“जिल्ला टाप” नचवैय्या रहे नगीना


मैं एक दो दिन में बाढ़ देखने जाता हूं। बाढ़ मापने के दो गंगा-घाट हैं मेरे पास – द्वारिकापुर और कोलाहलपुर। द्वारिकापुर सवर्णों का घाट है और कोलाहलपुर अवर्णों का। दोनो के अपने अलग मिजाज हैं। द्वारिकापुर में पीपल का एक विशालकाय वृक्ष है। एक पाकड़ भी है जिसके नीचे की पत्थर की बैंच पर बैठ कर चौधरी टाइप लोग अपनी बालू की नावों का ट्रेक्टरों में ट्रांस-शिपमेण्ट सुपरवाइज किया करते थे। अब वहां वह बेंच जलमग्न हो गयी है। किनारे लंगर डाली मोटर लगी बड़ी नावें जिनपर बालू ढुलाई होती थी, अब बाढ़ के साथ साथ अपना स्थान बदल रही हैं। उन्हें गंगा की धारा से बचाने का यत्न करते हैं उसके मालिक लोग।

आज 12 अगस्त की द्वारिकापुर तट की बाढ़ का दृष्य

कोलाहलपुर में गांव वालों के नित्यकर्म गंगा किनारे होते आये हैं। वह अभी भी हो रहा है। लोग गंगा की मुख्य धारा में जाने की जहमत नहीं उठा रहे, पर उसका पानी एक बांध से गांव की ओर बढ़ने से रोका गया है; उस रुके पानी में अब नहाते, कपड़े धोते, पूजा में अर्ध्य देते और मछली मारते दिखते हैं।

कोलाहलपुर – रुके पानी में अब लोग नहाते, कपड़े धोते, पूजा में अर्ध्य देते और मछली मारते दिखते हैं।

आज देखा कि उस बांध को लांघ कर पानी आगे बढ़ गया है। सन 1978 की बाढ़ की याद दिलाता है यह बढ़ा हुआ पानी। बांध के बचे हुये हिस्से पर कुछ लोग मछली पकड़ने के लिये केचुआ फंसा कर कांटा फेंकते दिखे। एक उम्रदराज आदमी का चित्र मैंने लिया।

कोलाहलपुर – बांध को लांघ कर पानी गांव की ओर आगे बढ़ गया है। बांध के बचे एक हिस्से पर तीन चार आदमी दिख रहे हैं मछली पकड़ने के लिये बैठे

उम्रदराज आदमी; क्लीन शेव, काला जूता पहने, फुल स्लीव कमीज, पैण्ट ऊपर सरकाये और चारखाने का गमछा सिर पर लपेटे थे वे। उन्होने नाम बताया नगीना। बात करने के लिये मैंने उनसे पूछा – कुछ लहा (कुछ हाथ लगा?)

नगीना ने जवाब दिया – “अबहीं का? अबहीं तो आ के बैठे हैं। घण्टा डेढ़ घण्टा बैठेगे। तब पता चलेगा। कौनो पक्का थोड़े है। लहा लहा नाहीं त दुलहा!” (अभी तो आ कर बैठे ही हैं। घण्टा डेढ़ घण्टा समय गुजारेंगे, तब पता चलेगा कि कुछ लहा या दुलहा बन गये। दुलहा का यहां प्रयोग निरर्थक श्रम का प्रतीक जैसा हुआ।)

जिल्ला टाप नचैय्या नगीना। मछली पकड़ने आये हैं।

नगीना हाजिर जवाब लगे। पता चला कि इस गांव में उनकी ससुराल है। वे रहने वाले खमरिया के हैं पर ज्यादा समय यहीं कोलाहलपुर में बिताते हैं।

चूंकि यहां उनकी ससुराल है, इसलिये वे गांव भर के सर्वमान्य जीजा और फूफा हैं। जीजा या फूफा से हंसी ठट्ठा करने का सभी को, विशेषत: महिलाओं को अधिकार प्राप्त है। और चूंकि नगीना स्वयम विनोदप्रिय हैं, यह हंसी ठट्ठा रोचक होता है।

उन्होने कहा कि घण्टा भर बाद पता चलेगा कि कितनी हाथ आती हैं। वैसे मछलियां भी होशियार हैं। कभी मिलती हैं तो सूखी रोटी के साथ सुरुआ (शोरबा) नसीब हो जाता है। नहीं तो दुलहा ही बन जाते हैं।

अपने बारे में बताने लगे नगीना। नाम भर ही नहीं है, हुनर में भी वे नगीना हैं। नाचने में उनके बराबर का बनारस भर में कोई नहीं था। नचनिया थे वे, जिल्ला टाप नचैय्या।

लड़कियां हंसती हुई फूफा नगीना के साथ मजाक कर रही थीं।

नाचने के अलावा वे वाद्य बजाने में भी माहिर हैं। मैंने पूछा – क्या बजाते हैं?

