लोलई राम गुप्ता का भिण्डा


गांव का लेवल क्रॉसिंग बंद था और मेरे आगे एक फेरीवाला अपनी मॉपेड के साथ खड़ा था। एक बड़ी खांची में सामान लिये। वह अगर खांची में ओवर डायमेंशनल कंसाइनमेण्ट न लिये होता तो बहुत सम्भव है कि लेवल क्रॉसिंग गेट को मॉपेड झुका कर पार कर गया होता। पर उसकी मजबूरी थी रुकना। मेरी भी मजबूरी थी बंद गेट ट्रेन के चले जाने और उसके दो मिनट बाद फाटक के बूम के ऊपर उठने का इंतजार की। जिंदगी भर मैंने इसी बात में गुजारी है कि लोग लेवल क्रॉसिंग के नियमों का पालन करें। अब खुद उस नियम को तोड़ तो नहीं सकता। :sad:

गांव का लेवल क्रॉसिंग बंद था और मेरे आगे एक फेरीवाला अपनी मॉपेड के साथ खड़ा था। एक बड़ी खांची में सामान लिये।

समय गुजारने के लिये मैंने चित्र लेने शुरू कर दिये। उस मॉपेड वाले से बात करनी भी प्रारम्भ की। खांची में और थैलों में वह काफी सामान लिये था। गांव में जो बिक सकता है – टॉफी, चूरन, पूपली और कंफेक्शनरी के बहुत से आईटम। किण्डर ज्वॉय – जो बच्चों को बहुत प्रिय है और तीस चालीस रुपये का आता है (वह मध्यम वर्ग के बच्चे ही खाते होंगे) का डूप्लीकेट का एक पैकेट भी था जिसपर लिखा था – मिस्टर फन बनी। चोको बीन्स। उसने बताया कि वह पांच रुपये का मिलता है मार्केट में। पूपली – चावल की तली कुरकुरी नमकीन जो एक पाइप के आकार की होती है; की बजाय चौड़ी और कई छेदों वाली लाल और पीले रंग की मिली जुली पूपलियों के कई पैकेट थे। एक पैकेट बीस रुपये का। खुदरा में दो रुपये का एक बेचते होंगे दुकानदार। उसका नाम फेरीवाले ने बताया – “लोग चिप्स कहते हैं पर हम उसे भिण्डा कहते हैं। कटी भिण्डी जैसा दिखता है।”

भिण्डा

अधिकांशत: फन बनी और भिण्डा ही था उसके पास; पर थैलों में और भी बहुत तरह के आईटम थे। दोनो तरफ लटके थे थैले। उन सब के साथ वह कैसे मॉपेड चलाता होगा, वह अपने आप में कारीगरी है। कोई मोटर-वैहीकल लाइसेंस देने वाला ऐसे वाहन की दशा के अनुसार लाइसेंस नहीं देता होगा। पर उस फेरीवाले को ऐसे सामान के साथ हाईवे पर नहीं गांव की पंचायती सड़कों और पगडण्डियों पर ही चलना होता है।

उस व्यक्ति ने अपना नाम बताया – लोलई राम गुप्ता। वह कटका में रहता है। सामान बनारस से ले कर आता है। भिण्डा का कच्चा माल भी लाता है बनारस से और उससे तल कर पैकिंग अपने घर नुमा कारखाने में करता है। अकेले ही यह काम करता है। बच्चे अभी पढ़ रहे हैं। स्कूल जाते हैं। उनको इस व्यवसाय में नहीं लगाया। बनारस से सामान लाना; भिण्डा बनाना और फेरी लगा कर आसपास के पांच सात किमी के इलाके में बेचना; यही उसका उद्यम है।

लोलई राम ने बताया कि दिन भर का टर्न ओवर छ से सात हजार का होता है। बिके सामान पर आठ से दस प्रतिशत का मुनाफा होता है। मोटे अनुमान से पंदरह हजार महीने की आमदनी। गांव देहात की लेबर फोर्स सामान्यत: पांच-सात हजार कमाती है। उस हिसाब से लोलई राम का उद्यम अच्छा ही कहा जायेगा। कोई बम्बई जा कर पच्चीस हजार भी कमाये, उसकी बजाय लोलई का यह बिजनेस मॉडल कहीं बेहतर है।

