बहुत सानदार फोटो घींचे हयअ यार!


बच्चे में, उससे पांच गुना ज्यादा उम्र वाले अजनबी के साथ बात करते, प्रश्न करते कोई संकोच, कोई झिझक नहीं थी।
“बहुत सानदार फोटो घींचे हयअ यार! … अरे ये तो हुंआ की फोटो है। और ये तो सिवाला की है। … केतने क मोबाइल हौ?”

क्या लिखोगे पाँड़े, आज?


आगे तीन बालक दिखे सड़क किनारे। ताल में मछली मारे थे। छोटी छोटी मछलियाँ। ताल का पानी एक छोटे भाग में सुखा कर पकड़ी थीं। आधा घण्टा का उपक्रम था उनका। अब वे आपस में पकड़ी गयी मछलियों का बंटवारा कर रहे थे।

स्मार्टफोन जाओ, साइकिल आओ


उसने मुझे दिखाया था कि साठ रुपये की पुड़िया में दो तीन दिन तक वे तीन चार लोग चिलमानंद मग्न रह सकते थे। वह ‘सात्विक’ आनंद जिसे धर्म की भी स्वीकृति प्राप्त थी। यह सब मैं, अपनी नौकरी के दौरान नहीं देख सकता था।

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