भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
वैकुण्ठधाम मंदिर है गंगा किनारे द्वारिकापुर में। सवेरे साढ़े सात बजे एक खटिया बिछा कर वह अपनी भेड़ें अगोर रहा था।
मैंने साइकिल रोक चित्र लेते पूछा – क्या कर रही हैं भेड़ें?
ऊंचा सुनता था वह। दो बार दोहराने पर जवाब दिया – “करिहीं का? जुगाली करत हयीं! (करेंगी क्या? जुगाली कर रही हैं!)”
रामदेव
भादौं का महीना है। हरियाली की कमी नहीं। चराने के लिये रेवड़ ले कर घूमने की जरूरत नहीं। उसने बताया कि पानी तो हर जगह है, इस लिये पानी पिलाने के लिये रेवड़ को गंगा तट पर ले जाने की भी दरकार नहीं।
वे द्वारिकापुर में गंगा किनारे मिलते हैं। कथावाचक हैं। गंगा किनारे चबूतरे पर स्नानार्थियों, महिलाओं को कथा सुनाते दिखते हैं। भागवत कथा। और भी अन्य कथायें। बातचीत में रामचरित मानस, भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों से मुक्त हस्त उद्धरण देते पाया है उन्हे। अच्छा कहते हैं। सरल आदमी हैं।
केदारनाथ चौबे
मुझसे जब भी मिलते हैं, कुछ न कुछ धर्म-कर्म की बातें सुनाते हैं। अभी फरवरी के महीने में मुझसे बोले थे कि इस चैत्र के नवरात्र में वे द्वारिकापुर के मंदिर पर भागवत कथा कहेंगे और उस संदर्भ में मेरा योगदान लेने मेरे घर पर भी आयेंगे। पर उसके बाद कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन हुआ और उनका मेरे घर आना या उनका कथा कहना नहीं हो पाया।
बताते हैं कि उनका जन्म सन बयालीस में हुआ था। चीनी मिल में नौकरी करते थे। रिटायर होने के बाद सन 2004 से नित्य गंगा स्नान करना और कथा कहना उनका, बकौल उनके, भगवान का सुझाया कर्म हो गया है। तब से वे निरंतर, बिला नागा यह करते आ रहे हैं।
केदारनाथ चौबे सन 2004 से नित्य गंगा किनारे आते हैं। स्नान-पूजन के बाद यहीं चबूतरे पर कथावाचन करते हैं।
डॉन बटनर की दीर्घायु वाली पुस्तक
“भगवान ने मन में कहा है कि अभी सत्तरह साल और करोगे। उसके बाद जब जाने का समय होगा तो भगवान एक दिन पहले बता देंगे कि कल चल देना है। … अब मन में तो यही सुझाया है, उन्होने। बाकी, जैसी उनकी इच्छा।” – केदारनाथ मुझे बताते हैं। ऑटो-सजेशन के रूप में अपनी जिंदगी 95 वर्ष की मान ली है, उन्होने। अभी अठहत्तर साल की उम्र में जिस ऊर्जा से वे साइकिल चला कर पांच-छ किलोमीटर दूर अपने गांव (चौबेपुर) से वे गंगा तट पर आते हैं और जिस तरह का बिना अतिरिक्त मांस का उनका छरहरा शरीर है, उनका यह ऑटो-सजेशन बहुत सही और सशक्त लगता है। उनका पूरा पर्सोना इस तरह का है कि डान बटनर की लॉगेविटी और प्रसन्न रहने वाली पुस्तकों के लिये वे एक सही पात्र बन सकते हैं।
अगर आपको लम्बा जीना है और प्रसन्न रहना है, तो केदारनाथ चौबे की जीवनचर्या का गहराई से अध्ययन करना चाहिये।
आज जब गंगा किनारे केदारनाथ जी मिले तो स्नान कर चुके थे। बताया कि पूजा नहीं करेंगे, “काहे कि बड़े भाई छ दिन पहले गुजर गये हैं और कुल बारह दिन तक वह वर्जित है।“ उनके बड़े भाई अस्सी साल के थे और उच्च रक्तचाप तथा अन्य व्याधियों से ग्रस्त भी थे।
एक महिला उनके लिये पूजा के कुछ फूल ले कर आयी थी। केदार नाथ जी ने उसी को कहा कि वही भगवान को अर्पित कर दे। वे तो अशुद्ध होने के कारण अर्पण नहीं कर पायेंगे।
केदारनाथ जी की मुझमें रुचि, मुझमें धर्म के प्रति आकर्षित करना है। मुझे उनमें सरलता, प्रसन्नता और दीर्ध जीवन के तत्व नजर आते हैं और उनसे बात कर मैं वे सूत्र जानने का प्रयास करता हूं।
वे मुझे तुलसी की मानस से एक प्रसंग बताते हैं – निषादराज के साथ लक्ष्मण का वन गमन के समय संवाद चल रहा है –
काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।। योग-वियोग भोग भल मन्दा। हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा।। जन्म मरण यहाँ लगि जग जालू। सम्पत्ति विपति कर्म अरु कालू।। धरणि धाम धन पुर परिवारु। स्वर्ग नरक जहाँ लग व्यवहारु।। देखिय सुनिय गुनिय मन माहीं। माया कृत परमार्थ नाहीं।। सपने होय भिखारि नृप, रंक नाकपति होय। जागे लाभ न हानि कछु, तिमि प्रपंच जग जोय।।अयोध्याकाण्ड 92॥
“हे भाई कोई किसी को सुख दुख देने वाला नहीं है। सब अपने किये का ही कर्मफल भोगते हैं। संयोग, वियोग, भोग, शत्रु-मित्र-उदासीन, ये सब भ्रम के फंदे हैं। जन्म मरण, सम्पति विपति, कर्म और काल – ये सब जगत के जंजाल हैं। … इन सब का मूल अज्ञान ही है। माया!”
