मुझे चाय की चट्टी थामनी चाहिये


मेरी पत्नीजी का बार बार कहना है कि गड़ौली धाम तक गर्मी के मौसम में 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना अपने साथ ज्यादती है। सप्ताह में कभी कभी जाना तो ठीक है पर रोज रोज उधर निकल लेने की बजाय और भी कुछ है जो देखना, लिखना चाहिये। मैं भी सोचता हूं कि विषयांतर होना ही चाहिये।

क्या किया जाये, कटका स्टेशन की चाय की चट्टी थाम ली जाये? प्रयागराज के सिविल लाइंस के कॉफी हाउस की याद होती है। हम – मेरे वरिष्ठ उपेंद्र कुमार सिंह जी और मैं – वहां अपने रेल परिचालन के बोझ से हल्का होने के लिये यदा कदा दफ्तर छोड़ चुपचाप निकल जाया करते थे। आधा एक घण्टा व्यतीत कर लौटने पर कुछ हल्कापन महसूस होता ही था। अब उपेंद्र जी का साथ नहीं है। यूं देखें तो गांव में पत्नीजी के अलावा किसी का भी साथ नहीं है। यहां कॉफी हाउस तो मिल ही नहीं सकता। पर रेलवे स्टेशन के आसपास चाय की दुकानें जरूर हैं, जहां कुछ समय गुजारा जा सकता है।

उन्नीस सौ पचास के दशक में प्रयाग के कॉफी हाउस में साम्यवादी (प्रगतिवादी) और रचनात्मक (परिमल के नाम से जाना जाता समूह) लेखक/कवि जुटा करते थे। मेरे ब्लॉग पर हेमेंद्र सक्सेना जी के संस्मरणों में उनका उल्लेख है। वैसा गांव में तो सम्भव है ही नहीं; लेशमात्र भी नहीं। किसी गरिष्ठ विषय पर अगर मैं लोगों को कुछ बोलने बतियाने की कोशिश करूं तो वे बड़ी जल्दी मुझसे कट लेंगे। पर उनके पास बैठ कर उनके बारे में, गांवगिरांव के बारे में बतियाना-जानना भी एक अलग तरह का संतृप्त करने वाला अनुभव हो सकता है। और असल में वही अनुभव प्रगतिवादी या परिमल समूह के साहित्यकारों को भी मानसिक खाद-पानी-धूप देता रहा होगा। रिटायरमेण्ट के शुरुआती महीनों में मैंने वह शुरू भी किया था, पर फिर कुछ अनचाहे कारणों से वह जारी न रह सका। अब वह पुन: किया जा सकता है। चाय की चट्टी थामी जा सकती है।

चाय की चट्टी (या उस जैसे अड्डे) निठल्ले आदमी को भी ‘मानसिक हलचल’ के लिये गतिमान बना सकते हैं! :-)

आज वह किया। सवेरे देखा तो कटका स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है।

आज वह किया। कई महीनों बाद कटका स्टेशन की ओर निकला। देखा कि स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है। भट्टी दहक रही है। पर्याप्त मात्रा में जलेबी छन चुकी है और समोसे तलने का भी तीन चौथाई काम पूरा हो चुका है। तीन चार ग्राहक बैठे हैं। दुकान वैसी नहीं थी, जैसी आधे अधूरे मन और संसाधनों के साथ खोली जाती है और कुछ समय बाद बंद हो जाती है।

यह चट्टी, बतौर अड्डा, थामने के लिये मुकम्मल जान पड़ी!