“सब कुछ। ढोलक, हरमुनियाँ, सारंगी, गिटार बेंन्जो, सब कुछ। दूर दूर तक बजाने के लिये बुलावा आता था।” नगीना ने बताया।

अब नाचते बजाते नहीं?

“अब उम्र हो गयी। अब मछली पकड़ने ही आ जाते हैं। यही मनोरंजन है।” नगीना ने कहा। आसपास के लोगों ने जो इनपुट्स दिये उसके अनुसार नगीना जीजा जी की उम्र पचास से साठ के बीच होगी। हो सकता है उससे ज्यादा भी हो।

नगीना

मैंने चलते चलते उनसे पूछा – आज केवल मनोरंजन भर ही होगा या मछली मिलेगी भी?

नगीना बोले – “मिले, मिले। उसी की आस में तो आ कर बईठे हैं। हमके मिले जरूर।”

विनोदी, हाजिर जवाब, हरफनमौला और आशावादी नगीना से मिल कर बहुत प्रसन्नता हुई। एक नगीना ससुरारी में रह कर इतने खुश हैं और एक हम जो अपनी ससुराल में रह कर भी मुंह लटकाये रहते हैं! थोड़ा तुम भी विनोदी, हाजिरजवाब, हरफनमौला और आशावादी बनो जीडी!


द्वारिकापुर – उफनती ही जा रही हैं गंगा


मैं अपने घर के पास गंगा के दो तटों – द्वारिकापुर और कोलाहलपुर तारी के 2 अगस्त, आठ अगस्त और दस अगस्त के चित्र अपने मोबाइल में लिये हूं। दो अगस्त को देख कर लगा था कि बहुत पानी बढ़ गया है गंगाजी में और इतनी सनसनी थी मन में कि घर लौट कर आते ही पोस्ट लिखी थी – उफान पर गंगा।

पर वह उफान एक दो दिन में थमा नहीं। अब भी जारी है। आज सवेरे तो तेज वर्षा के कारण निकल कर वहां जा नहीं पाया, पर यह जरूर अहसास है कि कल से आज अगर कोई परिवर्तन हुआ भी होगा तो और बढ़ने का ही होगा।

कल रमापति यादव जी आये थे। वे डाकिया हैं। मेरी बहन की राखी का स्पीड पोस्ट देने आये थे। वे द्वारिकापुर के रहने वाले हैं। बता रहे थे कि द्वारिकापुर और अगियाबीर के बीच जो नाला पड़ता है और जिसमें मानसून के मौसम के अलावा पानी नहीं रहता, इस समय गंगा का बैक-बे बना हुआ है। उसमें करीब दो किलोमीटर तक पानी भर गया है। उसी के किनारे भोला विश्वकर्मा का नीचाई पर लकड़ी का स्टोर है। भोला खाती है – कारपेण्टर। अब अपनी लकड़ियां बटोर कर ऊंचाई पर ले गया है। आगे कुछ लोगों के नीचाई पर घर भी हैं। पता नहीं उनकी क्या दशा है। इस क्षेत्र में अधिकतर गांव तो ऊंचाई पर बसे हैं, जहां बाढ़ का खतरा नहीं। पर किरियात के क्षेत्र में तो घरों में पानी घुस ही गया होगा।

अपनी पैंसठ साल की जिंदगी में बाढ़ें बहुत देख लीं। किसी बाढ़ में फंसा नहीं। पर बाढ़ का कौतूहल और सनसनी हमेशा होती है। अब भी हो रही है।

दो अगस्त के दिन द्वारिकापुर घाट के चित्र ये थे –

  • 2 august 1

गंगाजी बढ़ी थीं पर तट के पेंड़ों के नीचे पानी नहीं आया था। तट पर गंगा चबूतरा, जहां लोग सुबह शाम गंगा आरती किया करते थे, भी दिख रहा था। यद्यपि जल उसके किनारे लग गया था। चबूतरे पर लोग बैठे बाढ़ निहार रहे थे। उफान पर थीं गंगा पर दृष्य भयावह नहीं था। करीब दो दर्जन लोग वहां जमा थे।

आठ अगस्त को दृष्य बदल गया था –

छ दिन के अंदर गंगा पेड़ों की जड़ों के नीचे पंहुच गयी थीं। विशाल पीपल की टहनियां पानी को छू रही थीं। पाकड़ के नीचे पत्थर की बेंच और पीपल के पास गंगा चबूतरा जलमग्न हो गये थे। पानी बहुत बढ़ आया था और बढ़ता ही जा रहा था!

