मुराहू पण्डित के साथ साइकिल से गंगा घाट


गांव से बाहर निकलते ही हाईवे के अण्डरपास के सामने ही मिल गये मुराहू पण्डित। वे रोज अपने गांव लीलापुर से ईंटवाँ घाट तक जाते हैं गंगा स्नान करने। आज मैं उन्हें पैलगी-परनाम कर उन्ही के साथ हो लिया। उनके साथ उनके स्नान अनुष्ठान देखने का अवसर था। वह मैंने गंवाना उचित न समझा। वैसे भी मुझे किसी काम की कोई जल्दी न थी। घर पर नाश्ता मिलने में अभी दो घण्टे थे। तब तक तो वापस आया ही जा सकता है।

गंगा तट के लिये मुझसे आगे चलते मुराहू पण्डित

मुराहू उपाध्याय जी रास्ते भर मुझे वह सब सुनाते गये जो कई बार बता चुके हैं। पर और भी बातें की। यह भी पता चला कि उनके पास दो बंदूक-पिस्तौल भी हैं; जिनका लाइसेंस रीन्यू कराना भी झंझटिया काम है। एक उम्र के बाद डाक्टर साहब से प्रमाणपत्र लेना होता है मानसिक-शारीरिक संतुलित होने का। बताने लगे कि डाक्टर साहब नये थे, सो उनके साथ चुहुलबाजी भी की। अपने लिये कहा कि वे अपढ़ गंवार हैं और उन्हें अपनी जन्म तारीख नहीं मालुम। डाक्टर साहब ने उनकी उम्र उनकी फिटनेस के अनुसार बहुत कम आंकी – उनको कोई रोग नहीं है। न हाइपर टेंशन और न मधुमेह। डाक्टर साहब के पास भी अपनी साइकिल चला कर पंहुचे थे। वह तो एक दारोगा जी, जो मुराहू जी के शिष्य रह चुके थे और जो डाक्टर साहब से मिलने आये थे, ने पोलपट्टी खोल दी – “मास्साब सत्तासी साल के हैं। राष्ट्रपति पदक पाये प्रधानाचार्य रह चुके हैं।”

मुराहू पण्डित

मुराहू पण्डित सरल व्यक्ति हैं, पर चुहुल, मजाक, अपने स्वास्थ्य के बारे में बोलना बतियाना, अपनी विशिष्टतायें लोगों को व्यक्त कर देना बहुत पसंद है। इस उम्र में भी सवेरे उठ कर दो घण्टे गाय-गोरू की सेवा करना, घर की सफाई करना, बारह-चौदह किलोमीटर साइकिल से चल कर गंगा स्नान के लिये बिला नागा आना-जाना – यह बताने में वे संकोच नहीं करते।

मेरे साले साहब, शैलेंद्र का कहना है कि मुराहू पण्डित में सब ठीक है – “सज्जन हैं, विद्वान हैं, कर्मठ हैं और स्वास्थ्य के बारे में सजग हैं। पर उन्हें बात करने का रोग है। आप से उनकी पटरी बैठ जायेगी, काहे कि आप में सुनने की क्षमता है। आजकल के नौजवान लोग कहां सुनने वाले हैं उनके स्वास्थ्य के और वृक्ष लगाने के प्रयोगों के बारे में। … ओन्हन सरये कन्नी काटि क चलि देथीं!”

लॉकडाउन के दौरान, जब वे छियासी साल के रहे होंगे, मुराहू पण्डित प्रयाग में फंस गये थे। वहांंसे वापस गांव आने का कोई साधन ही नहीं था। टेक्सी-ऑटो चल ही नहीं रहे थे। वहां किसी ने अपनी पुरानी साइकिल उन्हे दे दी। एक ही दिन में नब्बे-पचानबे किमी साइकिल चला कर वे अपने गांव लौटे थे। सवेरे छ बजे चले और हंड़िया पंहुच कर पंद्रह मिनट सुस्ताये। एक पाव दही की लस्सी बना कर पी कर ऊर्जा पायी और फिर वहां से चले तो शाम चार बजे गांव पंहुच कर ही रुके।

जब उन्होने यह बताया तो बहुत अचम्भा हुआ मुझे। मैं छियासठ की उम्र में अधिक से अधिक 20 किमी साइकिल चला पाया हूं और ये छियासी के इतना चला सकते हैं!

