प्रेमसागर के साथ लूट, ॐकारेश्वर से पहले


29 अक्तूबर 21, रात्रि –

किसी हादसे की आशंका प्रेमसागर को शुरूआत में ही रही थी। वे मुझसे अमरकण्टक के बाद वन में छिनैती की आशंका व्यक्त कर रहे थे। मैंने सहायता के लिये प्रवीण दुबे जी से कहा। उन्होने केवल उसका ही नहीं आगे यात्रा का मुकम्मल इन्तजाम कर दिया था। और सब सही चल रहा था, पर कल हादसा हो ही गया।

कुल 9 लोग थे। तीन मोटरसाइकिल पर। प्रेमसागर के अनुसार 18-20 साल की उम्र के रहे होंगे। दो गेरुआ पहने थे, बाकी पेण्ट-शर्ट। बड़वाह के चार पांच किलोमीटर पहले अकेले चल रहे प्रेमसागर को रोका। पूछा कि पास में क्या है? कुछ गांजा-वांजा है? प्रेमसागर ने बताया कि वे साधारण कांवर यात्री हैं। नशा के नाम पर उन्हें सिर्फ चाय पीने का व्यसन है। पर वे लोग कहने से माने नहीं। प्रेम सागर का पिट्ठू (पीछे टांगने का बैग) ले कर पूरी तरह तलाशा। उसमें कपड़े के अलावा कुल जमा डेढ़ सौ रुपये थे। प्रेमसागर के अनुसार “उनकी निगाह बड़ी रकम पर थी; डेढ़ सौ को उन्होने छुद्र रकम माना होगा”। फिर उनके शरीर की तलाशी ली। उसमें कुछ नहीं मिला। उनका मोबाइल नया था; उसे ले लिया। सिम कार्ड वहीं निकाल कर फैंक दिये। धमकी अलग दिये कि किसी को रास्ते में बताया तो मार डालेंगे। तलाशी लेना, धमकी देना – यह सब जघन्य कृत्य इस घटना को छिनैती नहीं, लूट – Robbery की श्रेणी में ला देता है।

“भईया, हम बोले कि जो कुछ है, वह मेरा नहीं है। आपका है तो आप ले लीजिये। उन्होने मोबाइल ही कीमती समझा और ले कर चलते बने। बहुत देर तक तो मैं संज्ञा-शून्य रहा। उन लोगों ने कुछ और सामान नहीं लिया था तो सब संभाल कर आगे चलने लगा। शायद किसी ट्रक वाले सज्जन ने यह लूट देखी होगी। आगे बस्ती में उसकी सूचना दी होगी। तो कुछ देर बाद एक सज्जन मोटर साइकिल पर आये। अच्छे छ फुट के रहे होंगे। गोरा रंग। उन्होने पूछा कि आपके साथ लूट का हादसा हुआ है? चलिये थाने पर रिपोर्ट लिखाइये। पर मैंने उन्हें मना कर दिया। भईया पुलीस के पास जाता तो वह तहकीकात में बार बार बुलाती और मेरी कांवर यात्रा तो खण्डित हो ही जाती। दूसरे, मुझे बहुत सहायता की उम्मीद तो थी नहीं।”

इसके पहले चाय की दुकान पर प्रेमसागर रुके थे। वहां से दोपहर डेढ़ बजे उनका मेरे पास एक फोन आया था। बता रहे थे – “भईया, जो कपड़े का जूता दो दिन पहले इंदौर में लिया था, और जिसका इस्तेमाल मैंने नहीं किया था; वह आज एक गरीब वृद्ध को दे दिया। बेचारे के पास चप्पल थी जो घिस गयी थी। उसकी स्ट्रेप टूटी थी तो रस्सी बांध रखी थी। वो बता रहे थे कि उन्हें पेंशन मिलती है, पर सारे पैसे बेटा छीन कर शराब पी जाता है। मैं और कुछ नहीं दे सकता था तो वह जूता ही दे दिया। उनके नाप का निकला जूता। और मेरा क्या; मेरी तो आदत बिना चप्पल-जूता चलने की है। लेना भी होगा तो बाद में ले लूंगा।” उसके बाद मुझसे अंतरंग के रूप में अपने किये पर मेरी मुहर लगाने की अपेक्षा कर रहे थे – “भईया ठीक किया न मैने?”

