घोघावदर-गोण्डल से जेतलसर, और आगे


5 दिसम्बर 21, रात्रि –

खराब अनुभव था आज का। प्रेमसागर घोघावदर से समय से निकल लिये थे। सवेरे सात बजे मुझसे बात किया तो सड़क किनारे चाय वाले की टेबल के पास बैठे थे। दिन की पहली चाय होगी। यह भी सम्भव है दूसरी हो। सवेरे के दो ढाई घण्टे में सिगरेट पीने वाला कितनी सिगरेट पीता है, या सुरती खाने वाला कितनी सुरती ठोंकता है? उतनी चाय प्रेमसागर की होती होगी। महादेव का भगत चाय के अलावा और कोई नशा न करे; यह देख कर महादेव खूब कोसते (?) होंगे। नाम खराब करता है यह भगत शैव सम्प्रदाय का।

शंकर जी खुद नशा नहीं करते थे, यह प्रेमसागर की थ्योरी है जो रामदेव पीर बाबा के पहले आश्रम में रामगिरी बाबा को सुना रहे थे। कोई शिवपुराण का उद्धरण। मुझे भी बताया उन्होने। पर पुराण-उराण में मेरी अंधश्रद्धा नहीं है। मुझे लगता है उसमें जनता को पटाने-भरमाने के लिये ब्राह्मणों ने जम कर कहानियाँ बना बना कर ठेल रखी हैं। उसमें से तत्वज्ञान का नवनीत निकालने के लिये उतनी मशक्कत करनी पड़ती है जितना सर्दी के मौसम में मथनी ले कर महिलायें दूध के साथ करती हैं। लेकिन मैं प्रेमसागर का पक्ष लेते हुये यह मान लेता हूं कि आम धारणा के विपरीत शंकर भगवान नशा नहीं करते होंगे। हां, सती की देह ले कर वे पूरे देश भर में घूमे तो असम में, कामाख्या में, चाय जरूर पीना शुरू कर दिये होंगे। वही अनुशासन प्रेमसागर पालन कर रहे हैं।

सड़क किनारे की चाय की टेबल का वह फोटो मुझे बढ़िया लगा।

सड़क किनारे की चाय की टेबल का एक चित्र भेजा। वह फोटो मुझे बढ़िया लगा। सवेरे की सूरज की रोशनी का पूरा लाभ लेते हुये खींचा होता तो और शानदार होता। गुज्जू रोडसाइड ऑन्त्रेपिन्योरशिप का बढ़िया आईकॉन है यह! और चाय की दुकान का सभी जरूरी सामान है टेबल पर या टेबल के नीचे। एक फोटो उस चायवाले की भी आ जाती अगर उलटी ओर से सड़क की तरफ से चित्र खींचे होते प्रेमसागर!

श्री गोण्डल पांजरापोल (गौशाला)

प्रेमसागर को गोण्डल पंहुचने में ज्यादा समय नहीं लगा होगा। वहां के पांजरापोल (गौशाला) के चित्र का टाइम स्टैम्प 08:34 बजे का है। गोण्डल में घुसते समय उन्होने भादर नदी का पुल पार किया। यूं लगता है पूरे इलाके, राजकोट-बोटाड में भादर ही नदी है। वही घूम फिर कर जहां तहां मिलती दिखती है। नदी का पाट यहां काफी है और उसके हिसाब से पानी कम। भादर पर दो जलाशय भी बने हुये हैं। उनमें जल संचय किया जाता होगा और सिंचाई के काम आता होगा। सौराष्ट्र की गंगा लगती है भादर नदी। ॐ नमो भादरायै नम:!

गोण्डल में प्रवेश के समय पड़ी भादर नदी

नदियों में जल है और जल में देसी-प्रवासी पक्षी भी खूब दिखते हैं। हंस, जिन्हें प्रेमसागर अपने इलाके में गरुण जी कहते हैं भी दिखे। पक्षी यहां – लोगों की सहिष्णु प्रकृति के कारण निर्भय लगते हैं। प्रेमसागर ने बताया कि एक तोता तो उनके कंधे पर बड़ी सहजता से आ कर बैठ गया था। यह प्रेमसागर की प्रकृति पहचान कर हुआ या सामान्य मानव स्वभाव पर पक्षियों की धारणा – कहा नहीं जा सकता। विचित्र तो लगा कि कोई पक्षी अपने से कंधे पर आ कर बैठ जाये।