लोलई राम गुप्ता। अपनी मॉपेड के साथ रेलवे फाटक पर।

ट्रेन चली गयी थी। लेवल क्रॉसिंग खुल गया था। मैं फटका पार कर बांयी ओर अपने घर की ओर अपनी साइकिल को मोड़ चला और लोलई राम ने अपनी मॉपेड दांये मोड़ी चमरऊट की ओर। वहां घरों में तीन चार दुकानें हैं जो लोलई राम गुप्ता जी के सामान बेचती हैं। गांव में हर गली मुहल्ले में किराने और कंफेक्शनरी की दुकानें हैं। एक बड़ी अण्डर एम्प्लॉयेड लोगों की फौज ऐसी दुकानें चलाती है। लोलई राम के उत्पाद हर गली नुक्कड़ पर मिलते हैं। बड़ा बाजार है इन चीजों का और लोलई राम उनका सही दोहन कर रहे हैं।

तुम भी एक मॉपेड खरीद लो जीडी! एक मॉपेड कितने की आती है?


पीतल का हण्डा


गांव का लेवल क्रॉसिंग बंद था। एक सवारी गाड़ी गुजर रही थी। उसके गुजरने और क्रॉसिंग गेट खुलने के इंतजार में हम भी थे और बगल में मोटर साइकिल पर सवार एक अधेड़ महिला भी। मोटर साइकिल नौजवान चला रहा था। बीच में एक बच्चा सैण्डविच था और पीछे अधेड़ महिला हाथ में प्लास्टिक की पन्नी में लिपटा एक पीतल का हण्डा लिये थी।

मेरी पत्नीजी ने कहा – शायद ये किसी शादी के समारोह में जा रहे हैं। पीतल का गगरा उसी में दिये जाने का चलन है।

गगरा/हण्डा बड़ा था। शानदार। उसपर फूल-पत्ती का स्टिकर या पेण्ट किया गया चित्र था। एक चित्र में डोली लिये जाते कंहार बने थे। और उसपर कैप्शन लिखा था – सजनी चली ससुराल। नया हण्डा शादी के उपहार के हिसाब से ही बना था।

मैंने पूछा – कितने का होगा?

पत्नीजी का उत्तर था – चार हजार से कम नहीं होगा।

“चार हजार?! इतने में तो साइकिल आ जाये।”

गगरा बड़ा था। शानदार। उसपर फूल-पत्ती का स्टिकर या पेण्ट किया गया चित्र था। एक चित्र में डोली लिये जाते कंहार बने थे। और उसपर कैप्शन लिखा था – सजनी चली ससुराल।

अपनी अपनी वासना। किसी को हण्डा प्रिय है; किसी को साइकिल। पर पत्नीजी ने मुझे टॉण्ट किया – “कौन से जमाने में रहते हो? आजकल कोई किसी को साइकिल उपहार में नहीं देता। गया गुजरा भी हो तो साइकिल नहीं मोटर साइकिल ही चलती है शादी-ब्याह में। उसकी औकात न हो तो गिफ्ट में फ्रिज, टीवी या वाशिंग मशीन दी जाती है। साइकिल पर चलना तौहीन है।”

मेरे वाहन चालक, गुलाब ने कार की खिड़की का शीशा नीचे गिरा कर महिला से पूछ ही लिया – “चाची, केतने क हौ हण्डा?”

ट्रेन गुजर चुकी थी। गेट खुल गया था। मोटर साइकिल आगे बढ़ते बढ़ते चाची ने जवाब दिया – हण्डा और खोरा (कटोरा) पांच हजार का।

चार पांच हजार का हण्डा केवल शादी के प्रतीक भर में से है। मैंने किसी को उसमें जल रखते नहीं देखा। जल रखा जाये तो उसे साफ करने में काफी मशक्कत करनी पड़े। दूर कुयें से पानी लाने की प्रथा या जरूरत भी उत्तरोत्तर खत्म होती गयी है। सिर पर गागर लिये चलती पनिहारिनें अब चित्रों में ही दीखती हैं। लोग हैण्डपम्प से पानी प्लास्टिक की बाल्टी में ही ले कर आते-जाते दीखते हैं। … चार दशक पहले मेरी शादी में आये हण्डे किसी बड़े ट्रंक में बंद पड़े होंगे।

