उमादास


GDFeb164437गुरु द्वारा दिया नाम उमादास। गृहस्थ नाम ॐ प्रकाश शुक्ल। बांसगांव, देवरिया के रहने वाले। कृशकाय शरीर। पर्याप्त स्फूर्ति। साधू।

उमादास नाम गुरु का दिया है। गुरु का नाम भी बताया उन्होने। बनारस के हैं गुरूजी।

चाय की चट्टी पर अचानक दिखे। चट्टी वाले अरुण से मैने उनके बारे में पूछा – कौन हैं?

“होंगे कोई बाबा। आते जाते रहते हैं।” अरुण ने उनके बारे में अनभिज्ञता जताई।  अपने पिताजी के समय से चट्टी पर इस तरह के बाबा लोगों का सत्कार करते रहे हैं अरुण और अन्य भाई लोग। बिना पूछे कि कौन कहां के हैं। मैं अरुण से भी प्रभावित होता हूं और बाबाजी से भी। सरल से जीव लगते हैं बाबा जी। पास के हैण्डपम्प से पानी ले कर खड़े बाबा से बतियाने लगता हूं।

अपना मुकाम पहले गोरखपुर बताते हैं। ज्यादा पूछने पर देवरिया और उसके आगे तिखारने पर बांसगांव। बाईस जनवरी को चले हैं। मईहर तक जा कर लौटेंगे। कुल 125 दिन की यात्रा का अनुमान है। पैदल ही चलते हैं उमादास। रोज लगभग 5 कोस। जहां जगह मिली वहां विश्राम कर लेते हैं और जहां जो भोजन मिला, वही कर लेते हैं। पास में एक कपड़े में रोल किया कम्बल-चद्दर है। एक झोले में अन्य सामान। एक कमण्डल भी है – जो शायद साधू होने का प्रतीक है। अन्यथा उनके पास एक ग्लास भी दिखा, जिसमें पानी पी रहे थे वे।

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उम्र नहीं पूछी; पर मेरी उम्र के तो होंगे ही। शायद ज्यादा भी। स्वस्थ होने के कारण मुझसे जवान लगते थे।

अपनी अवस्था का अनुमान देते हुये बताते हैं उमादास – “शरीर का क्या भरोसा? अपना पता और तीन चार लोगों का मोबाइल नम्बर अपने झोले में रखा हूं।”

झोले से निकाल कर गीता की प्रति और उसमें लिखे मोबाइल नम्बर/पता आदि दिखाया उन्होने। बोला कि गीता और रामायण साथ में ले कर चलते हैं।

अपना खाना भी बना लेते हैं?

“नहीं, जो मिला वही कर लेता हूं। कभी अगर कुछ न मिला तो दो टिक्कड़् सेंक लेता हूं।”

पहले भी कभी यात्रा की है?

“पन्द्रह साल पहले चित्रकूट तक गया था इसी तरह। अकेले। एक बार मैरवा गया था। पैदल ही। अकेले। नेपाल नहीं गया। पहाड़ नहीं चढा हूं।”

अपनी दशा या देश-काल से कोई शिकायत नहीं लगी उमादास को। प्रसन्नमन ही दिखे। उन्हे मैने चलते समय एक जून के भोजन के पैसे दिये। बडी सहजता से स्वीकार किये उन्होने।

वापसी में अपने साथ चलते राजन भाई से मैने कहा – एक उमानाथ हैं। अगली जून के भोजन की फिक्र नहीं और मैं हूं; जो अगले साल भर के लिये अन्न संग्रह की जुगत में हूं। एक वाहन, एक वाहन ड्राइवर काइन्तजाम कर रहा हूं। मैं असन्तुष्ट हूं। उमानाथ संतुष्ट हैं और प्रसन्न भी।

अपना अपना भाग्य। अपनी अपनी दशा।

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सब्जी भाजी का बगीचा


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उस घर के बाहर बांस की खपच्चियों वाली बाड़ के बगीचे को साइकल से आते जाते रोज देखता था। आज वहां पैदल गया। वहां पंहुचने के लिए पगडंडी पर लगभग 100 मीटर चलना था। उसके बाद मिले शिवमूर्ति। शिवमूर्ति पड़ोसी हैं पर उनके पास भी अच्छा सब्जी भाजी का बगीचा है।

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शकरकंद,  बैगन, मिर्च,  आलू, धनिया, लहसुन आदि अनेक सब्जियों की क्यारियां।