भादर का पुल। आगे की बस पर स्वच्छता का नारा लिखा है।

भादर नदी के पुल पर वे चढ़ ही रहे थे कि दूसरी ओर से आता एक आदमी उनसे बोला कि उसे दस रुपये चाहियें। उसने कुछ खाया नहीं है और बहुत तेज भूख लगी है। उसे दस रुपये देते समय प्रेमसागर ने पूछा कि और चाहिये तो बोलो। पर आदमी दस रुपये से ही संतुष्ट था। कहा कि उतने से ही उसका काम चल जायेगा। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसी घटनाओं को मैं सामान्य बुद्धि से लूं और उनका विश्लेषण करूं या उन्हें धर्म और महादेव से जोड़ूं। इस पूरी यात्रा को मैं बहुत भक्ति भाव से या मिराकेल की दृष्टि से नहीं ले रहा हूं। पर कई घटनायें सामान्य अनास्था से नहीं समझी जा सकतीं; वैसा भी लगता है। यह भी लगता है कि त्वरित विचार बना लेना या व्यक्त कर देना अधिक सही नहीं होगा। यात्रा की समप्ति – तार्किक समाप्ति पर आकस्मिक पूरा होने पर – समग्रता में जो विचार बनेंगे, वे ज्यादा ठोस होंगे। बीच बीच में निष्कर्ष अधपके हो सकते हैं। बीच में जो जैसे घटित हो रहा है उसे वैसे ही इस ट्रेवल-ब्लॉग में रख देना ज्यादा सही होगा।

जल की बात की जाये। सौराष्ट्र की जो भी नदियां हैं उनके जल का जितना सम्भव हुआ, दोहन किया गया है समाज और खेती तो जीवन देने में। सौराष्ट्र में नर्मदा माई का जल भी आया है, नहरों के माध्यम से। जल से समृद्धि आयी है या समृद्धि से जल को खींच लाने की जुगत बनी है यह कैच-22 टाइप सवाल हो सकता है। पर जल का किफायती प्रयोग, जल की इज्जत और समृद्धि साथ साथ हैं – इसको नकारा नहीं जा सकता।

गोण्डल बड़ी जगह है। उसे पार करने में प्रेमसागर को घण्टा भर लगा होगा। पर केवल भादर या पिंजरापोल के चित्र के अलावा कोई चित्र प्रेमसागर ने नहीं लिये। मैंने उनसे पूछा कि वहां रुके नहीं क्या चाय के लिये?

“नहीं भईया। काहे कि वह जगह गंदी थी। सड़क किनारे कचरा फेंका हुआ था। उसी में दो तीन मरे कुत्ते की लाशें भी फेंकी हुई थीं। कचरे के ढेर पर लोग अपना कचरा भी फेंकते हुये दिखे। जो जगह साफ न हो, वहां बैठने का मन नहीं हुआ।” – प्रेमसागर ने बताया।

गोण्डल रियासत थी। बड़ी रियासत। नगरपालिका है यहां पर और जैसा प्रेमसागर ने बताया कि अक्षम नगरपालिका होगी। गुजरात के नरेंद्रभाई मोदी जो पूरे भारत में स्वच्छ भारत का संदेश पंहुचा रहे हैं; उन्हीं के गोण्डल में सड़क किनारे मरे कुत्ते और कचरा फैंका है। प्रेमसागर से यह सुन कर मन खराब हुआ। पर प्रेमसागर ने यह जरूर कहा कि उन्होने गोण्डल के अलावा किसी जगह पर ऐसी गंदगी नहीं दिखी। पूरे गोण्डल शहर में, जहां से प्रेमसागर गुजरे, सफाई का स्तर अच्छा नहीं था।

वीरपुर – अंतत: एक गेस्ट हाउस में 400 रुपये में कमरा मिला।

शाम के समय वीरपुर पंहुचने के पहले ही प्रेमसागर रात गुजारने का ठिकाना तलाशने लगे थे। पर कहीं कोई मंदिर-धर्मशाला में स्थान नहीं मिला। जलाराम बापा का मंदिर था, पर वहां भी रहने की व्यवस्था नहीं हुई। अंतत: एक गेस्ट हाउस में 400 रुपये में कमरा मिला। बाहर वे भोजन कर आये और गेस्ट हाउस में दूध मंगाया। “कभी कभी खर्चा भी करना चाहिये, भईया।”; प्रेमसागर ने कहा। पर उनके कहे से यह जरूर लगता था कि इस तरह खर्च कर यात्रा करने को रोज रोज सम्भाल पाना कठिन होगा।

