प्रेमसागर – द्वादशज्योतिर्लिंग काँवर यात्रा सम्पन्न


अठाईस अगस्त 2021 रहा होगा जब प्रेमसागर ने प्रयागराज संगम से जल ले कर कांवर यात्रा प्रारम्भ की होगी बाबा विश्वनाथ के लिये। पतली से कांवर जो गोपीगंज के आसपास टूट गयी। किसी सज्जन ने उन्हें एक लाठी दी जिसे कांवर बना कर वे आगे बढ़े। मुझे वे तीस अगस्त को मिले पहली बार मेरे घर के पास हाईवे पर।

प्रेमसागर दो साल की अवधि मान कर चल रहे थे इस पैदल यात्रा के लिये। पर वह, विघ्न-बाधाओं के बावजूद, कल सोलह जुलाई 2022 को बाबा बैजनाथ धाम में जल चढ़ाने के साथ वह सम्पन्न हुई। साल भर से भी कम समय में।


वे द्वादशज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पर निकले थे। उन्हें न रास्ता मालुम था, न साधन थे उनके पास। कोई सम्पर्क सूत्र भी नहीं थे। वे बात कर रहे थे कि उज्जैन जायेंगे और वहां से ॐकारेश्वर। नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकण्टक का तो नाम भी नहीं लिया था मेरे सामने। पर यात्रा ने मेरे देखते देखते आकार लिया। और वह वृहत यात्रा बन गयी। बहुत कुछ मत्स्यावतार की तरह! वह मछली जो अंजुरी में समाई थी और जो इतनी विशालकाय मत्स्य बनी कि मनु ने कल्पना भी नहीं की होगी।

प्रेमसागर दो साल की अवधि मान कर चल रहे थे इस पैदल यात्रा के लिये। पर वह, विघ्न-बाधाओं के बावजूद, कल सोलह जुलाई 2022 को बाबा बैजनाथ धाम में जल चढ़ाने के साथ वह सम्पन्न हुई। साल भर से भी कम समय में।

कल सवेरे सवा सात बजे उनसे बात हुई तो उस समय वे देवघर में वैद्यनाथ धाम में लाईन में लगे थे जल चढ़ाने के लिये। उनको 2091 नम्बर का टोकन मिला था। लाइन धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी। कभी खड़े रह कर और कभी बैठ कर वे लाइन में आगे बढ़ रहे थे। भीड़ में उनका चश्मा भी कहीं गिर कर गुम हो गया था। वे मोबाइल पर संदेश भेजने की अवस्था में भी नहीं थे। फोन पर मुझे बोला – “भईया, हो सकेगा तो आज ही चश्मा बनवा लूंगा। उसके बिना काम नहीं चलेगा।”

उन्हें अपना गंतव्य सामने दीख रहा था। उनके अनुसार उनका शरीर थक गया था। पिछ्ले दो दिनों में उनकी चलने की रफ्तार उनके अपने औसत से कहींं कम थी। बता रहे थे कि बालू बिछा दी गयी है मार्ग में और मौसम की गर्मी में वह गर्म हो जाती है। पर अब लाइन में लगे अपने जल चढ़ाने का इंतजार करते प्रेमसागर झारखण्ड प्रशासन की व्यवस्था के गुण गा रहे थे। “प्रशासन व्यवस्था बहुत अच्छी है। लाइट लगी हैं। पैरों पर वे जल डालते हैं। बालू भी लाल वाली बिछा रखी है”।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