वे सज्जन जो प्रेमसागर से पुलीस में रिपोर्ट लिखाने की बात कह रहे थे; प्रेमसागर को अपने साथ आगे एक मोबाइल की दुकान पर ले कर गये। शायद वह बड़वाह में रही होगी दुकान। वहां उन्होने प्रेमसागर को बारह हजार का रेडमी का नया फोन खरीद कर दिया। प्रेमसागर उनसे उनका नाम पूछने लगे और उनका एक चित्र लेना चाहते थे। पर उन सज्जन ने मना कर दिया। नाम भी नहीं बताया और चित्र भी न लेने को कहा। बोले – “आप इसे गुप्तदान ही मान कर चलिये।”

“भईया मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा कि महादेव क्या कर रहे हैं और क्या करा रहे हैं। उन लुटेरों से मेरी तलाशी हो गयी। मोबाइल ले लिया। किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी भी मिली और उसके बाद सज्जन मिले जो पहले वाले से बेहतर नया मोबाइल मुझे दिलाये। पहले वाला 12 (मेगा) पिक्सल का और 32 या 16 जीबी का था। यह फोन तो 64 पिक्सल का है और 64जीबी का है। और जो सज्जन मुझे दिलाये, उनका चिन्ह भी मेरे पास नहीं है। मुझे लगता है कि वे आये थे लुटेरों से मारपीट करने, निपटने के लिये।”

सिम तो उन लुटेरों ने फैक दिये थे। वे प्रेमसागर ने उठा लिये थे। नये मोबाइल में पहले अपने सभी पासवर्ड बदले। मोबाइल के फंक्शन समझने में समय लगाया। यह भी तय किया कि आपात स्थिति के लिये एक सिम खरीद कर अपना फीचर फोन भी पास में रखा करेंगे। रास्ते में उन्होने अपना लोकेशन मुझे पुन: भेजना प्रारम्भ किया।

रात में उन्होने कहा – “भईया मैंने पासवर्ड वगैरह बदल दिये हैं। पर यह लिख दीजियेगा कि मोबाइल अपहृत हो गया है उसके मिसयूज से मेरे सम्पर्क वाले सावधान रहें। क्या पता उसमें लोगों के कॉण्टेक्ट नम्बर मौजूद हों।”

प्रेमसागर से मेरी लूट के पहले बात हुई थी डेढ़ बजे पर लोकेशन अपडेट नहीं हो रही थी। अंतिम अपडेट पौने इग्यारह बजे का था। मैंने सोचा था कि शायद जंगल के कारण नेटवर्क खराब होने से लोकेशन नहीं मिल रही थी। पर दोपहर दो-तीन बजे यह हादसा हो गया होगा, यह कल्पना में भी नहीं था!

शाम लोकेशन मिलने लगी तो वे मोरटक्का (ॐकारेश्वर रोड) से गुजर रहे थे। सवा छ बजे वन विभाग के रेस्टहाउस पंहुचे होंगे। उसके बाद रात आठ बजे जब उन्होने मुझे फोन किया तब दिन की इस घटना का पता चला।


सवेरे चोरल से निकले तो बहुत प्रसन्न रहे होंगे। निकले थोड़ा देर से। सूर्योदय के बाद। जंगल में अंधेरे में निकलना उचित नहीं समझा होगा। उनसे पौने 9 बजे बात हुई। एक स्थान पर वे चाय की दुकान पर ऊंचे स्थान पर अपनी कांवर रख रहे थे चाय पीने के लिये। उसके पहले निकलते हुये रेस्ट हाउस और मुख्त्यारा-बलवाड़ा स्टेशन के पहले लेवल क्रासिंग के चित्र भेजे थे।

मुख्त्यारा-बलवाड़ा स्टेशन के पहले लेवल क्रासिंग का चित्र

एक जगह उन्हें बड़ा ताल दिखा था। उसमें कमलिनी भी खिली थी। … प्रकृति का आनंद लेते चल रहे थे प्रेमसागर। आगे अनिष्ट की किसी भी सम्भावना से अनभिज्ञ और बेखबर।