“पोरबंदर से दिलीप जी का फोन था। वे ट्विटर के जरीये जानते हैं। उन्होने पैसे भेजने की बात कही। मैंने मना किया। मेन बात है भईया कि पैसा मांगने से अपने को भिक्षुक के स्तर पर उतारना पड़ता है। वह ठीक नहीं लगता।” – प्रेमसागर ने अपना पक्ष रखा। वे कांवर यात्रा में सहायता स्वीकार कर रहे हैं। सहर्ष। कृतज्ञ भी होंगे लोगों के। पर मांगने में जो अपने को दयनीय बनाना होता है, वह वे नहीं चाहते। कुछ लोगों को यह अटपटा लग सकता है या इसे हिपोक्रसी या पाखण्ड मानते हों; पर मुझे यह सही, सहज और स्वीकार्य व्यवहार लगता है।

6 दिसम्बर 21, रात्रि –

सवेरे चाय की पहली जगह

सवेरे समय पर – पांच बजे निकल लिये प्रेमसागर। जेतपुर 13-14 किमी दूर था और जेतलसर 20 किलोमीटर के आसपास। मैंने उन्हें सुझाया कि जेतपुर के बाद से ही वे देखना शुरू कर दें कि कौन सी जगह पर रुका जा सकता है। रास्ते के सभी मंदिर और धर्मशालायें टटोलना प्ररम्भ कर दें। जेतलसर तक तो कुछ न कुछ इंतजाम हो ही जायेगा। जेतलसर बड़ी जगह है। रेलवे का जन्क्शन भी है। शायद अश्विनी पण्ड्या जी, जो इस क्षेत्र के रेल मण्डल परिचालन प्रबंधक रह चुके हैं, वे भी सहायता कर सकें।

और अश्विनी जी सहायता करने में समर्थ निकले। उन्होने जेतलसर के आगे एक आश्रम में रहने और भोजन का इन्तजाम कर दिया। जेतलसर के लिये प्रेमसागार को बीस-इक्कीस किलोमीटर चलना था; पर आगे आश्रम तक जाने के लिये उन्हें 28 किलोमीटर चलना पड़ा। साढ़े पांच बजे शाम के समय वे आश्रम पर पंहुचे।

यह आश्रम कोई गंगा अमर आश्रम, सतगुरु धाम है। चित्रों में परिसर बहुत बड़ा लगता है। सीताराम बापू की स्मृति में बना भवन है। प्रेमसागर के एक चित्र में वे आश्रम मंदिर के सामने कुर्सी पर पालथी मार कर बैठे हैं।

[गंगामाँ अमर आश्रम के चित्र]

रास्ते में चार लेन की सड़क थी और बीच में डिवाइडर पर कनेर और अलमाण्डा के फूलोंं के झाड़िया भी लगी थीं। पूरे भारत वर्ष की तरह यहां भी सड़क के चौड़ा किये जाने में पेड़ कटे होंगे और जो लगाये गये हैं वे कनेर और अलमाण्डा के बौने झाड़ ही हैं। गिनती में वृक्षारोपण पहले जितना हो गया है पर बड़े पेड़ गायब हो गये हैं।

रास्ते में चार लेन की सड़क थी और बीच में डिवाइडर पर कनेर और अलमाण्डा के फूलोंं के झाड़िया भी लगी थीं।

आज रास्ते में प्रेमसागर को पांच छ लोगों का जत्था मिला जो किसी माता जी के दर्शन के लिये पदयात्रा कर रहा था। अकेले प्रेमसागार को पा कर वे चंदे के लिये ज्यादा ही नीछने लगे। प्रेमसागर ने उन्हे 50 रुपये दिये पर पचास रुपये पा कर वे और भी देने की जिद करने लगे। “भईया, मुझे जोर दे कर कहना पड़ा कि मांगने के लिये पीछे पड़ गये हैं तब आप तीर्थ यात्री कम हैं, भिखमंगे ज्यादा हैं।”उसके बाद प्रेमसागर ने मौन धारण कर लिया और मुश्किल से उन तंग करने वाले धर्म ध्वजा धारियों से पीछा छुड़ाया।

