अतिथि – श्री नारायण शुक्ल और उनकी टीम


अठाईस दिसम्बर। सवेरे धूप आ गयी थी। मौसम साफ था यद्यपि हवा तेज चल रही थी। मैं उहापोह में था कि घर से बाहर साइकिल ले कर निकला जाये कि नहीं। आठ बजने वाले थे। अचानक दरवाजे पर कुछ खटखटाहट और लोगों की आवाज सुनाई थी। इतने सवेरे कौन आ सकता है?

आने वाले एक दो नहीं सात लोग थे। दो महिलायें और पांच पुरुष। आगे थे एक मुझसे कुछ कम उम्र के, और मुझसे काफी कम वजन के खिचड़ी बालों वाले सज्जन। उनका शरीर वैसा ही था, जैसा मैं अपना वजन कम बनाने का स्वप्न देखता हूं। मुझसे कुछ ज्यादा ऊंचाई थी उनकी। उन्होने बताया – आप मुझे नहीं जानते होंगे। मैं आपको आपके लेखन के माध्यम से जानता हूं। मेरा नाम श्री नारायण शुक्ल है। मैं सिंगापुर में रहता हूं। मेरी सॉफ्टवेयर की कम्पनी है जो मोबाइल और वेब एप्लीकेशन के कार्य करती है। हम वाराणसी आये थे। वहां से सवेरे गड़ौली धाम पंहुचे और फिर आपके बारे में पूछते हुये आपसे मिलने आया हूं। मेरे साथ मेरी कम्पनी के अधिकारी लोग हैं।”

सात साल हो गये मुझे यहां गांव में रहते। मेरे जाने और अनजाने पाठक इक्का दुक्का आये हैं यहां। अभी कुछ दिन पहले चौबीस वर्ष के आयुष पटेल और फिर शिकागो में प्रवासी राजकुमार उपाध्याय जी अपने परिवार के साथ आये थे। आयुष पटेल पर मैंने लिखा भी है। राजकुमार जी की भेंट पर अभी लिखना शेष है। पर यह पहली बार हुआ है कि अपरिचित सज्जन अपनी कम्पनी के शीर्षस्थ अधिकारियों के साथ अचानक आ गये हों। यह बड़ा आश्चर्य भी था और अतीव प्रसन्नता का विषय भी।

श्री नारायण शुक्ल (बीच में) की टीम के साथ पायजामा पहने मैं।

लगता है अतिथियों के आने का एक दौर चल रहा है। गांव में हम अपेक्षा नहीं करते थे कि ब्लॉग पर मेरी उपस्थिति के आधार पर लोग हमें ढूंढ़ते घर पर पंहुच जायेंगे। वह भी तब, जब ब्लॉग की अपडेटिंग महीनों से ‘नियमित रूप से अनियमित’ हो गयी है। लोगों के आने से निश्चय ही हम – मेरी पत्नीजी और मैं – आल्हादित हैं। हम ने अपने घर-परिवेश के रखरखाव पर और रुचि ले कर उसे बेहतर करने की सोची है। और मैंने यह भी सोचा है कि उम्र का बहाना ले कर ब्लॉग को अनियमित करने की बजाय उसे और जीवंत बनाया जाये। उम्र के साथ उसे नये ध्येय और अधिक पाठकोन्मुख बनाया जाये। … यह जोश कायम रहना चाहिये, जीडी! :-)


श्री नारायण जी चौरी चौरा के मूल निवासी हैं। अर्से से वे सिंगापुर में हैं और वहीं बनाई है अपनी कम्पनी – SingSys (सिंगसिस)। नाम इन्फोसिस की तर्ज पर लग रहा है। सिंग उपसर्ग शायद सिंगापुर के कारण हो। कम्पनी के दफ्तर सिंगापुर और भारत (लखनऊ) में हैं। मुख्यालय सिंगापुर में होने से व्यवसायिक सहूलियत होती होगी। शायद सॉफ्टवेयर के भारत से वे निर्यातक और सिंगापुर से आयातक – दोनो होने का लाभ ले पाते हों।