उसके बाद मैं अपनी पत्नीजी के मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद उनकी पट्टी खुलवाने में व्यस्त था, तब पौने दस बजे प्रेमसागर का फोन आया। उन्होने जल चढ़ा दिया था। यात्रा सम्पन्न हो गयी थी। वे वीडियो कॉल कर आसपास का दृष्य दिखाना चाहते थे, पर बाहर अस्पताल में होने के कारण वह कॉल ले नहीं पाया मैं। उनके भेजे चित्र ह्वाट्सएप्प पर मिले। दिन भर भी व्यस्तता के कारण उनसे बात नहीं हुई। पर वे बैजनाथधाम से वासुकीनाथ जायेंगे दर्शन के लिये। जो भी भक्त आते हैं बाबाधाम दर्शन के लिये वे वासुकीनाथ जरूर जाते हैं। “भईया, कहा जाता है बाबाधाम हाईकोर्ट है तो वासुकीनाथ सुप्रीमकोर्ट।” वासुकीनाथ जाना तो एक दो दिन बाद होगा और वह किसी वाहन की सहायता से।

आज सवेरे प्रेमसागर वापस लौट रहे थे पैदल उसी कांवर मार्ग पर सुल्तानगंज की ओर कटोरिया के लिये। सवेरे छ बजे बात हुई तो बताया घण्टा भर में पंहुच जायेंगे। “रास्ता में कुछ लोग चाय पिलाने वाले हैं। वहां रुकूंगा भईया। उसके बाद कटोरिया में प्रदीप मिश्रा जी ने एक स्वागत समारोह रखा है। उनके पास रुकूंगा।” – प्रेमसागर ने बताया। वे पैदल चल रहे हैं। पैदल चलने की बाध्यता नहीं है अब पर “पैदल जल्दी पंहुच जायेंगे। वाहन से तो ज्यादा समय लगेगा। रास्ता लम्बा होगा।”

पदयात्री को पैदल चलने से कभी परहेज नहीं होता! :-)

पिछले दो दिनों की यात्रा के बारे में भी उन्होने बताया था, उनके बारे में भी एक पोस्ट लिखना शेष है। एक दो दिन में वह लिखना सम्पन्न होगा। प्रेमसागर की पद यात्रा सम्पन्न हो गयी है। उसका लेखन भर वाइण्ड-अप करना है मुझे।

जय बाबा वैद्यनाथ! जय महादेव! हर हर हर हर महादेव!


कुछ समय आंख के ऑपरेशन थियेटर में


कल पंद्रह जुलाई 2022 का दिन आंख और आंख से सम्बंधित सोच ने ले लिया। कुछ लोग कहते हैं कि आजकल आंख के इलाज का विज्ञान और तकनीक इतनी विकसित हो गयी है कि मोतियाबिंद की शल्य चिकित्सा में सब कुछ बहुत सरल, बहुत कुछ मानक हो गया है। पर विज्ञान और तकनीक का विकास किसी ब्लैक-स्वान ईवेण्ट की आशंका और मानसिक व्यग्रता को मिटा नहीं पाता। आंख की जीवन में अहमियत दिन भर सोच पर हावी रही।

डा. आलोक

मेरी पत्नी जी ने सवेरे सात बजे मुझे कहा कि उन्हें हल्की खांसी आ रही है। ऐसे में डाक्टर साहब ऑपरेशन कर पायेंगे? उनसे जरा पूछ लो। मैं झिझका। सवेरे पांच बजे से हम दोनो निठल्ले लोग जाग रहे हैं, पर डा. आलोक जो सम्भवत: दिन में बारह-चौदह घण्टे काम करते होंगे, वे नींद से उठ गये होंगे? उनके पास हमारे इस फोन कॉल के लिये समय होगा? क्या अपनी व्यग्रता में मेरी पत्नीजी ज्यादा ही लिबर्टी नहीं ले रहीं एक व्यस्त डाक्टर के साथ?