गोण्डल की गंदगी और इन तीर्थ पदयात्रियों की तंग करने की प्रवृत्ति ने सौराष्ट्र में जो सुखद अनुभवों का गुलदस्ता बन रहा था और जिसे ले कर प्रेमसागर खूब मगन थे, उसमें से कुछ पुष्प नोच लिये।

आगे लगभग 100 किलोमीटर और बचे हैं वेरावल/सोमनाथ पंहुचने में। देखें आगे क्या अनुभव होते हैं। अभी तक ‘मोटामोटी’ सब ठीक ठाक चलता आया है। महादेव चाहेंगे तो आगे भी होगा। बीच बीच में कभी कभी महादेव लोड टेस्ट करेंगे प्रेमसागर की आस्था और संकल्प दृढ़ता का। पर यहां इस भाग में इतने शुभचिंतक हो गये हैं प्रेमसागर के कि उनका काम चलता जायेगा।

हर हर महादेव। जय सोमनाथ।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

गुक्खल


एक चार बाई चार फुट का प्लाई बोर्ड खरीदा था महराजगंज मार्केट से। वह मेरी साबुनदानी जैसी छोटी कार में किसी भी तरह अंटा नहीं। झल्ला कर दुकान वाले को एक ठेला/सगड़ी वाले को बुलाने को कहा। उसके लिये गुक्खल आये। मैंने मोलभाव नहीं किया। पचास साठ पर सगड़ी वाले आया करते थे सामान ले कर; गुक्खल ने 100 मांगे तो उनकी उम्र देख कर वही मान लिया मैंने।

उम्रदराज थे गुक्खल पर बहुत तेजी से तीन किलोमीटर दूर मेरे घर पंहुच गये। शक्ल ध्यान से देख मुझे लगा कि ब्लॉग लेखन के लिये एक सही पात्र हैं। उन्हें पीने मे लिये मीठा-पानी दिया। मैंने देखा कि हमारी ग्लास से उन्होने अपनी सगड़ी के नीचे लटकाई थैली में से अपनी ग्लास और पानी की बोतल निकाल कर पहले हाथ मुंह धो कुल्ला किया। उसके बाद अपनी ग्लास धो उसी में पानी उंड़ेल कर पिया।

उम्रदराज थे गुक्खल पर बहुत तेजी से तीन किलोमीटर दूर मेरे घर पंहुच गये। शक्ल ध्यान से देख मुझे लगा कि ब्लॉग लेखन के लिये एक सही पात्र हैं।

मिठाई खाते खाते बताये कि रैदासी सम्प्रदाय से हैं वे। दीक्षा लेने के लिये खुद और माता पिता को साथ ले कर सचखण्ड, पंजाब हो आये हैं। सम्प्रदाय के लोगों के सतसंग आसपास – इलाहाबाद, जौनपुर आदि जगहों पर होते रहते हैं तो वहां भी जाते हैं। जब तक माता पिता जिंदा थे, तब तक उन्हे साथ ले कर जाते थे। अब दोनो नहीं रहे तो अकेले जाते हैं।

“अपनी माँ को उठा कर गिरनार की 10099 सीढ़ियाँ चढ़ कर जूनागढ़ में हो आया हूं। माँ को सुदामापुरी द्वारका, बेट द्वारका आदि दिखा लाया था।” – गुक्खल अपनी यात्राओं के बारे में बताते हैं।

चार लड़के हैं गुक्खल के। “चारों एक से बढ़ कर एक कारीगर हैं। एक ढलाई (उपकरण की casting) करता है, दूसरा लेथ मशीन पर काम करता है – पुर्जे को सही शेप दे कर मशीन में फिट करता है। तीसरा सिलाई करता है। वह भी टॉप का कारीगर है। आजकल आया हुआ है। समधा में मेरी मामी से दो बिस्सा जमीन ले कर घर बनवा रहा है। चौथा नम्बर अरब में है। वह भी अच्छा कमाता है।”

मुझे आश्चर्य हुआ – “जब चारों बेटे अच्छा कमाते हैं तो तुम्हे सगड़ी चलाने की क्या जरूरत है?”