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बांस की खपच्चियों की बाड़ राजेन्द्र प्रसाद जी ने लगाई थी। नीलगाय के आतंक से निपटने के लिए। उन्होंने बताया कि ये खपच्चियां भी कई बार नहीं रोक पातीं नीलगायों को। वे घुस आती हैं। पिछली बार आम्रपाली आम की फुनगी चर गयी थीं। बैगन के फल खा लिए थे। अच्छे और बड़े फल ही खाती हैं वे – राजेन्द्र प्रसाद ने बताया।
हमें देख वहां अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी थी। सभी नीलगाय को अपने जीवन का प्रतिद्वंद्वी मान रहे थे। कभी भी आ जाती हैं वे। ऊंचा उछल कर आ जाती हैं। बाड़ में नीचे से झुक कर भी प्रवेश कर जाती हैं। दुलत्ती बहुत तेज झाड़ती हैं। सांवले नर नीलगाय टी बहुत ही खूंखार हैं।
बच्चे भी नीलगायों के बारे में बात करते आवेश से भर जाते लगे।
राजेन्द्र प्रसाद ने बताया कि वे कलकत्ता में जल निगम में काम करते हैं। नौकरी में कुछ अड़चन आ गयी है, सो पिछले पांच छ साल से गाँव में ही हैं। कई आम और नींबू के गाछ वे कलकत्ता से ही ले कर आये हैं। उनके सहकर्मी यहाँ आते रहते हैं बंगाल से। यहाँ आ कर बनारस और प्रयाग घूम कर जाते हैं। उनके बगीचे से नींबू आदि ले जाते हैं।
राजेन्द्र प्रसाद ने हमें दो बड़े प्रकार के नींबू के फल दिए। उनमे से एक अण्डाकार था। राजेन्द्र ने बताया कि उसे गंधराज कहते हैं। हल्का खट्टा होता है वह। बड़ी अच्छी सुगंध थी फल में। शायद इसी कारण से उसका नाम है गंधराज।

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राजेन्द्र के पास दो बिस्सा जमीन में बगिया है और उसके अलावा उनके पास दो गायें हैं। लगभग यही हम भी रखना चाहते हैं गाँव में। मैंने राजेन्द्र से कहा कि उनसे बगीचे और गाय पालने के बारे में सलाह लेने आते रहेंगे।
वे लोग मेरे पहले के काम के बारे में पूछते थे। मैंने बताया कि मैं ट्रेन हांकता था। ज्यादा समझ नहीं पाये वे मेरे काम के बारे में। रेलवे में उनका इंटरेक्शन फिटर खलासी या स्टेशन स्टाफ से हुआ है। उससे मेरे काम का अनुमान लगाना सम्भव नहीं अनुमान कराना भी शायद व्यर्थ है। हल्का सा भी अनुमान होने पर अपेक्षा होने लगती है कि मैं कोई नौकरी दिलवा दूंगा। वह मेरे बस में नहीं!
मैं उन लोगों से विदा मांग कर आया। भविष्य में उनसे मिलता रहूँगा।

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मछली पकड़ना और फोटोग्राफ़ी



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कोलाहलपुर में केवट नहीं हैं। उनके पास नावें नहीं हैं। धन्धा भी मछली पकड़ने का नहीं है उनका। अधिकांश मजदूरी करते हैं, खेतिहर हैं या बुनकर। सवेरे गंगा किनारे वे शौच, दातुन और स्नान के लिये आते हैं। नहाने के बाद कुछ धर्मपारायण हनुमान जी या शिवजी के मन्दिर जाते हैं तो पास ही में करार पर हैं।


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वहां घाट पर चित्र खींचने के लिये बस कुछ ही प्रकार के दृष्य होते हैं। विविधता के लिये मैं करार पर उखमज से लिपटे पेड़ों और झाड़ियों के चक्कर लगाता हूं। उखमज (पतंगे) बहुत ही ज्यादा हैं गंगा किनारे। उनको पकड़ने के लिये मकड़ियां जाला लगाती हैं। जालों में फंसे उखमज और उनके मृत शरीर अनेकानेक आकृतियां बनाते हैं। सवेरे की रोशनी में उनके पास घूमने का एक अलग तिलस्म है।


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मैं आज उनके आगे बढ़ गया। गंगा किनारे एक नाव थी। उसपर तीन आकृतियां नजर आ रही थीं। पहले लगा कि वे बालू का अवैध उत्खनन करने वाले होंगे। पर जब लगा कि उस प्रकार के लोग नहीं हैं नाव पर तो मैं नजदीक चला गया।

तीन जवान मछेरे थे उनपर। जाल समेट रहे थे। उन्होने बताया कि करीब एक घण्टा हो गया उन्हे पर कोई मछली हाथ नहीं लगी। सो अब वे जगह बदल रहे हैं। नाव किनारे एक खूंटे से बांध रखी थी उन्होने। खोल कर आगे बढ़ने लगे। उनके जितने चित्र खींच सकता था, उतने मैने खींचे। कुछ ज्यादा ही खींचे।


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पास के बरैनी घाट के हैं वे मल्लाह। नाव पर जो सामान नजर आ रहा था, उसके हिसाब से बहुत तैयारी के साथ थे वे मछली पकड़ने को।


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एक अन्य व्यक्ति साइकल से आया था। हाथ में मछली पकड़ने के लिये बन्सी/डण्डी। एक जार में कुछ मछलियां और पकड़ी मछलियां रखने के लिये एक पॉलीप्रॉपिलीन का बोरा था। बताया कि कटका के पास के किसी गांव से है वह।