श्री नारायण शुक्ल जी

मैंने उनके बारे में जानने के लिये उनकी वेब साइट का निरीक्षण किया।

उनकी साइट से कम्पनी की सोशियो-कल्चरल जीवंतता के बारे में ये पंक्तियाँ मुझे बहुत भाईं –

“हम हर कर्मचारी का ध्यान रखते हैं। दफ्तर के प्रांगण में ही मासिक हेल्थ केयर चेक अप अनिवार्य हैं। हम सभी त्यौहार मनाते हैं। हम होली के अवसर पर रंग खेलते हैं, रंगोली और पटाखे दीपावली पर होते हैं, रावण दहन होता है दशहरा पर, नवरात्रि में डांडिया और बोन-फायर पार्टी नव वर्ष के अवसर पर होते हैं। स्पर्धा नामक एक इनडोर स्पोर्ट्स मीट आयोजित की गयी। यह टीम भावना जगाने वाली थी और तनाव दूर करने वाली भी। We go for regular outdoor trips for team building, sponsored by the company. It includes our recent trips to Jaipur, Nainital, Mussoorie, Banaras, Manali and Singapore. Above all, road trip on bikes to Leh and Ladakh was a milestone.”

शुक्ल जी इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकम्यूनिकेशंस में स्नातक हैं। मेरी तरह केवल डिग्री वाले स्नातक नहीं वरन तकनीकी दुनियाँ में जागते-सोते-जीते हैं। उनके द्वारा यह कम्पनी सेट अप करने, सफलता से 150 लोगों को ह्वाइट कॉलर जीविका प्रदान करने की बातें सुन कर अपने बारे में मुझे लगता रहा कि मैंने उसी तरह की पढ़ाई कर घास ही खोदी। भला हो कि भारत सरकार ने मुझे रेल हाँकने का (ग्लोरीफाइड) गाड़ीवान रख लिया, अन्यथा हम किसी काम के थे नहीं! उस समय तो कोई टेलीफोन ऑपरेटर के लायक भी न समझता हमें! शुक्ल जी के बारे में जान कर उनसे प्रभावित हुये बिना नहीं रह सका मैं।

शुक्ल जी की कम्पनी के कस्टमर – स्क्रीनशॉट उनकी वेब साइट से
शुक्ल जी की कम्पनी के कर्मियों का एक कोलाज। उनकी वेबसाइट का स्क्रीनशॉट

यह भी पता चला कि तकनीकी के साथ प्रयोगों का शुक्ल जी का अनुभव सतही नहीं है। वे एमेच्योर रेडियो (एचएएम – HAM) के साथ प्रयोग कर चुके हैं और उनके पास उसे चलाने का लाइसेंस/सनद (एमेच्योर स्टेशन ऑपरेटर्स लाइसेंस – जिसे परीक्षा उत्तीर्ण कर ही पाया जा सकता है) लम्बे अर्से से है। उनकी कम्पनी एप्पल, एण्ड्रॉइड और वेब एप्लीकेशंस के सॉफ्टवेयर बनाती है। उनके ग्राहकों की जमात में नामी गिरामी नाम हैं। उनकी वेब साइट का अवलोकन कर प्रभावित हुये बिना बचा नहीं जा सकता।

श्री नारायण शुक्ल जी की कम्पनी के चार विभागाध्यक्ष उनके साथ थे। शुक्ल जी की पत्नी और साली उनके साथ थीं। वे लोग विश्वेश्वर महादेव का दर्शन कर, वहीं पास में पूड़ी-जलेबी का नाश्ता कर निकले थे। पहले वे गड़ौली धाम गये। गड़ौली धाम के बारे में जानकारी उन्हें मेरे ब्लॉग से मिली थी। शुक्ल जी ने ब्लॉग में गड़ौली धाम के एक पात्र सोनू के बारे में वहां के लोगों से पूछा तो उन लोगों को आश्चर्य हुआ – “आप सोनू के बारे में कैसे जानते हैं?”

