एक दिन में उज्जैन से इंदौर, पैदल 60 किमी चलना हुआ


26 अक्तूबर 21, रात्रि –

सवेरे से ही मुझे लग रहा था कि प्रेमसागर आज शाम होते होते महसूस करने लगेंगे कि बीस किलोमीटर चलना बाकी है और सूर्यस्त हो गया है, या होने को है। पहले भी मैं कह चुका हूं कि वे अगला मुकम पच्चीस-तीस किलोमीटर पर तय किया करें। उससे ज्यादा भी बढ़ा तो अधिक से अधिक पैंतीस होगा। उतनी दूरी शाम पांच छ बजे तक वे तय कर ही लेंगे। पर उज्जैन से इंदौर की एक लम्बी दूरी की यात्रा थी जो नक्शे में पचास किलोमीटर से कुछ ज्यादा की नजर आती है। इसके अलावा; वस्तुत: दोनो शहरों में अतिरिक्त चलना हो ही जाता है और आज कुल साठ किलोमीटर के आसपास चलना पड़ा। भले ही यह पठारी इलाका है। ऊंचाइयां – नीचाइयां बहुत नहीं हैं। सड़क भी अच्छी ही है और मौसम भी उष्ण नहीं है; पर साठ किलोमीटर ज्यादा ही होता है। बहुत ज्यादा। इंदौर पंहुचते पंहुचते थकान उनपर हावी हो गयी। शायद थकान ने पूरी तरह से उनपर अधिपत्य जमा लिया।

रात सवा आठ बजे मैने उन्हें फोन किया तो वे मुकाम पर पंहुच ही रहे थे – “भईया, अब हम सोच लिये हैं कि रोज की यात्रा पचीस किलोमीटर की तय किया करेंगे। रात के ठहरने की जगह में कुछ असुविधा हो, तब भी। अभी प्रवीण भईया के घर जाना था मिलने के लिये पर इतना चलने के बाद हिम्मत नहीं पड़ रही है। कल सवेरे ॐकारेश्वर के लिये निकलने की बजाय एक दिन इंदौर में रहूंगा। परसों वहां के लिये निकलूंगा। प्रवीण भइया के यहां कल ही मिलने जाउंगा।”

Hasten Slowly

साठ किलोमीटर – मैं जो भी ट्रेवलॉग पढ़ या सुन रहा हूं आजकल, उसमें एक दिन में लोग 35-40 किलोमीटर से ज्यादा नहीं चलते। इतना होने पर वे फख्र से उसका वर्णन एक दो पैराग्राफ, या एक दो पेजों में करते हैं। यात्रा की दुरुहता को भी बताते हुये ज्यादा ही खींचते हैं। पर यहांं, प्रेमसागर जाने किस धुन में, इतनी लम्बी दूरी एक दिन में तय कर जाते हैं। उन्हें, स्वामी चिन्मयानंद की पुस्तक के शीर्षक के अनुसार – Hasten Slowly – का सूत्र अपनाना चाहिये। वे अब तक औसत 25-28 किमी प्रतिदिन चल रहे हैं – अगर सभी दिन जिनमें रुकने के दिन जोड़ लिये जायें तो। अगर वे 32-35 किलोमीटर की ऊपरी सीमा के अनुसार चलें और अपने दैनिक मुकाम उसी प्रकार तय करें तो उनके रुकने के दिन भी कम हो सकते हैं और वे ज्यादा औसत पा सकते हैं। दूसरे, अभी वे यात्रा में विश्राम के लिये रुकने में ज्यादातर बड़े स्थानों को चुनते हैं – जहां मंदिर या अन्य टूरिस्ट आकर्षण होते हैं। उसकी बजाय अगर छोटी जगह पर रुकेंं तो ज्यादा आनंद आये। मसलन मुझे अगर रुकना होता तो भोपाल या जबलपुर की बजाय आष्टा या चोरल में विराम करने को ज्यादा तवज्जो देता! खैर, यात्रा मैं नहीं, प्रेमसागर कर रहे हैं और यात्रा का उनका अनुभव मुझसे कहीं ज्यादा या बहुत अलग प्रकार का है।