डाक्टर ने उनकी उम्र कम आंकी तो गलती डाक्टर साहब की नहीं है। मुराहू पण्डित को भगवान ने बनाया ही किसी अलग माटी से है! :-)

गंगा नदी में सूर्य को जल अर्पित करते मुराहू उपाध्याय जी

गंगा किनारे ईंटवाँ में बहुत गहरे में हैं गंगा जी। 30-40 फिट स्टीप नीचे उतरना मेरे बस का नहीं था। मैंने उन्हे कहा कि वे ही नहा कर वापस आयें। मैं इंतजार करूंगा। नीचे झांका तो दो दर्जन लोग नहा रहे थे – बच्चे, महिलायें और पुरुष। मुराहू पण्डित काफी दूर जल में हिल कर पश्चिम और पूर्व की ओर मुंह कर चार पांच डुबकी लगाये। शरीर को अच्छे से मल कर साफ किया और स्नान पूरा कर सूर्यदेव को गंगाजी के बहते जल से लेकर अर्पण किया। फिर किनारे आ कर अपना जरीकेन और लोटा ले कर गये और उसमें गंगाजल भरा।

वापस आ कर मुझे भी तीन अन्जुरी गंगाजल दिया। वह मैंने आचमन कर और अपने ऊपर छिड़क कर अपना गंगाजल से कव्वा-स्नान सम्पन्न किया।

वापसी में मुराहू पण्डित ईंटवाँ के शैव मंदिर में ले कर गये।

वापसी में मुराहू पण्डित ईंटवाँ के शैव मंदिर में ले कर गये। मुझे घर लौटने की तलब हो रही थी, पर मुराहू पण्डित जी को मैंने कम्पनी दी। मंदिर छोटा है, पर पुराना है और अच्छा लगता है। उस मंदिर की चारदीवारी बनाने की कथा भी पण्डित जी ने बतायी। ईंटवाँ के ही फलाने जी का छ क्विण्टल गांजा पकड़ा गया था। उस मामले में बरी होने पर उन फलाने जी ने यह जीर्णोद्धार कराया। गांजा वाले का भला शंकर जी न करेंगे तो कौन करेगा। और उस भक्त ने बम भोले की मनौती भी पूरी श्रद्धा से सम्पन्न की। मैं यह नहीं पूछ पाया कि इस मनौती के बाद गांजा व्यवसाय चला, फला-फूला कि नहीं। बहरहाल इलाके में इतने गंजेड़ी दिखते हैं कि उससे गंजेड़ी, गांजा व्यवसाई और पुलीस वाले – सभी बमबम होंगे। भोलेनाथ की सब पर फुल किरपा दीखती है।

पूरे रास्ते भर मुराहू पण्डित जी मुझसे बोलते बतियाते आये। मेन हाईवे पर आ कर हम दोनो ने अपना अपना रास्ता पकड़ा। मैं अपने घर की ओर चला और मुराहू पण्डित सौदा-सुलफ के लिये महराजगंज बाजार की ओर।

लॉकडाउन के दौरान, जब वे छियासी साल के रहे होंगे, मुराहू पण्डित प्रयाग में फंस गये थे। वहांंसे वापस गांव आने का कोई साधन ही नहीं था। टेक्सी-ऑटो चल ही नहीं रहे थे। वहां किसी ने अपनी पुरानी साइकिल उन्हे दे दी। एक ही दिन में नब्बे-पचानबे किमी साइकिल चला कर वे अपने गांव लौटे थे। सवेरे छ बजे चले और हंड़िया पंहुच कर पंद्रह मिनट सुस्ताये। एक पाव दही की लस्सी बना कर पी कर ऊर्जा पायी और फिर वहां से चले तो शाम चार बजे गांव पंहुच कर ही रुके।