“हमसे घर में बैठा नहीं जाता न बाबू! इसलिये काम करते हैं। नहीं तो जरूरत थोड़े ही है।” – गुक्खल ने जवाब दिया।

गुक्खल

एक और आश्चर्य की बात हुई यह। जहां पूरा समाज निठल्ले-निकम्मे लोगों से अंटा पड़ा है वहां यह उम्रदराज आदमी यह कहता है कि वह श्रम इसलिये करता है कि यूं ही बैठे नहीं रहा जाता उससे।

उसे 100 रुपये देने थे। मेरे पास 500 का नोट था। अपने वाहन चालक को मैंने कहा कि वह खुल्ला करा लाये। पर गुक्खल बोले कि खुल्ले उनके पास हैं। उन्होने अपने कोट और स्वेटर के नीचे कमीज की जेब में एक पॉलीथीन की तह लगाई पन्नी निकाली। उसका रबर बैण्ड खोला। उसमें तह लगा कर हजार डेढ़ हजार रुपये थे। मुझे उन्होने खुल्ले चार सौ दिये। चार सौ में दस का एक नोट बड़ा पुराना था, गंदा था। मैंने वह उन्हे वापस दे दिया – लो यह भी रख लो। इस तरह कुल 110 रुपये दिये गुक्खल को। उनकी रामकहानी सुन कर उन्हे देना अखरा नहीं।

यह मुझे बहुत अच्छा लगा कि गुक्खल इसलिये काम करते हैं कि उनसे बिना काम किये बैठा नहीं जाता!

घर से वापस जाते हुये गुक्खल

मोटा दड़वा से घोघावदर


4 दिसम्बर 21, रात्रि –

घोघावदर गोण्डल के पहले बड़ा गांव है। प्रेमसागार को अपने बीस किलोमीटर चलने के अनुशासन के अनुसार वह स्थान सही पड़ता है। किसी के घर पर रुकना नियत था, पर प्रेमसागर ने रामदेवबाबा पीर के मंदिर में रुकना बेहतर समझा। रास्ते में सदा की तरह कुछ मंदिर, कुछ नदियां, कुछ खेत और कुछ चाय की दुकानें मिलीं जिनके बारे में लिये चित्र मेरे पास उन्होने भेजे।

कंवेक्शन ट्यूब युक्त सोलर गीजर। ट्यूब से कोई द्रव पानी के ड्रम पर गुजर कर उसे गर्म करता है।

सवेरे निकलते ही उनका ध्यान कहीं सोलर गीजर पर गया। एक सामान्य डिजाइन है जिसमें सोलर समांतर ट्यूब के एक कोने पर एक बेलनाकार पीपा है जिसमें गर्म पानी पाइप के माध्यम से घर या संस्थान के बाकी हिस्सों में ले जाया जाता है। प्रेमसागर के हिसाब से बीस-तीस हजार की लागत आती है। मोटा दड़वा के घरों में भी लगे हैं – यह बड़ी बात है। गुजरात के गांवों में भी सौर ऊर्जा का प्रयोग व्यापक हो गया है। मैंने तो यहां अपने घर में जब 2 केवीए का सोलर सिस्टम लगाया तो उसे आसपास के गांवों में पिछले छ साल में किसी ने रिप्लीकेट नहीं किया है। अधिक से अधिक यहां कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्स के तहद कुछ सोलर लाइटें लगीं, जिनकी घटिया बैटरी दो साल में बैठ गयी। आज चार साल बाद उनमें सो शायद ही कोई जलती हो। CSR के माध्यम से खैरात बांट कर लोगों को ऊर्जा की हरित क्रांति नहीं सिखाई जा सकती। उसके लिये गुजराती व्यवसायिक मानसिकता विकसित करनी जरूरी है।

यह सोलर गीजर देख कर मन ललच रहा है कि एक ठो गीजर भी घर में लगवा लिया जाये।

प्रेमसागर कांवर देशाटन कर जब लौटें तो शायद अपने गांव देवरिया-गोरखपुर में वह कल्चर लोगों को दे सकें। पर उससे पहले उन्हें अपना खुद का मानस खोलना होगा। और वह वे कर ही रहे होंगे।