पौने इग्यारह बजे प्रेमसागर के एक बैलगाड़ी हाँकते हुये अपना चित्र भी खिंचाया था और उसे भेज कर तुरंत मुझे फोन कर बताया भी। … प्रसन्नता इतनी थी कि मुझसे रीयल-टाइम आदान प्रदान कर रहे थे वे।

पौने इग्यारह बजे प्रेमसागर के एक बैलगाड़ी हाँकते हुये अपना चित्र भी खिंचाया था

दोपहर डेढ़ बजे जब प्रेमसागर ने बताया था कि उन्होने अपने नये जूते उस विपन्न वृद्ध को दे दिये थे, और उसपर मुझसे अपनी सहमति की मुहर मांगी थी; तो मन में मुझे प्रेमसागर पर क्रोध ही आया था। उनकी दान देने की वृत्ति पर नहीं – पैसा प्रेमसागर का और दान प्रेमसागर का। उससे मुझे क्या आपत्ति?! बल्कि अच्छा ही था वह विपन्न वृद्ध पर द्रवित होना। पर कांवर यात्रा में चप्पत-जूते के प्रति जो झिझक का भाव प्रेमसागर त्याग नहीं पा रहे वह क्रोधित करता है।

मेरे विचार से यह कांवर यात्रा विलक्षण है और इसके नियम प्रेमसागर को ही तय करने हैं – उन जड़बुद्धि मूर्खों को नहीं जो घर में बैठ कर पौराणिक ज्ञान बघारते हैं। वे दो कौड़ी के लोग हैं। मैं उन्हें ठेंगे पर रखने का हिमायती हूं, पर प्रेमसागर “लोग क्या कहेंगे” की सोच से उबर नहीं पा रहे। इस सोच से मेरी तनिक भी सहमति नहीं है। मैं इस बारे में विस्तार से कहना चाहता हूं, पर आज की पोस्ट तो मूलत: लूट के हादसे पर है। इसलिये उस सब की चर्चा – यह यात्रा किस स्वरूप में (मेरे अनुसार) होनी चाहिये; फिर कभी करूंगा।

कल सवेरे प्रेमसागर ॐकारेशवर ज्योतिर्लिंग को जल चढ़ाने जायेंगे। इस पावन कृत्य के साथ उनकी यात्रा का चौथाई भाग सम्पन्न होगा! आज एक तरह से अनूठा दिन था। कल दूसरी तरह से विलक्षण दिन होगा।

जंगल-घाटी में चोरल का रेस्ट हाउस

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

चोरल वन खण्ड और शनि मंदिर


28 अक्तूबर 21, रात्रि –

छतीस किलोमीटर चल कर प्रेमसागर इंदौर से चोरल पंहुचे। सवेरे पांच बजे निकल कर शाम तीन-चार बजे के बीच वे चोरल रेस्ट हाउस में आ गये। मालवा के पठार के किनारे से घाटी में ऊपर नीचे चलते हुये करीब 12-14 किलोमीटर की यात्रा की। गूगल मैप के अनुसार पठार की ऊंचाई 614मीटर तक है और घाटी 58मीटर की नीचाई तक होती है। विंध्य के पहाड़ इस खण्ड में बहुत ऊंचे नहीं हैं पर धरती की असमानता, जंगल और नदियां-प्रपात इलाके को रमणीय बनाते हैं। वर्षा के समय तो हरियाली देखते ही बनती है और अभी तो वर्षा का मौसम खत्म ही हुआ है। सब अच्छा ही रहा होगा प्रेमसागर के लिये। उन्होने यात्रा के चित्र अच्छे भेजे हैं। देख कर पूरा अहसस हो जाता है यात्रा मार्ग का।

एक जगह पर – पहाड़ और घाटी शुरू होने के पहले ही प्रेमसागर को एक खुली बैलगाड़ी दिखी। बैल स्वस्थ थे और अच्छी कद काठी के। आजकल जिनके पास बैल हैं भी वे उनकी ऐसी सेहत के साथ नहीं रखते दीखते। बैलगाड़ी पर ट्यूब-वेल के पाइप लदे थे। पुरातन यातायात साधन से नये जमाने की सिंचाई तकनीक का सामन ढोया जा रहा था। :-)

पहाड़ और घाटी शुरू होते समय ही प्रेमसागर को एक खुली बैलगाड़ी दिखी। बैल स्वस्थ थे।

