वृद्धा बोलीं आगे पीछे की 14 पुश्तें तर जायेंगी!


10 सितम्बर 2021:

माताजी एक ठो बात और बोलीं – “बेटा जो यह बारहों ज्योतिर्लिंग यात्रा कर रहे हो, उससे तुम्हारा चौदह पुश्त पहले का और चौदह पुश्त बाद का भी तर जायेगा!

सहायता करने वालों के लिये बोलीं – उन लोगों का पूर्वजनम का जो भी पाप होगा, वह धुल जायेगा। वे फिर कभी जनम नहीं लेंगे।”

– एक गांव की अस्सी साल की वृद्धा, प्रेमसागर से बातचीत में।

शाम साढ़े छ बजे प्रेमसागर ब्यौहारी पंहुचे। थके होंगे पचास किलोमीट्टर चलने से, पर आवाज सामान्य थी। उनका स्मार्टफोन बिगड़ गया था। एक जगह उसको री-फार्मेट कराये। अब अपना ई-मेल सेट कर एप्प भरेंगे और तब फोटो आदि प्रेषित कर पायेंगे। वह तो अच्छा हुआ कि उनके पास बैक-अप के लिये सुधीर जी के सौजन्य से फीचर फोन है, अन्यथा बातचीत भी शायद रुक जाती।

शाम को वे ब्यौहारी पंहुच गये हैं। उनकी व्यवस्था शायद बानसागर में की थी। कुछ कंफ्यूजन हुआ है। आगे आ गये जोश में। अब रेस्ट हाउस के सामने इंतजार कर रहे हैं।

रास्ता अच्छा था। हाईवे। पर चलना बचाने के लिये वे गाय चराने वालों के साथ शॉर्टकट से हो लिये। मोबाइल सेट कर उस कच्चे रास्ते के चित्र भेजेंगे। उनके साथ चलने से दस किलोमीटर की बचत हुई, बकौल प्रेमसागर।

रास्ते में नदियां मिलीं। शोणभद्र और समधिन नदियों की बात प्रेमसागर जी ने की। झील भी दिखी, पर उसका चित्र नहीं ले पाये। तब मोबाइल खराब था। उसके बाद मोबाइल बनवाये। जंगल थे, पेड़ थे। हवा नहीं बह रही थी। धूप तेज थी। कवि लोग जाने क्या कहेंगे – धूप में जंगल ऊंघता है या सांझ के इंतजार में सन्न मारे पड़ा रहता है। पेड़ थे चुपचाप। जानवर भी नहीं थे। आम, सागवान और जंगली गाछ दिखे। प्रेमसागर बोटानिस्ट नहीं हैं अन्यथा वन सम्पदा देख कर दर्जन भर नाम गिना देते! :-)

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अपने पैर की दशा से संतुष्ट हैं। जब तब मलहम-पाउडर लगा लेते हैंं। दिन में भी लगा लेते हैं और रात में सोते समय भी। भोजन की मात्रा और पौष्टिकता से कोई तकलीफ नहीं है। दिन में बिस्कुट आदि ले लेते हैं। कहीं दाल रोटी मिल जाता है तो उसका भी सेवन कर लेते हैं। चलने से जो थकान होती है वह रात में नींद लेने से दूर हो जाती है। उनकी शारीरिक मशीन 40-50 किलोमीटर चलने के लिये अभ्यस्त हो गयी है। आम आदमी को, ग्रामीण को भी यह देख सुन कर अचम्भा होता है। लोग यकीन नहीं कर पाते कि वे दिनों दिन चल रहे हैं। वे सबूत मांगते हैं तब प्रेमसागर उनसे मेरा ब्लॉग gyandutt.com खोलने और prem pandey सर्च कर देखने को कहते हैं, जहां रोज के चलने का सचित्र विवरण लिखा है। कई लोगों के पास स्मार्टफोन होता भी है – आजकल तो गांव गांव मेंं लोगों के पास है। वे देखते हैं और यकीन करते हैं। “आज मेरे सामने ही तीन चार आदमी एड्रेस डाल कर देखे और पढ़े। तब उनका विश्वास बना।”

