भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
आज शाम को अमरकण्टक पंहुच जायेंगे प्रेमसागर जी। वहां उन्हें सोन-जोहिला-नर्मदा का उद्गम मिलेगा। वहां वे कांवर भी खरीदेंगे। बहुत कुछ लिखने को मिलेगा अमरकण्टक और उसके आसपास के बारे में। अभी तक की यात्रा रोचक रही है, मेरे डिजिटल ट्रेवल के लिये। आगे और भी रोचक होगी; तय है!
कल प्रेमसागर रुके राजेंद्रग्राम में। बाणसागर के डिप्टी रेंजर तिवारी जी के घर पर अतिथि थे। मैंने पूछा नहीं, पर उनके आग्रह से उनके घर पर थे तो सत्कार भरपूर हुआ ही होगा। इतना कि कल दिन भर न उन्होने बात की और न दिन का कोई चित्र प्रेषित किया। शाम को उनका कोई फोन भी नहीं था। निश्चय ही आनंद से रहे होंगे वहा। उनके परिवार का कोई चित्र नहीं भेजा अन्यथा पता चलता कि वे लोग कैसे लगते हैं। कल सवेरे आसपास घूम कर जोहिला नदी और कुछ मंदिरों के चित्र अवश्य भेजे हैं। नदी ठीकठाक जल वाली लगती हैं। शायद वर्षा का मौसम है, इसलिये जल होगा; वर्ना नदियां सभ्यता की विकृति को झेलते हुये कृषकाय होती गयी हैं उत्तरोत्तर।
राजेंद्रग्राम के समीप जोहिला नदी
कल शैलेश पण्डित की टिप्पणी थी जोहिला-सोन-नर्मदा की कथा के बारे में। वही बात लगभग प्रेमसागर जी ने भी अपने मैसेज में लिखी है। शैलेश पण्डित का एक ब्लॉग है DZIRENDISCOVER जो रेगुलर अपडेट नहीं होता। उसमें नर्मदा की दशा दुर्दशा पर एक पोस्ट है। उन्होने लिखा है –
“हमने नदियों को माता तो माना लेकिन कभी उसका रख रखाव उस तरह से नहीं किया। औद्योगिक कचरा, आवासीय और धार्मिक गन्दगी हमने जी खोल कर नदियों में बहाई। जिन देशों में नदी को केवल नदी माना उन नदियों की स्थिति हमारी गंगा, यमुना, नर्मदा से लाख गुना अच्छी है।”
शैलेश जी अगर अपना फोन नम्बर दे सकें तो उनसे नर्मदा के बारे में जरूरी इनपुट्स मिल सकेंगे और आगे प्रेमसागर के यात्रा विवरण का कण्टेण्ट बेहतर हो सकेगा। शैलेश जी आशा है यह पढेंगे।
प्रेमसागर जी आज सवेरे निकल लिये अमरकण्टक के लिये। जल्दी निकलते हैं तो अगले घण्टा-डेढ़ घण्टा चलने पर कोई चाय की दुकान मिलती है तो वहां चाय पीते हैं। उनसे जब भी सवेरे बात होती है तो वे चाय की दुकान के आसपास या चाय की दुकान पर ही होते हैं। आज भी वे चाय की दुकान पर थे। बताया कि रास्ता अच्छा है। नीचाई है – पचहत्तर परसेण्ट ढलान और पचीस परसेण्ट चढ़ाई। एक दो चित्र भी भेजे हैं उन्होने आज की अब तक की यात्रा के।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
एक चित्र उन्होने बलभद्र चौबे जी का भेजा है। बलभद्र जी उनको परसों अवरुद्ध घाटी से मैकल पर्वत चढ़ाते और आगे राजेंद्रग्राम तक साथ एस्कोर्ट किये थे। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के एक महत्वपूर्ण अंश में वे सहायक बने। उनका सहयोग रामचंद्र जी की रामेश्वरम सेतु वाली गिलहरी जैसा नहीं, नल-नील जैसा माना जाना चाहिये। उनके रहने से ही प्रेमसागर वह दुर्गम रास्ता पार कर पाये।
प्रेम सागर के साथ बलभद्र चौबे
प्रेम जी ने बताया कि प्रवीण दुबे जी उनकी खैर खबर लेते रहते हैं। कल उनका फोन आया था। प्रवीण जी ने कहा कि अमरकण्टक में दो तीन दिन प्रेम सागर जी को गुजारना चाहिये। वहां की व्यवस्था के लिये उन्होने लोगों को सहेज दिया है। प्रवीण जी प्रेमसागर की आगे मध्य प्रदेश की ॐकारेश्वर – उज्जैन की यात्रा भी सकुशल करा देंगे, ऐसा मेरा यकीन है!
