भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
चार दिन पहले जवाहिर लाल गंगाजी की धारा के पास रेती में बैठा दिखा था। सामान्यत वह सवेरे घण्टा भर पण्डाजी की चौकी के बगल में कछार को छूते तट के करार की जमीन पर बैठा मुखारी करता पाया जाता था। पण्डा जी ने बताया कि एक दो दिन पहले उसकी फलाने परसाद से कहा सुनी हो गयी थी। संवेदनशील है जवाहिरलाल सो अपनी जगह से ही हट गया।
मैने उसके पास जा कर उसे मनाने की कोशिश की, पर नाकाम रहा। वह बोला – ईंही ठीक बा। हवा लागत बा। (यहीं ठीक है, हवा लग रही है।) Continue reading “गंगा तीरे बयानी”
हम रेलवे उपकरणों की विफलता पर एक पावरप्वॉइण्ट बना रहे थे| उस समय कर्षण विद्युत उपकरण (over head transmittion equipment – OHE) की विफलता कम करने के लिये इंफ्रा-रेड (थर्मोग्राफिक) कैमरे के प्रयोग की तकनीक का जिक्र हमारे मुख्य विद्युत अभियंता महोदय ने किया।
मेरे अनुरोध पर उन्होने अगले दिन इलाहाबाद रेल मण्डल के एक कर्मी को मेरे पास यह कैमरा दिखाने को भेजा। इसके पहले मैने इंफ्रा रेड कैमरे का नाम सुना था और यह सोचता था कि अन्धेरे में जासूसी इत्यादि गुह्य कर्म के लिये उनका उपयोग होता होगा। पर अब पाया कि दिन के समय, कर्षण विद्युत उपकरणों के विद्युत परिवहन से गर्म होते बिन्दुओं (hot spots) की जानकारी लेने के लिये भी इनका प्रयोग होता है!
कर्षण बिजली 25 किलो वोल्ट पर रेल ट्रैक के ऊपर से गुजरती है। बिजली के इंजन का पेण्टोग्राफ इसको छूता हुआ गुजरता है और इन तारों से ऊर्जा पा कर रेल गाड़ी खींचता है। इसकी पूरी प्रणाली में अनेक उपकरण आते हैं और उनमें गुजरने वाली बिजली उनको ऊष्मित करती रहती है। कोई हिस्सा ज्यादा गर्म हो कर टूट सकता है, या अन्य खराबी उत्पन्न कर सकता है। इंफ्रा-रेड कैमरे से इन भागों का तापक्रम जांच कर समय रहते रखरखाव की प्रक्रिया की जा सकती है।
इंफ्रा-रेड कैमरे में किसी भी चित्र के दो बिन्दु तय किये जा सकते हैं। एक रेफरेंस बिन्दु, जिसके सापेक्ष अन्य बिन्दुओं का तापक्रम लिया जा सके और दूसरा चल बिन्दु। कैमरा सेट कर कर्सर घुमाते हुये विभिन्न बिन्दुओं का तापक्रम विद्युत कर्मी नोट करता चलता है। इस तापक्रम के आंकड़ों से उपकरणों की रखरखाव की जरूरत तय होती है।
मैने श्री आर. के. मेहता, मुख्य विद्युत अभियंता, उत्तर-मध्य रेलवे से पूछा कि वे इस इंफ्रा-रेड कैमरे का कितना उपयोग कर रहे हैं? श्री मेहता का कहना था कि पिछले एक साल से उनका कर्षण विद्युत विभाग इसका प्रयोग कर रहा है। सब-स्टेशन और अन्य स्थाई लोकेशन पर इसका अच्छा फीडबैक मिला है और उससे प्रिवेण्टिव मेण्टीनेंस की गुणवत्ता बढ़ी है। पर इस कैमरे से चलती गाड़ी से ऊपर के तारों का अध्ययन नहीं हो पाता। उसके लिये एक मंहगा कैमरा रिसर्च एण्ड डेवलेपमेण्ट ऑर्गेनाइजेशन ने खरीदा है और वे प्रयासरत हैं कि उस कैमरे से तापक्रम रिकॉर्डिंग सर्वप्रथम उत्तर-मध्य रेलवे पर ही हो। यह मंहगा कैमरा ट्रेन के इंजन के ऊपर लगाया जा सकता है और ट्रेन की चलती दशा में तापक्रम रिकॉर्डिग करने में यह सक्षम है। आशा करें कि यह प्रयोग भी शीघ्र होगा।
