भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
मैं अर्थर हेली का उपन्यास डिटेक्टिवपढ़ रहा था। नेट पर नहीं, पुस्तक के रूप में। यह पुस्तक लगभग दस बारह साल पहले खरीदी थी। लुगदी संस्करण, फुटपाथ से। नकली छपाई होने के चलते इसमें कुछ पन्ने धुन्धले हैं – कुछ हिस्सों में। इसी पढ़ने की दिक्कत के कारण इसे पढ़ना मुल्तवी कर दिया था।
[लुगदी (पाइरेटेड) संस्करण वाली पुस्तकें लेना, अपनी माली हालत बेहतर होने के साथ साथ बन्द कर दिया है। पिछले सात आठ साल में ऐसी कोई किताब नहीं खरीदी!]
पर यूं कहें कि हर किताब के पढ़ने के दिन पूर्व नियत होते हैं! इसका नम्बर अब लगना था।
कभी कभी लगता है ब्लॉग बन्द करने का समय आ गया। इस लिये नहीं कि पाठक नहीं हैं। पाठक की अनिवार्यता को ब्लॉग ले कर चलता है और उसे बढ़ाने के निश्चित टोटके हैं। वह टोटके पालन करता रहा हूं, यह शायद अर्ध सत्य होगा; पर उन टोटकों की पहचान जरूर है। लिहाजा, पाठक की कमी का कारण तो नहीं ही है। कारण यह भी नहीं है कि रूठ कर मनाने वालों की सहानुभूति प्राप्त करनी है। वह अवस्था पार कर चुका हूं।Continue reading “आत्मना-अतुष्ट”
कोयला शुष्क है, कठोर है रुक्ष है। जब धरती बन रही थी, तब बना कोयला। उसमें न आकृति है, न संस्कृति। उसमें प्रकृति भी नहीं है – प्रकृति का मूल है वह।
आकृति, प्रकृति और संस्कृति दिखे न दिखे, आजकल विकृति जरूर दीखती है। भेड़ियाधसान उत्खनन हो रहा है। दैत्याकार उपकरण दीखते हैं। कोयले की धूल दीखती है। सड़क के किनारे मुझे गायें दिखी नहीं। अगर होंगी भी तो सतत कोयले की धूल के कारण भैंसों में तब्दील हो गयी होंगी।
दामोदर नदी के किनारे एक परित्यक्त कुआँ
मैं अन्दरूनी इलाकों में नहीं गया। सड़क का साथ छोड़ा नहीं। लिहाजा दिखा भी उतना ही, जो सामान्यत दीखता है पर्यटक को। घुमक्कड़ी करने वाले को कहीं और दीखता। उसको शायद विकृति की बजाय प्रकृति और संस्कृति दीखते!
धनबाद – भारत की कोयला-राजधानी, बोकारो और फुसरो (कोयला उत्खनन का मूल) में मुझे एथेनिक गांव कहीं नजर आये। खपरैल कुछ घरों में दिखी भी, पर साथ साथ दीवारें ईंटों की थीं। उनपर रंग भी गंवई नहीं थे – केमीकल पेण्ट थे। औरतें घरों के दरवाजों दीवारों पर चित्र उकेरती हैं। वैसा कहीं पाया नहीं। लोटा-गगरी-मेटी दीखते हैं गांवों में। पर यहां अधिकतर दिखे प्लास्टिक के डिब्बे और बालटियां। हां बांस की दउरी, मोनी, डेलई जैसी चीजें नजर आईं। मुर्गियों को चिकन की दुकानों पर ले जाने के लिये बड़े आकार की झांपियां बांस की तीलियों की बनी थीं।
धनबाद के पहले ट्रेन की खिड़की से दिखा दृष्य
गांव और मूल संस्कृति कहीं होगी जरूर, पर कोयले की अर्थव्यवस्था ने उसे दबोच रखा है। दीखती ही नहीं! कोयला बाहर से लोगों को लाया। मेरी पत्नीजी बताती हैं कि फुसरो में उत्खनन बन्द हुआ तो लोग बस गये। ज्यादातर बाहर के लोग। इलाहाबाद या आस पास के गांवों में धोती कुरता में लोग मिल जायेंगे। यहां तो कोई एथिनिक पोषाक नजर नहीं आती। स्थानीय लोगों से बातचीत नहीं हुई, अत: कह नहीं सकता कि उनकी बोली में हिन्दी को समृद्ध करने के लिये क्या है। पर स्थापत्य, वेश, स्मारक, पुस्तकालय … इन सब के हिसाब से जगह रीती दीखती है। धनबाद में स्टेशन के आसपास कुछ सुन्दर चर्च दिखे। पर अपने अतीत में गुमसुम बैठे।
मोदी कहते हैं वाइब्रेण्ट गुजरात। वाइब्रेण्ट झारखण्ड कहां है। न भी हो तो कहां हैं भविष्य की सम्भावनायें। मेरा नाती भविष्य का नेता होगा झारखण्ड का। कैसे लायेगा यहां वाइब्रेंसी? कौन डालेगा इस सुप्त प्रकृति में संस्कृति के प्राण!
कुछ चित्र इन जगहों के –
धनबाद में पानी के लिये इकठ्ठा लोग
मुर्गियों के लिये बांस की बनी झांपियां
सड़क की दशा अच्छी है, फिर भी मरम्मत का काम होता है। बेहतर सड़कें, बेहतर भविष्य?