पता चला कि नौजवान का नाम मनोज कुमार है। वह स्कूल टीचर बनने के लिये तैयारी कर रहा है पर साथ ही जीविका के लिये चाय-नाश्ते की दुकान भी खोल ली है। दुकान सवेरे पांच बजे खुल जाती है। जब मैं पंहुचा तो साढ़े सात बज रहे थे। समोसे का साइज सामान्य से बड़ा लग रहा था। गरम छनता समोसा टैम्प्ट कर रहा था। पर मैंने समोसे पर जोर नहीं मारा। मनोज से पूछा कि चाय पिला सकते हैं? बिना शक्कर।

बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी।

और बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी। बाकी बची चाय थर्मस में भर कर रख दी गयी। बनाने की स्पीड अच्छी थी; सर्विस अच्छी थी। मुझे बैठने के लिये बेंच भी मनोज के पिताजी ने अपने गमछे से साफ की। यानी, पर्याप्त आदर दिया बैठने के लिये।

मनोज के पिताजी ने बताया कि वे मेरे साले साहब को वर्षों से दूध सप्लाई करते रहे हैं। अभी भी करते हैं। विनोद सवेरे पांच बजे दुकान खोलते हैं। उनका कहना था कि अगर मैं पांच बजे भी घूमने निकलूं तो यहां इस अड्डे पर चाय मुझे मिल सकेगी। पांच बजे से जलेबी, लौंगलता और उसके बाद समोसा बनाने का काम धाम होता है। समोसा खाने के लिये थर्मोकोल के दोने में ‘मटर का छोला’ भी उपलब्ध होता है। आमतौर पर आसपास के लोगों का नाश्ता एक या दो समोसा-छोला और एक टुकड़ा जलेबी होता है। चाय के ग्राहक कम होते हैं। समोसा और जलेबी लोग खरीद कर घर पर नाश्ता करने के लिये ले जाते हैं।

मनोज का समोसा चार रुपये का है और जलेबी पच्चीस रुपया पाव। मैंने स्वाद परखने के लिये कुछ समोसे खरीदे। घर आ कर चखने पर और लोगों को तो अच्छे लगे, मुझे नहीं। उसमें लहसुन के पेस्ट का प्रयोग हुआ था। नॉन-लहसुन-प्याजेटेरियन व्यक्ति को लहसुन की थोड़ी सी भी मात्रा कष्ट देती है। :-D

गांव के रोड साइड रेलवे स्टेशन की बजरिया की चाय की दुकान। मुझे किसी महानगरीय कॉफी शॉप की अनुभूति का नोश्टाल्जिया ले कर नहीं ही चलना चाहिये। मनोज के पिताजी के गमछे से साफ की गयी बेंच या टाट बिछाई दुकान की मुंडेर बैठने के लिये पर्याप्त है। सामने ही अदरक कूट कर चाय बनाने और कुल्हड़ में छान कर परोसने का अपना अपना नोश्टाल्जिया है।

पांच सात ब्लॉग पोस्टें मनोज की चाय की चट्टी के नाम पर हो ही जायेंगी। पता चला कि मनोज सपाई है। इसी बहाने कभी न कभी भाजपा-सपा की राजनीति पर भी कुछ कहने लिखने को मिल जायेगा। और गांवदेहात के भांति भांति के ग्राहक आते हैं; उनकी अपने अपने स्तर की, अपने अपने कंसर्न की बातें होती हैं। वह सब भी देखना, समझना, लिखना हो सकेगा।

चाय का कुल्हड़

मेरी जेब में पैसे नहीं हैं। मोबाइल-स्मार्टफोन युग में सवेरे सैर को निकलते समय घड़ी पहनने और जेब में पैसे ले कर चलने की आदत खत्म हो गयी है। खैर, मनोज की दुकान पर भीम-एप्प का एक क्यू-आर कोड का स्टिकर दिख गया। उससे पेमेण्ट किया। पता चला कि वह खाता सामने के किसी “त्रिपाठी इलेक्ट्रिकल” दुकान वाले सज्जन का है। मनोज का अपना खाता न होने के कारण उनका क्यूआर कोड लगा लिया है, जिससे मेरे जैसे किसी ग्राहक को भी सामान खरीदने, पैसा देने में दिक्कत न हो और कोई ग्राहक इस आधार पर न टूट जाये। मनोज की ग्राहकी थामने की यह जुगत भी अच्छी लगी मुझे।

अब आगे भी, कल सवेरे से मनोज की चाय की चट्टी पर! :-)