प्रवीण जी प्रेमसागर के लिये भगवान शिव के प्रतिनिधि हैं। वे मुझे भी यात्रा के लिये उकसाते रहते हैं और मैं अपने ऑस्टियोअर्थराइटिस ग्रस्त पैरों का बहाना देता रहता हूं! … प्रवीण दुबे जी की जय हो!
आज शाम को अमरकण्टक पंहुच जायेंगे प्रेमसागर जी। वहां उन्हें सोन-जोहिला-नर्मदा का उद्गम मिलेगा। वहां वे कांवर भी खरीदेंगे। बहुत कुछ लिखने को मिलेगा अमरकण्टक और उसके आसपास के बारे में। अभी तक की यात्रा रोचक रही है, मेरे डिजिटल ट्रेवल के लिये। आगे और भी रोचक होगी; तय है!
वन कर्मी प्रेम सागर जी को किरन घाटी, जहां से सड़क खराब होनी प्रारम्भ हुई थी, वहां से एस्कॉर्ट कर साथ साथ राजेंद्र ग्राम तक आये। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते प्रेमसागर अभिभूत लगते हैं। उन्हीं की सहायता से वे यह यात्रा कर पहाड़ पार कर पाये। वर्ना रास्ता इतना खतरनाक था कि एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर घाटी की गहरी खाई – कोई सपोर्ट ही नहीं था!
हृदय की बाईपास सर्जरी से आश्चर्यजनक रूप से बचे प्रेमसागर कल एक हजार मीटर ऊंचे मैकल को पार कर आये। पानी के बहाव और जगह जगह भूस्खलन से अवरुद्ध पहाड़ी मार्ग; जो कल दुपहिया वाहन के लिये भी बंद कर दिया गया था; को पैदल पर कर वे सीतापुर (अनूपपुर) से राजेंद्रग्राम पंहुचे।
उन्होने कहा कि अगर उन्होने पैदल द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा का संकल्प नहीं लिया होता तो वे कभी इस मार्ग से आते ही नहीं। वाहनों के लिये वैकल्पिक लम्बा मार्ग उपलब्ध है। किसी सैलानी की तरह उस मार्ग से वाहन द्वारा आते, इस ‘खतरनाक’ रास्ते से तो कतई नहीं।
लेकिन प्रेमसागर बताते हैं कि कल जब सीतापुर से चलने पर वन मिला था और यह समाचार कि वहां बाघ के पैरों के निशान मिले हैं और बाघ आसपास हो सकता है; तब भी उन्हे भय नहीं लगा था। “मन में सोच लिया कि बाघ तो चाहे अकेले हों या दस आदमी के झुण्ड में, वह जैसे व्यवहार करेगा वैसे ही करेगा। सब कुछ महादेव पर छोड़ दिया है तो क्या भय?! जिंदगी आज तक की होगी तो वह भी सही। जो महादेव चाहेंगे, वही होगा।” … महादेव के सम्बल पर चल रहे हैं प्रेमसागर और चलते चले जा रहे हैं।
छ साल पहले हृदय रोग से ग्रस्त वह व्यक्ति जो छ मीटर भी नहीं चल सकता था, आज पैदल मैकल पहाड़ चढ़ ले रहा है। यह चमत्कार ही है। प्रेम सागर कहते हैं कि अगर वे हृदय रोग से पूर्णत: उबरे न होते तो आज उनका हार्ट फेल हो गया होता! पहाड़ का रास्ता आगे पीछे आने वाला – अचानक मुड़ जाने वाला (अंग्रेजी के Z अक्षर की तरह टर्न का) – और सतत ऊंची होती धरती का था। नीचे देखने पर कुछ समतल नहीं, मात्र गहरी खाई दिखती थी। वैसी की ‘झांंई’ छूटने लगे और कमजोर हृदय वाले का दिल बैठ जाये।