मेरे उहापोह के बावजूद जब उन्होने तीन चार बार मुझे कहा तो मैंने डाक्टर आलोक को एक संदेश भेज दिया। कुछ देर बाद उनका सहृदय उत्तर भी आ गया – नहीं, कोई समस्या नहीं। हल्की खांसी कोई बाधा नहीं होगी और जरूरत पड़ी तो वे कुछ खांसी दबाने की दवा दे कर ऑपरेशन कर देंगे।

सो, हम लोग – वाणी, विवेक, रीता और मैं नियत समय पर डाक्टर साहब के क्लीनिक में उपस्थित हो गये। ऑपरेशन के पहले डाक्टर साहब ऑपरेशन के मरीजों ने मिल रहे थे। मेरी पत्नीजी को उन्होने कहा – “आप मुझ पर फेथ रखें। जैसे विवेक जी हैं वैसे ही मुझे भी मान कर चलें। सब ठीकठाक होगा”। डा. आलोक का यह पारिवारिक तरीके से दिया गया आश्वासन मेरी पत्नी जी को गहरे से जरूर छू गया होगा। उन्होने अपना गला साफ कर कहा कि वे डाक्टर साहब पर पूरे यकीन से सब कुछ छोड़ कर चल रही हैं।

लबादा पहना कर रीता पाण्डेय की आंख में दवा डालते डाक्टर आलोक के सहकर्मी।

एक दिन पहले डा. आलोक के सहकर्मियों ने मोतियाबिंद के लेंस के आकलन के लिये बायोमेट्रिक जांच की थी। रीता जी की दोनो आंखों की पावर में व्यापक असमानता को देखते हुये डाक्टर साहब ने एक बार खुद जांच कर पुन: कर अपने को संतुष्ट किया। फिर रीता जी को ऑपरेशन के लिये प्रतीक्षा करने को कहा। दांई आंख में दवा डाले, आंख बंद कर रीता को ऑपरेशन का लबादा पहना कर एक बिस्तर पर लिटा दिया गया।

डाक्टर साहब ऑपरेशन के उस बैच के अन्य मरीजों के साथ कॉन्फीडेंस-बिल्डिंग-कवायद में लग गये और उनके सहकर्मी ऑपरेशन थियेटर की तैयारी में।

मेरी बिटिया अपनी माँ के साथ बनी रही और मौका पा कर दामाद जी मोबाइल पर सम्भवत: अपने दफ्तर के काम में लग गये। ऑपरेशन थियेटर में जाने के पहले लगभग बीस मिनट का समय था वह।

मेरी बिटिया अपनी माँ के साथ बनी रही और मौका पा कर दामाद जी मोबाइल पर सम्भवत: अपने दफ्तर के काम में लग गये।

डा. आलोक ने मुझे ओपरेशन थियेटर (ओटी) में आ कर शल्य चिकित्सा देखने का प्रस्ताव रखा। यह तो वैसा ही था कि अपनी रेल अफसरी के दौरान किसी सामान्य यात्री को ट्रेन इंजन में लोको चालक की सीट के बगल में बैठ कर यात्रा करने का ऑफर दूं। मैंने उस पेशकश को सहर्ष लपक लिया। मुझे अपनी पोषाक चेंज रूम में उतार कर डाक्टर द्वारा पहने जाने वाली ड्रेस पहनने को कहा गया। गाढ़ा हरे रंग का पायजामा, कमीज नुमा बंडी और सिर पर हरा कण्टोप और मास्क। एक स्टूल ले कर मुझे ओटी के एक कोने में बैठने का अवसर मिला। मेरे पास मेरा मोबाइल था और स्क्रिबल करने के लिये पॉकेट डायरी और कलम।

दोनो स्थितियों में कोई समानता नहीं थी, पर ऑपरेशन थियेटर के कोने में बैठ कर मुझे बरबस अपने ट्रेन इंजन – स्टीम/डीजल/इलेक्ट्रिक/सबर्बन ईएमयू के ड्राइवर केबिन के कई वाकये याद आने लगे। :-D

मुझे अपनी पोषाक चेंज रूम में उतार कर डाक्टर द्वारा पहने जाने वाली ड्रेस पहनने को कहा गया। गाढ़ा हरे रंग का पायजामा, कमीज नुमा बंडी और सिर पर हरा कण्टोप और मास्क। एक स्टूल ले कर मुझे ओटी के एक कोने में बैठने का अवसर मिला। …ओटी के उस कोने पर एक रैक में ढेरों लेंस पैकेट रखे थे जो केटरेक्ट शल्य चिकित्सा में इस्तेमाल होने थे।

