख में पड़ गयी हो।
बावजूद इसके कि नागेश्वर मेरे बारे में बहुत सहृदय नहीं हैं और वे बार बार मुझे कोंचते रहते हैं कि मैं मेहनत कर नई ऊंचाइयां प्राप्त करूं। इस प्रक्रिया में मेरे प्रति वे निर्दयी भी हो जाते हैं; पर वे हैं सरल, शरीफ और ईमानदार आदमी। दूसरी बात जो मुझे उनके समीप ले जाती है वह उनका लिखने का स्टाइल है। करीब करीब वह मेरे जैसा ही है।
आगे, नागेश्वर नाथ कभी कभी ब्लॉग पर अपनी गेस्ट पोस्ट लिखा करेंगे। वे मुझसे लगभग रोज मिलते हैं। धारीदार नेकर और एक टीशर्ट पहने वह कहते हैं कि इससे पहले कि यादें धुंधली हो जायें; उन्हें लिख देना चाहते हैं। उनके फाउण्टेन पेन की स्याही खतम हो गयी है। बॉल प्वाइण्ट पेन से वे लिखना नहीं चाहते। कभी वह कलम उन्हे रुची नहीं। एक इंकपॉट मंगवाई है। तब, मन हुआ तो वे थोड़ा बहुत लिखा करेंगे।
मैं बहुत सोच कर नागेश्वर नाथ जी के प्रति बड़े आदर से लिख रहा हूं। नागेश्वर गांवदेहात के एक विपन्न वातावरण से आगे बढ़े और उन्होने जो कुछ हासिल किया वह उनके मन माफिक भले न हो, लाखों लोगों से कहीं बेहतर है। बावजूद इसके कि नागेश्वर मेरे बारे में बहुत सहृदय नहीं हैं और वे बार बार मुझे कोंचते रहते हैं कि मैं मेहनत कर नई ऊंचाइयां प्राप्त करूं। इस प्रक्रिया में मेरे प्रति वे निर्दयी भी हो जाते हैं; पर वे हैं सरल, शरीफ और ईमानदार आदमी। दूसरी बात जो मुझे उनके समीप ले जाती है वह उनका लिखने का स्टाइल है। करीब करीब वह मेरे जैसा ही है। उनका सोचने का नजरिया मुझसे कुछ अलहदा है; पर वे सिनिकल-सठियाये नहीं हैं।
मेरे रेलवे ज्वाइन करने के समय से यह धारणा पुष्ट होती रही है कि रेलवे की नौकरी व्यक्ति को (मुख्यत: अफसर को) अंतर्मुखी बनाती है। नौकरी के दौरान मैं भी रेलवे के बाहर के बहुत कम लोगों से मिला। अब, जब उस काल का तामझाम/पैराफर्नेलिया नहीं है; तब बहुत से लोगों से मिलना हो रहा है। गांव देहात के तो अनेकानेक चरित्रों से रोज आमना-सामना होता है। अपने परिवेश को जानने-टटोलने की खब्ती इच्छा के कारण लोगों से मिलना होता है। अब, छ साल गांवदेहात में व्यतीत होने पर उसमें भी एक प्रकार की मोनोटोनी होने लगी है। पर शहर में यदा कदा जाने पर अब उस प्रकार के लोग मिलते हैं, जिनसे रेलवे की नौकरी के दौरान नहीं मिला।
शनिवार को रोहित मिले। रोहित यादव। सेमसंग के कस्टमर केयर के अधिकारी। हरी टीशर्ट पहने और नये काट के हेयर स्टाइल वाले नौजवान। बनारसी, पर बनारसीयत का दो पीढ़ी पहले का जो पैमाना होता है – बात करने में बनारसी टोन और मुंह में पान/पानमसाला ठुंसा हुआ – वह नदारद। यहीं नाटी इमली में रहते हैं। उनका यह सेमसंग का कस्टमर केयर सेण्टर उनके घर से करीब दस मिनट की पैदल दूरी पर है। उनकी पत्नी उनके लिये उनका लंच भेजती हैं। … घर से दस मिनट की दूरी पर दफ्तर। दफ्तर में; जैसा दीख रहा था; रोहित के प्रभुत्व में एक दर्जन से ज्यादा कर्मी। वे लोग रोहित जी के मित्रवत थे; यद्यपि उनके साथ अदब और आदर से पेश आ रहे थे। जिस तरह का माहौल था, उसके अनुसार रोहित बॉस नहीं, फर्स्ट-अमॉन्ग-ईक्वल नजर आ रहे थे।