सवेरे उनसे बात की तो वे बारह किलोमीटर चल चुके थे। उसके बाद लोकेशन शेयर ऑन किया तो लगा कि चौदह किलोमीटर चल चुके हैं। तेजी से आगे बढ़ रहे थे। बारह बजे के पहले वे आई आई टी इंदौर के केम्पस के सामने से गुजर रहे थे। अर्थात दो तिहाई यात्रा सम्पन्न कर चुके थे।

इसके बाद उन्हें केवल 12 किलोमीटर चलना था। आगे जंगल थे, ऊंचाई-नीचाई के घुमावदार रास्ते, अंधे मोड़ और चट्टानें। नदी – चोरल नदी – कई बार घूमती हुई सामने से या दूर दिखती गुजरती थी। प्रवीण दुबे जी से उनकी बात हो चुकी थी। उन्होने वनों के वृक्षों को देखने चीन्हने के लिये कहा था।

चोरल और उसके आगे निमाड़ के वनों में जैव विविधता काफी है। कई प्रकार के वृक्षों के बारे में प्रवीण बताते हैं। सागौन यहां बहुतायत से है। पर सागौन यहां पहले से ही है। उन्हें सयास लकड़ी के जंगल बनाने की दृष्टि से नहीं लगाया गया है। तेंदू पत्ता (Diospyros melanoxylon) इन जंगलों में है पर तेंदू पत्ता, जिसका प्रयोग बीड़ी बनाने में किया जाता है; के पौधों को लोग बढ़ने नहीं देते। छोटे पौधे/पेड़ की पत्तियां चौड़ी होती हैं। उन्हे चुन कर बेचा जाता है। तेंदू की पत्ती की उपयोगिता ही उनके वनों की वृद्धि में बाधक है। अन्यथा इसके वृक्ष भी बड़े होते हैं और अगर सघन लगे हैं तो उनकी छतरी ज्यादा नहीं बनती। अन्यथा वे घने होते हैं – सगौन की तरह सीधे बढ़ने वाले नहीं। … इन जंगलों में आग लगना (या जानबूझ कर लगाया जाना) वन प्रबंधन की बड़ी समस्या है।

जंगल का दृश्य

मैं प्रवीण जी से अच्छी जानकारी वाली, वन की विविधता या प्रबंधन के मुद्दों को डील करती हुई पुस्तक की बात करता हूं। वे मुझे शोध पेपर्स की बात करते हैं। किसी भारतीय वन अधिकारी ने अपने अच्छे मेमॉयर्स लिखे हैं? मैंने देखे नहीं। पर प्रवीण जी से दस बीस मिनट की बातचीत के बाद – और यह हर बार होता है – मैं ऐसी पुस्तक की तलाश की सोचता हूं। भारतीय लोग अभी भी पुस्तक लेखन के मामले में ऋग्वैदिक मानसिकता वाले हैं – श्रुति और स्मृति के युग के। पुस्तक लिखना या ट्रेवलॉग लिखना उनके भेजे में कम ही आता है।

मैं प्रेमसागर को चोरल नदी के घुमाव और सौंदर्य को कैमरे में पकड़ने के लिये अनुरोध करता हूं। मैं यह भी कहता हूं कि धूप में जब जल झिलमिलाता है या दूर उसकी पतली जल रेखा चमकती है, तो उसका चित्र लेने का प्रयास करें। वह सब ट्रेन से गुजरते हुये और इंजन या ब्रेकवान या सैलून की रीयर विण्डो (जिससे पूरा दृश्य दिखता है) से मैंने निहार रखा है। पर वह प्रेमसागार अपनी 30-35 किलो की कांवर साधे कुछ कर पाते हैं और बहुत कुछ नहीं भी। बहरहल जो प्रयास उन्होने किये हैं वे भी प्रशंसनीय हैं।