वैसे, दिन में उनकी यात्रा आनंददायक थी। उज्जैन से निकले तो अकेले थे, पर रास्ते में अपनी फील्ड यात्रा पर जाने वाले जनार्दन वाकनकर जी और उनके मित्र सुभाष शर्मा जी रास्ते में मिले। तब तक पंद्रह-बीस किलोमीटर चल चुके होंगे प्रेमसागर। वे लोग अपने काम से जा रहे थे; या शायद काम तो प्रेमसागर से रास्ते में मिलने के निमित्त ही बना लिया था। उन्होने रास्ते के एक बलराम जाट ढाबा में जलपान कराया प्रेमसागर को।

जनार्दन जी से मेरी बात भी हुई। प्रेमसागर को भी मैंने कहा कि उनकी यात्रा जनार्दन जी जैसे लोगों के सहयोग और शुभेच्छा के बल पर ही हो रही है। आगे उन जैसे लोगों के सम्पर्क सूत्रों की बहुत आवश्यकता पड़ेगी, जब शायद मार्गों में जन सहयोग आज की अपेक्षा कहीं अधिक चाहिये होगा। वैसे प्रेमसागर की सरलता और लोगों के प्रेमभाव को देख कर लगता है कि सब ठीक ही होगा।

उज्जैन से निकले तो अकेले थे, पर रास्ते में अपनी फील्ड यात्रा पर जाने वाले जनार्दन वाकनकर जी (दांये)और उनके मित्र सुभाष शर्मा जी (बीच में) रास्ते में मिले। तब तक पंद्रह-बीस किलोमीटर चल चुके होंगे प्रेमसागर।

रास्ते में खान नदी मिली। खान नदी क्षेत्र की अच्छी नदी है और क्षिप्रा से ज्यादा पानी उसमें दिखता है। उसके और उसके पुल के चित्र भी प्रेमसागर ने भेजे हैं।

प्रेमसागर महाकाल मंदिर में अपने तरह के अनूठे भक्त आये होंगे। वे अमरकंटक का कांवर ले कर जल भी अर्पित किये और भोर की भस्म आरती में भी थे। यह मंदिर में लोगों को पता चला होगा। महाकाल आरती के समय डमरू बजाने वाले – जीतू, शुभम और लकी – प्रेमसागर से मिलना चाहते थे। पर जब पता चला कि वे इंदौर के लिये निकल चुके हैं तो वे लोग पीछे दुपहिया वाहन पर आये और रास्ते में प्रेमसागर से मिले। उन्होने प्रेमसागर को यह भी कहा कि आगे किसी अन्य ज्योतिर्लिंग में उन्हें किसी प्रकार का सहयोग चाहिये होगा तो वे सब प्रकार से सहायक हो सकेंगे।

मुझे रास्ते से ही प्रेमसागर ने फोन कर इन सज्जनों से मुलाकात की जानकारी दी। “भईया आज का दिन तो बहुत खास है। लगता है महाकाल ही मेरे साथ यात्रा कर रहे हैं। उनकी कृपा बरस रही है। मैं आपको तुरंत बता रहा हूं कि बाद में कहीं भूल न जाऊं। अभी कुछ देर बाद कांवर रखने की जगह मिलेगी तो मैं उनके चित्र भी आपके पास भेजूंगा।”

महाकाल आरती के समय डमरू बजाने वाले – जीतू, शुभम और लकी जी क्रमश: बांये से। उनके अलावा प्रेमसागर कांवर लिये हैं।

भूलने का तो सवाल ही नहीं था। महाकाल मंदिर के जीतू, शुभम और लकी जी ने उनके पीछे आ कर मिलने का जो भाव दिखाया, वह भूलने की बात है ही नहीं। पर उनसे मिलने के बारे में तुरंत बताना उनकी प्रसन्नता के अतिरेक को पूरी तरह दर्शा रहा था। कठिन पदयात्रा के बाद इस तरह के अनुभव यात्रा की सार्थकता को गहरे से अण्डरलाइन करते हैं। आगे इस प्रकार के कई कई अनुभव महादेव करायेंगे – ऐसा यकीन है। निश्चित ही ऐसा आगे भी होगा!

27 अक्तूबर 21, सवेरे –

आज प्रेमसागर ने सवा छ बजे चित्र भेजते हुये बातचीत की। वे इंदौर में रुक कर कल सवेरे रवाना होंगे। “भईया, आगे मैं पचीस किलोमीटर पर रुकने की जगह चुनूंगा।” देखते हैं, वे इस कथन पर कितना कायम रह पाते हैं। आखिर यात्रा का नियोजन-निष्पादन तो उनको ही करना है – अपना स्वास्थ्य, अपनी सामर्थ्य और यह देखते हुये कि साल भर उस रुटीन को बनाये रखना है। महादेव उनके साथ हैं। गहरे से साथ हैं; यह तो हमें पता चल ही गया है। भली करेंगे महादेव!