रास्ते में लोग दिखते हैं। पर चित्र कम ही ले पाते हैं प्रेम सागर। यह एक चित्र है।

मैं सोचता हूं कि अगर यह ब्लॉग न लिखा गया होता तो प्रेमसागर क्या प्रमाण बताते? शायद वे अपने मोबाइल में विभिन्न स्थानों के चित्र और वीडियो दिखा कर लोगों में विश्वास जगाते। पर पुराने समय में तो यात्री के पास अपनी बोलने की ताकत का ही सहारा होता रहा होगा। समय और तकनीकी के बदलाव नें कई चीजें आसान कर दी हैं।

“नहीं नहीं। औरतें भी मिलती हैं और वे भी बात करती हैं। वे भी उतना ही पूछ्ती हैं, जितना आदमी। … आज तो एक करीब अस्सी साल की वृद्धा, सड़क किनारे अपने घर के दरवाजे पर कुर्सी लगा बैठी थीं। मुझे आते देख वे मुझे बुलाईं और बोलीं – बेटा कहां जंगल जंगल भटक रहे हो? कहां से आ रहे हो? … मैंने बताया कि काशी से आ रहा हूं।”

“लोग कौतूहल व्यक्त करते हैं। अचम्भा व्यक्त करते हैं। पर लोग सहायता करने की भी बात करते हैं?” – मैंने पूछा।

“हां हां। लोग पानी पीने की बात करते हैं। एक दो लोग कहते हैं आप बैठिये, आपका पैर दबा देते हैं। कुछ लोग आर्थिक मदद की भी बात करते हैं। मैं कहता हूं कि नहीं उस सब की जरूरत नहीं है। बस, आप मेरे बारे में अच्छा सोच रहे हैं, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है।”

“लोग बात करते हैं, क्या औरते में मिलती हैं। वे भी बात करती हैं? या औरतें सामने नहीं आतीं?”

“नहीं नहीं। औरतें भी मिलती हैं और वे भी बात करती हैं। वे भी उतना ही पूछ्ती हैं, जितना आदमी। … आज तो एक करीब अस्सी साल की वृद्धा, सड़क किनारे अपने घर के दरवाजे पर कुर्सी लगा बैठी थीं। मुझे आते देख वे मुझे बुलाईं और बोलीं – बेटा कहां जंगल जंगल भटक रहे हो? कहां से आ रहे हो? … मैंने बताया कि काशी से आ रहा हूं।”

घर के बाहर दीवार से उंठगी बैठी महिला। स्केच आदरणीय अमृतलाल वेगड़

“उन्होने पूछा कहां तक जाओगे?; मैंने बताया कि बारहों ज्योतिर्लिंग यात्रा करूंगा।”

“वृद्धा बोलीं – कुछ संकल्प है? तब मैंने कहा – हां माताजी।”

वह वृद्धा अहोभाव से बोलीं – “बेटा, वह माता धन्य है, जिसने तुम्हे जन्म दिया। अगर वो जिंदा होंगी तो खुश होंगी और अगर स्वर्गवास कर गयी होंगी तो वहां से भी देख रही होंगी कि मेरा बेटा कितना बड़ा काम कर रहा है।”

प्रेम सागर की माता जी का देहावसान तीन चार साल पहले हुआ है। वृद्धा के आशीष से उन्हें बहुत सुकून मिला होगा।

“और माताजी एक ठो बात और बोलीं – “बेटा जो यह बारहों ज्योतिर्लिंग यात्रा कर रहे हो, उससे तुम्हारा चौदह पुश्त पहले का और चौदह पुश्त बाद का भी तर जायेगा!””

“माता जी यह भी पूछीं – बेटा कोई तुमारी मदद कर रहा है? मैंने उन्हें आपका (ज्ञानदत्त पांड़े का) नाम बताया, पाण्डेजी (सुधीर जी) और दुबे भईया (प्रवीण जी) का नाम बताया। तब वे बोलीं – उन लोगों का पूर्वजनम का जो भी पाप होगा न, वह धुल जायेगा। वे फिर कभी जनम नहीं लेंगे।”

“वे वृद्ध महिला बहुत प्रसन्न हुईं। मुझे पानी-गुड़ दिया। फिर बताया कि हनुमान जी की पूजा हुई है घर में। उसका प्रसाद – पूरी-सब्जी-साबूदाने की खीर – खिला कर बिदा किया मुझे।”