उसके बाद भी पानी बढ़ता गया। दस अगस्त को द्वारिकापुर में नावें और पीछे आ गयीं। पेड़ और डूब गये। पीपल की जड़ें जो थोड़ा बहुत नजर आ रही थीं, वे भी डूब गयीं।

जो कुछ सुनने में आ रहा है, वह भयोत्पादक है। गुन्नीलाल जी कहते हैं कि अगियाबीर में लूटाबीर तट की ओर से पानी घुसने की आशंका बन गयी है। द्वारिकापुर से करहर की ओर जाने वाली सड़क, डेढ़ी पर पानी आ गया है। और पानी बढ़ा तो कुछ घर घिर सकते हैं।


मटर और महुआ उबाल कर खाते रहे हैं अतीत में – सत्ती उवाच


सत्ती उपयुक्त चरित्र है दलित बस्ती में आये बदलाव को बताने के लिये। वह लगभग मेरी पत्नीजी के उम्र की होगी। या कुछ छोटी। यद्यपि उसे अपनी उम्र के बारे में खुद कोई अंदाज नहीं है। पूछने पर कहती है – रनिया, नाहीं जानित। तीस चालीस होये ! “रानी (मेरी पत्नी जी को रानी कहती है) – नहीं जानती अपनी उम्र पर तीस चालीस होगी।” हम अनुमान ही लगा सकते हैं। मेरी पत्नीजी की शादी नहीं हुई थी, तब वह ब्याह कर इस गांव में आ चुकी थी। मेरे साले शैलेंद्र से अपने को उम्र में वह बड़ी बताती है और शैलेंद्र की उम्र 55+ की है। उस आधार पर उसे पचपन – साठ के बीच माना जा सकता है।

बातचीत में वह प्रगल्भ है। धाराप्रवाह बोल सकती है। हाजिर जवाब है और यह नहीं लगता कि किसी पूर्वाग्रह से वह गलत सलत बतायेगी। इसलिये मैंने विगत दशकों में हुये परिवर्तन को जानने के लिये उससे बात करने की सोची। उससे बात अपनी पत्नी जी के माध्यम से ही हो सकती है। वे ही उसके साथ उसकी भाषा में और उसकी ट्यूनिंग के साथ बात कर सकती हैं।

सत्ती

उसके साथ यह पहली मुलाकात थी और वह अतीत के बारे में पूरी तरह सोच कर तैयारी के साथ नहीं आयी थी। उसने टुकड़ों में बताया। सिलसिलेवार नहीं। और कई बातों में तो उसे याद दिलाना पड़ा।

सत्ती को हमने कुर्सी पर बैठने के लिये कहा, पर वह जमीन पर ही बैठी। उसके लिये चाय अपने साथ ही परोसी, पर वह कप ले कर अकेले एक कोने में जा कर पी कर आयी। अभी भी, सन 2021 में भी उसकी पीढ़ी पुराने संस्कार नहीं छोड़ पाई है।

सत्ती को हमने कुर्सी पर बैठने के लिये कहा, पर वह जमीन पर ही बैठी।

उसकी चार बेटियां हैं और दो बेटे। बेटे मिस्त्री का काम करते हैं। उसका पति घर बनाने का ठेका लेता है। वह कुशल मिस्त्री है। एक लड़की का विवाह हो चुका है। बाकी लड़कियां भी विवाह योग्य उम्र वाली हैं। एक लड़की बीमार चल रही है। उस लड़की की ओझाई करा रही है। शायद ओझाई पर उसे दवाई से ज्यादा यकीन है। मेरी पत्नीजी उससे कहती हैं कि ओझाई छोड़ ठीक से इलाज कराये। वह बोली – “नाहीं रनिया, डाक्टर के लगे लई गइ रहे – नहीं रानी, डाक्टर के यहां ले कर भी गयी थी। उसने सूई लगाई और दवाई भी दी है।”

मेरे श्वसुर (पं. शिवानंद दुबे) जी के बारे में बताती है। उन्होने बीस रुपये पर रखा था घर में। वे चीनी मिल में जाते थे। बनी (मजूरी) में उसने गेंहू भी मांगा था, वह भी देते थे वे। उस जमाने में उसने पांच सौ रुपये का नोट नहीं देखा था। मालिक (पं. शिवानंद) से चिरौरी की तो धन तेरह के दिन पांच सौ भी दिया था। उसे माथे से लगाया था सत्ती ने। घर पर ले जा कर उसी नोट की धनतेरस को पूजा की थी। मालिक हाता (अहाता, अपना पुश्तैनी घर) छोड़ कर टबेले (ट्यूब वेल की कोठरी) में रहते थे। तभी मालिक और भईया (शैलेंद्र) ने उसे काम पर रख कर ठिकाना दिया था। भईया गरम (नाराज) हो गये थे एक बार और सत्ती ने मालिक को कहा था कि वह काम नहीं करेगी। पर मालिक ने मनाया और कहा कि भईया को समझा देंगे। उसके बाद मालिक के असामयिक निधन के बाद भी लम्बे अर्से तक वह भईया के यहां काम करती रही।