उन्हें देख कर यह इच्छा बलवती होती है कि (कम से कम) मैं सौ साल की उम्र पाऊं। मुराहू पण्डित की तरह बीस किलोमीटर रोज साइकिल चलाता रहूं। गंगास्नान की आदत पड़े न पड़े, वहां जाना और चित्र खींचना बदस्तूर, बिलानागा जारी रहे। मुराहू उपाध्याय जी की तरह मुझे बात-रोग भले न घेरे; ब्लॉग-रोग बना रहे। पढ़ने वाले कम से कम सौ पचास लोग – उतने जितने मुराहू पण्डिज्जी को पैलगी करने वाले हैं – मुझे नित्य पढ़ते रहें। मेरे लिये दीर्घ जीवन का वही सूत्र होगा।

देखता हूं, अगले रेगुलर गंगा नहाने वाले कौन सज्जन मिलते हैं, जिनसे मिला और जिनपर लिखा जा सके।

हर हर महादेव!

गंगा स्नान कर लौटते मुराहू पण्डित

ईंटवाँ गंगा घाट पर नित्य स्नान करने वाला लालचंद


लालचंद। उम्र सत्तर साल। “चालीस पचास बरिस से गंगा स्नान करत हई (40-50 साल से नित्य गंगा स्नान कर रहा हूं)।” – वह कहता है। ईंटवाँ का घाट बहुत गहरा है। करार के समतल से करीब चार मंजिला मकान जितने नीचे हैं गंगाजी। घुमावदार कच्चा रास्ता, एक खोह की बगल से निकलता हुआ। लोगों ने अपनी सुविधा के लिये सीढ़ियां सी बना ली हैं मिट्टी खोद कर; पर निरंतर प्रयोग करने से सीढ़ियां फिर रैम्प जैसी हो जाती हैं। घुटनों में तकलीफ वाले को नीचे उतरना कष्टप्रद होता है और उम्रदराज के लिये वापसी में ऊंचाई चढ़ना।

लालचंद के साथ दोनो तकलीफें हैं। फिर भी वह नित्य गंगा स्नान करता है। मैं गंगा के जल तक नहीं उतरता। बीच में खड़ा हो कर लोगों को नहाते देखता हूं। नंगे बच्चे, गमछा पहने पुरुष और साड़ी पहने महिलायें। करीब दो दर्जन लोग नहा रहे हैं। सब आनंद और आल्हाद से भरे आवाजें कर रहे हैं। ईंटवाँ घाट अच्छा है – सिवाय उसके काफी गहरा होने के। … नहाने के बाद लालचंद लाठी के सहारे चढ़ाई चढ़ता लौटता दीखता है। मेहनत लगती है ऊंचाई चढ़ने में। वह हरे राम, हरे कृष्ण कहता चढ़ता आ रहा है, मानो यह कहने से ऊर्जा मिलती हो।

नहाने के बाद लालचंद लाठी के सहारे चढ़ाई चढ़ता लौटता दीखता है।

वह एक तौलिया पहने है। हाथ में कचारा हुआ कपड़ा और कांधे पर लुंगी। घर से एक लाठी और तौलिया भर ले कर आता होगा गंगा स्नान के लिये। बाकी, नहाने-सुखाने और कपड़ा कचारने का काम तो गंगा किनारे होता है। उसके पैरों में चप्पल भी नहीं है। इसी गांव – ईंटवाँ का निवासी है तो थोड़ी दूर आने जाने के लिये चप्पल की भी क्या जरूरत? मेरे सामने से वह चलता चला जाता है। कराह वाली आवाज में हरे राम कहता हुआ। थोड़ा आगे चल कर वह कांधे पर रखी लुंगी खोल कर अपने सिर पर कर लेता है। सूरज की गर्मी से भी बचत होती है और लुंगी सूखती भी है। आगे घर पंहुचते पंहुचते लुंगी शायद सूख जाये और शायद वह पहन भी ले।… क्या गजब मिनिमलिस्ट जीवन है।