सोनू से सौदा – गड़ौली धाम


जब घर से सवेरे निकला तो डिस्टोपियन (dystopian – मनहूसियत वाले) विचार मन में चल रहे थे। कुछ भी सकारात्मक नहीं दिखता गांव में। दिनों दिन ईंट भट्ठे बढ़ रहे हैं। बालू और मिट्टी का वैध-अवैध खनन बढ़ रहा है। वातावरण में धूल ज्यादा होती है। सवेरे घूमना उतना मन प्रसन्न नहीं करता। भगवानपुर और करहर के बीच सिवान वाली जमीन जहां घर नहीं, खेत भर हैं; में सड़क नहीं है। वहां दिन पर दिन खेतों की मेड़, जिसपर साइकिल गुजारनी होती है, लोग अपनी छुद्र लोभ वृत्ति के कारण पतली करते जा रहे हैं। हर साल चार छ इंच मेड़ कभी इस खेत वाला कभी दूसरे खेत वाला काट देता है। यह मेड़ काटने की छुद्र सोच ही इस इलाके की दरिद्रता का कारण है और उसका प्रतीक भी।

करहर में एक महुआ के पेड़ के नीचे भीड़ ने मेरा डिस्टोपियन विचार बदला। … इस समय वहां आपस में बांटा जा रहा था सामुहिक रूप से बीना हुआ महुआ।

पर करहर में एक महुआ के पेड़ के नीचे भीड़ ने मेरा डिस्टोपियन विचार बदला। वहां महिलायें, बच्चे और पुरुष भी सवेरे से महुआ बीनते हैं। इस समय वहां आपस में बांटा जा रहा था सामुहिक रूप से बीना हुआ महुआ। सामुहिक काम – भले ही महुआ जैसी छोटी चीज का हो – अगर इस इलाके में किया जा सकता है तो सम्भावना है कि ये ही लोग सामुहिक तौर पर खेती, पशुपालन, दुग्ध-व्यवसाय आदि अनेकानेक कार्य कर सकते हैं। यह विचार मेरे मन में कौंध गया। सब कुछ नेगेटिव या चिरकुट नहीं है। लोगों को अगर सिखाया, बताया और लाभ का अहसास कराया जाये तो “एक धन एक बराबर इग्यारह – 1+1=11” बनाने की आदत विकसित हो सकती है। खेत की मेड़ को काट कर पतला करने की आदत के विपरीत!

गड़ौली धाम के गौपालन के सोशियो-इकॉनॉमिक प्रयोग की सफलता इस सामुदायिक सोच पर ही पल्लवित हो सकती है। यही बात मन में दोहराता हुआ मैं करहर-गड़ौली-अगियाबीर होता हुआ गड़ौली धाम पंहुचा।

सुनील ओझा जी का जहां बैठक लगता है, वहां आज खसखस के पर्दे टांगे हुये थे। दिन में जब इन पर्दों पर पानी दंवारा जाता होगा तो बहुत ठण्डी हवा उनसे गुजर कर उस बैठक को शीतल करती होगी। वैशाख और जेठ की तपती गर्मी के लिये तो बहुत शानदार इंतजाम हो गया है।

ओझा जी वहां नहीं थे। संदीप सिंह दिखे। उन्होने बताया कि कल रात नौ दस बजे बाबूजी बनारस गये। दीदी (ओझा जी कि बिटिया) साथ थीं। सुनील ओझा जी का जहां बैठक लगता है, वहां आज खसखस के पर्दे टांगे हुये थे। दिन में जब इन पर्दों पर पानी दंवारा जाता होगा तो बहुत ठण्डी हवा उनसे गुजर कर उस बैठक को शीतल करती होगी। वैशाख और जेठ की तपती गर्मी के लिये तो बहुत शानदार इंतजाम हो गया है। … मेरे ख्याल से अब संध्या जी (ओझा जी की बिटिया) को अपने पिता को यहां रात गुजारने के लिये छोड़ने में दिक्कत नहीं होनी चाहिये।