जमाना बदल गया। और आगे भी बदलेगा तेजी से। हण्डा भी अप्रासंगिक हो गया है और आगे और होगा। कोई अब हण्डे में जल नहीं रखता, प्लास्टिक के गगरे चल पड़े हैं। अशर्फियां हण्डे में डाल कर कोई घर में गाड़ता भी नहीं। अब सारा धन जनधन खाते में रहता है।

पर शादी की रस्मों में हण्डा रहेगा। वह ही नहीं – हल, मूसल, चकरी, जांत, सुग्गा, कलसा सब रहेंगे। शादी के बाद भले ही दुलही फूलों से सजी कार में विदा हो, हण्डे पर चित्र पालकी-कंहार और उसपर कैप्शन ‘सजनी चली ससुराल’ वाले ही होंगे। भारत बदलता है पर फिर भी अपने नोस्टॉल्जिया में जीना जानता है।

हण्डा अभी पांच हजार का है। जब पचीस हजार का हो जायेगा; तब भी कोई चाची अपनी भतीजी के शादी के लिये खरीद कर ले जाती दिखेंगी हण्डा!


टिल्लू की अमूल दुकान


टिल्लू अर्थात नागेंद्र कुमार दुबे। गांव के शुरुआत पर – जहाँ गांव की मुख्य सड़क नेशनल हाईवे से जुड़ती है; टिल्लू ने अमूल के दूध और अन्य उत्पादों का आउटलेट खोला है।

गांव में जब मैं रहने आया था तो दूध का विकल्प केवल गाय-गोरू पालने वालों से दूध खरीदना भर था। अधिकतर ग्वाले या बाल्टा वाले (मिल्क कलेक्टर) दूध में कितना पानी मिलाते हैं, उसपर कोई निश्चित मत बन नहीं पाता था। दूध में पानी की शिकायत करने पर दो तीन दिन अपेक्षाकृत दूध बेहतर होता था। फिर उसकी तासीर बदलने लगती थी और सप्ताह भर में पुन: शिकायत करने की स्थितियाँ बनने लगती थीं।

सवेरे पौने सात बजे अमूल का डिस्ट्रीब्यूटर (दांये) अपनी गाड़ी में ला, टिल्लू (बांये) को अमूल की सप्लाई दे कर जाता है।

अब टिल्लू का अमूल का आउटलेट हो जाने पर वह तनाव खत्म हो गया है। अमूल के पाउच में गुणवत्ता वही जो अमूल विज्ञापित करता है। दूध की मात्रा का भी कोई शक नहीं। मैंने पाया है कि अन्य ब्राण्डों की बजाय अमूल के आधा किलो के पैकेट में मात्रा भी 15मिली ज्यादा ही होती है। फैट कण्टेण्ट भी जितना लिखा है उसके अनुसार ही होता है। इस मानकीकृत उपलब्धता के हिसाब से; टिल्लू का उपक्रम गांव के शहरी रूपांतरण की दिशा में एक मील का पत्थर है।

गांव – विक्रमपुर – एक तरह से मालगुड़ी जैसा है। गांव में रेलवे स्टेशन है। उनींदा सा रेलवे स्टेशन। दो जोड़ा पैसेंजर ट्रेने यहां रुकती हैं। लेवल क्रासिंग गेट जो गांव के उत्तरी भाग को दक्षिणी भाग से जोड़ता है, पर उपस्थित होने वाला गेटमैन गांव के लिये महत्वपूर्ण सरकारी मुलाजिम है। रेलवे स्टेशन के पास बीस-पचीस दुकानों की बजरिया है जो आसपास के दस पंद्रह गांवों के ट्रेन पकड़ने वाले लोगों को केटर करती है। उस बजरिया के अलावा भी इधर उधर छिटकी पांच सात किराना की दुकानें हैं। उनमें टिल्लू की अमूल दूध की दुकान एक नया आयाम देती है। यह लोगों के रहन सहन में परिवर्तन लायेगी और उनकी सोच में भी।

