प्रेमसागर जी को लह गया नया स्मार्टफोन!


आज नया स्मार्टफोन मिल जाने से उनकी नोकिया के बूढ़े, चार इंच के स्मार्ट(?) फोन के धुंधले चित्र से निजात मिली। उन चित्रों को मुझे बहुत एडिट करना पड़ता था…

सुधीर पाण्डेय

कल सुधीर जी के सौजन्य से प्रेमसागर जी को अपनी यात्रा सुगम और सुप्रसारित करने हेतु एक नया स्मार्टफोन मिल गया। सुधीर जी ने ही कुछ दिन पहले उन्हें एक फीचर फोन और पावरबैंक खरीदवाया था। उससे उनकी फोन की बैटरी डिस्चार्ज होने की समस्या हल हो गयी थी।

आज नया स्मार्टफोन मिल जाने से उनकी नोकिया के बूढ़े, चार इंच के स्मार्ट(?) फोन के धुंधले चित्र से निजात मिली। उन चित्रों को मुझे बहुत एडिट करना पड़ता था और तब भी धुंधलापन दूर न होने के कारण उनका पेण्टिंग टाइप संस्करण बनाना होता था। अब वह नहीं करना होगा।

सुधीर जी को प्रेम सागर धन्यवाद दे ही रहे होंगे; मैं भी धन्यवाद देता हूं – दिल के कोर से!

प्रेम सागर पाण्डेय, छाता वाले की दुकान खुलने की प्रतीक्षा करते हुये।

आज सवेरे प्रेमसागर जी, बावजूद इसके कि बारिश जारी है, निकल लिये हैं अनूपपुर के लिये। सात किलोमीटर चल लिये थे जब सात-आठ के बीच उनका फोन आया। बारिश शुरू हो गयी थी। एक छाता वाले की दुकान के बाहर बैठे थे और दुकान खुलने का इंतजार कर रहे थे।

कल दिनेश कुमार शुक्ल जी ने फेसबुक पर टिप्पणी की थी – “रास्ते मे रेनकोट थोड़ा-बहुत ही बचत करेगा। भीगने से बचें। शुभयात्रा। हर हर महादेव।”

मैंने भी दिनेश जी की एडवाइजरी अपनी ओर से प्रेमसागर जी को दे दी। निकल तो वे लिये ही हैं। पर छाते का प्रयोग यात्रा के लिये नहीं, हल्की बारिश से बचने और कोई ठिकाना देखने-खोजने के लिये ही करेंं। छाता केवल सिर ही बचायेगा, पूरा शरीर तो भीगता रहेगा। और किसी पेड़ के नीचे शरण न लें।

खैर, प्रेमसागर जी का नया फोन आ गया है तो मुझमें भी उनके बारे में लिखने का उत्साह रहेगा। हर हर महादेव!

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मोबाइल वाले की दुकान पर प्रेमसागर और दुकानवाला।

अपडेट –

बारिश प्रचण्ड हो गयी। प्रेम सागर जी को वापस शहडोल लौटना पड़ा। उनका मैसेज आया –

आज ७ किलोमीटर चलने के बाद डिप्टी साहैब और मुंसी जी
का फोन आया कि महराज हम
आपके लेने के लिए आ रहे है
हमको आज लौटना पड़ा
हर हर महादेव।



संकल्पों की कसौटी पर जीवन कसते प्रेमसागर


अपने चलने के अनुशासन के बारे में प्रेमसागर बताते हैं कि घूमने की आदत उनकी पुरानी है, पर घूमना बढ़ा दिल की बीमारी से उबरने के बाद। मुझे कहते हैं – “मेन बात ये हुआ भईया कि उसके बाद भगवान पर मेरा विश्वास काफी बढ़ गया।”