सगड़ी चलाता बलराम आया। सगड़ी पर दूध के दो कैन लदे थे। पीछे पीछे एक दो आदमी। मैंने बलराम का सगड़ी रोकते चित्र लिया तो पीछे से, सगड़ी से कूद, एक छोटे कद के नौजवान ने आगे आ कर कहा – एक फोटो मेरा भी लीजिये न! बड़ी फुर्ती से एक बच्चे की तरह वह उछल कर सगड़ी की साइकिल पर बैठ गया।

सगड़ी चलाता बलराम आया। सगड़ी पर दूध के दो कैन लदे थे।

उस नौजवान का नाम है सोनू। सोनू नाम तो सुनील ओझा जी का दिया है। वैसे वह शादाब है। मेरठ, जहां से यहां की एक दर्जन साहीवाल गायें आई हैं, वहीं के किसी गांव का है सोनू। गायों की देखभाल करने में दक्ष है। बहुत वाचाल है सोनू। अपने से ही बताता जाता है। आपको प्रश्न करने की कम ही जरूरत होती है। “मैं गाय की सेवा का सब काम कर लेता हूं। सवेरे चार बजे उठता हूं। दिन के बारह बजे तक काम ही काम रहता है। शाम को फिर गायों के काम में लगना होता है। गाय ही नहीं, मैं घोड़ा भी पाल सकता हूं। उसकी देख रेख, उसकी सवारी – सब आता है मुझे। यही नहीं, चिनाई (ईंट से दीवार बनाना – ब्रिकलेयर) का काम भी मुझे आता है।” – सोनू बताता ही जाता है।

फोटो खिचाता सोनू। पीछे गमछाधारी बलराम है।

अब वह तेईस साल का है। उसकी बीवी उससे एक साल उम्र में बड़ी है। “मैं तीसरी तक पढ़ा हूं और मेरी बीवी हाईस्कूल तक। शादी हुई तो वह उन्नीस साल की थी और मैं अठारह का। एक साल बड़ी है तो कोई बात नहीं। बूढा होने पर मैं बड़ा हो जाऊंगा और वह छोटी। एक बच्चा है हमारा। तेरह महीने का। उसका नाम हम दोनो ने मिल कर रखा है – अबूजर। अबूजर मुहम्मद।”

“अबूजर का क्या मतलब होता है?” – मैंने पूछा। उसे अर्थ नहीं मालुम था। यही बताया कि ये नाम होता है लोगों का। मैंने तुरंत इण्टरनेट पर सर्च किया। अबू-जार हजरत मुहम्मद के एक साथी/अनुयायी/साहबी का नाम था। मैंने उसे बताया कि मोहम्मद साहब के साथी का नाम है तो सोनू ने संतोष जताया कि उसकी बीबी और उसने एक अच्छा ही नाम रखा था। “बीबी और बच्चे को देखने मैं गांव आता जाता रहूंगा।” सोनू ने जोड़ा।

सोनू, संदीप और बलराम बड़ी फुर्ती से दूध के कैन का वजन लेते हैं और तापक्रम भी नोट करते हैं।

सोनू, संदीप और बलराम बड़ी फुर्ती से दूध के कैन का वजन लेते हैं और तापक्रम भी नोट करते हैं। सोनू एक कॉपी में आंकड़े दर्ज करता है। दोनो डिब्बों को जोड़ कर 60-62 किलो निकलता है दूध। “शाम को भी इसी के आसपास होता है। थोड़ा कम भी हो सकता है।”

संदीप चाय बनाते हैं। एक सिरेमिक कप में चाय मुझे थमाते हैं। बाकी लोग पेपर कप में चाय लेते हैं। मेरे लिये कुर्सी कमरे के दरवाजे के पास रखी जाती है। वहां हवा अच्छी आती है। सोनू बात करता जाता है। “सारे दूध को गर्म कर क्रीम निकाल कर घी बनाया जाता है। बचा सेप्रेटा बाल्टा-वाला (बिल्ला नाम का आदमी) ले जाता है।”

“अच्छा?! मेरे काम का तो सेपरेटा ही है। मेरी उम्र में घी की ज्यादा जरूरत नहीं। देसी गाय का सेपरेटा दूध ही बढ़िया है। बिल्ला के बेचे जाने वाले दूध में से मुझे दे सकते हो? बिल्ला से कुछ ज्यादा रेट लगा लो।” मैंने पूछा।

बलराम और संदीप का कहना है कि सारा दूध बिल्ला को देना तय हुआ है। वे उसमें बदलाव नहीं कर सकते। सोनू मुझसे पूछता है – “आपको कितना चाहिये?” मेरे एक किलो बताने पर वह मायूस होता है – बस?