कालका मेल की दुर्घटना भयावह थी। हम रेलवे में उसके प्रभाव से अभी भी उबर रहे हैं। शायद अपनी यादों में उबर न पायें कभी भी। कई लोग हताहत हुये-घायल हुये। सभी यात्री थे। कुछ समीप के थे। कुछ दूर के। पर सभी यात्री थे। यात्रा कर रहे थे। आषाढ़ के उत्तरार्ध में।
चौमासे में प्राचीन भारत में यात्रायें नहीं हुआ करती थीं। पर अब ट्रेने भरी जाती हैं। बसों और अन्य वाहनों का भी वही हाल है। पैसे वाले यात्रा करते हैं, कम पैसे वाले भी करते हैं। संचार के साधन पहले से बेहतर हो गये हैं। बात करना आसान हो गया है। ई-मेल/फैक्स/वीडियो सम्पर्क – सब आसान हो गया है। यात्रायें फिर भी कम नहीं हुई हैं।
यात्रा में यह भी दृष्टिगत होता है!
पन्द्रह साल पहले मैं सोचा करता था कि जल्दी ही लोग यात्रायें कम कर देंगे और रेलवे में माल यातायात की कैपेसिटी मिलने लगेगी। वह नहीं लगता!
मैं यह सोचता था कि अर्बनाइजेशन सबर्बनाइजेशन में बदलेगा। या विबर्व (village-urban unit) कायम होंगे। पर देख रहा हूं कि अभी भी बम्बई बम्बई है – वहां के आतंकी हमलों के बावजूद। संचार और प्रोद्योगिकी के विकास के बावजूद गांव या कस्बे उद्योग नहीं आकर्षित कर पा रहे। लिहाजा जिसे देखो वही बम्बई जा रहा है और वहां से परिवार लाद-फान्द कर गाजीपुर आ रहा है – घिनहू चच्चा की बिटिया का गौना जो है!
कब बन्द होगा यह मैट्रो-प्रयाण! कब बन्द होंगी ये यात्रायें!
मैं घुमक्कड़ी, या टूरिज्म की बात नहीं कर रहा। मैं किसी की मृत्यु पर होने वाली अनिवार्य यात्रा की बात नहीं कर रहा। पर मेरे कहने में शिक्षा/नौकरी/अनिवार्य (?) तीर्थयात्रा/रोजगार के लिये कम्यूटिंग आदि की यात्रायें आती हैं। टूरिज्म के लिये निकटस्थ स्थान भी विकसित नहीं हुये। वैष्णो देवी की टक्कर के देश भर में 20-25 स्थान बनते तो आदमी घर के निकटस्थ जगह चुन कर यातायात की जरूरत कम करता और मई-जून के महीने में झुण्ड के झुण्ड जम्मूतवी की गाड़ियों में न ठुंसते! :lol:
हमें और अर्थशास्त्रियों/समाजशास्त्रियों को सोचना चाहिये कि यात्रायें हो ही क्यों रही हैं और कैसे कम की जा सकती हैं! या फिर यह कि यात्रा के मेकेनिज़्म में अन्य परिवर्तनों की तरह क्या परिवर्तन आने जा रहा है? क्या यात्रा का स्वरूप तकनीकी रूप से विकसित होने वाले यात्रा के संसाधनों को यूं ही चरमराता रहेगा या जीडीपी की वृद्धि दर यात्रा की वृद्धि दर को पार करेगी, या यात्रा की वृद्धि दर को ऋणात्मक कर देगी।
ह्वेन इज़ योर नेक्स्ट ट्रॉवल सार!
मेरी पत्नीजी का कहना है कि मैं दुखी रहता हूं, जब ब्लॉग पर नहीं लिखता। बेहतर है इसी तरह लिखूं और अपने दफ्तर की/रेल की समस्याओं की न सोचूं!