शुक्ल जी ने ब्लॉग की और मेरी चर्चा की तो वहीं के किसी व्यक्ति ने मेरा घर का पता बताया। उनके बताये रास्ते से रेल लाइन के बगल से गुजरते हुये वे मेरे घर तक पंहुचे।

कोई आम आदमी घुमक्कड़ी के इतने प्रयोग नहीं करता। यह तो अलग मिट्टी से बने शुक्ल जी ही हैं जो सर्दी के मौसम में सवेरे सवेरे अपनी टीम के साथ घूमते घूमते मेरे घर तक आ गये। और उसके लिये लिंक उनके बेटे द्वारा उन्हें सुझाया मेरा ब्लॉग ही था। उनसे बात करते यह तो साफ हो ही गया कि मेरे ब्लॉग को बहुत चाव से उन्होने पढ़ा है और इस गांवदेहात के बहुत से पात्रों से वे परिचित हो गये हैं। सिंगापुर में रहता कोई व्यक्ति अगर उस तरह का परिचय पा लेता है तो और क्या कहूं – ‘मानसिक हलचल’ धन्य हो गया।

उन लोगों की उपस्थिति के दौरान मन में यह विचार बना रहा कि मुझे ब्लॉग को, अपनी बढ़ती उम्र के साथ उपेक्षित नहीं करना है। उसे जीवंत बनाये ही नहीं रखना, उसे नये आयाम देना भी है। बहुत कुछ है जो लिखा-कहा जा सकता है।

शुक्ल जी के साथ चार विभागाध्यक्ष अधिकारी थे। छोटी सी मुलाकात में ज्यादा नहीं जान पाया उनके बारे में। गुलशन जी की बात याद रह गयी है कि वे जब अपने जूते टांगेंगे तो इसी तरह गांव में रहना चाहेंगे। वे मेरे घर-परिवेश को भविष्य की नजर से देख रहे थे! अजय मिश्र जी इलाहाबादी हैं। मुझे उन्होने बताया कि वे मुझसे मेरी बोली अवधी में भी बात कर सकते हैं और यहां भदोहिया भोजपुरी मिश्रित अवधी में भी।

शुक्ल जी खुद गोरखपुर के पास चौरीचौरा के रहने वाले हैं। चौरीचौरा से सिंगापुर की जीवन यात्रा के बारे में, अगर कभी फिर मिले तो बातचीत होगी।

विदा होते समय भी भद्र महिलायें बातचीत में रत थीं। मुलाकात का समय निश्चय ही कम लगा होगा उन्हें। श्रीमती शुक्ल और उनकी बहन।

शुक्ल जी की पत्नी जी, साली जी और मेरी पत्नी जी में बड़ी जल्दी तादात्म्य स्थापित हो गया। आसपास के सगे सम्बंधियों की चर्चा, बाभनों को प्रकार – सरयूपार – की बातचीत शुरू होने में देर नहीं लगी। … एक आध घण्टा और वे रुके होते या मेरी पत्नीजी उन लोगों को चाय-स्नेक्स पर टरकाने की बजाय ब्रेकफास्ट के लिये रोकतीं तो उन भद्र महिलाओं को चर्चा में एक दो शादियाँ तय हो जातीं आपसी रिश्तेदारी-पट्टीदारी में। :lol:

चलते समय हम लोगों ने घर के सामने चित्र खिंचाये। शुक्ल जी अपने खिचड़ी होते बालोंं पर खुद ही बोले – “जब पोता हो गया, तो डाई करना छोड़ दिया।” वैसे उनके लिन्क्ड-इन प्रोफाइल में उनका चित्र काले बालों वाला है। अच्छा है – Linkedin पर जवान बने रहना ठीक रहता है! :-)