प्रेम सागर सोलह साल के थे, जब उनकी माता मरणासन्न थीं। उनके पिता जी ने उनके बचने की आशा छोड़ कर उनके लिये लकड़ी आदि का इंतजाम कर लिया था। पड़ोस की एक महिला के कहने पर माँ के बचने के लिये उन्होने द्वादश-ज्योतिर्लिंग की कांवर अर्पण का संकल्प लिया। अपनी माँ के लिये उन्होने अपनी उम्र सोलह की बजाय अठारह बताते हुये अपना रक्त भी दिया। मां बच गयीं। और उसके बाद 28-29 साल और जी कर गयीं।

प्रेम सागर बताते हैं कि सोलह वर्ष की अवस्था में उन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग पदयात्रा के संकल्प की विराटता का आभास नहीं था। यह भी नहीं लगता था कि वैसा कुछ वे कर पायेंगे भी। समय बीतता गया; संकल्प शेष रहा। “अनजाने में लिये संकल्प के प्रति जिज्ञासा बढ़ती गयी।”

प्रेम सागर द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा के बारे में योजना तो आज से आठ नौ साल पहले बनाना शुरू कर दिये थे। उस समय उन्होने सोच लिया था कि बेटी की शादी हो जाये और बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जायें, तब वे यह यात्रा करने में देर नहीं करेंगे।

पर सब कुछ उनकी योजना के अनुसार नहीं हुआ। छ साल पहले उनका हृदय रोग उभरा। उनके ब्लॉकेज देखते हुये, संजय गांधी पी.जी.आई. में बाईपास सर्जरी ही एक मात्र निदान बताया गया। खर्चा करीब 5-6 लाख का अंदाज बैठा। प्रेम सागर के सामने अपनी बिटिया के विवाह की प्राथमिकता थी। उनके अनुसार अगर छ लाख इलाज पर खर्च हो जाता तो बिटिया का विवाह न हो पाता। उनका सौभाग्य था – और एक चमत्कार कि उन्हें लखनऊ के अस्पताल में कार्डियॉलॉजी के डाक्टर साहब मिल गये। उनकी कृपा से उनके सारे टेस्ट बिना पैसा खर्च किये हो गये। डाक्टर साहब ने उन्हें दवा भी मुफ्त में दी और जीवन का अनुशासन बताया। अंकुरित अन्न खाने को कहा और धीरे धीरे अपना पैदल चलना बढ़ाने को बोला। वह अनुशासन प्रेमसागर ने बड़ी कड़ाई से पालन किया। छ सात महीने बाद हुई जांच में पता चला कि उनका ब्लॉकेज मामूली बचा है। उसके बाद तीन महीने और बीते। फिर टेस्ट कराने पर डाक्टर साहब ने कहा कि जो 5-10 पर्सेण्ट ब्लॉकेज बचा है वह तो कोई खास बात नहीं है। वे अपनी सामान्य जिंदगी जी सकते हैं। बीमार होते समय तुरंत बाईपास सर्जरी का मामला था और प्रेमसागर छ मीटर भी चल नहीं पाते थे; पर इस अलग प्रकार से हुये इलाज से एक चमत्कार ही हुआ। प्रेमसागर ठीक हो गये। उससे उनका पैदल चलने का अनुशासन बन गया। वह समय के साथ प्रबलतर होता गया।

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वे उन डाक्टर साहब से उसके बाद मिलने का प्रयास किये। लखनऊ के अस्पताल में तीन बार गये पर वे डाक्टर साहब – ओम प्रकाश पाण्डेय जी – मिले ही नहीं। अस्पताल वालों से पता चला कि वे बाहर से विजटिंग डाक्टर के तौर पर आते थे पर फिर वे कहां गये, उनका पता कोई नहीं बता पाया। … प्रेम सागर के लिये वे शंकर जी की कृपा उनपर बरसाने आये और उसके बाद उनका पता नहीं चला!