“ये जो माताजी मिलीं, उनका चित्र तो आप ले नहीं पाये (उनका मोबाइल उस समय खराब था) पर उनका घर कैसा था? कच्चा या पक्का?” – मैंने यूं ही प्रेमसागर से पूछा।

“आधा कच्चा था, खपरैल वाला और आधा पक्का।”

खपरैल वाले एक मकान की छत। उसपर रखा हंसिया देखिये।

अच्छे लोग और अच्छी औरतें मिलते ही हैं; पर कुछ खराब लोग भी मिलते हैं। “दो आदमी कल मिले थे। शराब के नशे में धुत थे। दारू पी के पूरा फुल। बोले मेरी गाड़ी में बैठो और आज रात भर मेरे घर में रहना है तुम्हें। मैंने बताया कि मैं पैदल चलता हूं। गाड़ी नहीं चढ़ता। वे तंग करने लगे। तो महादेव की कृपा से आसपास के लोग आ गये और उनको डांट कर भगाया। … लोग तरह तरह के होते हैं।”

देर रात में अपना मोबाइल सेट कर प्रेम सागर ने चित्र अपलोड किये। रेंजर साहब के घर में लोगों के चित्र भी थे उसमें। प्रेमसागर जी के साथ रेंजर साहब बैठे हैं – त्रिपाठी जी। प्रेमसागर जी के प्रति श्रद्धा रख एक अधेड़ और एक नौजवान उनका पैर भी दबा रहे हैं। उनके बारे में प्रेम सागर बताये कि वे राम मिलन जी हैं और उनके बेटे हैंं।

फोटो लेना, भेजना और रास्ते के संस्मरण याद रखना, बताना – यह सब ब्लॉग डिसिप्लिन प्रेमसागर धीरे धीरे सीख रहे हैं। अब वे मात्र इतना किलोमीटर चला, इतना किलोमीटर बचाया आदि बताने के अलावा भी इनपुट्स देने लग गये हैं। अब मुझे सतपुड़ा के जंगल या भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता आदि का सहारा लेने की जरूरत कम पड़ती जायेगी। वे जो बतायेंगे, उसी से ही ब्लॉग-साहित्य (अगर वह कोई चीज होती है, तो!) सृजित होगा। हर हर महादेव!

साल भर में शायद प्रेम सागर अपना इण्डिपेण्डेण्ट ब्लॉग बनाने में भी दक्ष हो जायें! :lol:

11 सितम्बर 2021:
प्रेम सागर, संतोष (वन विभाग कर्मी) और विक्रम सिंह, समाज सेवी

प्रेम सागर जी ने बताया कि निकलने में देर हुई आज। विक्रम सिंह, एक समाज सेवक जी मिल गये थे। वे शहडोल से प्रयागराज जा रहे थे। सपरिवार। उनसे बातचीत में समय लग गया और निकलने में देरी हुई।

जब मैंने पौने आठ बजे बात की तो वे सात किलोमीटर आगे निकल चुके थे। आज वे जय सिंह नगर तक यात्रा करने वाले हैं। गूगल मैप में वह ब्यौहारी से 41 किमी दक्षिण में है।

आज का टार्गेट – ब्यौहारी से जयसिंह नगर।



रीवा से बाघवार – विंध्य से सतपुड़ा की ओर


9 सितम्बर 2021:

उन्होने बताया कि सागौन के वृक्षों की भरमार है। शाल वन प्रारम्भ हो चुका है। भवानी भाई का ‘घना, ऊंघता, अनमना जंगल’ प्रेमसागर सामने देख रहे हैं। I wish he could have been a better writer and had knack of expressing himself; not merely being a pilgrim. पर आप प्रेमसागर नहीं हो सकते और प्रेमसागर आप नहीं हो सकते!