डा. अभि के साथ प्रेमसागर। बीच में हैं सुदेश भाई।

प्रेम सागर ने निकलते ही एक मंदिर के दर्शन किये। वहां मंदिर की खासियत यह है कि चारों धाम की यात्रा कर लौटे लोग उस मंदिर में जरूर जाते हैं, अन्यथा “चारों धाम का पुण्य” फलित नहीं होता; ऐसा वहां लोग कहते/मानते हैं। मंदिर के कर्ता-धर्ता डा. अभि जी ने उन्हें मंदिर की महिमा बताई, चाय पिलाई और दर्शन भी कराये। उन्होने उन्हें उनकी जांघों की मांसपेशियों के खिंचाव के लिये – जो लम्बा चलने के कारण उन्हे बहुधा हो जाता है – एक दवाई और एक तेल भी दिया। तेल सरसों, तिल और गुड़ की डली को पका कर बनाया जाता है। उससे उनको जांघ और पैर में मालिश करने को कहा है।

डा. अभि के पिता श्री अगर दास गोंडलिया जी की लिखी पुस्तकें

उनके पिताजी ने पांच पुस्तकें लिखी हैं गुजराती में। उनमें से तीन उन्होने प्रेमसागर को दीं। प्रेमसागर ने बताया कि धीरे धीरे वे गुजराती बोलना-समझना और लिपि पढ़ना सीख रहे हैं। गुजरात यात्रा में अभी महीना भर लगेगा। ताब तक कामचलाऊ गुजराती उन्हे आ जानी चाहिये। तब तक इन पुस्तकों को वे सरसरी निगाह से (कम से कम) पढ़ ही लेंगे; ऐसी आशा की जानी चाहिये। सौराष्ट्र के अन्चल में पांच पुस्तकों के लेखक हैं – यह बड़ी बात है। उनके मंदिर में कुछ औषधीय पौधे और वृक्ष भी हैं, जिनके चित्र प्रेमसागर ने लिये।

[मंदिर परिसर में उगाये औषधीय पौधे]

प्रेमसागर को एक पौधा – बेल या लता दिखी शिवलिंगी। उसका फल शिवलिंग के आकार का होता है।

कल प्रेमसागर को राजघराने के लोग मिले थे। ये लोग किसानी- डेयरी आदि का काम करते हैं। कुछ और व्यवसाय भी हैं। गांव के लिहाज से सम्पन्न कहे जा सकते हैं। उनके घरों में तलवार-ढाल के चिन्ह उनकी दीवारों पर टंगे हैं। प्रेम सागर ने कहा कि इन सबके चित्र उन्होने भेजे हैं। पर मंदिर, औषधीय पौधों, डा. अभि या अन्य लोगों और शिवलिंगी के चित्र मुझे नजर नहीं आये उनके चित्रों के हुजूम में।

कुल मिला कर मोटा दड़वा के आसपास के ही अनेक अनुभव प्रेमसागर ने सवेरे पौने नौ बजे चलते चलते मुझे गिना दिये। आजकल वे मोबाइल जेब में रख कर, ब्लू-टूथ स्पीकर से कॉल अटेण्ड करते बोलते बतियाते चलते हैं। उनके हाथ फ्री रहते हैं। दो तीन महीने में तकनीकी रूप से एडवांस हो गये हैं, प्रेमसागर पहले की अपेक्षा। कहीं ज्यादा प्रगतिशील कांवरिया!

रास्ते में प्रेमसागर को कई नदियां मिलीं। चित्रों में वे बड़ी लगती हैं। उनमें पानी भी पर्याप्त है। पर उनके रास्ते में कोई नदी नक्शे में नजर नहीं आयी। आंचलिक क्षेत्र का गूगल मैप इस मामले में कमजोर प्रतीत होता है। उन नदियों में पक्षी भी बहुत हैं। कुछ प्रवासी पक्षी दिखते हैं।

दोपहर में प्रेमसागर कहीं सो गये। तीन बजे उठ कर फिर चलना शुरू किये और शाम छ बजे घोघावदर में रामदेव बाबा पीर के एक मंदिर में अपने लिये तलाश चुके थे। रात यहीं गुजार कर कल वे वीरपुर के लिये रवाना होंगे।

हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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