शुक्ल जी ने किन्ही गोरखपुरी कवि की पंक्तियाँ सुनाईं, जिनका आशय है कि सफेद बालों में खिजाब लगा कर चलना यूं है जैसे झूठ कपाल पर लिये चलना! पहले शुक्ल जी मिले होते और वे पंक्तियां सुनाई होती तो मेरा भी भला होता। मैं तो दो-तीन दशक तक झूठ कपारे पर लिये घूमता रहा। रिटायर हुआ तो उसे कपाल से उतारा! :lol:

शुक्ल जी (बांये से चौथे) अपनी टीम के साथ हमारे ड्राइंग रूम में। उनके दांये गुलशन जी हैं और बांये उनकी पत्नीजी। चित्र अजय मिश्र जी, जो उनके एचआर विभाग के मुखिया हैं, खींच रहे हैं। सो वे चित्र में नहीं हैं।

और शुक्ल जी तो कभी रिटायर होने वाले हैं नहीं! डेढ़ सौ कर्मचारियों को नौकरी देते; पालते-पोसते हैं। उन्हें कोई रिटायर होने देगा? कभी नहीं। हां वे मौज मजे के लिये एमेच्योर रेडियो ब्रॉडकास्टिंग करें और उसपर एक आध बार हम जैसे को भी पॉडकास्ट ठेलने का मौका दें! और इधर इलाहाबाद-बनारस से गुजरते हुये ‘रेल लाइन के बगल-बगल चलते’ मेरे घर तक भी चले आयें। जरा बता कर आयें, जिससे उनके आतिथ्य लायक भोजन की तैयारी हो सके।

शुक्ल जी, उनके परिवार और उनकी टीम की जय हो!


ज्ञानदत्त पाण्डेय – मैं भदोही, उत्तरप्रदेश के एक गांव विक्रमपुर में अपनी पत्नी रीता के साथ रहता हूं। आधे बीघे के घर-परिसर में बगीचा हमारे माली रामसेवक और मेरी पत्नीजी ने लगाया है और मैं केवल चित्र भर खींचता हूं। मुझे इस ब्लॉग के अलावा निम्न पतों पर पाया जा सकता है।
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पीयूष वर्मा का मालिश-तेल, कंचे, माला और चलना


चार साल पहले ऑस्टियोअर्थराइटिस के कारण घुटने कट्ट-कट्ट आवाज करने लगे थे। हाथ की कुहनियां भी दर्द करने लगी थीं। डाक्टर ने कहा था कि घुटने की कटोरी का ट्रांसप्लांट ज्यादा मंहगा नहीं पड़ेगा। दवाओं में ग्लूकोसामाइन वाली टेबलेट्स मेरे ब्लड शूगर को बढ़ा रही थीं। यह लगता था कि उत्तरोत्तर बढ़ती उम्र कष्टदायक ही होगी। चलना-फिरना कम होने से वजन बढ़ेगा और उससे जोड़ों की समस्या और बढ़ेगी। इस कैच-22 से शायद अवसाद होने लगे।

मैंं छड़ी ले कर चलने लगा था।

फिर बोकारो में कृष्णमुरारी मेमोरियल अस्पताल के हड्डी रोग चिकित्सक रणवीर जी ने मुझे टखनों पर वजन रख व्यायाम करने और मेकवेस्टिन दवा का नियमित सेवन का निदान सुझाया। उससे लाभ यह हुआ कि मैंने छड़ी को तिलांजलि दे दी। घर में चलना-फिरना सहज हो गया। पर घर के बाहर आधा किमी चलने के बाद घुटनों का दर्द फिर भी तीखा बना रहा। मैंने अपना वजन तीन-चार किलो कम किया। उसका भी कुछ लाभ मिला।

जिंदगी घुटनों के दर्द के साथ एक स्तर पर “नॉर्मल” बना चुकी थी। वह नॉर्मल बहुत सही नहीं था। पर कामचलाऊ तो था ही।

कुछ महीने पहले रवि रतलामी जी ने अपने भोपाल के मित्र पीयूष वर्मा जी का एक मालिश का तेल सुझाया, जिसके प्रयोग से उनकी पत्नीजी को बहुत लाभ हुआ था। यह भी बताया गया कि फलाने व्यक्ति जो अपना कामधाम भी ठीक से नहीं कर पाते थे, मालिश के इस तेल का प्रयोग कर “चार धाम की यात्रा” कर आये!