प्रेमसागर की प्रशंसा मैंने कम ही की है यात्रा वृत्तांत में। वह मेरा शायद लेखन दोष है। एक सरल व्यक्ति पर मैंने अपनी कठिन अपेक्षायें लाद दी हैं। (जाने क्योंं) उस व्यक्ति ने भरसक प्रयास किया है अपेक्षा पर खरे उतरने का। यूं देखें तो मैंने प्रेमसागर के लिये कुछ विशेष नहीं किया है। सिवाय शुभेच्छा व्यक्त करने के। पर शायद सुबह शाम हालचाल पूछना ही एकाकी यात्री के लिये बड़ी चीज हो। मैं बार बार सोचता हूं कि उनकी यात्रा को मैं और असम्पृक्त भाव से देखूं और उसमें अपने को अभिव्यक्त करने का अधिकधिक प्रयास करूं। ऑफ्टरऑल उनकी कांवर यात्रा को देख कर मेरे अपने मन में बहुत कुछ चलता है। उसका चवन्नी भर ही लेखन में आता है। लेकिन लोग प्रेमसागर को पढ़ना चाहते हैं, तुम्हें नहीं पण्डित ज्ञानदत्त! वैसे, यह लोगों की मांग और “लोग क्या सोचेंगे” की फिक्र तुम कब से करने लगे। … :lol:

मैं कई बार सोचता हूं कि प्रेमसागर के इनपुट्स के आधार पर अपने मन में जो चलता है उसको ज्यादा से ज्यादा लिखूं। पर नहीं करता। शायद उसके पीछे और कोई कारण नहीं – लेखन आलस्य भर है।

बाई ग्राम में शनि नव ग्रह मंदिर की शनि देव की प्रतिमा

यात्रा की समाप्ति के कुछ पहले एक गांव पड़ता है – बाईगांव। या बाईग्राम। वहां एक नवग्रह मंदिर है। पुराना नहीं है। मारवाड़ जंक्शन के किसी मीणा दम्पति ने इसे बनवाया था सन 2002 में। उसके कई चित्र प्रेमसागर ने खींचे और भेजे हैं। नवग्रहों में मुख्यत: शनि हैं। काली तेल में लिपटी प्रतिमा। उनको चमकदार नीला वस्त्र पहनाया हुआ है। उनके वाहन के रूप में एक बड़ा चौपाया जानवर है। शायद भैंसा। वैसे शनि की सवारी तो शायद काला कौव्वा या काला कुकुर है। या हो सकता है काला भैंसा ही हो। बहरहाल शनि महराज के बारे में मेरी जानकारी (लगभग) शून्य है। शनि मेरे हिसाब से मनुष्य के भय और अनिष्ट की आशंका से उपजे देवता हैं। प्रेमसागर ने इसके पहले भी कई स्थानों पर शनि महराज के मंदिर देख कर चित्र भेजे हैं। मैं समझ नहीं पाता कि लोग शनि की वक्रदृष्टि, अढैय्या या साढ़ेसाती, काला तिल और तिल के तेल में पुती चमकती उनकी प्रतिमा के प्रति इतने ऑब्सेस्ड क्यूं रहते हैं। शायद अनजाने का भय और अनिष्ट की आशंका भारतीय जनमानस पर गहरे से पैंठ गयी है – वह क्रोमोजोम्स या गुणसूत्रों तक में घुसी हुई है!

शनि प्रतिमा के सामने पूजा करते श्रद्धालु

पत्रिका के एक लेख में मिला कि सुरेंद्र सिंह मीणा का ससुराल है बाईग्राम। मारवाड़ जंक्शन के मीणा जी चोरल की मधुबाला जी से शादी किये! शायद प्रेम विवाह रहा हो। वे यहां एक धर्मशाला बनवाना चाहते थे ॐकारेश्वर जाने वाले कांवर यात्रियों के लिये पर नीव की खुदाई के समय शनि महराज की प्रतिमा मिल गयी। सो धर्मशाला की बजाय यहां शनि और नवग्रह मंदिर बन गया। यहां कांवर यात्रियों के लिये भी व्यवस्था होती है। … मुझे पूरा प्रकरण रोचक लगा। अच्छा हुआ कि प्रेमसागर ने वे चित्र मुझे भेजे। यह सब नेट पर खंगालने में मेरे एक दो घण्टे लग गये! इतनी जानकारी खंगालने के बावजूद, शनि इतने महत्वपूर्ण देवता क्यूं हैं और उन्हें न्याय देने वाला देवता क्यों माना जाता है, वह मेरे मन में अभी भी अनुत्तरित प्रश्न है।