मैं तेज कदम चलता हुआ उसके बगल में आ कर उससे बातचीत करने की चेष्ठा करता हूं। वह अपना नाम और उम्र बताता है। चालीस पचास साल से गंगा स्नान की बात करता है। उसकी पत्नी तीज त्यौहार या किसी खास मौके पर ही आती है नहाने। “उतरने चढ़ने में तकलीफ होती है।” पर वह अपने घुटने की तकलीफ के बावजूद रोज आता है।

जवानी में वह दो तीन साल पंजाब (?) नौकरी किया। कागज बनाने वाली कम्पनी में। वहां सब तरह का कागज बनता था – सिवाय नोट और फोटो छापने के कागज के। वह बार बार नाम पंजाब का लेता है पर बताता है कि जगह सहारनपुर थी। उसके बाद कुछ-कुछ महीने वह ग्वालियर, अहमदाबाद, बम्बई, पूना आदि जगहों पर भी नौकरी किया। बाहर रहना जमा नहीं तो वापस आ कर चालीस साल कालीन बुनने का काम किया। महीन से महीन और मोटा से मोटा कालीन बुना। जब शुरू किया था, तब दस रुपया रोज मिलता था। “अब तो चार सौ रुपया मिलता है”। बहुत अंतर आ गया है। काम में भी और काम की मजदूरी में भी।

लालचंद, गांव ईंटवाँ

एक लड़की थी लालचंद की। शादी हो गयी है। अब वह और उसकी पत्नी भर हैं। “जिंदगी कट रही है” – वह कहता है और आगे चल देता है। फिर कुछ चल कर रुक कर बताता है – एक गैया रही, तब दूध की तकलीफ नहीं थी। अब दूध तो नहीं मिलता पर आधा बीघा खेती है सो खाने की तकलीफ नहीं है। दो लोगों का गुजारा हो जाता है।

सत्तर की उम्र, पति पत्नी। पहनने को एक बनियान और लुंगी। खाने के लिये दस बिस्सा खेती। आस्था के लिये घर के बगल में गंगा माई। और क्या चाहिये जीने के लिये? … मैं लालचंद के जीवन के ‘संतोष और सुख’ को नापने का प्रयास करता हूं। पर क्या होगा? लालचंद जैसा निश्चिंत जीवन जी पाना क्या मेरे लिये सम्भव होगा?

सुख और प्रसन्नता के पोथे पढ़ने की कवायद मैं करता हूं। दीर्घजीवन के सूत्रों पर कई किताबें कई बार खरीदी और पढ़ी हैं। पर शायद असल सूत्र तो गंगा किनारे, निरुद्द्येश्य घूमने और लालचंद जैसे लोगों को देखने, बोलने बतियाने में ही मिलेंगे। वही करो जीडी तुम।

आज घूमते हुये देर हो गयी है। नौ बजे तक घर पंहुच जाया करता था। दस बजने को हैं। धूप तेज हो गयी है। बोतल का पानी भी खत्म हो गया है। पत्नीजी फोन पर जल्दी घर लौटने को कह रही हैं। मैं साइकिल तेज चलाता हूं घर लौटने को। पर मन में लालचंद का गंगास्नान वाला जीवन घूमता है!

जय हो गंगा माई!


टेला में तिलक


सब अलग अलग हो गये हैं, पर मेरा कुटुम्ब कुल मिला कर ढाई-तीन सौ लोगों का होगा। या ज्यादा ही बड़ा होगा। सुकुलपुर, तहसील मेजा, प्रयागराज का पुश्तैनी घर तो खण्डहर हो कर गिरा दिया गया है पर उसकी जगह नया बना नहीं। लोग आसपास इधर उधर बस गये हैं। कुछ लोग गांव में ही बना लिये हैं अपने मकान। कुछ प्रयागराज, मिर्जापुर, दिल्ली आदि में हैं। एक शाखा काण्डला चली गयी है और एक पुणे। पर लोग अब भी जुड़े हैं। यदाकदा मिल लेते हैं आपस में। और अब ह्वात्सएप्प है, वीडियो कालिंग है, फेसबुक है। लोगों के पास बोलने को कुछ नहीं होता तो गुड मॉर्निग, जै श्री राम, जै मातादी टाइप स्टेटस और कुछ इधर उधर के फार्वर्ड किये चित्र, वीडियो तो होते ही हैं।