हर हर महदेव!

सुभाष शर्मा और कांवर के साथ प्रेमसागर
*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

देवास से उज्जैन और उज्जैन में


24 अक्तूबर 21 रात्रि –

कल सवेरे देवास से चल कर उज्जैन की यात्रा की प्रेमसागर ने। लगभग 35-36 किमी की यात्रा। सपाट पठार। कोई बड़ी नदी नहीं थी रास्ते में। जमीन में भी उतार चढ़ाव नहीं। लोग सहायक ही रहे होंगे। एक जगह एक चाय वाले ने आग्रह कर उन्हें बुलाया और जलपान कराया। एक जगह मोटर साइकिल से जा रहे पति पत्नी ने मोटरसाइकिल रोक कर प्रेमसागर को चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लिया। गर्मी थी पर रास्ता ठीक होने के कारण ज्यादा कष्ट नहीं था। शाम होने के पहले प्रेमसागर नागजीरी में क्षिप्रा विहार वन नर्सरी के अतिथि गृह में पंहुच गये थे। एक वनरक्षक के घर से उनका भोजन बन कर आया। उन्होने नाम बताये – शर्मा जी और गया प्रसाद।

अगले दिन – आज – त्रिपाठी जी और चौहान जी उन्हें महाकाल मंदिर ले कर गये। वे दिन में घूमने भी निकले। शायद ये दोनो सज्जन साथ रहे हों। महाकाल को उन्होने अमरकंटक से कांवर यात्रा से लाया जल चढ़ाया। एक अन्य कमण्डल अमरकंटक का जल वे तीन चार दिन बाद ॐकारेश्वर ज्योतिर्लिंग को भी अर्पित करेंगे।

त्रिपाठी जी और चौहान जी उन्हें महाकाल मंदिर ले कर गये।

“नर्मदा के मूल स्थान का जल तो आप इन दो ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ा रहे हैं। आगे त्रय्म्बकेश्वर और उसके बाद के लिये कहां से जल उठायेंगे?” – मैंने पूछा।

कहां से जल लेना है उसका विधान शिवपुराण में वर्णित है। ॐकारेश्वर दर्शन के बाद पास में ही अलकनंदा नदी हैं। उनका जल ले कर त्र्यम्बक और भीमाशंकर को अर्पित करने का विधान है। उसके अनुसार नदी से जल लूंगा।

प्रेमसागर जल चढ़ाने के साथ साथ विभिन्न नदियों का थोड़ा थोड़ा जल अपने साथ रख भी रहे हैं। वह यादगार के रूप में रहेगा। जब वे केदार की यात्रा पर निकलेंगे तो उसमें गंगाजी का स्वच्छ जल भी जुड़ेगा। गंगाजी के जल में दीघकाल तक जल को स्वच्छ रखने का गुण होता ही है।

इसका अभिप्राय यह है कि बाकी 9 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा के साथ उनके युग्म के रूप में जल लेने वाले स्थानों की भी यात्रा प्रेमसागर को नियोजित करनी होगी। अभी ॐकारेश्वर तक तो प्रवीण चंद्र दुबे जी के सहयोगियों ने नियोजन और उसके अनुसार यात्रा निष्पादन सुगम बनाया। आगे यह नियोजन-निष्पादन प्रेमसागर को करना होगा।

महादेव आगे की यात्रा के लिये उन्हें मानसिक अनुशासन उपलब्ध करायेंगे, या उनमें पहले से है तो जागृत करेंगे; ऐसा लगता है। मंझधार में तो नहीं ही छोड़ेंगे प्रेमसागर को! उज्जैन में उनके मंदिर में जलाभिषेक के हस्ताक्षर कर चुके हैं तो उनकी भक्तों में प्राइम मेम्बरशिप तो तय हो ही गयी है। बस, प्राइम मेम्बरशिप का कार्ड हर किसी को दिखाते, फ्लैश करते न चलें! :-)