मुझे चार धाम की यात्रा तो नहीं करनी है, पर एक सामान्य स्वस्थ और दीर्घ जीवन जीने की चाह तो अवश्य है। पीयूष जी ने मुझे वह मालिश वाला तेल भेजा। मालिश-अनुशासन के अनुसार मुझे दो तीन बार दिन में अपने जोड़ों पर हल्की मालिश करनी थी। उतनी मैं नहीं कर पा रहा हूं। मालिश करने का कोई अनुचर मुझे नहीं मिला। खुद ही स्नान के पहले और कभी कभी एक बार और अपने घुटनों, कूल्हे, हाथ के जोड़ों, टखनों और हाथ-पैर की उंगलियों पर हल्की मालिश करता हूं। महीने में करीब चालीस बार यह हो पाता है।

इस आधे अधूरे मालिश-अनुशासन के भी लाभ हुये। मुझे नियमित दर्द रहता था पैरों में। मेरी पत्नीजी रात में मेरे घुटनों और तलवों पर आयोडेक्स/मूव जैसा कुछ लगाती थीं। अब वह दर्द और आयोडेक्स/मूव का लगाना नहीं है।

पीयूष जी के तेल के प्रयोग के साथ मैंने कुछ और भी किया है। मैंने घर में ही पैदल चलना प्रारम्भ किया है। घर के बेड-रूम्स और ड्राइंग रूम में चक्कर लगाते हुये नित्य तीन हजार कदम चलने का लक्ष्य रखा था। तीन हजार कदम चलने में मुझे तीन-चार बार बीच बीच में आराम करतेकरते हुये यह लक्ष्य प्राप्त करना पड़ता था।

घर के ड्राइंग रूम का हिस्सा, जिसमें पैदल चला जाता है।

नवम्बर के महीने में मैं कुल 1 लाख 11 हजार कदम चला। प्रति दिन औसत 3700 कदम। इसमें से तीन हजार कदम तो नित्य के टार्गेट के थे। बाकी फुटकर चलना होता था।

मैंने उत्तरोत्तर अपने पैदल चलने को बढ़ाया। बीच में पॉज देने की आवृति कम होती गयी। चलना भी बढ़ता गया। दिसम्बर में मैं कुल 1 लाख 57 हजार कदम चला। अर्थात प्रति दिन पांच हजार से ज्यादा कदम। महीने भर में 37 प्रतिशत ज्यादा चलने की क्षमता आयी।

जनवरी 2023 में अभी 11 दिन हुये हैं। सवेरे इग्यारह बजे तक इस महीने मैं 1,00,194 कदम चल चुका हूं। यह औसत 9100 कदम प्रति दिन होता है। कई दिन मैं दस हजार से अधिक कदम चल चुका हूं। यह दिसम्बर के अनुपात में 80 प्रतिशत बेहतर है।