एक दिन के विश्राम के बाद प्रेम सागर सवेरे समय पर ही निकले होंगे, पर मैं कुछ अस्वस्थता के कारण उन्हे छ के आसपास फोन नहीं कर पाया। उनका ही रिंग आया सात बजे के बाद। उन्होने बताया कि 6-7 किलोमीटर चल चुके हैं। उन्हें कुछ खांसी आ रही थी। बोले कि कमरे में एसी था, उससे सर्दी लगी, जिसे बाद में उन्होने बंद कर दिया। आज पैंतीस किलोमीटर चलने का विचार था। उन्होने एक स्थान का नाम बताया जहां तक उन्हें पंहुंचना था।

मैंने वह क्षेत्र देखा नहीं है। ट्रेन से गुजरा भी होगा तो रात में निकल गया होगा। मैं आकलन करता हूं कि प्रेम सागर रीवा से दक्षिण की ओर चल रहे थे। विंध्य की पर्वत श्रेणी से सतपुड़ा की ओर। पर विंध्य कहां खत्म होता है और सतपुड़ा कहां शुरू, वह मुझे नहीं ज्ञात था। मैंने नेट पार सर्च करने की कोशिश की। यह भी पता करने की कोशिश की कि कोई अमेजन किण्डल पर रीवा-शहडोल-अमरकण्टक के ट्रेवलॉग मिल जाये। वह नहीं हुआ तो प्रवीण चंद्र दुबे जी से बात करने का प्रयास किया। वे भी भोपाल से इंदौर के रास्ते में थे। उनसे बात न हो पाई। एक एहसास यह था कि शायद नर्मदा विंध्य और सतपुड़ा की सीमा रेखा हैं। पर क्या वह सीमा रेखा दो देशों की सीमा रेखा सरीखी होती है या पहाड़ कभी आपस में गुंथे भी होते हैं?

खैर, बाद में जो जानकारी मिलेगी उससे ब्लॉग अपडेट किया जायेगा। फिलहाल तो प्रेम सागर जी के इनपुट्स ही थे मेरे पास। उन्हीं के आधार पर यह लिखता हूं।

करीब घण्टे भर बाद प्रेम सागर जी ने सिल्पार के टोंस हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर स्टेशन के चित्र भेजे। मैंने चेक किया तो यह बाणसागर परियोजना के दूसरे चरण की 15 मेगावाट की दो इकाइयों का स्थान था। यह रींवा नहर पर स्थित है।

जितनी प्रेम सागर जी से अपेक्षा थी, उससे बेहतर ही थे ये चित्र। धुधले नहीं थे।

वहां से वे आगे बढ़े। उन्होने तीन घण्टे बाद गोविंदगढ़ रेलवे स्टेशन के चित्र भेजे। स्टेशन की मेन प्लेटफार्म लाइन खुदी हुयी थी। व्यापक मॉडीफिकेशन का काम चल रहा था। यहीं एक घण्टा प्रेमसागर ने प्लेटफार्म पर आराम किया।

गोविंदगढ़ के बारे में पढ़ा कि यह रीवा के बघेल राजाओं की समर कैपिटल हुआ करती थी। वह इलाका – उनके भवन आदि शायद प्रेम सागर जी के रास्ते में पड़े नहीं। गूगल मैप पर एक कोठी और एक पुरानी चार पहिया गाड़ी के चित्र मिले। वहां की सीनरी के भी चित्र हैं। चित्र किन्हीं शशांक गुप्ता, क्षितिज मिश्र और रत्नेश वर्मा जी के लिये हैं। निश्चय ही मनोरम आरामगाह रहा होगा गोविंदगढ़! ये चित्र अच्छे हैं, अन्यथा उलूलजुलूल कपड़े पहने लड़कों और उनकी गर्लफ्रैण्डों के फोरग्राउण्ड के चित्रों की भरमार है! :lol:

दिन में आगे कहीं एक हनुमान जी का मंदिर मिला। वहां प्रसाद के रूप में खिचड़ी मिली। वही प्रेमसागर का लंच हुआ। खिचड़ी का मिलना यह दर्शाता है कि हिंदुत्व में भी ‘लंगर’ जैसी प्रथा किसी न किसी रूप में उपस्थित है। उसका ऑर्गेनाइज्ड रूप नहीं बना है; पर है जरूर। इस तरह की लंगर प्रथा धर्म में ऑर्गेनाइज्ड तरीके से होनी चाहिये या नहीं, उसपर बतकही हो सकती है। ऑर्गेनाइज्ड रिलिजन के अपने घपले हैं। उसमें जड़ता आती है। पर मुझे लगता है कि लंगर की प्रथा सिक्खी से और दान/जकात की प्रथा इस्लाम से सीखने के बारे में विचार होना चाहिये।