वही सम्बंध हैं, फोन और सोशल मीडिया के माध्यम से; और वही आत्मीय जुड़ाव का तरीका रह गया है। बहुत से परिवारों-कुटुम्बों का वही जुडाव जरीया होगा। यही नियो-नॉर्मल लाइफ है।

उस दिन अखिलेश और उनके छोटे भाई रजनीश ने कहा कि रजनीश की बिटिया का विवाह होना है बाईस अप्रेल को। तिलक 17 अप्रेल को है टेला गांव में। टेला मेरे गांव से पचास किलोमीटर की दूरी पर। वहां जाने में, सिवाय वैशाख की गर्मी के, ज्यादा असुविधा नहीं है। तीन चार घण्टे का समय निकालना है। मैंने कहा कि मैं टेला पंहुचूंगा। रजनीश ने मुझे टेला के आयोजन स्थल – लाल चंद्र मिश्र जी के घर – का गूगल मैप पर लोकेशन प्रेषित कर दिया।

अपने घर से निकल कर नेशनल हाईवे पकड़ जंगीगंज तक की यात्रा उस फिर टेला के लिये किसी स्थान धनतुलसी होते हुये ग्रामीण सड़क पर चलना। कहीं कोई दिक्कत नहीं हुई। दिक्कत केवल लाल चंद्र जी के घर पंहुचने में हुई। गूगल वाली महिला ने घर की जीपीएस लोकेशन के अनुसार एक पगडण्डी नुमा सड़क पर कार घुसवा दी। केवल झोपड़ियां थीं वहां। एक दो पक्के घर भी जो थे, वे प्रधानमंत्री आवास योजना के पैसे से बने नजर आ रहे थे। पगडण्डी भी इतनी खराब थी कि मेरी छोटी कार लगा कि कहीं पलट न जाये। रोक कर एक महिला से लालचंद्र जी के घर का रास्ता पूछा तो उसने हाथ से दिखा कर करीब दो-तीन सौ मीटर दूर घर दिखाया। पर वहां जाने के लिये रास्ता था नहीं साइकिल या पैदल जाया जा सकता था। गूगल वाली महिला सन्न मार गयी थी। उसके अनुसार (शायद) गूगल का काम खत्म हो गया था।

जहां पंहुचे थे, वहां कार मोड़ने की भी जगह नहीं थी। अभिमन्यु या अंगद की सी दशा। बैकट्रेक करना कठिन काम। गुलाब (मेरे ड्राइवर साहब) ने किसी तरह मेरी साबुनदानी नुमा कार -ऑल्टो के-10 – बैक की। उसके बाद लालचंद्र मिश्र जी का घर कम से कम पांच लोगों से पूछते हुये नियत घर पर पंहुचे।

मिश्र जी के अहाता में घुसते ही तेज आवाज में लाउडस्पीकर पर गायन सुनाई पड़ा – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। यह कोई रिकार्ड नहीं बज रहा था। बाकायदा आरकेस्ट्रा का इंतजाम था। मंच पर म्यूजिकल तामझाम के साथ एक खुले केश वाली महिला हाथ में माइक थामे, फुल कॉन्फीडेंस में गा रही थी।

