गांवदेहात डायरी साइकिल लेकर निकलता हूं तो हर जगह कुछ बदलाव नजर आता है। विक्रमपुर की हाइवे से संधि पर दोनों ओर दो गुमटियां हैं—जग्गी की आलू टिक्की और राजेश की समोसा बेचने वाली। दस दिन से दोनों बंद हैं। दोनों गैस पर चलाते थे अपनी दुकान। अब मेरे लिये यह समाजशास्त्रीय अध्ययन होगा—देखना किContinue reading “खाड़ी जंग से बदलता गांवदेहात”
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सुकुआर हो गये हैं लोग। कुल्ला करने भी मोटर साइकिल से जाते हैं।
सुकुआर (नाजुक) हो गये हैं लोग। अब मेहनत नहीं करते। अब यह हाल है कि कुल्ला करने (खेत में हगने) भी मोटर साइकिल से जाने लगे हैं। ट्रेक्टर से खेती करते हैं। वह भी आलस से।
गाय, सुनील ओझा और गड़ौली धाम
दीर्घजीवन की सेंच्यूरी मारने की इच्छा शायद मेरे शहरी जीवन त्याग कर इस ग्रामीण अंचल में बसने के निर्णय के मूल में है। हो सकता यही चाह सुनील जी को गड़ौली धाम लाई हो। जो हो; इस शतकीय सोच की एक एक गेंद खेलना और लिखना है!