किसे इसका श्रेय दिया जाये? पीयूष जी के तेल को या तेल के निमित्त अपने आप को ‘पेरने’ के जुनून को? मैं पक्के तौर पर नहीं कह सकता। यह केवल व्यक्तिगत प्रयोग है और इसमें तेल के अलावा कई अन्य घटक भी हैं। मौसम अच्छा है। चलना इन-हाउस हो रहा है; बाहर की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर नहीं। हां, बीच में मेरा स्वास्थ्य करीब दो-तीन हफ्ते खराब भी रहा; फिर भी चलने की क्रिया में अपने को पेरने का काम मैंने रोका नहीं! … यह जरूर है कि अगर पीयूष जी तेल नहीं भेजे होते और एक फीडबैक का आग्रह नहीं किया होता तो शायद चलने का यह प्रयोग मैं करता भी नहीं और मेरा वाकिंग-हेल्थ के प्रति नजरिया ढुलमुल सा, हमेशा बढ़ती उम्र को कोसने का बना रहता। अब मेरे पास एक सक्सेस स्टोरी है लोगों को बताने के लिये! :lol:

पैदल चलने में सहायक कंचे और 27 मनके की माला।

मेरे पैदल एक घण्टा चलने में अपने कदमों को नापने के लिये जो तकनीक है उससे कुछ और भी लाभ हुये हैं। मैं एक 27 मनके की माला और दस कंचों का प्रयोग करता हूं। दांये हाथ में चलते चलते माला जप करता चलता हूं। “हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे; हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे” का जाप। एक जप में आठ कदम चलना होता है। बेड रूम-ड्राइंग रूम की एक ओर की ट्रिप में तीन जप होते हैं। कुल सताइस ट्रिप के बाद एक कंचा जेब से निकाल कर मेज पर पड़ी कटोरी में डाल देता हूं। इस प्रकार जेब के दसों कंचे कटोरी में पंहुचने तक मैं चलता हूं। इस दस कंचों के जेब से कटोरी में पंहुचने के खेल में एक घण्टा 6-8 मिनट लगते हैं। अपने आप को इतना पेरना पर्याप्त मानता हूं मैं!

पहले तीस मिनट के भ्रमण में तीन चार बार सुस्ताता था; अब एक घण्टा से अधिक के भ्रमण में केवल एक बार (वह भी यदा कदा) रुकना होता है। इस भ्रमण में मैं जप भी कर लेता हूं और अपनी सांसों को लेने, निकालने का क्रम भी अनुभव करता जाता हूं। कुल मिला कर इस क्रिया में शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक स्वास्थ्य का लाभ मिल रहा है। इस क्रिया का श्रेय मैं पीयूष जी के तेल को देता हूं। वे स्पीड पोस्ट से तेल न भेजते और मेरे मन में फीडबैक देने का दबाव न होता तो मैं यह सब करता ही नहीं! जिंदगी जैसे लदर-फदर चल रही थी, वैसे चलती रहती।

इस क्रिया में शारीरिक-मानसिक-आध्यात्मिक स्वास्थ्य का लाभ मिल रहा है।

पीयूष वर्मा जी की जय हो!


गेंहू की तलाश में ढूंढी यादव


सवेरे सवेरे ढूंढी आये। अशोक कऊड़ा जला चुका था। पहले उन्होने पास बैठ शरीर गर्म किया। उन्होने मुझसे मिलने की बात कही तो अशोक ने मुझे खबर दी। बाहर निकल कर उनसे मिला। उन्होने पैलगी की। उसके बाद अपने आने की मंशा – “जीजा, कोटेदार कहेस कि आपके लगे गोंहू होये। (जीजा कोटेदार – राशन बांटने वाला मुलाजिम – ने कहा है कि आपके यहां गेंहू मिल सकता है।)”

ढूंढी यादव

कोटेदार प्रजाति के लोग भ्रष्ट नौकरशाही का मूलाधार हैं। वे स्थानीय नेता और फूड सप्लाई विभाग की नौकरशाही के बीच सेतु भी हैं। आम जनता – जो अपने अधिकारों के प्रति उतनी सजग नहीं होती – को यह तिकड़ी ठगती है। और उस ठगी की कीली है कोटेदार नामक जीव। लोगों को समय पर राशन न देना। झूठ बोलना कि अभी सप्लाई नहीं आयी है। सप्लाई आने पर भी लोगों को उनका बायोमीट्रिक वेरीफिकेशन के लिये झिलाना या अंगूठा लगवाने पर भी कम तोल कर राशन देना उनकी यूएसपी है।