कांटा फंसा कर वह बैठा मछली मारने को। मैं भी पास में बैठना चाहता था कैमरा ले कर। पकड़ी मछली का चित्र लेने की प्रतीक्षा में। करार पर दूब गीली थी ओस से। मैने बैठने को उससे बोरा मांगा। काफी उहापोह दिखाया उसने पर अन्तत दिया नहीं। मैने गीली दूब पर बैठ कर इन्तजार करने का निर्णय किया।

लगभग 10 मिनट बैठा रहा मैं। मछली उसके कांटे में अटकी पर शायद उतना नहीं कि वह खींच सके। मेरा धैर्य उसके धैर्य से काफी कमजोर प्रमाणित हुआ। उकता कर मैं उठ आया।

फोटो खींचने का लालच मुझ बिना लहसुन-प्याज का शाकाहारी भोजन करने वाले को मछली पकड़ने की प्रतीक्षा करा रहा था। कुछ अजीब सी बात है।

खैर, आगे भी कोई मछेरा मिलेगा। आगे भी मछली पकड़े जाने की प्रतीक्षा करूंगा। तब शायद वह पर्याप्त परिचित होगा और बैठने के लिये मुझे अपना बोरा भी दे दे।

आगे की ब्लॉग पोस्टों की प्रतीक्षा कीजिये बन्धुवर।
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गड़ही, बेलपत्ता और बाबा विश्वनाथ

सवेरे वे बच्चे गड़ही के पानी में गीला कर रहे हैं गठ्ठर। उसके बाद उनकी माँ यह ले कर बनारस जाएगी। गदौलिया में बाबा विश्वनाथ मंदिर के पास बेलपत्ता की सट्टी लगती है। वहां बेच कर वो वापस लौटती है।


विक्रमपुर में कटका स्टेशन के पास गंदे पानी की गड़ही में कुछ बच्चे जमा थे। मुझे लगा मछली मार रहे होंगे। पास जा कर देखा तो पानी में भीगे गठ्ठर नजारआये। यह जमा नहीं कि इतनी जरा सी गड़ही में गठ्ठर भर मछली निकल आये।

बच्चों से पूछा – गठरी में क्या है?
एक ने जवाब दिया – बेलपत्र। बनारस ले जायेंगे।

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गढही में धोने जा रहे हैं बेल पत्र की गठरी

आगे पता चला कि बच्चे गाँव के ही हैं। उनके परिवार के मर्द – भाई और पिता दक्षिण में गंगापार के मिर्जापुर के जंगलों से तोड कर लाते हैं यह बेलपत्र। लगभग रोजाना। सवेरे वे बच्चे गड़ही के पानी में गीला कर रहे हैं गठ्ठर। उसके बाद उनकी माँ यह ले कर बनारस जाएगी। गदौलिया में बाबा विश्वनाथ मंदिर के पास बेलपत्ता की सट्टी लगती है। वहां बेच कर वो वापस लौटती है। बनारस बस से जाती है या ट्रेन से। दोनों साधन हैं विक्रमपुर में।

शानदार माडल है यह पारिवारिक मेहनत और बिजनेस का।

यह माडल कई परिवार काम में लाते हैं व्यवसाय के लिए।

तब तक उन बच्चों की माँ भी आ गयी। मेरे पूछने पर गठ्ठर उठाते समय उसने बताया कि 2-3सौ मिल जाते हैं इस में। मुझे लगा कि इससे कुछ ज्यादा ही मिलते होंगे।

चलते चलते मैंने बच्चों को गठ्ठर के पास खड़ा कर एक चित्र लिया।

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चलते चलते मैंने बच्चों को गठ्ठर के पास खड़ा कर एक चित्र लिया।

वापस आते समय गड़ही के पानी के बारे में सोच रहा था कि बाबा विश्वनाथ इस गड़ही के पानी से भीगा एक बेलपत्ता भी चबा लें तो हैजा हो जाए उन्हें! शर्तिया!

जय बाबा विश्वनाथ!!! जय भोलेनाथ।


कोलाहलपुर और मुर्दहिया


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कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं।
मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। पर लगा कि गाँव वैसा नहीं है।
यह विचार आया कि शायद अब हालात बदले हों। पहले सामाजिक और आर्थिक हालात भयावह रहे हों।

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उस दिन मुझे गंगा किनारे शाम को मिल गए रामधनी। उनकी उम्र मेरे बराबर लगभग साठ साल की है। तुलसीराम भी लगभग इतनी उम्र के होते।
लगा कि कोलाहलपुर को मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने के लिये रामधनी एक सही पात्र होंगे। वैसे भी रामधनी स्पष्टवक्ता लगे। अच्छी याददाश्त वाले भी। यह विचार मन में पुख्ता हो रहा है की रामधनी के विस्तृत इंटरव्यू ले कर उसके आधार पर एक श्रंखला लिखी जा सकती है।
रामधनी के दो लड़के हैं, दोनों बुनकर। वे अब मोतियाबिंद के आपरेशन के कारण बुनकर के काम से संन्यास ले चुके हैं। उनके कहे अनुसार उनका घर संपन्न नहीं हो तो विपन्न भी नहीं है।
भविष्य में मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने की संभावनाएं बनती हैं – आखिर मुझे भी व्यस्त रहने को कुछ काम चाहिए! कि नहीं?