ओटी के उस कोने पर एक रैक में ढेरों लेंस पैकेट रखे थे जो केटरेक्ट शल्य चिकित्सा में इस्तेमाल होने थे। डा. आलोक ने बताया था कि पिछले दिन उन्होने इक्यासी ऑपरेशन किये थे। के.एम.मेमोरियल अस्पताल के मुख्य प्रबंधक बैनर्जी दादा ने डा. आलोक के द्वारा उनके यहां किये गये हजार-दो हजार ऑपरेशंस की बात मुझे बताई थी। आलोक जी उसके अलावा अन्य अस्पतालों और दूर दराज में लगने वाले कैम्पों में भी शल्य चिकित्सायें करते होंगे। … वे भारत की दृष्टि अंधता/रुग्णता दूर करने के पुनीत काम में लगे हैं। पता नहीं समाज उन्हें ड्यू-क्रेडिट देता है या नहीं। :-(

उन जैसे उत्कृष्ट डाक्टर के इर्दगिर्द इसी तरह के सफल ऑपरेशंस के आंकड़े बनने लगते हैं। शायद डा. आलोक के अस्पताल की लॉबी में उनके चित्र के बोर्ड के साथ उनके स्कोरबोर्ड का एक काउण्टर लग जाना चाहिये। रोज, सातोंं दिन, बारहों महीने और सालों साल किये गये काम का आंकड़ा बताता काउण्टर। वह मरीज में फेथ-बिल्डिंग के अलावा वह साथ जुड़े पैरामेडिक्स के लिये भी बहुत जोश भरने वाली चीज हो सकती है।

वहां उपस्थित सर्जन और दोनो सहायक कर्मी जानते थे कि आगे किस चीज की और कब जरूरत होनी है। कोई सरप्राइज एलीमेण्ट नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि ऑपरेशन थियेटर में थियेटर – रंगमंच – शब्द जुड़ा है!


पहले की पोस्टें –

बढ़ती उम्र और रीता पाण्डेय की आंखें

मोतियाबिंद ऑपरेशन की तैयारी


डाक्टर साहब का क्लीनिक/अस्पताल कुछ ही महीने पहले खुला है। तब भी मेरी पत्नीजी उनकी दो हजारवीं शल्य चिकित्सा की मरीज हैं – ऐसा मुझे उन्होने बताया था। मोतियाबिंद के अलावा एक आंख की मोटे लेंस वाली, डीजेनरेटिव रोग की ‘विशिष्ट’ मरीज!


ओटी में दो सहकर्मी – एक लड़की और एक नौजवान तैयारी करते हैं। ऑपरेशन के सारे सामान बहुत कुछ वैसे सजाते हैं जैसे कोई दुकानदार सवेरे दुकान खोलने पर जमाता है। उसके बाद डाक्टर साहब के आने पर वे उनकी हरी रंग की पोषाक के ऊपर सर्जन वाला लबादा पहनाने में सहायता करते हैं। मेरी घड़ी के अनुसार 2:58 हुआ है। डाक्टर साहब दक्षता से अपना काम शुरू करते हैं। पूरी तरह स्टरलाइज्ड वातावरण है। उन तीनो व्यक्तियों में एक अलग तरह चुस्ती आ गयी लगती है।

ओटी में दो सहकर्मी – एक लड़की और एक नौजवान तैयारी करते हैं। ऑपरेशन के सारे सामान बहुत कुछ वैसे सजाते हैं जैसे कोई दुकानदार सवेरे दुकान खोलने पर जमाता है।

