मेरी पत्नीजी का बार बार कहना है कि गड़ौली धाम तक गर्मी के मौसम में 12-14 किलोमीटर साइकिल चलाना अपने साथ ज्यादती है। सप्ताह में कभी कभी जाना तो ठीक है पर रोज रोज उधर निकल लेने की बजाय और भी कुछ है जो देखना, लिखना चाहिये। मैं भी सोचता हूं कि विषयांतर होना ही चाहिये।
क्या किया जाये, कटका स्टेशन की चाय की चट्टी थाम ली जाये? प्रयागराज के सिविल लाइंस के कॉफी हाउस की याद होती है। हम – मेरे वरिष्ठ उपेंद्र कुमार सिंह जी और मैं – वहां अपने रेल परिचालन के बोझ से हल्का होने के लिये यदा कदा दफ्तर छोड़ चुपचाप निकल जाया करते थे। आधा एक घण्टा व्यतीत कर लौटने पर कुछ हल्कापन महसूस होता ही था। अब उपेंद्र जी का साथ नहीं है। यूं देखें तो गांव में पत्नीजी के अलावा किसी का भी साथ नहीं है। यहां कॉफी हाउस तो मिल ही नहीं सकता। पर रेलवे स्टेशन के आसपास चाय की दुकानें जरूर हैं, जहां कुछ समय गुजारा जा सकता है।
उन्नीस सौ पचास के दशक में प्रयाग के कॉफी हाउस में साम्यवादी (प्रगतिवादी) और रचनात्मक (परिमल के नाम से जाना जाता समूह) लेखक/कवि जुटा करते थे। मेरे ब्लॉग पर हेमेंद्र सक्सेना जी के संस्मरणों में उनका उल्लेख है। वैसा गांव में तो सम्भव है ही नहीं; लेशमात्र भी नहीं। किसी गरिष्ठ विषय पर अगर मैं लोगों को कुछ बोलने बतियाने की कोशिश करूं तो वे बड़ी जल्दी मुझसे कट लेंगे। पर उनके पास बैठ कर उनके बारे में, गांवगिरांव के बारे में बतियाना-जानना भी एक अलग तरह का संतृप्त करने वाला अनुभव हो सकता है। और असल में वही अनुभव प्रगतिवादी या परिमल समूह के साहित्यकारों को भी मानसिक खाद-पानी-धूप देता रहा होगा। रिटायरमेण्ट के शुरुआती महीनों में मैंने वह शुरू भी किया था, पर फिर कुछ अनचाहे कारणों से वह जारी न रह सका। अब वह पुन: किया जा सकता है। चाय की चट्टी थामी जा सकती है।
चाय की चट्टी (या उस जैसे अड्डे) निठल्ले आदमी को भी ‘मानसिक हलचल’ के लिये गतिमान बना सकते हैं! :-)

आज वह किया। कई महीनों बाद कटका स्टेशन की ओर निकला। देखा कि स्टेशन रोड पर एक नयी चाय की दुकान आ गयी है। दुकान पर पालथी मारे एक सांवला सा नौजवान, माथे पर त्रिपुण्ड लगाये विराजमान है। भट्टी दहक रही है। पर्याप्त मात्रा में जलेबी छन चुकी है और समोसे तलने का भी तीन चौथाई काम पूरा हो चुका है। तीन चार ग्राहक बैठे हैं। दुकान वैसी नहीं थी, जैसी आधे अधूरे मन और संसाधनों के साथ खोली जाती है और कुछ समय बाद बंद हो जाती है।
यह चट्टी, बतौर अड्डा, थामने के लिये मुकम्मल जान पड़ी!
पता चला कि नौजवान का नाम मनोज कुमार है। वह स्कूल टीचर बनने के लिये तैयारी कर रहा है पर साथ ही जीविका के लिये चाय-नाश्ते की दुकान भी खोल ली है। दुकान सवेरे पांच बजे खुल जाती है। जब मैं पंहुचा तो साढ़े सात बज रहे थे। समोसे का साइज सामान्य से बड़ा लग रहा था। गरम छनता समोसा टैम्प्ट कर रहा था। पर मैंने समोसे पर जोर नहीं मारा। मनोज से पूछा कि चाय पिला सकते हैं? बिना शक्कर।