जगह जगह भूस्खलन का नजारा था। छोटे बड़े पत्थर गिरे थे या गिर रहे थे। रास्ते में हनुमान जी का मंदिर मिला। पहाड़ की सबसे ऊंची जगह से लगभग दो-तीन किलोमीटर पहले। मंदिर में हनुमान जी की वृहदाकार, पंचमुखी, गेरू में लिपटी बड़ी बड़ी चमकदार आंखों वाली प्रतिमा थी। इस मंदिर के दोनो ओर ऊपर से अतिवृष्टि का जल वेग से ऐसे गिरा था कि अपने साथ पहाड़ की कई चट्टाने और मिट्टी धसका कर नीचे ले आया। यह चमत्कार ही था कि मंदिर बच रहा। मंदिर के आसपास तीन जगह सड़क पानी के तेज बहाव से क्षतिग्रस्त हो गयी। “मोटा मोटी एक महीने से यह भूस्खलन हो रहा है। तभी से सड़क रिपेयर का भी काम चल रहा है। सड़क बनती थी और फिर टूट जाती थी”।
रास्ते में हनुमान जी का मंदिर मिल। पहाड़ की सबसे ऊंची जगह से लगभग दो-तीन किलोमीटर पहले।
मंदिर में उन्होने विश्राम किया। वहां उन्हे गुड़ और जल का प्रसाद भी मिला। सतत चढ़ रहे पहाड़ के यात्री के लिये यह प्रसाद भी अमृत तुल्य है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
सड़क मार्ग को रिपेयर-रिस्टोर करने वाले कई मजदूर, कई यंत्र और अन्य कर्मी दिखे।
पहड़ की चढ़ाई पर सड़क मार्ग को रिपेयर-रिस्टोर करने वाले कई मजदूर, कई यंत्र और अन्य कर्मी दिखे। एक ठेकेदार खान साहब से प्रेमसागर की बात भी हुई। खानसाहब ने बताया कि वे स्खलन की लगभग चार जगहों पर चौड़ी रीटेनिंग दीवार बनाने का काम कर रहे हैं। दीवार की चौड़ाई पांच फुट की बनाई जा रही है – भूस्खलन की पुख्ता रोक के लिये। उस दीवार में कहीं भी ईंट या मलबा नहीं लगा है। उनका काम चौबीसों घण्टे चल रहा है। काम जल्दी पूरा करने का दबाव है। पर काम के दौरान भी भूस्खलन कई बार हुआ है।
ठेकेदार खान साहब ने बताया कि वे स्खलन की लगभग चार पांच जगहों पर चौड़ी रीटेनिंग दीवार बनाने का काम कर रहे हैं।
खान साहब भी प्रेमसागर की पैदल यात्रा पर आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे। पर अलग थलग जगह पर इतनी ऊंचाई पर, संसाधनों की कमी के बावजूद कोई निजी उद्यमी चौबीस घण्टे काम करवा रहा है – यह भी आश्चर्य है। खान जैसों को देख कर भी एक राष्ट्रीय गर्व का भाव मन में आता है। उनका कार्य, उनका श्रम, उनकी एण्टरप्राइज तो कहीं कोई बोलता-बतियाता-प्रसारित भी नहीं करता। खान ने बताया कि सीमेंट और स्थानीय उपलब्ध पत्थर-गिट्टी-बालू का ही प्रयोग हो रहा है रीटेनिंग वाल बनाने में। बिना खड़े रहने की जगह के वह दीवार बनाना कठिन काम है।
ठेकेदार खान साहब
पहाड़ और जंगल – दोनो अभूतपूर्व हैं। प्रवीण दुबे जी बताते हैं कि ये जंगल शाल-वन हैं। सागौन की तो प्रकृति होती है कि वह किसी अन्य प्रकार के वृक्ष को पनपने नहीं देता, पर शाल अपने साथ बाकी सभी प्रकार के वृक्षों-वनस्पति को सहअस्तित्व में साथ लिये चलता है – पूरी बायोडाईवर्सिटी के साथ। इस जंगल में बहुत वैविध्य है। और जंगल के बीच में रहते हैं गोण जनजाति के लोग। वे बहुत सरल हैं जिन्हे प्रकृति के साथ रहना भरपूर आता है। उनके गुणसूत्र में प्रकृति है। जंगल की वनस्पतियों की उन्हें बहुत जानकारी है। उन्ही के माध्यम से चिकित्सा का उनका जो अनुभूत-ज्ञान है, उसपर बहुत कुछ शोध किया जा रहा है पर बहुत कुछ किया जाना शेष है। सामान्य शहरी आदमी उनकी इन विविधताओं की सोचता ही नहीं। वह यहां से गुजरा तो बस गुजर जाता है। अनुभव करने या रुकने का उसके पास समय ही नहीं होता।