पत्रिका के लेख में कुछ रोचक टोटके लिखे हैं। वे मैं नीचे प्रस्तुत कर दे रहा हूं –

कुछ जरूरी बातें
-धतूरे के पुष्प शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से संतान की प्राप्ति होती है।
-आंकड़ें के फूल शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से लंबी आयु की प्राप्ति होती है।
-बिल्वपत्र शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से हर इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है।
-जपाकुसुम शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से शत्रु का नाश होता है।
-बेला शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से सुंदर सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
-हर सिंगार शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से सुख-संपत्ति की प्राप्ति होती है।
-दुपहरियां के पुष्प शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से आभूषणों की प्राप्ति होती है।
-शमी पत्र शिवलिंग और शनिदेव पर अर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

चोरल के वन विभाग के रेस्ट हाउस में प्रेमसागर शाम चार बजे पंहुच गये थे। तब वे वहां के और आसपास के चित्र भेज सकते थे – सूर्यास्त होने में अभी भी एक डेढ़ घण्टा था। वे चित्र नहीं मिले। पर रात में वहां उपस्थित वन कर्मी श्रीकृष्ण वर्मा जी से उन्होने बातचीत कराई। वर्मा जी मक्सी (उज्जैन से शाजापुर के रास्ते पड़ने वाला स्थान, जो रेल जंशन भी है) के रहने वाले हैं। वे देवास में 2009-11 के बीच तेंदूपत्ता कर्मी थे। सरकार ने नौकरी दी तो वन विभाग में आ गये। देवास में वेकेंसी नहीं थी तो पास का इंदौर वन मण्डल मिला। तीन साल से वे इंदौर के चोरल खण्ड में हैं। नौकरी से संतुष्ट ही हैं, यद्यपि अपने घर से दूर रह रहे हैं। “नौकरी तो करनी ही है सर जी।”

वर्मा जी ने बताया कि चोरल के जंगल में बघेरे तो बहुत हैं। हर दूसरे तीसरे दिन खबर आती है कि आसपास के गांवों में बघेरा किसी की गाय मार गया या किसी की बकरी उठा ले गया। बघेरे के चार प्रकरण चोरल के इस जंगल में रोज होते हैं। लोग भी हैं, गांव भी हैं, पालतू जानवर भी हैं और बघेरे भी। सब सामान्य चलता है।

बाघ भी हैं। पर उन्होने देखा नहीं। वन बड़ा है। चालीस किलोमीटर के दायरे में फैला है चोरल का जंगल। उसके आगे निमाड़ का क्षेत्र भी जंगल ही है। खण्डवा तक जंगल हैं। खण्डवा का नाम ही खाण्डव वन सा लगता है – शायद इलाका महाभारत काल से जुड़ा हो।

वर्मा जी ने मुझे रेल खण्ड की भी जानकारी दी। खण्डवा से सनावद और उधर महू के आगे छोटी लाइन की पटरी उखाड़ दी गयी है। बड़ी लाइन बनेगी। पर महू से मोरटक्का (ॐकारेश्वर रोड) तक एक हेरिटेज ट्रेन चलती है। “आप आओ न सर, कभी यहां।” वर्मा मुझे निमंत्रण देते हैं। मैं अपनी असमर्थता व्यक्त करता हूं। पर वह स्थान मुझे अब भी, अपनी यादों में, बहुत आकर्षित करता है। महू-पातालपानी-कालाकुण्ड-चोरल-बड़वाह-ॐकारेशवर सब से जाने कितनी बार गुजरा हूं।

प्रेमसागर की चोरल में उपस्थिति आज वह सब यादें कुरेद गयी!

कल प्रेमसागर ॐकारेश्वर के लिये निकलेंगे। इकतालीस किलोमीटर की यात्रा है। भोर में ही निकलना होगा। वैसे वन का इलाका है। उन्हें सूर्योदय के बाद ही निकलना चाहिये। … देखें, कल क्या होता है।