अपने चलने के अनुशासन के बारे में प्रेमसागर बताते हैं कि घूमने की आदत उनकी पुरानी है, पर घूमना बढ़ा दिल की बीमारी से उबरने के बाद। मुझे कहते हैं – “मेन बात ये हुआ भईया कि उसके बाद भगवान पर मेरा विश्वास काफी बढ़ गया।”

सुल्तानगंज से देवघर

उनकी बिटिया की शादी में बहुत अड़चनें आ रही थीं। परिवार के लोगों का भी सहयोग नहीं मिल रहा था। तब उन्होने संकल्प लिया 101 बार बैजनाथधाम में जल चढ़ाने का। वे सप्ताह के काम के दिन जमशेदपुर में नौकरी करते। फिर शनिवार को ट्रेन पकड़ कर सुल्तानगंज जा कर रविवार की सुबह गंगाजल लेते और पैदल देवघर आ कर सोमवार को 12-1 बजे तक बैजनाथ जी को जल अर्पित करते। यह एक सौ एक बार किया। उसके बाद “सलामी” भी किया दो बार दण्ड भी किया। दण्ड में कांवर रास्ता लेट लेट कर तय किया जाता है। वह और भी कठिन कार्य है। वहां सुल्तानगंज से देवघर का रास्ता 105 किलोमीटर का है। एक दिन में तय करते थे। “पर मेन बात है कि रास्ता कच्चा है इसलिये चलने में दिक्कत नहीं होता था। पैदल चलने के लिये रास्ता जितना कच्चा हो, उतना बेहतर है।”

बैजनाथ धाम देवघर

प्रेम सागर बताते हैं कि जब यह 101 कांवर संकल्प लिया और देवघर के बैजनाथधाम में जल चढ़ाना प्रारम्भ किया तो आशातीत दैवीय परिवर्तन हुआ। बिटिया की शादी सहजता से हो गयी। संकल्प की कसौटी पर खरे उतरे प्रेम सागर!

उनकी माता, जो उनकी सोलह वर्ष की अवस्था में ही जाने वाली थीं; लम्बा जी कर आज से तीन साल पहले देह छोड़ी। उनका क्रियाकर्म भी उन्होने और अन्य दो भाइयों के सहयोग से सम्पन्न हुआ। बड़ा बेटा 21 साल का है और छोटा अठारह का। दोनो काम में लग गये हैं। बड़ा बेटा कहता है कि अभी तीन चार साल काम करने के बाद विवाह की सोचेगा। छोटे की शादी तो उसके बाद होनी है। अब सैंतालीस साल के हैं प्रेम सागर। उन्हें लगा कि यही उचित समय है सोलह वर्ष की उम्र में लिये संकल्प के लिये निकल लेने का। इसके बाद तो दम खम उतार पर होगा। तब के लिये उस संकल्प को स्थगित करना सही नहीं होगा।

महादेव! Photo by Suren Singh on Pexels.com

और इस कारण से निकल लिये हैं प्रेम सागर! चलते चले जा रहे हैंं। मैं प्रेम सागार जी से कुछ सवाल पूछता हूं।

“आपको यकीन है कि यह द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा पूरी कर लेंगे?”

“हण्ड्रेड टेन परसेण्ट यकीन है भईया। यकीन अपने पर नहीं, महादेव पर है। अपना क्या कहा जा सकता है? अगले क्षण सांस खत्म हो जाये। मेरा क्या गारण्टी है भईया, गारण्टी तो उनका है!”

“आप चले जा रहे हैं, पर कभी यह विचार नहीं आता कि इसमें असफल भी हो सकते हैं?” – मैं यकीन वाले सवाल को दूसरे तरह से पूछता हूं।

“असफलता का भय तो कभी भी मन में नहीं आया। नेगेटिविटी अगर मन में आयी तो समझो आदमी गया। तब वह चल ही नहीं पायेगा।” – प्रेम सागर वाजिब कारण बताते हैं अपने सफल होने के अटूट विश्वास का।

“अकेले चल रहे हैं। यह नहीं लगता कि एक ग्रुप होता, लोग साथ होते आपस में सहायता के लिये?” – मैं पूछता हूं।

“एक बात बतायें भईया कि काहे अकेले चलते हैं। साथ में कोई हो तो बातचीत में कभी दूसरे पर क्रोध या ईर्ष्या उठेगा ही। एक बार ईर्ष्या, क्रोध, गुस्सा आया तो सारी तपस्या मिट्टी में मिला देगा। अकेले चल कर अपने को उससे बचाता हूं मैं।”

महादेव पर अटूट श्रद्धा, संकल्प की कसौटी पर खुद को कसने का आत्मानुशासन और चमत्कारों पर यकीन – इसी के सहारे प्रेमसागर चलते चले जा रहे हैं। चरैवेति! चरैवेति!!!