जीपीएस पर, गूगल पर और गूगल वाली महिला – गूगलाइन – पर यकीन तो करना चाहिये पर नुक्कड़ पर यूंही समय गुजारते, इंदारा पर पानी खींचते या मचिया पर बैठे गपियाते लोगों के ईको-सिस्टम की अनदेखी कर नहीं। लास्ट माइल कनेक्टिविटी में गूगलाइन भाग खड़ी होती हैं। काम गांवदेहात के लोग ही आते हैं – “इहई खड़ंजा पकड़े चला जा। ओकरे बाद पीपर के पेड़े के बगलियां से जायअ। अनुपम क घर पूंछि लेह्यअ…” पता नहीं गूगलाइन कब यह भाषा बोलना सीखेगी। गूगलाइन और गांवगिरांव की गोमतिया जब एक जैसे तरीके से और एक जैसी टोन में निर्देश देने में सक्षम होंगी, तभी भारत में आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस सफल माना जायेगा। :lol:

आश्चर्य और शॉक अभी और भी मिलने थे। मिश्र जी के अहाता में घुसते ही तेज आवाज में लाउडस्पीकर पर गायन सुनाई पड़ा – रेलिया बैरन पिया को लिये जाये रे। यह कोई रिकार्ड नहीं बज रहा था। बाकायदा आरकेस्ट्रा का इंतजाम था। मंच पर म्यूजिकल तामझाम के साथ एक खुले केश वाली महिला हाथ में माइक थामे, फुल कॉन्फीडेंस में गा रही थी। बहुत कुछ वह अंदाज जैसा मनोरंजन वाले टीवी चैनलों पर नयी प्रतिभायें दिखाती हों। मुझे अपनी पत्नीजी का ऑफ्ट-रिपीटेड कहना याद हो आया – “मेरे बब्बा होते तो यह सब देख कर गोली मार देते!”

घर के अहाते के खुले में नाश्ता, बातचीत, पैलगी-आशीर्वाद का दौर पूरा हुआ

बब्बा को गये तीन दशक हो गये हैं। दो पीढ़ियाँ जन्म ले चुकी हैं उनके बाद। गांवदेहात बहुत तेजी से बदल रहा है। पर तब भी; इतनी मशक्कत कर अगर गंगा किनारे के इस गांव टेला में न आया होता तो यह अनुभव कहां पाता?! अपने घर से जिसे निकलने में कष्ट हो, उसे 50 किमी दूर किसी जगह जाना हो तो वह मशक्कत ही तो है?!

आंगन में बांस, हल, मूसल, चकरी आदि शुभकार्य के प्रतीक जमा थे। पण्डित लोग जम गये थे। बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि पण्डित मंत्रोच्चार टर्राना शुरू करेंं तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो। पूरी तरह एथेनिक वातावरण।

घर के अहाते के खुले में नाश्ता, बातचीत, पैलगी-आशीर्वाद का दौर पूरा हुआ और उसके बाद तिलक लगने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। लालचंद्र मिश्र जी के घर के आंगन में सब पंहुचे। आंगन मीडियम साइज का था। उसके गच्चे पर स्टील की पट्टियां लगीं थी। कोई उससे नीचे नहीं गिर सकता था और पूरी छत का उपयोग भी हो सकता था। नीचे आंगन में बांस, हल, मूसल, चकरी आदि शुभकार्य के प्रतीक जमा थे। पण्डित लोग जम गये थे। बांयी ओर ओसारे में महिलायें तैनात थींं कि पण्डित मंत्रोच्चार टर्राना शुरू करेंं तो उनकी गारी का गायन प्रारम्भ हो। पूरी तरह एथेनिक वातावरण। हजार साल पहले भी कमोबेश यही सीन हुआ करता रहा होगा। थोड़ा बदलाव यह था कि हर कोई अपने मोबाइल थामे कैमरामैन का रोल अदा कर रहा था। और फ्लैश वाले, कैमरा लटकाये भी कई थे – चारपांच रहे होंगे। डिजिटल युग में फोटो खींचना, वीडियो बनाना बांये हाथ का खेल हो गया है। एक दशक में लोग मूवी बनाने में भी सिद्धहस्थ हो जायेंगे। घर घर वीडियोग्राफी होगी और लेखक लोग किताब लिखने की बजाय गांवदेहात के तिलक, शादी, तेरही आदि की फिल्मोग्राफी के स्क्रिप्ट बेंंचा करेंगे।

