मिश्रीलाल सोनकर, सतयुग वाले


दुबले से आदमी। दुबले आदमी पर बुढ़ापा कम ही असर करता है। वे घुटने तक की लुंगी – जो गमछा भी हो शायद – और बनियान पहले अपनी सब्जी की दुकान पर एक ओर कुर्सी पर बैठे थे। मेरी निगाहें गाजर और टमाटर तलाश रही थीं। पत्नीजी ने यही दो चीजें ले कर आने को कहा था, मर्केट से। उनकी दुकान पर ये दोनो ही नजर आ गये।

मैंने एक पाव गाजर देने को कहा। वे सज्जन लपक कर अपनी कुर्सी छोड़ दुकान की गद्दी पर पंहुच गये। मैं इसबीच टमाटर छांटने लगा। थोड़े कम पके और छोटे टमाटर। घर से यही हिदायत थी कि ‘टाइट’ टमाटर लाये जायें, ज्यादा बड़े, पिलपिले या पूरे पके नहीं।

टमाटर छांटने के बाद देखा तो उन्होने गाजर की बजाय खीरा तौल दिया था। उनको बताया कि गाजर देना था। दो तीन बार उन्होने आंय आंय किया तो साफ हो गया कि ऊंचा सुनते हैं। खैर, खीरे की जगह गाजर तौला। दोनो आईटम तौलने के बाद बोले – “और कुछ चाही? धनिया, मर्चा।”

मेरे मना करने पर उन्होने एक खीरा थैली में रख दिया – “बुढापा आ गया है। ढंग का खाया करो।” मानो उनके द्वारा दिया एक खीरा मेरे लिये स्वास्थ्यवर्धक हो जायेगा। एक खीरे की फिलेंथ्रॉपी ने उनको मुखर कर दिया – “हम सतयुग के हैं। अब कलियुग चल रहा है।”

उन्होने पूछने पर नाम बताया – मिश्रीलाल। मिश्रीलाल सोनकर। इस पूरे इलाके में सब्जी का थोक-फुटकर व्यवसाय सोनकरों के पास ही है। वैसे, उनकी उम्र के हिसाब से उनका नाम स्टाइलिश है। अन्यथा नाम सुने हैं – बर्फी सोनकर, रंगीला सोनकर आदि। उनकी सब्जियों में भले ही वैविध्य हो, पर नाम रखने में (ज्यादातर) कोई कलात्मकता नहीं दीखती।

मिश्रीलाल – उन्होने अपनी उम्र भी बताई – चौरासी। अस्सी चार चौरासी।

उनका स्वयम को ‘सतयुग’ का बताना मुझे अटपटा भी लगा और अच्छा भी। उन्होने मेरी उम्र पूछी। मैंने बताया 66-67। ऊंचा सुनने के कारण दो बार रिपीट करना पड़ा। फिर उन्होने यह बताने के लिये कि उन्होने सही सुना है; दोहराया – “सड़सठ – साठ-सात सड़सठ?”

मेरे हां कहने पर उन्होने अपनी उम्र भी बताई – चौरासी। अस्सी चार चौरासी।

उनकी गणना में हो सकता है बारह साल या बीस पच्चीस साल का एक युग होता हो। उस हिसाब से उनके जन्म के बाद तीन चार युग गुजरे हों। अब कलियुग का मध्य चल रहा हो।

कहते हैं भारत ऐसा देश है जो एक साथ बीस शतब्दियों में जीता है। उस हिसाब से यह कल्पना की जा सकती है कि एक अच्छी खासी आबादी सतयुग, त्रेता, द्वापर की भी अभी होगी। मिश्रीलाल की तरह अपने सतयुगी नोश्टॉल्जिया में जीती। ईंट की कच्चे मिट्टी के पलस्तर की दीवारों और टीने की छत थी। पीछे की दीवार पर भगवान जी लोगों के कैलेण्डर टंगे थे। निश्चय ही सतयुगी मिश्रीलाल जी की चलती होगी; वर्ना नयी पीढ़ी तो फिल्मी हीरोइन वाले कैलेण्डर-पोस्टर लगाती।

दुकान पर चौरासी की उम्र में भी काम में लगे थे मिश्रीलाल। मेरे पास भी मिश्रीलाल की तरह कोई काम होता, तो शायद मैं भी उनकी तरह छटपट होता। मिश्रीलाल का चित्र लेने पर यह जरूर विचार बना कि मिश्रीलाल पर एक डेढ़ पेज लिखा ही जा सकता है।

वैसे गांवदेहात में कोई व्यक्ति अस्सी पार का मिले और जो उम्र के अलावा पूरी तरह स्वस्थ्य दीखता हो, उससे दीर्घ जीवन के सूत्रों पर बात करनी चाहिये। बावजूद इसके कि एक मोटा गोल चश्मा लगाये हैं मिश्रीलाल और ऊंचा सुनते हैं; मुझे लगता है अभी दस-पंद्रह साल और चलने चाहियें वे और कोई आश्चर्य नहीं कि शतक लगा लें। हो सकता है उनके काल निर्णय अनुसार वे अगले सतयुग तक जियें।