अकेले तीर्थ यात्रा Photo by cottonbro on Pexels.com

15 सितम्बर 2021:

शहडोल में तेज बारिश हो रही है। इसलिये आज प्रेमसागर आगे अनूपपुर-अमरकण्टक के लिये प्रस्थान नहीं कर सके। बोल रहे थे कि आज एक रेनकोट खरीदने की सोच रहे हैं।


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सोन, बाणगंगा, सोहागपुर और शहडोल


13 सितम्बर 2021 की यात्रा के बाद:

शाम पांच बजे प्रेमसागर पांड़े शहडोल के बिचारपुर वन रेस्ट हाउस में पंहुच गये थे। वे सवेरे साढ़े चार बजे ही निकल लिये थे जयसिंह नगर के डेरा से। गूगल मैप में रास्ता करीब पचास किमी का है, पर टूरिस्ट लोकेशन देखते देखते आये तो वे, उनकी फ्रेजॉलॉजी के अनुसार “मोटामोटी” 60 किमी चले।

रास्ते में घना जंगल मिला। किसी वन्य जीव से पाला नहीं पड़ा। घना वन निकलने के बाद सवेरे गाय गोरू चरने के लिये जाते दिखे। उसके अलावा रास्ते में मंदिर थे, सोन नदी थी। सोन यहां वास्तव में नदी ही हैं – शोणभद्र नद नहीं। छोटा सा पाट दिखता है उनका।

सोन नदी

प्रेम सागर के इस इलाके के भ्रमण के संदर्भ में मुझे एक नर्मदा घाटी पर सन 1963 का लिखा एक ट्रेवलॉग हाथ लगा। एक सज्जन नेत्तूर पी दामोदरन 1963 में शहडोल आये थे। वे यहां केंद्र सरकार के विशेष प्रतिनिधि के रूप में आदिवासियों पर कोई अध्ययन कर रहे थे और उस संदर्भ में नर्मदीय क्षेत्र में बहुत घूमे थे। दामोदरन जी 1952-57 के दौरान संसद सदस्य रह चुके थे।

वे यहाँ शहडोल में जिले में सोन नदी में आयी बाढ़ में फंस गये थे। उसी दौरान उन्होने अपने नर्मदा भ्रमण के मेमॉयर्स लिखे जो मलयालम मनोरमा में ‘नर्मदायुदे नत्तिल (The land of Narmada)’ के नाम से छपे। … छोटी सी दिखती सोन नदी इतनी भयंकर बाढ़ भी ला सकती हैं कि पूरा शहडोल का इलाका उससे कट सकता है और नेत्तूर पी दामोदरन उसमें फंस कर एक यात्रा विवरण लिख सकते हैं – ऐसा प्रेमसागर जी के चित्र की नदी से नहीं लगता। पर सोन नदी या शोणभद्र नद – हैं ही ऐसी नदी जिनको देख कर मन में इज्जत या भय का भाव आये। सोन और नर्मदा दोनो अमरकण्टक से निकली नदियाँ हैं। पर दोनो की प्रकृति में बहुत अंतर है। प्रेम सागर का अगर साथ रहा तो नर्मदा के साथ अमरकण्टक से ॐकारेश्वर तक चलना हो सकता है और उनके बारे में बहुत कुछ प्रेमसागर के चित्रों, उनके कथनों, विभिन्न यात्रा विवरणों से सामने आयेगा। सोन का तो शायद यही एक चित्र ब्लॉग पर आये!