ब्लॉग लिखने में शल्य चिकित्सा के बारे में बताते हुये मेरे पास दो विकल्प हैं। मैं पूरी जानकारी ले कर एक आम व्यक्ति की भाषा में प्रक्रिया समझाने का प्रयास कर सकता हूं। पिछली पोस्टों की टिप्पणी में जानकार पाठकों ने वैसा ही किया है। नयी तकनीक, नये लेंस और नये प्रोसीड्यर/पोस्ट-ऑपरेटिव अनुभव के बहुत से कथानक हैं लोगों के पास। मेरे कुछ मित्रों ने किसी तीसरे की हॉरर स्टोरीज भी सुनाई हैं और प्रसन्नता के अहो-अनुभव के किस्से भी। मैं वह सब व्यक्त कर सकता हूं या मैं एक कोने में दृष्टा भाव से हो रही अपनी मानसिक हलचल व्यक्त कर सकता हूं। मुझे अपनी मानसिक अभिव्यक्ति ज्यादा रुचती है।


[डाक्टर साहब के आने पर वे उनकी हरी रंग की पोषाक के ऊपर सर्जन वाला लबादा पहनाने में उनकी सहायता करते हैं। मेरी घड़ी के अनुसार 2:58 हुआ है। मैं समय मार्क करता हूं और डाक्टर साहब दक्षता से अपना काम शुरू करते हैं।]


एक कुशल नाट्य की तरह वहां हर कृत्य नपा तुला, बिना किसी हड़बड़ाहट के होता दीखा। किसी को आवाज ऊंची कर कहने का कोई मौका नहीं आया। बोलने की आवश्यकता ही नहीं थी। वहां उपस्थित सर्जन और दोनो सहायक कर्मी जानते थे कि आगे किस चीज की और कब जरूरत होनी है। कोई सरप्राइज एलीमेण्ट नहीं। कोई आश्चर्य नहीं कि ऑपरेशन थियेटर में थियेटर – रंगमंच – शब्द जुड़ा है!

सब प्रकृति की सहज गति से खुलता सा था वहां उस रंगमंच पर। महर्षि श्री अरविंद मातृशक्ति के चार वपुओं की बात करते हैं – महाकाली, महालक्ष्मी, माहेश्वरी और महासरस्वती। महासरस्वती का कार्य सर्जनात्मक और लय-ताल के साथ होता है। ओपरेशन थियेटर में महासरस्वती का साम्राज्य नजर आया मुझे।

मेरी बिटिया डा. आलोक के बारे में अपना आकलन व्यक्त करते हुये कहती है – ये डाक्टर अपने काम में कुशल तो होंगे ही; पर मुख्य बात है कि वे बैलेंस्ड आदमी हैं।

महासरस्वती का साम्राज्य बहुत बैलेंस्ड होता है! :-)

द बेयरफुट आई सर्जन के कुछ चित्र कौंधते हैं। नेपाल की गरीबी, टोकरी (बास्केट-टेक्सी) में लाद कर अपनी बहन कांची माया को ऑपरेशन के लिये लाया उसका भाई। ऑपरेटिंग टेबल पर गरीब कांची डा. संदुक रुईत को बताती है कि वह किस प्रकार मक्के की खेती और बकरियाँ पाल कर घर चलाने की जद्दोजहद करती है। जब वह मोतियाबिंद से अंधी हो गयी तो उसके आदमी ने उसे छोड़ दिया… उसकी परिवार में उपयोगिता ही नहीं बची।

डा. आलोक मुझे उदाहरण देने के लिये बताते हैं उस बुढ़िया माई के बारे में; जो घर के कोने में लेटी रहती है और जो अंधी हो चुकी है। घर वाले उसकी सेवा करने में असुविधा महसूस करते हैं तो लाद-फांद कर डाक्टर के पास ले आते है जिससे वह बुढ़िया उनपर कमतर बोझ बने। पूर्णत: परित्यक्त, पूर्णत: उपेक्षित के जीवन में केटरेक्ट की शल्य चिकित्सा उस बुढ़िया के लिये कितना मायने रखती होगी!