प्रवीण जी बताते हैं कि ये जंगल शाल-वन हैं। सागौन की तो प्रकृति होती है कि वह किसी अन्य प्रकार के वृक्ष को पनपने नहीं देता, पर शाल अपने साथ बाकी सभी प्रकार के वृक्षों-वनस्पति को सहअस्तित्व में साथ लिये चलता है – पूरी बायोडाईवर्सिटी के साथ।
दस किलोमीटर खड़ी चढ़ाई चढ़ी प्रेमसागर ने। वह व्यक्ति जिसकी हृदय धमनियों में अवरोध रहा हो और जिसे बाईपास सर्जरी ही एकमात्र निदान बताया गया हो, वह इतना स्वस्थ हो जाये कि पैदल पहाड़ चढ़ जाये, अभूतपूर्व है। राजीव टण्डन जी बताते हैं कि हृदय की अवरुद्ध धमनियों का ब्लॉकेज खुलता तो नहीं है; पर शरीर की मृत्यु से जद्दोजहद करने की प्रवृत्ति कोलेटरल वेसल्स का निर्माण करती हैं जो अवरोध का मुकम्मल विकल्प बना देती हैं। प्रेमसागर जी के साथ वही हुआ होगा। पर वह भी तो चमत्कार में भी चमत्कार ही है। उसी को ही देवाधिदेव महादेव की कृपा कहा जा सकता है।
सबसे ऊंचे स्थान पर पंहुच कर प्रेमसागर को जो अनुभूति हुई, करीब 1000 मीटर के मैकल पर्वत पर चढ़ कर, उसके बारे में वे कहते हैं कि “लगा कि पहाड़ मेरे से छोटा पड़ गया”!
प्रेम सागर सब से ऊंचे स्थान पर पंहुच कर अपनी अनुभूति के बारे में कहते हैं कि लगा कि पहाड़ मेरे कदमों के नीचे है!
रास्ते में प्रेमसागर को कई झुण्ड बंदरों के मिले। लाल मुंह वाले मिले और काले मुंह वाले भी। एक बंदर का चित्र भी प्रेमसागर ने भेजा है। “बंदर खतरनाक थे। वह तो गनीमत थी कि मेरे पास छाता था, वर्ना मेरा बैग-झोला तो छीन कर तारतार कर देते, इस आशा में कि उसमें खाने की कोई सामग्री होगी”।
सड़क पार करता वानर।
जंगली जानवरों की इज्जत करने की चेतावनी वाला वन विभाग का एक बोर्ड भी उन्हें रास्ते में दिखा। जिसमें लिखा था – “जंगली जानवर अचानक सड़क पर आ सकते हैं। इन्हें दुर्घटनाग्रस्त करना दण्डनीय अपराध है।” कुल मिला कर यह कि सड़क पार करने का राइट ऑफ वे (right of way) यात्री का नहीं जंगल के जीवों का है। बहुत कुछ उसी तरह कि रेल लाइन पार करने का अधिकार ट्रेसपासर्स को नहीं है। राइट ऑफ वे, लेवल क्रासिंग पर भी, ट्रेन का है, सड़क वाहन का नहीं। मुझे याद आता है कि अफ्रीका के किसी वन में गुबरैले बहुत होते हैं। वहां बोर्ड लगा है कि राइट ऑफ वे गुबरैलों (Dung Beetles) का है।
वन कर्मी प्रेम सागर जी को किरन घाटी, जहां से सड़क खराब होनी प्रारम्भ हुई थी, वहां से एस्कॉर्ट कर साथ साथ राजेंद्र ग्राम तक आये। उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते प्रेमसागर अभिभूत लगते हैं। उन्हीं की सहायता से वे यह यात्रा कर पहाड़ पार कर पाये। वर्ना रास्ता इतना खतरनाक था कि एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर घाटी की गहरी खाई – कोई सपोर्ट ही नहीं था!