हनुमान जी का मंदिर मिला। वहां प्रसाद के रूप में खिचड़ी मिली।

आगे, बकौल प्रेम सागर रास्ता बहुत खतरनाक था। शायद सड़क हाईवे से हट कर इकहरी हो गयी थी। वह सर्पिल “जलेबी जैसी” सड़क थी। जरा सा फिसले नहीं कि खड्ड में गिर जाने का खतरा। सर्पिल सड़क से हट कर एक जगह पगड़ण्डी पकड़ी प्रेम सागर ने और पांच-सात किलोमीटर बचा लिये। शाम पांच बजे वे बाघवार रेस्ट हाउस पंहुच गये थे।

मैंने आज प्रेमसागर जी का पूरा रास्ता गूगल मैप पर देखा –

9 सितम्बर का यात्रा मार्ग
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इस यात्रा मार्ग में गोविंदगढ़ रेलवे स्टेशन से बाघवार के बीच एक स्ट्रिप ऊंचाई और फिर घाटी की दिखती है। इसी इलाके को खरतनाक मार्ग कह रहे होंगे प्रेमसागर। शायद यह रींवा के पठार का छोर हो। शायद इससे सतपुड़ा की शुरुआत होती हो। मेरा भौगोलिक ज्ञान पुख्ता नहीं है। इसलिये मैं केवल अटकल ही लगा सकता हूं। बहरहाल मुझे भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता – सतपुड़ा के घने जंगल की याद आ रही है।

सतपुड़ा के घने जंगल?!

सतपुड़ा के घने जंगल।
नींद मे डूबे हुए से
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मीचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।

जितना मैं नेट पर रास्ता और प्रेमसागर के चित्र देखता हूं, उतना मुझे लगता है कि मुझे खुद वहां हो कर अनुभव लेना चाहिये था। तब मेरी अनुभूति, मेरा ज्ञान और मेरी समझ कहीं ज्यादा सघन, कहीं ज्यादा गहरी होती। लेकिन मैं वहां हो नहीं सकता। मैं कुछ अच्छी पुस्तकों को ढूंढ और टटोल सकता हूं। मुझे नर्मदा के आसपास और विंध्य के दक्षिणी भाग की बेहतर जानकारी चाहिये। जाने कहां से मिल सकेगी!

10 सितम्बर 2021:
आज का यात्रा पथ

आज सवेरे फिर मेरी तबियत खराब होने के कारण मैंने फोन नहीं किया। प्रेमसागर का ही आया। वे निकल लिये हैं और आज ब्यौहारी तक पंहुचने की योजना है। ठीक ठाक गति से चल रहे थे। एक चाय की दुकान पर रुकने जा रहे थे। मैंने उन्हें फिर नदी-नाले-झरने और वन्य दृश्य अथवा जो भी रोचक लगे उसके चित्र लेने को पुन: कहा। इस ब्लॉग कड़ी में सम्प्रेषण का मुख्य सूत्र चित्र ही हैं। उनके बिना मैं यात्रा की अनुभूति ही नहीं कर सकता। मैंने प्रेम सागर को चलते चलते वॉईस मैसेज देने को कहा, पर वह उनसे हो नहीं पाया। उनके लेखन की बजाय उनकी आवाज बेहतर कम्यूनिकेट करती है – यह बात वे ग्रहण नहीं कर पा रहे।

उन्होने बताया कि सागौन के वृक्षों की भरमार है। शाल वन प्रारम्भ हो चुका है। भवानी भाई का ‘घना, ऊंघता, अनमना जंगल’ प्रेमसागर सामने देख रहे हैं। I wish he could have been a better writer and had knack of expressing himself; not merely being a pilgrim. पर आप प्रेमसागर नहीं हो सकते और प्रेमसागर आप नहीं हो सकते! :lol:




प्रेम सागर के घर वाले कैसे लेते हैं पदयात्रा को?