और जो यह सोन का चित्र प्रेमसागर ने भेजा है, वही वह स्थान है जहां नेत्तूर पी दामोदरन ने बाढ़ में एक ट्रक जिसमें उसके कर्मी बैठे थे, अपने सामने जलमग्न होते देखा था। उस घटना के बारे में वे लिखते हैं कि वे शहडोल के कलेक्टर से मिल रहे थे कि कलेक्टर ने उनसे कहा कि “अगर वे यहां से घण्टे भर में नहीं निकल जाते तो यहीं फंसे रह जायेंगे। यहां मौसम साफ है पर प्रयागराजघाट और अमरकण्टक में तेज वर्षा हो रही है। बाढ़ का पानी वहां से यहां आने में दो घण्टा लेता है। तब यह नदी यहां बाढ़ में आ जायेगी।”

नेत्तूर पी दामोदरन अपना सामान बांध जब तक सोन नदी – 10 मील दूर – पंहुचे, तब तक बाढ़ आ चुकी थी। ट्रक जलमग्न होते देखा उन्होने। एक सप्ताह वे शहडोल में फंसे रहे और बैठे ठाले अपने भ्रमण के मेमॉयर्स लिखने प्रारम्भ किये। वे मलयालम मनोरमा में छपे और कालांतर में दस साल बाद केरल सरकार की ग्राण्ट/सहायता से उनका पुस्तकाकार प्रकाशन हुआ।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

मैंने तो यह पुस्तक अमेजन किण्डल पर पढ़ी है। प्रेम सागर प्रकरण न होता तो मैं न तो शहडोल पर अपना ध्यान केंद्रित करता और न यह पुस्तक खंगालता। :lol:

सोन नदी के बाद प्रेमसागर बाणगंगा सैलानी स्थल से हो कर गुजरे। उसके कुछ चित्र उन्होने दिये हैं। बाणगंगा में एक तालाब है। पानी है उसमें पर बहुत साफ नहीं दिखता। या कहें तो गंदला है। टूरिस्ट प्लेस के हिसाब से जल को साफ करने का जो प्रयास होना चाहिये था, वह नहीं है। लोग और टूरिज्म वाले दोनो उत्तरदायी लगते हैं।

बाणगंगा के कुछ दृश्य उक्त कोलाज में हैं। साधू जी कोई त्यागी महराज हैं, जिनका राम मंदिर वहां है। बाणगंगा में चबूतरों पर परित्यक्त/खण्डित मूर्तियाँ लगी हैं। उनके कई चित्र प्रेम सागर जी ने भेजे हैं। उनका कहना है कि समय के साथ ही वे सैण्ड-स्टोन की मूर्तियाँ खण्डित हुई होंगी। किसी विधर्मी विध्वंस की बात तो उन्हें किसी ने नहीं सुनाई।

बाणगंगा के बारे में उन्हें किंवदंति बताई गयी कि अर्जुन ने प्यासी गाय को पानी देने के लिये एक बाण धरती में मारा था और उससे गंगा की जलधारा फूटी जिससे गाय की प्यास दूर हुई। सम्भवत: जलाशय उसी ‘गंगा’ का प्रतीक है।

अर्जुन या पाण्डव यहां कैसे आये? इसके बारे में कहा जाता है कि शहडोल ही मत्स्य प्रदेश है – राजा विराट का राज्य। पाण्डवों ने वनवास के तेरहवें वर्ष में यहीं अज्ञातवास किया था। विकीपीडिया में भी ऐसा लिखा है। नेत्तूर पी दामोदरन की उक्त पुस्तक में भी ऐसा वर्णन है। मैं अब तक यह मानता था कि मत्स्य देश राजस्थान के अलवर या जयपुर का इलाका था। पर शहडोल के संदर्भ में यह जानकारी मेरे लिये नयी है।

राम सीता, कृष्ण या पाण्डव ऐसे चरित्र हैं, जिनपर भारत का हर इलाका अपना कुछ न कुछ दावा करना चाहता है। पूरा उत्तरावर्त और दक्षिणावर्त, पूरा हिमालय प्रदेश और सिंधु या उसके पार अफगानिस्तान का क्षेत्र भी किसी न किसी प्रकार से इन महाकाव्य कालीन स्थलों और घटनाओं से स्वयम को जोड़ता है। शायद यही भारत को एक सूत्र में पिरोने की कड़ी है और एक कारण है कि मेरे जैसा आदमी वृहत्तर भारत के स्वप्न देखता है – गंधार से म्यान्मार तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक!