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

इंदौर में और फिर चोरल की ओर


28 अक्तूबर, सवेरे –

कल प्रेमसागर प्रवीण चंद्र दुबे जी के घर गये। प्रवीण और राजश्री (उनकी पत्नी) तो भोपाल गये थे। प्रवीण मध्यप्रदेश के शासन द्वारा नामित पर्यावरण समिति के अध्यक्ष हैं तो उनका आधे से ज्यादा समय भोपाल में बीतता है। वे 29 अक्तूबर तक भोपाल में रहेंगे। इसलिये उनसे प्रेमसागर का मिलना नहीं हो पाया। इसे संयोग ही कहा जायेगा कि दो-तीन बार मिलने की सम्भावनायें थीं और दोनो बार मुलाकात नहीं हुई। जब प्रेमसागर भोपाल में थे, तब प्रवीण यात्रा पर बाहर थे। एक बार तो वे दौलतपुर में कुछ समय रुके थे, तब प्रेमसागर आष्टा से दौलतपुर की पदयात्रा पर थे। वे शाम को पंहुचे और प्रवीण तब तक वहां से जा चुके थे। अब. इंदौर में उनके घर पर प्रेम के जाने पर वे भोपाल जा चुके थे। परसों जब प्रेमसागर ॐकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग को जल चढ़ायें या एक दो दिन बाद माहेश्वर में जब नर्मदा तट पर हों, तब शायद मुलाकात हो सके, शायद।

प्रवीण दुबे जी के सुपुत्र और प्रेमसागर के बगल में बैठे अग्रवाल जी।

प्रवीण जी के बच्चे वहां थे और उनसे मुलाकात हुई। प्रेमसागर के साथ अग्रवाल जी थे। अग्रवाल जी एक बड़ी गौशाला (श्री अहिल्यामाता गौशाला जीवदया मण्डल ट्रस्ट) से जुड़े हैं – सम्भवत: सचिव हैं। यह गौशाला पेडमी गांव, महू (इंदौर से तीस किलोमीटर दूर) में है और उसमें 511 गायें वर्तमान में हैं। यहां किसानों द्वारा परित्यक्त, अनाथ और दुर्घटनाग्रस्त गायों को आश्रय मिलता है। इस गौशाल में वेटिनरी कॉलेज महू ने भी अपना सहयोग दिया है।

उक्त चित्र प्रवीण जी ने बहुत पहले मुझे भेजा था। आज अग्रवाल जी का प्रेमसागर से मिलना जान कर इसकी याद हो आयी। इस चित्र में अग्रवाल जी को मैं पहचान पा रहा हूं। पांच सौ से अधिक परित्यक्त गायों की देखभाल बहुत पुण्य का काम है। अग्रवाल जी और सम्भवत: प्रवीण दुबे भी इससे जुड़े हैं। इन लोगों के बारे में आदर और आगे और जानने का भाव मन में आता है। पर लोगों से आमने सामने मिलने की सम्भावनायें तो (मेरी उम्र के साथ साथ) क्षीण ही होती जाती हैं। फिर भी डिजिटल माध्यम जो कुछ सम्पर्क दे रहे हैं उनकी मैं एक दशक पहले कल्पना भी नहीं कर सकता था।

कल रात प्रेमसागर ने वन विभाग के एसडीओ ए.के. श्रीवास्तव जी के साथ अपनी सेल्फी भेजी।

कल रात प्रेमसागर ने वन विभाग के एसडीओ ए.के. श्रीवास्तव जी के साथ अपनी सेल्फी भेजी। मुझे उसको लेते समय कोने में हथेली आ जाने के कारण चित्र को पर्याप्त एडिट करना पड़ा। ब्लॉग लेखन में इस तरह के छोटे छोटे खुचुर-पुचुर करने की मेरी प्रवृत्ति बहुत समय खाती है। कभी कभी मैं सोचता हूं कि वह सब करने की बजाय, वह परफेक्शन की तलाश करने की बजाय मुझे अपना शब्द ज्ञान बढ़ाने और लेखन अभिव्यक्ति परिमार्जित करने पर ध्यान देना चाहिये। पर प्रवृत्ति बदलना आसान काम नहीं है।

प्रेमसागर का चित्र पर विवरण – पीलू गिरवाल(स्थाई कर्मी); मानसिंह (वनरक्षक)।
दोनों भाई साहब खाना बनाने से लेकर रहने तक का टोटल व्यवस्था इनके जी में था बहुत अच्छा से देखभाल कीय
जय हो राजा महाकाल की