रात के आठ बज चुके हैं। कल भोर में – या मध्य रात्रि में प्रेमसागर को जाग कर भस्म आरती के दर्शन हेतु जाना है। मैं तो सत्रह साल वहां रहा और कभी जा नहीं पाया। लोगों से केवल उसके बारे में सुना। प्रेमसागर तो दूसरे ही दिन वहां हो आयेंगे। प्रेमसागर महादेव के मिशन पर निकले हैं तो वे सभी कुछ कर या देख लेना चाहते हैं जो शिव से सम्बंधित है।

उज्जयिनी या उज्जैन शिव की नगरी है। काशी भी शिव की नगरी है। और इन नगरों की, स्थानों की प्राचीनता का अहसास इनको देखने, इनमें घण्टा दो घण्टा घूमने में हो जाता है। उज्जैन या अवंतिका उन सप्त नगरियों में से है जहां मोक्ष प्राप्त होता है। अन्य पुरी हैं – अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), द्वारिका, कांची और काशी। काशी वाले अकेले यह क्रेडिट नहीं ले सकते।

प्रेमसागर वह अनुभव कर लिये होंगे जिनमें स्थान की प्राचीनता और पवित्रता दिखती है। उन्होने क्षिप्रा के चित्र भी भेजे हैं जो महाकालेश्वर के पार्श्व में बहती हैं। उनको देख कर क्षिप्रता का अहसास तो नहीं होता। किसी युग में रही होंगी। अब तो नर्मदा का जल लिफ्ट कर उसमें न मिलाया जाये तो सिंहस्थ (कुम्भ) सम्पन्न ही नहीं हो सकता। नदी में जल की मात्रा और गुणवत्ता दोनो ही शोचनीय हैं।

उज्जैन में कई लोग उनसे मिले। कई लोग उनके बारे में सोशल मीडिया पर उनकी चर्चा से या इस ब्लॉग से उनके बारे में जान पाये। कुछ लोगों को वन विभाग के कर्मियों के जरीये पता चला। जनार्दन वाकनकर जी से तो मेरी बात भी कराई प्रेमसागर ने।

जनार्दन वाकनकर और प्रेमसागर

जनार्दन जी मराठी मूल के हैं। ॐकारेश्वर के बाद प्रेमसागर को मराठी भाषी क्षेत्र में तीन ज्योतिर्लिंगों की यात्रा करनी है। जनार्दन जी उस इलाके के भाषाई, सांकृतिक और भौगोलिक – सभी प्रकार के सेतु बन सकते हैं। मैंने उनसे जनार्दन जी के सम्पर्क को अहमियत से लेने को कहा है। आगे की यात्रा में जितना अधिक विविध पृष्ठभूमि के लोगों की सद्भावना और जुड़ाव मिलेगा, उतना ही उन्हें सहूलियत होगी और उतना ही उनकी यात्रा संतृप्त बनेगी। सद्भावना, शुभकामना और आशीर्वाद की सांद्रता महादेव भी पहचानते हैं।

महादेव की कृपा से ही लोग मिलते हैं। पर साधक कितने जतन से उनका मिलना सहेजता है, उसे महादेव जरूर परखते होंगे। … यात्रा एकाकी तपस्या नहीं है। उसके लिये तो शायद भविष्य में कभी एकांत स्थान पर धूनी रमानी पड़े। यात्रा तो विराटता का अनुभव लेने का अवसर है। उसे सस्ते में गुजर नहीं देना चाहिये।

एक ग्रुप विक्रमादित्य पर नाट्य मंचन कर रहा था, उसके दो सज्जन – जीतेंद्र त्रिपाठी और शक्ति नागर प्रयास कर प्रेमसागर से मिलने आये। वन विभाग के रेस्ट हाउस के पास ही एक सभागृह में मंचन हो रहा था। शाम के समय प्रेमसागर को वहां ले कर भी गये। विक्रमादित्य की नगरी और विक्रमादित्य पर नाट्य-मंचन – शानदार अनुभव रहा होगा। नाटक के निर्देशक महोदय – ओमप्रकाश शर्मा जी ने प्रेमसागर का फूल माला से स्वागत भी किया। वे तो चरण छूने का उपक्रम भी कर रहे थे तो प्रेम ने रोका – “आप तो मेरे अग्रज हैं। पितातुल्य हैं।” उन्होने प्रेमसागर को माला पहनाई तो प्रेम ने उनको भी।

दिन में महाकाल के दर्शन और जल अर्पण करने के बाद प्रेमसागर कई अन्य स्थानों पर भी घूमे – शनि मंदिर, गणपति मंदिर, हरसिद्धि शक्तिपीठ. संदीपनि आश्रम और काल भैरव आदि। काल भैरव को प्रसाद (शराब की शीशी) चढ़ाने का कार्य नहीं हो पाया। वह शायद कल करेंगे।