और बहुत जल्दी ही, दुकान पर उपलब्ध दूध और अदरख का प्रयोग कर बनाई गयी चाय। एक कुल्हड़ में चाय छान कर थमा दी गयी। बाकी बची चाय थर्मस में भर कर रख दी गयी। बनाने की स्पीड अच्छी थी; सर्विस अच्छी थी। मुझे बैठने के लिये बेंच भी मनोज के पिताजी ने अपने गमछे से साफ की। यानी, पर्याप्त आदर दिया बैठने के लिये।
मनोज के पिताजी ने बताया कि वे मेरे साले साहब को वर्षों से दूध सप्लाई करते रहे हैं। अभी भी करते हैं। विनोद सवेरे पांच बजे दुकान खोलते हैं। उनका कहना था कि अगर मैं पांच बजे भी घूमने निकलूं तो यहां इस अड्डे पर चाय मुझे मिल सकेगी। पांच बजे से जलेबी, लौंगलता और उसके बाद समोसा बनाने का काम धाम होता है। समोसा खाने के लिये थर्मोकोल के दोने में ‘मटर का छोला’ भी उपलब्ध होता है। आमतौर पर आसपास के लोगों का नाश्ता एक या दो समोसा-छोला और एक टुकड़ा जलेबी होता है। चाय के ग्राहक कम होते हैं। समोसा और जलेबी लोग खरीद कर घर पर नाश्ता करने के लिये ले जाते हैं।
मनोज का समोसा चार रुपये का है और जलेबी पच्चीस रुपया पाव। मैंने स्वाद परखने के लिये कुछ समोसे खरीदे। घर आ कर चखने पर और लोगों को तो अच्छे लगे, मुझे नहीं। उसमें लहसुन के पेस्ट का प्रयोग हुआ था। नॉन-लहसुन-प्याजेटेरियन व्यक्ति को लहसुन की थोड़ी सी भी मात्रा कष्ट देती है। :-D
गांव के रोड साइड रेलवे स्टेशन की बजरिया की चाय की दुकान। मुझे किसी महानगरीय कॉफी शॉप की अनुभूति का नोश्टाल्जिया ले कर नहीं ही चलना चाहिये। मनोज के पिताजी के गमछे से साफ की गयी बेंच या टाट बिछाई दुकान की मुंडेर बैठने के लिये पर्याप्त है। सामने ही अदरक कूट कर चाय बनाने और कुल्हड़ में छान कर परोसने का अपना अपना नोश्टाल्जिया है।
पांच सात ब्लॉग पोस्टें मनोज की चाय की चट्टी के नाम पर हो ही जायेंगी। पता चला कि मनोज सपाई है। इसी बहाने कभी न कभी भाजपा-सपा की राजनीति पर भी कुछ कहने लिखने को मिल जायेगा। और गांवदेहात के भांति भांति के ग्राहक आते हैं; उनकी अपने अपने स्तर की, अपने अपने कंसर्न की बातें होती हैं। वह सब भी देखना, समझना, लिखना हो सकेगा।

मेरी जेब में पैसे नहीं हैं। मोबाइल-स्मार्टफोन युग में सवेरे सैर को निकलते समय घड़ी पहनने और जेब में पैसे ले कर चलने की आदत खत्म हो गयी है। खैर, मनोज की दुकान पर भीम-एप्प का एक क्यू-आर कोड का स्टिकर दिख गया। उससे पेमेण्ट किया। पता चला कि वह खाता सामने के किसी “त्रिपाठी इलेक्ट्रिकल” दुकान वाले सज्जन का है। मनोज का अपना खाता न होने के कारण उनका क्यूआर कोड लगा लिया है, जिससे मेरे जैसे किसी ग्राहक को भी सामान खरीदने, पैसा देने में दिक्कत न हो और कोई ग्राहक इस आधार पर न टूट जाये। मनोज की ग्राहकी थामने की यह जुगत भी अच्छी लगी मुझे।
अब आगे भी, कल सवेरे से मनोज की चाय की चट्टी पर! :-)