द बेयरफुट आई सर्जन के कुछ चित्र कौंधते हैं – काठमाण्डू में बागमती नदी के घाट पर कोर्नियल ट्रांसप्लाण्ट का एक चित्र।

मैं जितना डा. आलोक को दक्षता से ऑपरेशन करते देखता हूं, उतना ही उन विपन्न लोगों के जीवन में इस ऑपरेशन की अहमियत के बारे में भी सोचता हूं। यहां से जाने के बाद शायद मेरे नजरिये में बदलाव आ जाये। शायद मैं विज्ञापनों के आधार पर जरूरतमंद चक्षु मरीजों को कुछ सहायता भी कर सकूं। … यह निश्चय ही मेरे लिये और मेरे जैसे अपेक्षाकृत साधन युक्त लोगों के लिये आंख खोलने वाली सोच है।

डा. आलोक से मैं उनसे समाज के इस जरूरतमंद सेगमेण्ट के बारे में उनके योगदान के बारे में पूछता हूं तो उनका बहुत यथार्थपरक उत्तर मिलता है। बिना व्यर्थ की लागलपेट के। उनका कहना है कि उनकी सेवायें उस तबके के लिये निशुल्क होती हैं, पर दवाओं और लेंस आदि पर जो खर्च होता है उसके लिये तो योगदान चाहिये ही। वे एक एनजीओ के साथ काम कर अपनी सेवायें फ्री देते हैं। साइटसेवर्स के सहयोग से दवाओं/लेंस आदि का प्रबंधन होता है। इसके अलावा बहुत से मरीज रु.2000 के आसपास का दवा/लेंस आदि का खर्च वहन करने में सक्षम होते हैं। इस वर्किंग मॉडल पर समाज के बहुत बड़े तबके की सहायता हो जाती है।

करीब साढ़े छ मिनट में मेरी पत्नीजी का मोतियाबिंद ऑपरेशन सम्पन्न हो गया।

यह सब बताने में डाक्टर आलोक अपनी सेवाओं की डींग हाँकते नहीं, अपने योगदान को मॉडेस्ट बता कर और सेवा फाउण्डेशन/साइटसेवर्स के योगदान को प्राथमिकता से बताते हैं। विनम्र योगदान की वृत्ति – यही बड़प्पन है। … यह डाक्टर मेरी अगली पीढ़ी का है। वाणी और विवेक की पीढ़ी का।

सामान्यत: मेरी पीढ़ी अगली पीढ़ी को नकारा बताने के साडिस्ट मनोविनोद में लिप्त रहती है। यहां मैं डा. आलोक की पर-उपकार की विनम्र वृत्ति का कायल हो गया। मैं और मेरी पत्नीजी यह सोचने लगे कि अपनी पेंशन का कुछ अंश तो साइट सेवर्स जैसी संस्था को दिया करेंगे।

करीब साढ़े छ मिनट में मेरी पत्नीजी का मोतियाबिंद ऑपरेशन सम्पन्न हो गया। ऑपरेशन थियेटर से निकल कर मैंने वहां की हरी पोशाक उतार अपने कपड़े पहने। रीता को आधा घण्टा एक बिस्तर पर आराम करने को कहा गया। आंख पर पट्टी बंधी थी। उन्हें एक दवा और चश्मे का किट और निर्देशों का कागज दिया गया जिसका प्रयोग अगले दिन पट्टी हटाने पर करना प्रारम्भ करना था।

हम लोग दो बजे क्लीनिक में गये थे। चार बजे तक घर वापस आ गये।


अगले दिन – आज 16 जुलाई की सुबह नौ बजे हम लोग डाक्टर साहब के पास गये। मेरी बिटिया और मैं रीता पाण्डेय के साथ। डाक्टर साहब के सहकर्मियोंं ने पट्टी खोली और आंख की सफाई की। फिर डाक्टर आलोक ने उनका निरीक्षण किया, संतोष व्यक्त किया और हम लोगों को हिदायतें दीं। अगले चार दिन बाद उनके यहां एक विजिट होगी। उसके पश्चात हम बोकारो से अपने घर के लिये रवाना होंगे।