प्रेमसागर ने कहा कि उज्जैन में घुसते ही उन्हें महाकाल की अनुभूति होने लगी और वह हर जगह हैं – यह भाव बना रहा है।

25 अक्तूबर, रात्रि –

आज प्रेमसागर के बारे में ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं हुआ। दीपावली की घर सफाई चल रही थी और मेरे टांगों में सर्दियों के प्रारम्भ होने के कारण दर्द हो रहा था। उसके कारण मानसिक-शारीरिक अस्वस्थता बनी रही। प्रेमसागर ने भी बताया कि वे रात डेढ़ बजे उठ कर भस्म आरती देखने गये थे। उसके बाद आ कर सोये या आराम किये। और कहीं निकले नहीं।

भस्म आरती का अनुभव बताते हैं वे। तीन घण्टा महाकाल के सानिध्य में बैठने का अवसर मिला। इतना लम्बा शिव जी के पास बैठने का यह उनके जीवन का दूसरा अनुभव था। वहां फोटो लेने की मनाही थी, पर एक फोटो तब भी वे ले पाये। बहुत लोग थे देखने वाले। वीआईपी वर्ग में ही दो सौ रहे होंगे और जनरल में तो 500-1000 लोग। अभूतपूर्व था वह! पहले प्रतीक्षा में एक घण्टा बैठना पड़ा। फिर चार से पांच बजे के बीच महाकाल का सिंगार हुआ और उसके बाद घण्टा भर भस्म आरती। श्मसान की भस्म की आरती। पौने छ बजे बाहर निकल कर उन्होने अपनी एक सेल्फी ली; यादगार के रूप में।

भस्म आरती के बाद पौने छ बजे बाहर निकल कर उन्होने अपनी एक सेल्फी ली; यादगार के रूप में।

उन्होने बताया कि दिन में जनार्दन वाकनकर जी उनके लिये भोला पाण्डेय होटल से शुद्ध शाकाहारी भोजन ले कर आयेंगे और एक भागवत कथा कहने वाली महिला भी मिलने आयेंगी। उसके बाद मैंने उनसे उनसे हुई मुलाकात के बारे में पूछा नहींं।

कल सवेरे पांच बजे वे इंदौर के लिये रवाना होंगे। नक्शे में दूरी 51 किलोमीटर दिखती है। सो लगभग 55-56 किलोमीटर तो चलना ही होगा। प्रवीण दुबे जी ने बताया है कि इंदौर से वे चोरल और चोरल से ॐकारेश्वर जायेंगे। अर्थात 28-29 अक्तूबर तक वे कांवर यात्रा के तीसरे ज्योतिर्लिंग के सानिध्य में होंगे!

26 अक्तूबर 21, सवेरे –

प्रेमसागर भिनसारे निकल लिये इंदौर के लिये। आज 50-56 किलोमीटर चलना है। उन्होने सवेरे सूर्योदय का नदी, शायद क्षिप्रा किनारे का चित्र भेजा है। टाइमलाइन के हिसाब से 6:39 का चित्र। उज्जैन में सूर्योदय 6:29 के समय हुआ होगा। यहां मेरे पास 6:04 पर हुआ था। यह अंतर बताता है कि कितना पश्चिम में हैं प्रेमसागर। विश्वेश्वर बनारस से महाकाल, उज्जैन में जब बतियाते होंगे तो समय के अंतर, सवेरे की ठण्ड, कोहरे या धुंध, नमी या खुश्की की बात करते होंगे। वैसे इतनी भस्म सवेरे सवेरे लपेट लेते हैं भस्म आरती में तो सर्दी तो लगती नहीं होगी बाबा को! :lol:

सूर्योदय का नदी, शायद क्षिप्रा किनारे का चित्र भेजा है। टाइमलाइन के हिसाब से 6:39 का चित्र।

आगे का विवरण संझा को!