9 सितम्बर 2021:

कोई व्यक्ति, 10-15 हजार किलोमीटर की भारत यात्रा, वह भी नंगे पैर और तीन सेट धोती कुरता में करने की ठान ले और पत्नी/परिवार की सॉलिड बैकिंग की फिक्र न करे – यह मेरी कल्पना से परे है। मैं तो छोटी यात्रा भी अपनी पत्नीजी के बिना करने में झिझकता हूं।

कल प्रेम सागर के छिले पांव वाली पोस्ट पर पर एक कविता की पंक्ति टिप्पणी में दी आदरणीय दिनेश कुमार शुक्ल जी ने – रेत में जब जब जले है पांव घर की याद आई है।

ये पंक्ति माहेश्वर तिवारी जी की कविता “घर की याद आई” में है। पूरी कविता नीचे है –

धूप में
जब भी जले हैं पाँव
घर की याद आई

नीम की
छोटी छरहरी
छाँह में
डूबा हुआ मन
द्वार का
आधा झुका
बरगद : पिता
माँ : बँधा आँगन
सफर में
जब भी दुखे हैं घाव
घर की याद आई
अकेले यात्रा। Photo by Jou00e3o Cabral on Pexels.com
"सफर में जब भी दुखे हैं घाव; घर की याद आई" - कितना सुंदर!!!

दिनेश जी और माहेश्वर जी कवि हैं। उनमें सूक्ष्म सम्वेदना का होना और उसका काव्य में प्रकटन होना स्वाभाविक है। पर एक कांवरिया किस प्रकार से लेता है पैर के घाव को? मैंने अपने घर के पास से संगम से बनारस जाते कांवरियों को देखा है। कई धीमे धीमे लंगड़ाते चलते हैं। उनके पैर में कपड़े बंधे होते हैं। पसीने और घर्षण से उनकी जांघों में फंगल इंफेक्शन होता होगा। पर उनके सामने लक्ष्य केवल बनारस तक पंहुचने का होता है। प्रेम सागर पाण्डेय को तो पूरा भारत चलना है! 

प्रेम सागर ने बताया कि उनके जांघ में पसीने और रगड़ से घाव हुआ था। दो तीन बार मलहम और पाउडर लगाने से अब काफी ठीक है। कल वे अमरकण्टक की ओर निकलेंगे। यहां से पैंतीस किलोमीटर पर कोई जगह है, वहां तक जाने का प्रोग्राम है।

उनको पैर पिराने पर घर की याद नहीं आती? मैं प्रेम सागर से इस बात को दूसरी तरह से पूछता हूं। उनका परिवार उनकी कांवर यात्रा को किस प्रकार से लेता है? उनकी पत्नी किस प्रकार से लेती हैं? प्रेम सागर जी ने बताया कि परिवार के लोग पहले नाराज थे। पर अब समझ गये हैं। उनकी पत्नी भी समझ गयी हैं। फोन पर समाचार लेती रहती हैं। उनके बारे में मेरा लिखा भी प्रेम जी अपने बेटा बेटी को भेजते हैं। वे अपनी माँ को बताते हैं। उनके अनुसार अब परिवार के लोग सहज भाव से लेते हैं। “आपको यात्रा करना है तो कर आइये” वाली सोच उनमें आ गयी है।

मुझे लगता है प्रेम सागर अपनी धुन और जिद के पक्के होंगे। परिवार के अन्य सदस्यों की नाराजगी का ध्यान कर कोर्स करेक्शन उनकी प्रवृत्ति का हिस्सा नहीं होगा। ऐसे व्यक्तित्व की मैं गहरे से कल्पना करना चाहता हूं; पर ऐसा व्यक्ति मेरी जान पहचान में नहीं है।

कोई व्यक्ति, 10-15 हजार किलोमीटर की भारत यात्रा, वह भी नंगे पैर और तीन सेट धोती कुरता में करने की ठान ले और पत्नी/परिवार की सॉलिड बैकिंग की फिक्र न करे – यह मेरी कल्पना से परे है। मैं तो छोटी यात्रा भी अपनी पत्नीजी के बिना करने में झिझकता हूं। अब कोई रेलवे का किसन सिंह, राम सिंह, छोटेलाल या रामलखन तो है नहीं जो मेरी नित्य की जरूरतों की फिक्र कर सके। पत्नीजी नहीं होंगी तो सवेरे नहाते समय कच्छा बनियान तौलिया कहां से लूंगा?! और पैर में अगर इंफेक्शन हो गया तो किस जगह कौन सी दवा लगानी है, यह बताने के लिये भी तो आर्धांगिनी की दरकार है। … देखिये शंकर भगवान आपकी भक्ति तो सही है, पर आदमी को प्रेम सागर पांड़े जैसा स्वयम को कसने का मन आप कैसे दे देते हैं!?

