गांव की सड़क पर बारिश के मौसम की शाम


मैं देर तक रुका नहीं; यद्यपि सांझ के गोल्डन ऑवर की सूरज की किरणों में वह जगह बहुत आकर्षित कर रही थी। मैंने अपने को दो – ढाई हजार साल के अतीत के टाइम फ्रेम से अपने को वर्तमान में धकेला और घर के लिये रवाना हो गया।

महुआ टपकने लगा है और अन्य बातें


बहेड़ा के फल गिरते महीना से ऊपर हो गया। अब महुआ भी टपकने लगा है। चार पांच दिन हो गये, आसपस टपक रहा है महुआरी में। बच्चे एक एक पन्नी (पॉलीथीन की थैली) में महुआ के फूल बीनने लगे हैं। जुनून सा दिखता है उनमें महुआ बीनने का।

सवेरे की घुमंतू दुकान


“इस इलाके में ज्यादातर लोग ऐसे ही काम कर रहे हैं। और कुछ करने को नहीं है; इस लिये जो मिल रहा है, किये जा रहे हैं।”

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