मेरे मन में लक्ष्मण की छवि एक उग्र युवा की थी। केदारनाथ जी ने यह प्रसंग कहा और बाद में मैंने मानस उठा कर देखा तो एक नयी दृष्टि मिली।
केदारनाथ जी ने भागवत से भी एक अंश वहाँ गंगा किनारे मुझे सुनाया। उसपर भी कभी मनन करना होगा। भागवत की प्रति भी खरीदनी पड़े, शायद।
केदारनाथ चौबे – अठहत्तर साल के व्यक्ति से मुझे बहुत कुछ सीखना है। जैसा सूर्यमणि तिवारी जी ने उस दिन फोन पर मुझे कहा था, मुझे बहिर्मुखी की बजाय कुछ इण्टर्नलाइज करना चाहिये। … जीवन के सार और मूल्यों पर मनन! वे मुझे कठ उपनिषद पारायण की बात कहते हैं। चौबे जी मानस और भागवत के उद्धरण देते मिले। दोनो के साथ आदानप्रदान से लगा कि अपने अंदर की अनुभूति करने का समय आता जा रहा है।
वानप्रस्थ, वैराग्य, और सामान्य जीवन में कोई विरोध/विरोधाभास नहीं है। जीवन की दूसरी पारी का यह महत्वपूर्ण पक्ष अभी तक अनदेखा किया। अब उसे भी साथ ले कर चलना है।
यह जगह – जगत नर्सरी, मझवाँ, मिर्जापुर – लगभग बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर होगी वाराणसी से। गांव है, पर वहां इतनी सुंदर नर्सरी है यह कि विश्वास नहीं होता। गूगल सर्च करने पर काफी जानकारी मिलती है। नेट और खंगालने पर नर्सरी का एक फेसबुक पेज भी दिखता है। उसके व्यवस्थापक महोदय वनस्पतियों के चित्र भी प्रस्तुत करते हैं और डी.एम. पर जानकारी मांगने पर खरीद का विकल्प भी बताते हैं।
लोग कहते हैं कि भारत एक साथ बीस शताब्दियों में पाया जाता है। जगत नर्सरी का ग्रामीण परिवेश, उसका भव्य परिसर (वैसी नर्सरी वाराणसी या इलाहाबाद में मैने नहीं पाई) और उसकी इण्टरनेट पर उपस्थिति – यह सब भारत के तेजी से बदलते परिदृष्य का अहसास करा देती है।
मेरी पत्नीजी की घर में उद्यान को सही रूप देने में रुचि है। हमने पिछले कई वर्षों में अपनी पेंशन का ठीक ठाक हिस्सा वनस्पतियों पर खर्च कर दिया है। अब; जब अपनी बढ़ती उम्र और अल्पज्ञता के कारण उद्यान सही शेप नहीं ले पाया (वह उद्यान कम, अरण्य ज्यादा लगता था); तो हमने एक माली की तलाश की। सौभाग्य से घर के पास के ही रामसेवक जी मिल गये। वे सप्ताह में एक दिन हमारे परिसर को संवारने में वेतन के आधार पर योगदान करते हैं। उनके काम करते महीना से ज्यादा हो गया है, और उनके मेहनत से घर अरण्य से उद्यानोन्मुख हो गया है।
जगत नर्सरी में प्रवेश करती मेरी पत्नीजी।
रामसेवक को इनपुट देने के लिये हमने जगत नर्सरी से कुछ पौधे लेने का निर्णय किया।
जगत नर्सरी में हम अब तक दो बार गये हैं। दोनो बार वहां के प्रबंधक नहीं दिखे, एक कर्मचारी, कोई मौर्य जी ही मिले। काफी बड़े परिसर में फैली नर्सरी को शायद वही मैंनेज करते हैं। उनका नाम भूल रहा हूं। शायद रामजी मौर्य बताया। मौर्य जी पास के गांव में रहते हैं।