आजकल गेंहू की राशन में उपलब्धता की मारामारी है। ज्यादातर लोगों को चावल ही मिल रहा है फ्री वाले राशन में। लगता है गेंहू का भण्डार कम हो गया है सरकार के पास। दूसरे, गेंहू के बाजार भाव 28-30 रुपया किलो हैं। अगर सरकार गेंहू रिलीज भी कर रही है राशन में तो उसे कोटेदार लोग बाजार में बेंच कर उसके बदले चावल ही दे रहे हैं जनता को। आखिर, लोगों से सरकार सीधे संवाद तो करती नहीं। अगर लोगों को सीधे मोबाइल पर मैसेज आये कि इस बार फलां तारीख को उनके गांव में इतना इतना गेंहू, चावल, तेल, चना मिलेगा तो कोटेदार का डंडी मारना कम हो जाये। पर वैसा होता नहीं। सूचना तंत्र में बहुत खुलापन आया है; पर अब भी भ्रष्ट नौकरशाही को खेलने खाने के लिये बहुत बचा है।

ढूंढी यादव को अपने घर के खाने के लिये गेंहू चाहिये। पिछली फसल के समय गेंहू के भाव यूक्रेन युद्ध के बाद चढ़ रहे थे। बिचौलियों, आढ़तियों ने घर घर जा कर 19-20 रुपये प्रति किलो गेंहू खरीदा। ढूंढी ने भी उस समय अपनी फसल का गेंहू निकाल दिया था। उन्हें यह यकीन था कि खाने भर का गेंहू राशन में मिलता रहेगा। पर अब राशन में चावल की सप्लाई होने के कारण उनका गणित गड़बड़ा गया है। ढूंढी का परिवार बड़ा है। उसके अलावा इस साल घर में शादी पड़ी थी। गेंहूं उसमें पूड़ी बनाने में लग गया। अब दो तीन महीने के लिये गेंहू कम पड़ गया है। अगली फसल आने तक के लिये वे आसपास गेंहू की तलाश में घूम रहे हैं। कोटेदार को टटोला होगा तो उसने मेरे घर का नाम ले लिया – उनके यहां हो सकता है।

मैं ढूंढी की सहायता नहीं कर पाया। मैंने उन्हें केवल एक कप चाय पिलाई। हालचाल पूछा और रवाना किया।

हमने अपने खाने भर को रख कर बाकी गेंहू घर पर आ कर खरीद कर ले जाने वाले बनिया को बेच दिया था। सो हमारे पास भी गेंहू नहीं है। गेंहू की पूरे इलाके में किल्लत है और सरकारी सप्लाई में जो आ भी रहा है, वह (अधिकांशत:) खुले बाजार में चला जा रहा है।

मैं ढूंढी की सहायता नहीं कर पाया। मैंने उन्हें केवल एक कप चाय पिलाई। हालचाल पूछा और रवाना किया। पर ढूंढी के बहाने मेरी गांव के स्तर की सरकारी मशीनरी के प्रति खीझ उभर आयी। यहां, सात साल रहते हो गये मुझे और चार पांच बार फार्म भरने, फोटो देने के बाद भी मेरा राशन कार्ड नहीं बना है। शायद इस लिये कि हमने कोई ‘दक्षिणा’ देने की सोची भी नहीं। … मेरा परिवार सरकारी राशन व्यवस्था से अलग है। अपने खेत की उपज या ओपन मार्केट पर निर्भर हैं हम।

आज ढूंढी आये तो कुछ लिखने – पोस्ट करने का मन हो आया। अन्यथा आजकल लिखा भी कम जा रहा है और गांव देहात में भ्रमण भी नहीं हो रहा है। सर्दी ने जीवन-अनुभव को सिकोड़ दिया है।


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