गंगा किनारा और बालू लदान के मजदूर


काम मेहनत का है। सो 3-4सौ (गांव का रेट) न कम है न ज्यादा। जो गांव में रहना चाहते हैं, वे इसको पसंद करेंगे; वर्ना अवसर देख कर महानगर का रुख करेंगे। मजदूर गांव/महानगर के बीच फ्लिप-फ्लॉप करते रहते हैं।

भरसायँ, जगरन और कंहारों की चर्चा


कंहारों का पुश्तैनी पेशा कुंये से पानी खींचना, तालाब से गाय-गोरू के लिये पानी लाना, पालकी ढोना और दाना भूनने के लिये भरसाँय जलाना है। इनमें से कई काम बदलती तकनीक ने उनसे छीन लिये हैं।

“जिल्ला टाप” नचवैय्या रहे नगीना


बात करने के लिये मैंने उनसे पूछा – कुछ लहा (कुछ हाथ लगा?)
नगीना ने जवाब दिया – “अबहीं का? अबहीं तो आ के बैठे हैं। घण्टा डेढ़ घण्टा बैठेगे। तब पता चलेगा। कौनो पक्का थोड़े है। लहा लहा नाहीं त दुलहा!”

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