रोहित यादव। सेमसंग कस्टमर केयर के एग्जीक्यूटिव
मैंने उन्हें अपना परिचय देते समय उनपर अपने बीते प्रभुत्व का वर्णन उस प्रकार किया जैसे लोग नेम-ड्रॉपिंग में करते हैं। यह बताने की कोशिश की कि मैं रेलवे का गैरमामूली अधिकारी था। पर वह बोलते ही मुझे अहसास हो गया कि बीते अतीत की शान बताना कोई अच्छी बात नहीं। वह अतीत तो अब खण्डहर हो रहा है।
शब्द मुंह से निकल ही गये थे। वापस नहीं लिये जा सके थे। वैसे मुझे लगा कि रोहित के मुझ कस्टमर के प्रति व्यवहार में मेरे द्वारा मेरे अतीत का वजन डालने का कोई असर नहीं पड़ा। पड़ना भी नहीं चाहिये। रोहित मेरे रुआब झाड़ने के पहले भी विनम्र थे और बाद में भी। हाँ, मुझे जरूर लग गया कि अपना परिचय देने में मेरे पास मेरे वर्तमान के तत्व होने चाहियें; “हम फलाने तोप हुआ करते थे” वाला रिटायर्ड आदमी का राग नहीं गाना चाहिये।
रोहित के पास जाने को मैं विवश हुआ था। पिछले दिन मेरे मोबाइल में एक बैंक वाले एप्प ने कहा कि वे एप्प जो उसके ऊपर स्कीन को देखने और पढ़ने की परमीशन लिये हैं, उनकी परमीशन वापस ले कर बैंकिंग एप्प का प्रयोग करें, अन्यथा आपकी जानकारी कॉम्प्रोमाइज हो सकती है। तीन चार एप्प – स्क्रीन शॉट, लाइव ट्रांसस्क्राइब, स्क्रीन को रात के अनुरूप ढालनेवाला एप्प आदि को वह ओवर राइडिंग परमीशन है। सेटिंग में वह परमीशन वापस लेने की प्रक्रिया में मैंने कुछ गड़बड़ कर दिया। पूरा मोबाइल हैंग कर गया। री-बूट हो कर भी अपनी सही दशा में नहीं लौटा। लिहाजा, मजबूरन मुझे पैंतालीस किलोमीटर दूर की बनारस की यात्रा करनी पड़ी सेमसंग के कस्टमर केयर सेण्टर के लिये।
तीन प्रतिशत से कम असंतुष्ट – वह भी धुर यूपोरियन गढ़ बनारस में। वैसे आम बनारसी तो बनारसी सांड़ की तरह बिना बात हत्थे से उखड़ता है और उसकी भाषा भी कासी-का-अस्सी टाइप होती है। अगर बनारसी जनता को भी रोहित साध लेते हैं तो उनकी काबलियत और सैमसंग को काबिल लोगों की कद्र करने की कल्चर – दोनो का साधुवाद।
रोहित को मोबाइल सुधारने में पांच मिनट से कम ही समय लगा। मेरे जैसी सेटिंग की समस्या को ले कर वहां आने वाले कम ही लोग होंगे। मेरे जैसे बेकार में ही स्मार्टफोन के खांची भर के फीचर्स के साथ, उसकी सेटिंग में खुरपेंच करते हैं और अपने पैर का अंगूठा अपने मुंह में डाल लेते हैं। :lol:
रोहित ने मुझसे पूछा भी कि कितने समय से मैं स्मार्टफोन का प्रयोग कर रहा हूं। मैंने बताया कि एक दशक से ज्यादा हो गया। करीब डेढ़ दशक। रोहित ने कहा – साठ से ज्यादा की उम्र के अधिकांश लोग वे आते हैं जो स्मार्टफोन का हाशिये बराबर प्रयोग करते ही दीखते हैं। उन लोगों का समस्या बताते समय पहला कथन यही होता है कि “उन्होने कुछ नहीं किया। मोबाइल जाने क्यों खराब हो गया”।
वैसे स्मार्टफोन के युग में सीनियर सिटिजन उत्तरोत्तर उसका अधिक प्रयोग करेंगे और उन्हें झमेला होने पर कस्टमर केयर सेण्टर आने की दरकार होगी। नुक्कड़ की मोबाइल रिपेयर शॉप वाला झोलाछाप डाक्टर की तरह मोबाइल की तकनीकी समस्या का समाधान करने के लिये उपलब्ध रहेगा; पर जैसे भारत का हेल्थ केयर सिस्टम अपर्याप्त है; वैसे ही शायद स्मार्टफोन केयर सिस्टम भी।
यह बनारस का सेमसंग का सर्विस सेण्टर भी घुमावदार उंची ऊंची सीढ़ियां चढ़ कर ही पंहुचा जा सकता है। वहां जाना इतना दुरुह है कि बूढ़ा आदमी हाँफ जाये! कुल छ काउण्टर हैं यहां और भीड़ भी खूब दिखी। सर्विस सेण्टर अपने आप में सेमसंग के लिये एक लाभ का सौदा होगा, ऐसा मुझे लगा। कस्टमर केयर बिजनेस पर सैमसंग को और ध्यान देना चाहिये। ग्रे-सेगमेण्ट में जो तकनीकी सुविधा प्रदान की जा रही है नुक्कड़ की दुकानों पर, उसकी बजाय अधिक आसपास कस्टमर केयर के आउटलेट होने चाहियें। और उम्रदराज लोगों के लिये ज्यादा सुविधाजनक होना चाहिये वहां पंहुचना।
रोहित आने वाले कस्टमर को सर्विस देने के बीच पिछले दिन के ग्राहकों से फोन पर सम्पर्क कर बात भी कर रहे थे और उनसे यह जानने का प्रयास कर रहे थे कि उनका संतुष्टि का स्तर कैसा है। वे फोन पर ग्राहकों से एसएमएस में दिये लिंक पर फीडबैक देने का आग्रह भी कर रहे थे। उन्होने मुझे बताया कि वे 23 साल की उम्र में इस नौकरी में आये थे और अब इग्यारह साल हो गये हैं इसी दफ्तर में काम करते हुये। अपना काम उन्हें अच्छा लगता है। ग्राहकों में तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं होते जो असंतुष्ट हों। और बहुधा वे भी अपने आकलन में गुड रेटिंग तो देते ही हैं।
तीन प्रतिशत से कम असंतुष्ट – वह भी धुर यूपोरियन गढ़ बनारस में। वैसे आम बनारसी तो बनारसी सांड़ की तरह बिना बात हत्थे से उखड़ता है और उसकी भाषा भी कासी-का-अस्सी टाइप होती है। अगर बनारसी जनता को भी रोहित साध लेते हैं तो उनकी काबलियत और सैमसंग को काबिल लोगों की कद्र करने की कल्चर – दोनो का साधुवाद।
आज दो दिन बाद, रोहित का फोन आया। “बाबूजी आप संतुष्ट तो हैं न सर्विस से? और एसएमएस में फीडबैक जरा देख लीजियेगा।” – रोहित के यह कहने पर मुझे लगा कि ड्राफ्ट में लिखी यह पोस्ट पब्लिश कर ही दी जाये। सेमसंग वाले हिंदी पढ़ते नहीं होंगे; पर शायद यह रोहित के किसी काम आ जाये।