“और क्या भाई। मैं और मेरी पत्नी को कुल मिला कर एक किलो ही तो चाहिये।” मेरे यह कहने पर वह टेनटेटिव सा होता है। फिर सोच कर बोला – चलो, आप रोज रोज आते हो, आपको दे दूंगा।

बलराम और संदीप कर्मचारी जैसा व्यवहार करते हैं पर सोनू, तीसरी दर्जा पास, छटपट (स्मार्ट) है। वह निर्णय लेने का ‘जोखिम’ उठाता है। वह कौतूहल भी रखता है। पर्याप्त। मुझसे मेरे बारे में, मेरे खींचे चित्रों के बारे में, मेरे लिखने के बारे में सवाल करता है। लगता वह बालक ही है पर मेरे ख्याल से गड़ौली धाम की गौशाला के लिये वह एसेट है। बावजूद इसके कि वह अपनी पत्नी-बच्चे से मिलने बार बार अपने गांव आता-जाता रहेगा; ओझाजी को इस बंदे को स्थाई रूप से अपने यहाँ रखना चाहिये।

सोनू मोबाइल दिखाता है। स्मार्टफोन। सेमसंग का। बताया कि दीदी (संध्या जी) ने दिया है। “वो मेरा मोबाइल टूट गया था न, तो दीदी ने मुझे यह दिया।” ओझाजी कि बिटिया अगर सैमसंग का टचस्क्रीन वाला फोन दे सकती हैं तो सोनू को एसेट समझती ही होंगी।

और शायद ऐसा ही वे सोचते भी हों। सोनू मोबाइल दिखाता है। स्मार्टफोन। सेमसंग का। बताया कि दीदी (संध्या जी) ने दिया है। “वो मेरा मोबाइल टूट गया था न, तो दीदी ने मुझे यह दिया।” ओझाजी कि बिटिया अगर सैमसंग का टचस्क्रीन वाला फोन दे सकती हैं तो सोनू को एसेट समझती ही होंगी।

मैं उसकी निर्णय लेने की क्षमता की सीमा परखने के लिये एक और सवाल करता हूं – “वैसे मुझे सेप्रेटा की बजाय एक किलो क्रीमवाला दूध दे सकते हो? क्या भाव दोगे?”

इस सवाल पर सोनू, संदीप और बलराम – तीनों समवेत स्वर में मना कर देते हैं। यह उनकी क्षमता के बाहर का निर्णय है। क्रीम वाले दूध की बिक्री तो नहीं हो सकती। उसके लिये तो बाबूजी को ही पूछ्ना होगा।

“तो आप लोग पूछ कर कल मुझे बता देना।” मेरे यह कहने पर तीनो किनारा करते हैं। ओझा जी से इस प्रकार की बातचीत शायद उस तरह की पॉलिसी विषयक बात हो जो फैक्टरी का जेनीटर फैक्टरी के चीफ एग्जीक्यूटिव से करने की सोच भी नहीं सकता। पर संदीप सिंह मुझे एक रास्ता सुझाते हैं – “आप हमसे क्यूं पूछते हैं। आप तो बाबूजी से सीधे बात कर सकते हैं। आप ही जब मिलेंगे तो पूछ लीजियेगा।”