मैं टिल्लू को बताता हूं कि अमूल का दूध अगर 6% फैट वाला है तो वह गाय का नहीं भैंस का है। भैंस का दूध अमूमन ए2 गुणवत्ता का है। उसमें भारत के देसी पशुओं के दूध के गुण हैं। विलायती पशुओं का ए1 वाला दूध नहीं (जिससे अनेक बीमारियों, मसलन डिमेंशिया की समस्या की सम्भावनायें प्रबल होती हैं)। मैं टिल्लू को यह भी कहता हूं कि अगर वह दूध के व्यवसाय में आया है तो दूध के बारे में उसे सामान्य आदमी से कई गुना ज्यादा ज्ञान अर्जन करना चाहिये। अब तक वह एक बाभन नेता जैसा सोचता-आचरण करता रहा है; अब उसे एक बनिया की तरह सोचना चाहिये।

एक सीनियर सिटिजन को प्रवचन देने की लत होती है। मुझमें वह शायद बढ़ती जा रही है। टिल्लू उस लत को पोषित करने वाला एक केप्टिव ऑडियेंस हो गया है। बेचारा! :lol:

नागेंद्र कुमार दुबे उर्फ टिल्लू।

गांव में पंचायत है। ग्रामप्रधान है। दो तीन पूर्व ग्रामप्रधान हैं। सो उनके होते गंवई राजनीति की खासी उर्वर भूमि है। … मालगुड़ी जैसा है, पर गांव में स्मार्टफोन, ह्वाट्सएप्प, यूटूब और फेसबुक के प्रचार प्रसार से गांव ग्लोकल (ग्लोबल-लोकल) भी बनता जा रहा है। टिल्लू का आउटलेट उसको तेजी से और ग्लोकल बनायेगा।

टिल्लू, नागेंद्र कुमार, भाजपा का मण्डल स्तरीय पदाधिकारी (मण्डल उपाध्यक्ष) भी है। पिछली बार उसे परधानी का चुनाव भी लड़ना था। पर एन मौके पर यह घोषणा हुई कि परधानी की सीट आरक्षित सूची में चली गयी है। नागेंद्र की सारी मेहनत बेकार गयी। फिर भी उसका परिणाम यह हुआ कि उसने समाज के सभी वर्गों के बीच अपनी साख बना ली। अब जब टिल्लू ने अमूल का आउटलेट खोला है, वह साख बड़ी सहायक प्रमाणित हो रही है। नेटवर्किंग का बिक्री के लिये दोहन सम्भव है।

टिल्लू की दुकान पर सवेरे से ही कुर्सियों पर बैठ कर वार्ता-गपबाजी करते लोग देखे जा सकते हैं। पहले पहल मुझे लगा कि अगर टिल्लू यही चौपाल का मॉडरेटर ही बना रहा तो बिक्री क्या खाक होगी! पर टिल्लू ने बताया कि ये लोग न केवल दुकान से सामान खरीद रहे हैं, वरन आसपास प्रचार भी कर रहे हैं। परिणाम है कि बिक्री में आशातीत बढ़त हो रही है।

खपत बढ़ने के साथ साथ सुविधायें बढ़ाने की सोच भी बन रही है। नागेंद्र ने बताया कि जल्दी ही वह एक और डीप फ्रीजर खरीदने वाला है। पांच सौ लीटर की केपेसिटी वाला। उसके लिये बयाना दे दिया है। वह आने पर और भी आईटम रखेगा अपने आउटलेट पर। आईसक्रीम के एक डिस्ट्रीब्यूटर से नित्य सप्लाई तय तमाम कर ली है। टिल्लू सरसों की थोक खरीद कर एक छोटा एक्स्पेलर भी लगा कर तेल पेरने का काम भी करेगा। लोगों को शुद्ध कच्ची घानी का तेल भी मिलने लगेगा। मैं जितनी देर टिल्लू के यहां खड़ा होता हूं, उसकी नयी नयी योजनायें सुनने में मिलती हैं। उन योजनाओं में मैं अपने भी इनपुट्स देने का लोभ नहीं रोक पाता!

इस गांव का मालगुडीत्व मैंने ज्यादा टटोला नहीं। टिल्लू के माध्यम से उसे जानने-टटोलने का प्रयास करूंगा। फिलहाल तो यही आशा है कि टिल्लू हर रोज यही खबर दे – “फुफ्फा, बिक्री बढ़त बा। कालि संझा दूध खतम होई ग। इही लिये आज एक क्रेट अऊर लिहे हई! (फूफा जी, बिक्री बढ़ रही है। कल शाम दूध खत्म हो गया। इस लिये आज एक क्रेट और बढ़ाया है सप्लाई में)।”

टिल्लू को बहुत शुभकामनायें!


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