शंकर जी के भक्त हैं ही उलट। आखिर रावण को ही देख लें – कैलाश पर्वत उपार कर लंका लिये जा रहा था। आज होता तो शायद सारे ज्योतिर्लिंग सीलोन में उठा ले जाने की सोच कर काम करना प्रारम्भ कर चुका होता। … मार्कण्डेय ऋषि को देख लीजिये, जो आव देखा न ताव शिवजी की पिण्डी पकड़ कर ही चिपक गये। ये लोग सामान्य सेंसिटिविटी और सेंसिबिलिटी के परे हैं। प्रेम सागर भी उसी तरह के हैं। उन्हें माहेश्वर तिवारी या दिनेश कुमार शुक्ल जी की कविता की कोमलता में नहीं बांधा जा सकता।

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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

कल मैंने प्रवीण दुबे जी से उनके रींवा की पोस्टिंग के बारे में बात की। वे भोपाल में थे। वन विभाग से सेवानिवृत्त हो कर इंदौर में रह रहे हैं। उन्होने कहा कि भोपाल से इंदौर पंहुच कर वे अपनी रींवा पोस्टिंग के बारे में जानकारी (चित्र) देंगे। उसपर एक लेख बनता है एक दो दिन बाद।

मैंने प्रेमसागर से उनकी तीर्थाटन की योजनाओं के बारे में बात की। यह स्पष्ट हो गया कि उनके मन में द्वादश ज्योतिर्लिंग भ्रमण और उसके भौगोलीय फीचर्स/कठिनाईयों की सूक्ष्म जानकारी नहीं है। इस बात को और अपनी आशंकाओं को मैं अपनी पत्नीजी से शेयर करता हूं। उनका सही जवाब है – “प्रेमसागर अगर तुम्हारी तरह सूक्ष्म जानकारी और प्लानिंग के फेर में पड़ते तो घर पर ही बैठे रहते। रींवा और शहडोल के जंगलों में नहीं हिलते!”

प्रेम सागर जी ने कल वन विभाग के रींवा के कर्मियों के साथ चित्र खिंचाया। वह मैं नीचे प्रस्तुत कर देता हूं।

प्रेम सागर (कुरता धोती में) अन्य बांये से हैं – सुनील सिंह, लालू कुशवाहा, शंकर रमन और शिव बहादुर सिंह
राजेश्वरी पटेल

चित्र में प्रेम सागर (कुरता धोती में) हैं। अन्य बांये से हैं – सुनील सिंह, लालू कुशवाहा, शंकर रमन और शिव बहादुर सिंह जी हैं। ये सभी किसी न किसी प्रकार से द्वादश ज्योतिर्लिंग यज्ञ में सहभागी बने हैं! प्रेमसागर जी ने एक और सज्जन – राजेश्वरी पटेल जी का चित्र भी भेजा है। उसको भी मैं साइड में लगा दे रहा हूं। बाद में कभी इस यात्रा का दस्तावेजीकरण हो तो सनद रहे!

इन सभी लोगों ने प्रेम सागर जी की बहुत सहायता की है। और अभी रास्ते में जाने कितने सामान्य-उत्कृष्ट-विलक्षण लोग जुड़ेंगे! … तुम अपनी कहो जीडी, शंकर भगवान तुम्हे कब तक और किस प्रकार से जोड़े रखेंगे!

आज सवेरे प्रेमसागर निकल लिये हैं अमरकण्टक के लिये – वाया शहडोल। उनको आज मैं अपनी अस्वस्थता के कारण फोन नहीं कर पाया। सामान्यत: पौने छ बजे करता हूं। मैंने फोन नहीं किया तो उनका फोन आया। सात बजे। उन्हें खांसी आ रही थी। शायद सर्दी लग गयी है। पर चले वे जोश में ही हैं। आज पैंतीस किलोमीटर आगे चल कर रात्रि विश्राम का प्लान है। आगे की योजना भी उनके मन में साफ होती जा रही है। अमरकण्टक से वे ॐकारेश्वर की ओर निकलेंगे।

आगे यह मानसिक यात्रा जारी रहेगी। कल फिर नयी पोस्ट होगी सवेरे इग्यारह बजे। इस बीच कुछ खास रहा तो वह माइक्रोब्लॉगिंग के रूप में फेसबुक या ट्विटर पर पोस्ट होगा।



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