एक कप चाय के साथ सोनू, संदीप और बलराम के साथ इस प्रकार की स्मॉल-टॉक। इसके लिये 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना खलता नहीं, अच्छा ही लगता है। मेरे मन का डिस्टोपियन भाव, अस्थाई रूप से ही सही, कुछ दूर तो होता है। इस प्रकार यहां नियमित आना मेरे डिस्टोपिया को पूरी तरह, समूल, निकाल सकेगा? यह देखा जाना बाकी है। मन में “उपारा बेंट” होने का भाव कहीं गहरे बैठ गया है। :-)

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Gadauli Dham गड़ौली धाम

गड़ौली धाम, सगड़ी और सुनील भाई


पत्नीजी ने कहा – “रोज रोज गड़ौली निकल जाते हो, ये मोनोटोनी ठीक नहीं। और भी जगहें हैंं जाने, घूमने, देखने और लिखने की। जब कुछ बिना किसी तय मुद्दे के चल रहे हो तो और जगह भी जाओ।” बात उनकी ठीक भी थी। रोज रोज वहां पंहुच जाना; सुनील ओझा जी को तख्त पर बैठे हाथ पैर गरदन हिलाते व्यायाम करते देखना; इधर उधर घूमना, आधा घण्टा सुनील भाई से बातचीत और बलराम की चाय – यह एक रुटीन ही न बन जाये। … वहां के लोग यह न सोचने लगेंं कि इस ‘उपारा बेंट’ को करने धरने को तो है नहीं, रोज रोज चला आता है! :-D

पर फिर भी साइकिल गड़ौली धाम की तरफ मुड़ गयी आज भी।

उपारा बेंट

उपारा बेंट आज मेरे लेक्सिकॉन में जुड़ा नया शब्द है। गड़ौली धाम के पास एक अधेड़ आदमी साइकिल पर जा रहा था। वह किसी से बात कर रहा था – “हम कहां जाब, हम त उपारा बेंट हई (मैं और कहां जाऊंगा, मैं तो उपारा बेंट हूं। जब तक मालताल (पैसा) हो, तब तक बम्बई रहो, दिल्ली रहो, जहां मन आये रहो। जब मात-ताल झर्र तो अपने घरे में घुसरो (लौट आओ)।”

उपारा बेंट गोरुआर (पशु शाला) का वह खूंटा है जिसे पुराना होने पर उखाड़ कर अटाले में रख दिया जाता है। उस कबाड़ से कोई जरूरत कहीं होने पर उसे निकाल कर लगा दिया जाता है। उसका नियमित कोई उपयोग नहीं। ताश के पत्तों में जो स्थान जोकर का है – जिसे कोई अन्य पत्ता न होने पर उपयोग कर लिया जाये; वही उपारा बेंट है गांवदेहात की भाषा में। रोज रोज जाने पर लोग उपारा बेंट समझने लगेंगे! :-)

कृपया गड़ौली धाम के बारे में “मानसिक हलचल” ब्लॉग पर पोस्टों की सूची के लिये “गड़ौली धाम” पेज पर जायें।
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गड़ौली धाम में

आज सुनील जी नहीं थे। सतीश ने बताया – “कल देर रात दीदी उन्हें ले गयीं। आज रामनवमी को कुछ कार्यक्रम होगा, पर बारह बजे तक ही आयेंगे, शायद।” सतीश को गंगा किनारे स्नान कर महादेव के अभिषेक के लिये बाल्टी भर गंगाजल लाना था। वे निकल लिये। अकेला मैं एक तख्ते पर लेटा कुछ देर – सरपत की बनी छत ताकते हुये। विनायक प्रणाम कर गये। यह नौजवान खुला नहीं है। दूरी बना कर रखता है। शैलेश ने फोन कर कहा – “भईया विनायक को बताते रहा करिये। बहुत अच्छा लड़का है। यहीं रहेगा।” शैलेश, विनायक, सुनील भाई ओझा – इन सब के बावजूद मन में उपारा बेंट का भाव आता है तो शायद मुझमें ही कोई डिजाइन डिफेक्ट है!