प्रेम सागर ने एक झरने का चित्र भी भेजा है। ऐसे कई झरने वहां तेज वेग से जल उत्सर्जित कर रहे हैं। इन्ही से भूस्खलन हो रहा है और यही स्रोत हैं नदियों के जल के। “इसी तरह का पानी करीब एक डेढ़ किलोमीटर के सड़क मार्ग में तेज वेग से गिर रहा था और बह रहा था।”
झरना और पहाड़ पर जल गिरने के कारण चट्टानों पर हुये घिसाव के दृश्य
डिप्टी रेंजर तिवारी जी
बाणसागर के डिप्टी रेंजर तिवारी जी के प्रति वे बहुत कृतज्ञ हैं। उनका परिवार राजेंद्रग्राम में रहता है। त्रिपाठी जी ने कहा कि भले ही रेस्ट हाउस में रहने की व्यवस्था है, प्रेमसागर उनके घर पर ही रुकें और एक दिन और उनके परिवार को उनके आतिथ्य का मौका दें। यहां राजेंद्रग्राम में वे तिवारी जी के परिवार के साथ ही उनके घर पर रुके हैं और कल भी रहेंगे। कल वे सोन नदी का उद्गम स्थल देखेंगे। “कल आपको उनकी उत्पति स्थल के चित्र भेजूंगा। उसके अलावा तिवारी जी ने बताया है कि एक और नदी (जुहिड़ा या जुआरी जोहिला नदी) का उद्गम पास में ही हुआ है। उसे भी देखने का अवसर मिलेगा।”
वन विभाग के लोगों की सहायता और उनके द्वारा मिले इज्जत सम्मान के लिये बारम्बार कृतज्ञता व्यक्त करते हुये जोड़ते हैं कि वे जब चले थे तो यह मान कर चले थे कि किसी पीपल के नीचे या किसी मंदिर में उन्हें रात गुजारने रहने का स्थान मिलेगा। भोजन का कोई ठिकाना न होगा। इस सब की तो उन्होने कल्पना भी न की थी। अब लगता है कि सहायता न मिली होती तो शायद यात्रा हो भी न पाती। लोग टिप्पणी आदि में देश के अन्य जगहों पर भी सहायता की बात लिखते हैं, उसे देख कर सम्बल और बढ़ता है। महादेव सहायता करते रहेंगे, यह यकीन है प्रेमसागर जी को।
पर महादेव बहुत डाईसी देव हैं। वे कब अपने भक्त की परीक्षा लेने लग जायें, कब पीपल के पेड़ या खुले आसमान की छत के नीचे उतार दें, उनका कोई भरोसा नहीं। अपनी पत्नी तक को उन्होने परीक्षा लेने में बक्शा नहीं। भक्त को अपनी प्लानिंग, अपनी तैयारी खुद करनी चाहिये, ऐसा मैंने प्रेमसागार जी को कहा।
महादेव का बैक-अप प्रोटेक्शन उनको भरपूर है – यह तो दिखता है; पर महादेव यह भी कहते होंगे कि बच्चा, कदम तो तुझी को आगे बढ़ाना है! :lol:
इग्यारह बजे प्रेमसागर का संदेश मिला – “संकरा वन है। अभी पता चला है कि बाघ या शेर आया हुआ है। उनके पैर का निशान मिले है। उसी जंगल को पार कर रहे हैं। यहाँ से ५ किलोमीटर किरन घाटी है (जहां रास्ता अवरुद्ध है) ॐ नमः शिवायः।”
कल प्रेमसागर ने सीतापुर, अनूपपुर में रेस्ट ही किया। बिचारपुर, शहडोल से सीतापिर, अनूपपुर का रास्ता लम्बा था। बकौल प्रेमसागर करीब 60 किमी चलना हुआ था। उसके बाद रविवासरीय विश्राम “शार्पेन द सॉ Sharpen the Saw” जैसा हो गया। पैरों की बैटरी रीचार्ज!