कल प्रेम ने अतिथि विश्राम गृह के कर्मियों का चित्र भी भेजा। प्रेमसागर का लेखन बहुत संक्षिप्त होता है और वे वॉइस मैसेज भेजना तो आज तक सीख नहीं पाये। उनसे सम्प्रेषण उनके भेजे चित्रों और फोन पर बातचीत के माध्यम से ही मुख्यत: होता है। यह दुरुह प्रक्रिया है और कभी कभी मुझे लगता है कि यह दूरस्थ डिजिटल-ट्रेवलॉग लेखन वास्तविक यात्रा से कम थकाऊ नहीं है। कभी कभी (और अब ज्यादा ही) लगता है कि काहे इस काम में लगे हो ज्ञानदत्त! पर कुछ टिप्पणियाँ ऊर्जा देती हैं। मसलन कल मिली आनंद जी की यह टिप्पणी –

आज मेरे कार्यालय क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र, मध्य कमान, रक्षा लेखा विभाग, रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार में मासिक बैठक के दौरान मैंने इस ब्लॉग को दिखाया, एक उदाहरण के तौर पर कि संकल्प से सिद्धि को किस प्रकार प्रेमसागर जी द्वारा प्राप्त किया जा रहा है। आपके बारे में भी बताया गया तथा आपके ब्लॉग को सब्सक्राइब करने के लिए भी कहा गया। एक जगह बैठे बैठे हमें आप प्रेमजी के माध्यम से जो कंकर कंकर में शंकर जी का दर्शन कर रहें है, वह नमस्य है। जय भोले। में आपके ब्लॉग को नियमित पढ़ता हूँ। भोले की इच्छा होगी तो आपका आशीर्वाद भी कभी मिलेगा। प्रणाम ।

anand1981 जी की टिप्पणी

कल और कोई विशेष गतिविधि नहीं रही कांवर यात्रा की। आज सवेरे पांच बजे प्रेमसागर चोरल के लिये रवाना हुये। चोरल इंदौर के अतिथि गृह से 36 किलोमीटर दूरी पर है। शुरू के बाईस-चौबीस किलोमीटर मालवा के पठार पर हैं। उसके बाद नर्मदा घाटी प्रारम्भ होती है। यात्रा की रमणीयता घाटी में ही है। अन्यथा इंदौर तो फैलता हुआ महू तक शहरी इलाका हो गया है। दो दशक पहले, जब मैं वहां हुआ करता था, तब ही वह शहरी हो गया था तो अब तो और बढ़ा होगा। पठार के अंतिम छोर पर मुझे नक्शे में इंदौर आईआईटी लिखा मिला। कायदे से प्रेमसागर को सवेरे तेज चल कर पठार जल्दी निपटा देना चाहिये जिससे घाटी के अवलोकन को धीरे चलते हुये निहारने का अधिकाधिक समय मिल सके।

प्रेमसागर ने इनके बारे में लिखा – वन मंत्री विजय साहा के नजदीकी सलाहकार और चालक भी हैं
इनका शुभ नाम विजय सिंह मीरा है
9:45 बजे रात को मिलने के लिए आए थे
जय हो राजा श्री महाकाल की!

कल रात में मध्य प्रदेश के वन मंत्री जी के सहयोगी विजय सिंह जी मिले थे। आज वे शुरुआती दौर में प्रेमसागर के साथ थे, उन्हें विदा करने के लिये। साथ में गार्ड भी थे। अच्छी झांकी के साथ प्रेमसागर का इंदौर प्रस्थान हुआ। सवेरे आठ बजे – जब मैंने उनसे बात की – तो वे एक नदी पार कर चुके थे। यह नदी घूम फिर कर चोरल नदी में एक जलप्रपात बनाते मिलती है। नदी किनारे चलना आनंददायक होता पर प्रेमसागर की पदयात्रा में नदी किनारे चलने का विधान नहीं है। वैसे आगे उन्हें चोरल नदी की घुमावदार यात्रा के दर्शन तो होंगे ही।

सवेरे 10:30 की प्रेमसागर की लोकेशन

सवेरे साढ़े दस बजे तक प्रेमसागर आज की पदयात्रा की दो तिहाई दूरी तय कर चुके हैं। वे इंदौर आईआईटी के पास से गुजर रहे हैं। आज सही चल रहे हैं प्रेमसागर! आगे घाटी का रमणीय इलाका है। आगे का विवरण उनसे संझा के समय पता करूंगा!

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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