नदी किनारे का वह शमी का वृक्ष जिसके आसपास हम दम्पति ने दिये जलाये थे; बहुत नीक लगता है। उसको समग्रता से देखने पर गंगाजी का पूरा विस्तार दीखता है।

मैं आसपास घूम कर देखता हूं। नदी किनारे का वह शमी का वृक्ष जिसके आसपास हम दम्पति ने दिये जलाये थे; बहुत नीक लगता है। उसको समग्रता से देखने पर गंगाजी का पूरा विस्तार दीखता है। अब रामनवमी आ गयी; पर ध्यान से जगह देखने पर एक दिया जो हमने दीपावली को जलाया था, वहां पास में रखा दिखा। अच्छा लगा कि हम अभी भी वहां हैं।

शमी के तने में एक आर पार दीखने वाला कोटर है। उससे गंगा जी का जल साफ दीखता है। मैंने उसके सामने कुशा इधर उधर कर चित्र लिया।

शमी के तने में एक आर पार दीखने वाला कोटर है। उससे गंगा जी का जल साफ दीखता है। मैंने उसके सामने कुशा इधर उधर कर चित्र लिया।

कुटिया के पास नयी सगड़ी दिखी। हीरालाल ने बताया कि चार रोज पहले आई थी कछवाँ से। “बाबू जी चलावत रहें। बहुत मस्त फोटो आई रही। आपऊ देखे होब्यअ। (बाबूजी – सुनील भाई चला रहे थे। बहुत शानदार फोटो आई थी। आपने भी देखी होगी।)”

मैने देखी नहीं थी। कहने पर विनायक ने मेरे पास भेजी। उसपर डेटलाइन है 6 अप्रेल रात पौने नौ बजे की। रात में बिना तैयारी के चित्र लिये जाने के कारण चित्र में धुंधलापन है। मोबाइल हाथ की बजाय ट्राइपॉड पर रखा होता तो क्लियर आता। मैंने उसे जस का तस प्रस्तुत करने की बजाय पेण्टिंग प्रभाव देना उचित समझा।

कुटिया के पास नयी सगड़ी दिखी। हीरालाल ने बताया कि चार रोज पहले आई थी कछवाँ से। “बाबू जी चलावत रहें। बहुत मस्त फोटो आई रही। (बाबूजी – सुनील भाई चला रहे थे। बहुत शानदार फोटो आई थी।)”

छियासठ प्लस के बाबूजी; रात पौने नौ बजे मौज मजे से साइकिल ठेला चला रहे हैं। साथ में तीन चार चेला लोग उन्हें साधने खड़े हैं। इस दृष्य की कल्पना ही मजेदार है। चित्र तो है ही। … मैं आगे की कल्पना करता हूं। सुनील भाई यहीं गड़ौली धाम में रहते हुये जीवन का सैंकड़ा पार करें और उस दिन भी सगड़ी पर इसी तरह चित्र खिंचायें। :-)

पता नहीं, सगड़ी खींचते सुनील ओझा जी का यह चित्र उनकी बिटिया ने देखा है या नहीं। वह तो अपने पिता को उम्र और ढेरों दवाईयों से पीड़ित मानती है। उनको तो सुनील भाई का यह एडवेंचरिज्म अच्छा थोड़े लगेगा?!

आज गड़ौली धाम में ज्यादा देर नहीं रहा। वैसे भी, जल्दी लौटना चाहता था। घर पर नौ दिवसीय मानसपाठ सम्पन्न करना था। उसके बाद बारह बजे रामलला का बर्थडे मनाना था। पत्नीजी ने गुड़ के हलवे का केक बनाया था। साथ में पूरी तरकारी सिंवई। आज रविवार था तो घर में काम करने वाले और भी लोग रोक रखे थे मेम साहब ने।

बकौल सतीश गड़ौली धाम में तो कुछ कार्यक्रम होगा ही नवरात्रि समापन पर। कल पता चलेगा वहां क्या हुआ। आज इतना ही।

जै श्री राम। हर हर महादेव।

गड़ौली धाम में गंगा किनारे शमी के वृक्ष की उखमज के जालों से गुंथी एक टहनी। ये वह चीजें हैं जो मुझे आकर्षित करती हैं, और वहां ले जाती हैं।

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