जीवंत, स्वस्थ और लम्बी जिंदगी। सीनियर सिटिजन के पास वही लक्ष्य होना चाहिये। … कभी फिर मिलूंगा मिश्रीलाल जी से।


पीपल की डालें और इस्लाम बकरीवाला


सड़क पर एक आदमी साइकिल के कैरियर पर पीपल की टहनियां लादे जा रहा था। साइकिल के हैण्डल और सीट के साथ वह लम्बी सी लग्गी भी फंसाये था। शायद पत्तियों के गट्ठर में कोई कुल्हाड़ी भी रही हो।

पीपल की टहनी और उसकी हरी पत्तियों से मैं अपने मन में हाथी की कल्पना करता हूं। गांव में हाथी आता था तो उसे पीपल के पेड़ के नीचे बांधा जाता था। वह पीपल की टहनियां तोड़ कर पत्तियां खाया करता था। मुझे लगा कि यह आदमी शायद हाथी के लिये ले कर जा रहा हो। पर उसके पास साइकिल चलाते हुये जब उससे पूछा तो उसने बताया कि उसके पास इग्यारह बकरियां हैं। बकरियोंंके लिये वह सवेरे सवेरे पत्तियां तलाशने निकलता है। आसपास के गांवों में यही तलाशता है कि कहां से उसे मिल सकती हैं। पीपल की पत्तियां उसकी बकरियों को बहुत प्रिय है। उनकी तलाश में ज्यादा रहता है वह।

सामान्यत: लोग पीपल को हाथ नहीं लगाते। कृष्ण गीता में अपने को वृक्षों में पीपल/अश्वथ कहते हैं। घर की मुंडेर पर अगर पीपल जम जाता है तो लोग तनावग्रस्त हो जाते हैं। मजबूरी में पीपल के पौधे को मुंडेर से निकाल कर कहीं और रोपित करते हैं। काट कर फैंकते नहीं। कुछ लोग अन्य धर्मावलम्बियों (मुसलमानों) का सहारा लेते हैं पीपल कटवाने या उसकी शाखा छंटवाने के लिये।

पीपल की डालें लिये जाते उस आदमी के बारे में जिज्ञासा हुई। उसने नाम बताया – इस्लाम। “शैलेंदर (शैलेंद्र, मेरे साले साहब) हमके जानथीं(अच्छी तरह जानते हैं)। हमार घर नहरा पर मछलीपालन के लग्गे बा।” शैलेंद्र से पूछने पर पता चला कि इस्लाम नट है।

मत्स्यपालन फार्म के पास नटों की बस्ती है। मुझे लगता था कि नट घुमंतू जाति है, पर यहां वे स्थाई रह रहे हैं। नट महिलायें दांत के कीड़े कान से निकालने का ‘जादू’ जैसा काम करती हैं। आदमी भी छोटा मोटा काम करते हैं। गांव के आर्थिक पिरामिड में वे बहुत नीचे हैं। शायद उनसे नीचे मुसहर ही होंगे। इस्लाम बकरियां पालता है। बकरी का दूध तो बहुत काम होता है, मुख्य अर्जन बकरियां बड़ा कर उन्हें बेचने से होता है। इस्लाम वही करता है।

“बकरी का दूध बहुत से लोग तलाशते हैं। सौ रुपया पौव्वा बिकता है। पर होता ही बहुत कम है।” इस्लाम ने मुझे बताया। शायद इस दूध में प्लेटलेट्स बढ़ाने की बहुत क्षमता है। डेंगू ज्वर के फैलने पर लोग बकरी का दूध तलाशते पाये जाते हैं।

इस्लाम

मैं इस्लाम को नहीं जानता था, पर वह जानता है। मेरे घर के सामने पीपल का पेड़ है। लगे हाथ वह उसकी छंटाई की अनुमाति मांगने लगा। वह मैंने मना कर दिया। घर में पीपल नहीं लगाते लोग, पर मेरे घर की जमीन पर वह घर बनने के पहले से है। ईशान कोण पर पीपल-पाकड़ और नीम एक कतार में लगे हैं। कुछ इस तरह कि देवता एक साथ खड़े हों। … मैं नहीं चाहूंगा कि पीपल को कोई क्षति हो। पर बहुत से लोग – हिंदू लोग, इस्लाम जैसे की सहायता लेते हैं पीपल की छंटाई या कटाई में।

आसपास के इलाके में कई बस्तियां हैं गड़रियों और भेड़ियहों (बकरी और भेड़ पालन करने वालों) की। वे सवेरे सवेरे अपना रेवड़ ले कर निकल लेते हैं और दिन भर चराते हैं। उसके उलट इस्लाम सवेरे टहनियां कांट कर लाता है और बकरियां पालता है। बकरियों को चराने नहीं ले जाता। पूर्णत: घुमंतू (नट) जाति अपने रेवड़ एक जगह पर रख कर पालती है और अब एक ही स्थान पर रहती भी है – यह जानकारी अलग सी थी। गांव में रहते हुये छ साल से ज्यादा हो गये। अब भी कोई न कोई ‘जानकारी’ मिल ही जाती है। इस्लाम के बारे में जानना भी जानकारी ही है।


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