आज सवेरे उन्होने वहां नर्सरी/रोपनी में रुद्राक्ष का पौधा लगाया। रुद्राक्ष का पौधा उस व्यक्ति से रोपवाया जाता है, जो सरल हो, संत हो और उसके मन में किसी के प्रति दुर्भावना न हो। प्रवीण दुबे जी ने सम्भवत: उनके ये गुण देख कर ही उनसे कहा था कि वे रुद्राक्ष का रोपण करें।
रुद्राक्ष के पौधे को लगाते प्रेमसागर
मुझे याद है कि एक जगह पर विष्णुकांत शास्त्री जी से रुद्राक्ष लगवाया गया था – यही जान कर कि वे सरल और विद्वान व्यक्ति हैं। उनका जीवन सेल्फ-लेस रहा है। एक रुद्राक्ष का पौधा मुझे भी दिया था मेरे मित्र प्रदीप ओझा ने। वह दो साल खूब बढ़ा। ऊंचाई करीब आठ फुट तक हो गयी। पर अचानक एक सर्दी में उसके पत्ते झरे और वह सूख गया। शायद हम पर्याप्त सरल, संत, दुर्भावना रहित न थे या मेरे घर की आबोहवा रुद्राक्ष को रास न आयी! :-(
मैं कामना करता हूं कि सीतापुर नर्सरी का यह रुद्राक्ष पनपे और विशाल वृक्ष बने। यह 20-25 मीटर तक ऊंचा बड़ा वृक्ष होता है। … आज प्रेमसागार जी के यह पौधा लगाते चित्र देख लगता है कि एक बार फिर मैं कोशिश करूंगा अपने परिसर में रुद्राक्ष लगाने की। शायद प्रवीण दुबे जी का एक नया सेपलिंग मिलने में सहयोग मिल सके।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
सीतापुर से राजेंद्रग्राम
पौधा रोपण के बाद प्रेमसागर आज सवेरे आठ बजे वहां से राजेंद्रग्राम के लिये निकल पड़े। यह रास्ता करीब 35 किमी का है। बीच में किसी स्थान पर रास्ता अवरुद्ध हो गया है। “राजेंद्रग्राम से वन विभाग के त्रिपाठी जी ने फोन कर बताया है कि उस स्थान पर एस्कोर्ट कर अवरोध पार करा देंगे” – ऐसा प्रेमसागर जी ने सूचित किया। उन्होने बताया कि सामने एक चाय की दुकान है जहां वे चाय के लिये रुके हैं। जगह का नाम बताया जमुड़ी। उन्हें तब सीतापुर से निकले घण्टा-डेढ़ घण्टा हो गया था।
डेढ़ घण्टे बाद जमुड़ी में चाय की दुकान और रास्ता
इग्यारह बजे उनका संदेश मिला – “सकरा वन (वन का नाम) है। अभी पता चला है कि बाघ या शेर आया हुआ है। उनके पैर का निशान मिले है। उसी जंगल को पार कर रहे हैं। यहाँ से ५ किलोमीटर किरन घाटी है (जहां रास्ता अवरुद्ध है) ॐ नमः शिवायः।“
वन का चित्र सवेरे 10:36 का है।
संकरा वन जहां बाघ के पग-मार्क मिले हैं। प्रेम सागर यहां से गुजरे।
जंगल, बाघ और अकेला पार करता कांवर पदयात्री। पता नहीं मन में भय लगा था या नहीं! प्रेम सागर ने बताया कि जंगल काफी घना और बड़ा है। वन कैसा है, कौन कौन वृक्ष हैं, कैसी वनस्पति, कैसे जीव? यह उनसे नहीं मालुम हो सकता। मुझे मानसिक (डिजिटल) यात्रा करते समय कहीं और से भी इनपुट्स लेने चाहियें।
आज शाम को उनके राजेंद्रग्राम पंहुचने पर उनके वन, घाटी और अकेले पार करने के मानसिक अनुभव पता करूंगा। फिलहाल इसको पोस्ट करता हूं! :-)