प्रेम सागर जी ने बताया कि वन विभाग के रेंजर साहब (त्रिपाठी जी) कल उन्हें वह स्थान भी दिखाने वाले हैं जहां अज्ञातवास में जाते समय पाण्डवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ पर छिपा कर रखे थे। अर्थात प्रेम सागर कल भी शहडोल और उसके आसपास अपना समय गुजारने जा रहे हैं। अगली पोस्ट में पाण्डव चर्चा सम्भव है!

शहडोल के पहले ही पड़ता है सोहागपुर। या सोहागपुर का वर्तमान नाम शहडोल है। सोहागपुर कालाचूरि राजाओं की राजधानी थी। यहां हजारवीं शती का विराटेश्वर मंदिर है। वह आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के संरक्षण में है। उस मंदिर का मत्स्यदेश के राजा विराट से कोई लेनादेना है? इस बारे में जानकारी मुझे नहीं मिली। प्रेम सागर ने पूरे मंदिर के घूम घूम कर चित्र लिये। बड़ी बारीकी से। उनका मोबाइल कैमरा अगर ठीक होता तो चित्र बहुत ही अच्छे आते! पर जो आये हैं वे भी खराब नहीं है!

विराटेश्वर मंदिर, सोहागपुर, शहडोल

मंदिर के स्थापत्य पर शहडोल जिले के विकीपेडिया पेज या आर्कियालॉजिकल सर्वे के पट्ट से ले कर जानकारी ब्लॉग पर डाली जा सकती है। पार वह इतनी सुलभ है कि पाठक उन्हें स्वतन्त्र रूप से देख सकते हैं। मैं तो यहां प्रेमसागर के कुछ चित्रों का स्लाइड शो प्रस्तुत कर देता हूं। मंदिरों की स्थापत्य कला पर मेरी समझ अगर परिष्कृत होती तो कुछ लिखता भी। कहीं कहीं उल्लेख है कि मंदिर थोड़ा झुक रहा है। प्रेमसागर ने भी बताया कि अगर ध्यान से देखा जाये तो झुकाव नजर आता है। अन्यथा बहुत ज्यादा नहीं है।

प्रेम सागर जब दत्तचित्त विराटेश्वर मंदिर के चित्र खींचने में लगे थे, तो उन्हें आर्कियॉलॉजिकल सर्वे के एक कर्मी, कोई अवधेश मिश्रा जी ने रोका कि चित्र खींचने की मनाही है। पर तब तक वे पर्याप्त चित्र ले चुके थे।

14 सितम्बर सवेरे 9 बजे:

आज प्रेमसागर शहडोल के बिचारपुर रेस्टहाउस में ही रुके हैं। आसपास के कुछ स्थान दिखाने के लिये रेंजर साहब (त्रिपाठी जी) उन्हें ले जायेंगे। पाण्डवों का अस्त्र शस्त्र रखने का स्थान है और एक इग्यारहवीं सदी का प्राचीन दुर्गामंदिर है। इसके अलावा दो तीन और भी स्थान हैं।

कल प्रेमसागर निकलेंगे अमरकण्टक के लिये। कल अनूपपुर तक पंहुचेंगे; परसों राजेंद्रग्राम और अगले दिन अमरकण्टक! यह यात्रा पथ तय करने में मुख्य रोल वन विभाग के लोगों का है। इतनी बड़ी सहूलियत प्रेमसागर को मिल गयी है। उस सब के लिये वे मुझे, प्रवीण जी को और वन विभाग वालों को धन्यवाद देते हैं। “और महादेव की कृपा तो हई है!” यह जरूर जोड़ते हैं।

सब कुछ महादेव की इच्छानुसार ही हो रहा है। यह पोस्ट भी महादेव की प्रेरणा से ही है! नहीं?


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