विनोद मुझे टोकते हैं – “देखो, अब असली माल-ताल दिया जा रहा है, अब फोटो लीजिये। बैठे बैठे फोटो नहीं आयेगा, तन्नी खड़े हो कर लेना पड़ेगा।” मैं देखता हूं कि एक साथ चारों ईवेंट फोटो/वीडियोग्राफर “माल-ताल” पर ही फोकस किये हैं। फ्लैश वाले भी उसी पर फ्लैश चमकाये जा रहे हैं। शादी गौण है, लड़का-लड़की गौण हैं। असली सत्य ‘माल-ताल’ है। यही ब्रह्म विद्या है, यही ब्रह्मज्ञान है! :-D

एक फोटोग्राफर को मैं कोई काम का जंतु लगा हूँगा, सो वह मेरा चित्र खींचने आ गया। उसके उलट, मैंने उसका चित्र खींचने के लिये मोबाइल सेट किया तो वह लजा गया। फोटो खींचने वाले का ही फोटो खींचना बड़ा रोचक कृत्य है। बंदा किस तरह से अपनी एक आंख बंद करता है; उसके मुंह की पेशियां किस तरह से सिकुड़ती हैं – यह ठीक से रिकॉर्ड करना एक बढ़िया चित्र बन सकता है। पर मुझमें वह कला नहीं और रात आसन्न थी, तो रोशनी का भी सहारा नहीं था। फिर भी चित्र लिया तो सही।

तिलक कितना चढ़ा? यह मुख्य चर्चा होती है। सब कुछ सबके सामने खोल कर रखा, दिखाया जाता है। मेरे पास बैठे, मेरे गांव सुकुलपुर के विनोद मुझे टोकते हैं – “देखो, अब असली माल-ताल दिया जा रहा है, अब फोटो लीजिये। बैठे बैठे फोटो नहीं आयेगा, तन्नी खड़े हो कर लेना पड़ेगा।” मैं देखता हूं कि एक साथ चारों ईवेंट फोटो/वीडियोग्राफर “माल-ताल” पर ही फोकस किये हैं। फ्लैश वाले भी उसी पर फ्लैश चमकाये जा रहे हैं। शादी गौण है, लड़का-लड़की गौण हैं। असली सत्य ‘माल-ताल’ है। यही ब्रह्म विद्या है, यही ब्रह्मज्ञान है! :-D

तिलक संस्कार पर कल एक स्टेटस भेजा था मैंने। उसपर एक टिप्पणी सटीक थी तिलक के बदलते स्वरूप पर। तिलक कितना वही है और कितना बदला है समय के साथ –

तिलक का बदलाव – ट्विटर पर टिप्पणी

तिलक अनुष्ठान सम्पन्न होने पर भोजन पर टूटा गया। भोजन व्यवस्था उम्दा थी। ज्यादा खा नहीं पाया। मेरे ड्राइवर साहब ने बताया – “गुलाबजामुन थी, गाजर का हलवा भी और ऊपर से आईसक्रीम। हम त तिन्नो खाये।” खैर, मैंने दोसा खा कर ही संतोष किया। जब जठराग्नि प्रबल थी, तब तिलक जैसे समारोह के लिये समय नहीं था। अब जब नापतोल कर भोजन करना होता है तो गुलाबजामुन, गाजर का हलवा और आईसक्रीम सब की बात ललचाती भर है। भाग्य में तो स्वल्पाहार और रात में बिना भूले ईसबगोल का सेवन ही है।

घर आ कर ब्ल्यू-जोंस वाली साइट पर Life Expectancy Test का दो साल बाद रिपीट करता हूं। उसके अनुसार मेरी लाइफ एक्स्पेण्टेन्सी डेढ़ साल बढ़ गयी है। अगर मैं अपनी “आदतें” सुधार लूं तो तेरह साल और जी सकता हूं।

सो अब जिंदगी तिलकही अटेण्ड करने, भोजन पर लगाम रखने और “आदतें” सुधारने में ही लगानी है। वही कर रहा हूं। आपको भी देर सबेर वही करना होगा! :-)


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