चलते चलते डाक्टर साहब ने कहा कि मैं ब्लॉग पर अच्छा लिखता हूं। हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी भी सधी हुई है मेरी। अपनी प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती। उम्र बढ़ने के साथ जब आदमी और भी हाशिये पर जाने लगता है तो प्रशंसा और भी अच्छी लगती है। मुझे वैसा ही लगा जैसे खाने में अच्छी, गाढ़ी अरहर की दाल परोसी हो और उसमें देसी घी का तड़का भी बिना कोई कंजूसी किये लगा हो। … क्या जीडी, तुम पेटू बाभन ही रहे। कॉम्प्लीमेण्ट स्वीकारने में भी पेट पूजा की सामग्री की उपमा खोजते हो! :lol:


मोतियाबिंद ऑपरेशन की तैयारी


डा. आलोक के यहाँ मेरी पत्नीजी मेरी बिटिया के साथ गयीं। रीता की दांयी आंख, जिसका मोतियाबिंद ऑपरेशन किया जाना है, के लेंस को तय करने के लिये उनका परीक्षण किया गया। उनकी आंख को दवा दे कर डायलेट किया गया और डाक्टर साहब के सहकर्मियों ने देखा-परखा। बाद में, मेरे दामाद जी – विवेक – के साथ डा. आलोक की बात हुई। यह पता चला कि लेंस कई प्रकार के आते हैं और उनकी गुणवत्ता के आधार पर उनकी कीमत भी कम या ज्यादा है।

रीता का मामला सामान्य मोतियाबिंद ऑपरेशन का नहीं है। उनकी दूसरी आंख में सी.एन.वी.एम. क्षरण सतत जारी है। इसलिये उपयुक्त यह है कि सामान्य दांई आंख, जिसमें मोतियाबिंद हो गया है, को ऑपरेट कर सही कर लिया जाये। यह ऑपरेशन बहुत अच्छी तरह होना चाहिये। रीता के आगे के जीवन की दृष्टि बहुत कुछ इसी ऑपरेशन पर निर्भर है।

रीता की डी-जेनरेट हो रही आंख का भी ऑपरेशन जरूरी है। उस आंख में मोतियाबिंद बहुत ज्यादा नहीं है। पर डाक्टर साहब हमें बार बार समझाने का प्रयास करते हैं कि उसका भी ऑपरेशन करा लेना चाहिये। मुझे समझ भी आता है। डा. आलोक से बातचीत के अलावा मैं इधर उधर उपलब्ध सामग्री भी खंगालता हूं। मेयो क्लीनिक स्टाफ द्वारा नेट पर उपलब्ध सामग्री भी कुछ वैसा कहती प्रतीत होती है –

When a cataract interferes with the treatment of another eye problem, cataract surgery may be recommended. For example, doctors may recommend cataract surgery if a cataract makes it difficult for your eye doctor to examine the back of your eye to monitor or treat other eye problems, such as age-related macular degeneration or diabetic retinopathy.

डाक्टर साहब हमें यह भी बताते हैं कि रीता की दांयी और क्षरित होती बांयीं आंख के चश्मे को ले कर भी द्वंदात्मक स्थिति है। उनका दांयी आंख का मोतियाबिंद इलाज करने के बाद अगर उनकी दांयी आंख का चश्मा लगभग बिना पावर का और बांई आंख का चश्मा आज जैसा बहुत ज्यादा मोटा और बहुत ज्यादा पावर का बना रहा तो दोनो आंखों के देखने में एक ही चीज अलग अलग दिखेगी। डबल-विजन की सतत असमंजस की दशा हो जायेगी। उसके लिये जरूरी है कि बांयी आंख में चश्मे के लेंस की बजाय एक सादे शीशा लगाया जाये। उस दशा में देखने का काम लगभग दांयी आंख से होगा। “पर वह सब करने पर अब से बेहतर ही दिखाई देगा” – डाक्टर साहब हमें यह स्पष्ट करते हैं।