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

श्यामलाल; और वे भी खूब पदयात्रा करते हैं


सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान मिले थे प्रेमसागर और उनपर पचास से ऊपर पोस्टें हो गयी हैं। और उनकी यात्रा का अभी प्रारम्भ ही है। पिच्चर बहुत बाकी है, दोस्त! उसी तरह सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान ये श्यामलाल जी दिखे। मुझसे आगे करीब दो सौ मीटर दूर चलते हुये। मैंने साइकिल कुछ तेज की और दांयी ओर से बांये आया उनसे बात करने के लिये।

सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान ये श्यामलाल जी दिखे। मुझसे आगे करीब दो सौ मीटर दूर चलते हुये।

देखा – गेरुआ वस्त्र पहने थे। कुरता धोती (तहमद की तरह), सिर पर सफेद गमछा लपेटा था। पीछे लपेट कर कम्बल जैसा कुछ लिया था। बांये हाथ में एक झोला। कोई लाठी नहींं थी हाथ में। चाल तेज थी। आठ के.एम.पी.एच. वाली तो रही होगी। नंगे पांव, छरहरे और फुर्तीले थे वे साधू जी।

पास पंहुच कर जो पता किया उससे लग गया कि साधू नहीं हैं, पर सेमी-साधू जरूर हैं। दिघवट के कोट (टीले) पर डीहबाबा के स्थान में रहते हैं। राजातलाब के दक्खिन में कोई गांव है – नाम कई बार बताये पर मेरे भेजे में रजिस्टर ही नहीं हुआ। इतना अंदाज लग गया कि राजातलाब से पांच-एक किलोमीटर दक्षिण में होगा। उस गांवमें उनकी बिटिया ब्याही है। उससे मिलने गये थे। मिल कर भोर में ही निकल लिये हैं अपने घर – दिघवट के लिये। मैंने मोटा हिसाब लगाया। करीब 25 किलोमीटर चल चुके होंगे और अभी दिघवट पंहुचने में 6 किलोमीटर और चलना है। जिस तरह से वे चल रहे थे और जिस प्रकार से मुझसे बात की, उसमें ऐसा नहीं लग रहा था कि थक गये हों। आवाज में सांस फूलने का कोई निशान नहीं था। चेहरे पर बहुत पसीना भी नहीं टपक रहा था। मुझे लग गया कि यह व्यक्ति दूर दूर तक पैदल चल सकने में सक्षम है।

दिघवट कोट के श्यामलाल

उन्होने अपना नाम बताया श्यामलाल।

श्यामलाल बोले कि वे श्रीलंका की यात्रा कर चुके हैं। तीन साथी थे। ट्रेन से गये। वहां उतर कर पैदल चले समुद्र तक। फिर जहाज से श्रीलंका। मैंने दो तीन बार पूछा – यह थोड़ा अटपटा लगा कि वीसा-पासपोर्ट कैसे जुगाड़ा होगा इन तीन लोगों ने। पर ज्यादा समझ नहीं आया। श्यामलाल ने यह भी बताया कि कामाख्या भी हो आये हैं। वहां भी ट्रेन से गये थे और फिर खूब पैदल घूमे।

यात्रा विवरण जानने का सवेरे समय नहीं था; दूसरे यह भी लगा कि दिघवट के कोट पर जा कर उन्हें तलाशा जा सकता है और उनके पास बैठ कर उनका वृत्तांत सुना जा सकता है।

प्रेमसागर से छुट्टी मिले तो श्यामलाल के पास जा कर उन्हें सुनूं। … या फिर उनको टिकट और यात्रा-खर्च दे कर ॐकारेश्वर रवाना कर दूं कि आगे की उनकी कांवर यात्रा में जोड़ीदार बन जायें। दोनो की कद-काठी, प्रवृत्ति और चलने की क्षमता बिल्कुल मिलती है! :lol:

आजकल बिल ब्रायसन की “अ वाक इन द वुड्स” के बाद लेवीसन वुड की “वॉकिंग द नाइल” प्रारम्भ की है – पढ़ने और सुनने की जुगलबंदी में। यह तो लग ही गया है कि घुमंतू लोगों की कमी नहीं है, बावजूद इसके कि वाहनों और गैजेट्स की भरमार हो रही है। प्रेमसागर मिले और फिर श्यामलाल। हो सकता है साल छ महीने में पण्डित ज्ञानदत्त भी मिलें – पैदल नहीं, साइकिल के साथ!

आजकल बिल ब्रायसन की “अ वाक इन द वुड्स” के बाद लेवीसन वुड की “वॉकिंग द नाइल” प्रारम्भ की है – पढ़ने और सुनने की जुगलबंदी में।

(ज्ञानदत्त) पांड़े हर दिन नहीं सोता है; देखें आगे क्या होता है। :lol:


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