मेरी पत्नी पूछने लगीं कि नार काटने (बच्चे की नाल हंसिया से काटने) पर क्या मिला करता था? सत्ती ने बताया कि पैसा नहीं मिलता था। उस समय काम के बदले अनाज देने का प्रचलन ज्यादा था। नार काटने के लिये 6-7 पऊआ (पाव) अनाज मिलता था। यह तब की बात है जब जमीन 100 रुपया बिस्वा की हुआ करती थी।

सत्ती कहती है कि उस समय धोती-साड़ी 200 रुपये की आती थी। फेरीवाले आते थे कपड़ा ले कर। साड़ी अनाज के बदले नही, पैसे से मिलती थी। उसकी मां के जमाने में शायद अनाज के बदले कपड़ा खरीदा जाता रहा हो। पर यह जरूर था कि कपड़ा फेरी वालों से ही लिया जाता था।

तब से अब के परिवर्तन के बारे में वह जोड़ती है। बड़ा फर्क हो गया है। काम ज्यादा मिलने लगा है लेकिन उसी तरह से खर्चा भी बढ़ गया है। कई तरह की चीजें मिलने लगी हैं जो पहले कभी सोची भी नहीं थीं।

सत्ती पहले के खाने के बारे में बताती है। दो जून खाना तो बनता ही नहीं था। मटर की दाल के साथ महुआ उबालते थे। वही खाते थे। मौसम में 2-2 बोरा महुआ बीन कर इकठ्ठा किया जाता था। उसी से काम चलता था। बनी (मजूरी) में लोग अरहर देने की पेशकश करते थे, पर दलित बस्ती के लोगों की मांग होती थी कि गेंहू मिले। “लोटन गुरू के हियाँ गेंहू मांगत रहे – लोटन गुरू के यहां गेंहूं मांगते थे अरहर की बजाय। पर गेंहू कम ही मिलता था। उसकी बजाय जौ मिलता था।”

रोटी-चावल कम ही नसीब होता था। ज्यादातर मटर-महुआ उबाल कर खाया जाता था। लोग आग सुलगा कर रखते थे। तम्बाकू पीते थे और उसी आग में जौ के आटे की लिट्टी सेंकते थे। पानी ताल (तालाब) का इस्तेमाल होता था। बड़े लोगों के घर धान कूटने पर जो भूसी निकलती थी, उसे बीन कर लाते थे और उससे किनकी (चावल के टुकड़े) निकाल कर उबाल कर खाते थे।

“रनियां, हमरे बस्ती में एक कुआं रहा। पूरा चमरऊट उही से पानी पियत रहा।”; सत्ती ने बताया। कुआँ शायद कच्चा या जर्जर था जो बाद में भंठ (धसक कर बंद हो) गया। “कौनो हित्त नाथ आये पर पानी बरे दौड़े परत रहा (किसी अतिथि सम्बन्धी के आने पर पानी के इंतजाम के लिये दौड़ना पड़ता था। अब तो हैण्ड पम्प बहुत से लगवा दिये हैं सरकार ने।)।”

सत्ती ने बताया कि वह बेहतर जानकारी देने के लिये अपने साथ तपेसरा और परभतिया को ले कर आयेगी। वे लोग शायद बेहतर बता सकेंगी।

उसके जाते समय हम सोच रहे थे कि कितना परिवर्तन आया है। अब अनाज की तो कोई किल्लत ही नहीं है। गेंहू, चावल, दाल तो राशन की दुकान से साल भर से ज्यादा अर्से से मुफ्त मिल रहा है। दिन में दो तीन बार भोजन की कोई किल्लत ही नहीं है। बच्चों को स्कूल में पढ़ाई भले न हो रही हो, यूनीफार्म-जूते-राशन-कॉपी-किताब सब मिल रहा है। जीवन स्तर बेहतर हुआ है और उसी अनुपात में अपेक्षायें भी बढ़ी हैं। असंतोष तब भी था, अब भी है। अब शायद पहले से ज्यादा हो गया है।

देखें, तपेसरा और परभतिया के साथ सत्ती कब मिलवाती है। तब शायद सामाजिक आर्थिक बदलाव के बारे में और जानकारी मिले।


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