रीता का मामला सामान्य मोतियाबिंद ऑपरेशन का नहीं है। उनकी दूसरी आंख में सी.एन.वी.एम. क्षरण सतत जारी है। इसलिये उपयुक्त यह है कि सामान्य दांई आंख, जिसमें मोतियाबिंद हो गया है, को ऑपरेट कर सही कर लिया जाये।

मुझे यह भी अहसास होता है कि निकट भविष्य में बांई आंख का भी मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद दृष्टि में और सुधार ही होगा। उसके अलावा बांई आंख के आगे होने वाला डी-जेनरेशन भी शायद समाप्त हो जाये। … फिर भी, आगे क्या होगा, को ले कर मन में कई प्रश्न कौंधते हैं, कई आशंकायें बनती हैं। उन सब के शायद तत्काल उत्तर न हों। पर एक आम व्यक्ति की बजाय मेरे पास ज्यादा जानकारी है, उसका संतोष होता है।

मैं जितना सोचता हूं, डाक्टर आलोक पर उतना विश्वास बढ़ता जाता है। पिछली पोस्ट पर डाक्टर आलोक की टिप्पणी – This is a challenging case for me and I will definitely do it with my best effort – मुझे और भी सम्बल देती है।

आंखों की समस्यायें विश्व में व्यापक हैं। यद्यपि आंखों को हम टेकेन-फॉर-ग्राण्टेड ले कर चलते हैं; पर हमारी देखने की क्षमता पर हमारा जीवित रहना बहुत कुछ निर्भर करता है। हम शतायु होना चाहते हैं तो वह बिना सामान्य दृष्टि के होना कल्पनातीत है। केनोप्निषद की वह पंक्ति मन में आती है, जिसमें ऋषि उस सत्ता की बात करते हैं – चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति। कौन है वह जिसने देखने और सुनने की क्षमता दी है!

आंख के ऑपरेशन का तनाव शायद मेरी पत्नीजी को भी हो। मेरी बिटिया और वे उस तनाव को दूर करने के लिये बाजार घूमने निकल गये। वापस आ कर घर में घुसे तो तीन चार थैले सामान लिये और आपस में झगड़ते हुये। “मम्मा आपको तो शॉपिंग करना आता ही नहीं। दुकानदार के सामने आपको बनारसी साड़ी के बारे में अपना ज्ञान बघारने की क्या जरूरत थी? आपके साथ तो मार्केट जाना ही नहीं चाहिये।”

मैंने पूछा नहीं, पर मां-बेटी बिना गोलगप्पे खाये घर लौटे ही नहीं होंगे। आपको क्या लगता है? स्त्रियाँ घर के बाहर तनाव दूर करने जायें और बिना चाट-पकौड़ी के बेरंग लौटें; यह कभी हुआ है इस धराधाम पर? :lol:

रीता की आंखों के बारे में सोच कर मेरे मन में भी कुछ घुमड़ता है। मुझे अपने बाबा – पण्डित महादेव प्रसाद पाण्डेय की याद हो आती है जो सत्तासी साल की उम्र में अपनी मुट्ठी की झिर्री में से ताकते हुये के.एम. मुंशी की लोपामुद्रा पूरी पढ़ गये थे। साढ़े तीन दशक हुये उस बात को। शायद उन्हें भी मोतियाबिंद था जो हमने ध्यान नहीं दिया। आज सोच कर एक पछतावा सा होता है, पर अब लगता है कि रीता पर ध्यान देना चाहिये, जो वर्तमान है, उसपर।

मेरे पास मेरे टैब में, The Barefoot Eye Surgeon नामक पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी है। यह नेपाली आंख के डाक्टर संदुक रुईत पर है। उनके नेपाल और विश्व की विपन्न/जरूरतमंद जनता के दृष्टि-स्वास्थ्य के विवरण की पुस्तक। उस पुस्तक के रिव्यू और उसका प्रोलॉग पढ़ता हूं। मन बनाता हूं कि अगले कुछ दिनों में वह पुस्तक ही पढ़/सुन ली जाये।


goodreads.com पर The Barefoot Surgeon


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