सहस्त्रार्जुन की राजधानी माहिष्मती (माहेश्वर)


05 नवम्बर 21, रात्रि –

प्रेमसागर 4 दिन से माहेश्वर में हैं। आज सवेरे उन्हें निकलना था, पर मौर्य जी, एसडीओ साहब ने उन्हें रोक लिया। दिवाली के बिहान पर सड़कें सुनसान रहती हैं, सो बेहतर है एक दिन बाद निकला जाये। कहां, किस रास्ते निकलना है यह वे अंतिम क्षण तय करेंगे। सम्भव है, चोरल – बड़वाह के बीच की घटना के बाद कुछ नये प्रकार से यात्रा की योजना हो, मैंने ज्यादा तहकीकात नहीं की। उन्हें कुल बारह ज्योतिर्लिंग दर्शन करने हैं। मैं इनको नक्शे पर मैप कर सबसे कम दूरी चलने के आधार पर मार्ग तय करना उचित समझता था, पर यात्रा करते समय अन्य सुविधायें शायद ज्यादा महत्व रखती हैं। और फिर महादेव क्या चाहते हैं, उसपर ही सब निर्भर करता है। महादेव मुझ अकेले, की-बोर्ड के साथ बैठे, के साथ तो हैं नहीं। वैसे भी वे मुझे यात्रा मार्ग तय करने के लिये उपयुक्त पात्र पाते नहीं होंगे। मैंने तो जीवन में केवल छोटी और लम्बी दूरी की ट्रेनों को चलाने की योजना बनाई या उसको मूर्त रूप दिया है। यात्री और मुख्यत: तीर्थयात्री की सोच और जरूरतें ट्रेन यात्रा की जरूरतों से अलग होती हैं। … तीर्थयात्रायें की-बोर्ड पर जन्म नहीं लेतीं। मैंने जो ट्रेवलॉग पढ़े हैं वे अधिकतर खोजी लोगों के हैं, तीर्थ श्रद्धालुओं के नहीं। सो पढ़ने में भी प्रेमसागर जैसे लोगों की समझ नहीं आयी है मुझमें।

यात्रानुशासन क्या है? यात्रा घर में आराम से बैठने की आसक्ति या राग का त्याग – विराग ही है। अपना बिस्तर, अपनी कुर्सी, अपना कमोड, अपना स्नानघर, अपनी बगिया, अपना आंगन-ओसारा छोड़ कर निकल पड़ना एक प्रकार का वैराज्ञ ही हो है। वह जो प्रेमसागर करने में सक्षम हैं और ज्ञानदत्त उसके लिये निहायत अक्षम/लद्धड़।

मुझे रामकृष्ण परमहंस जी की एक लघु कथा याद आती है। उसमें पत्नी अपने पति को कह रही थी कि उसका भाई वैराज्ञ लेने की बहुत तैयारी कर रहा है। बहुत गहन तैयारी। जल्दी ही वह वैराज्ञ ले लेगा। उसने पति ने कहा कि वैराज्ञ ऐसे थोड़े ही लिया जाता है। पत्नी ने अपने प्रिय भाई के बारे में ऐसी टिप्पणी सुन तुनक कर पूछा – तो कैसे लिया जाता है? इसके उत्तर में आदमी उठा और घर से निकलते हुये बोला – “ऐसे लिया जाता है”। और वह चलता चला गया। वापस नहीं आया। वैराज्ञ या यात्रा – कुछ ऐसे ही लिये-किये जाते हैं।

लम्बी चौड़ी योजना बनाने वाला (पढ़ें – मेरे जैसा व्यक्ति) यात्रा पर नहीं निकलता। यात्रा पर प्रेमसागर जैसा व्यक्ति निकलता है जो मन बनने पर निकल पड़ता है। सो, प्रेमसागर मन बनने के साथ ही आगे की लम्बी यात्रा पर निकल पड़ेंगे। माहेश्वर और नर्मदा का आसक्ति-राग लम्बा चलने वाला तो है नहीं। वह विराग ही तय करेगा कि उन्हें किस ओर निकलना है। यात्रा यूं होगी।

प्रेमसागर माहेश्वर घूमे। एक दिन उन्होने मुझे 100 से अधिक चित्र भेज दिये। सुंदर चित्र पर किसी पर कोई विवरण नहीं। एक एक चित्र के आधार पर उन्हें फोन कर विवरण पूछ्ना बहुत कठिन तो नहीं था, पर वह पूछ कर नोट्स बनाने का धैर्य मैंने नहीं दिखाया। मैंने देखा है कि किसी भी घूमने की जगह – अमरकण्टक, जबलपुर, भोपाल आदि के बारे में लिखने में मुझे यही दिक्कत हुई है। प्रेमसागर ने देखा बहुत है; चित्र भी खूब खींचे हैं, पर मेरा विवरण उनके साथ न्याय नहीं कर पाया। वही हाल मण्डलेश्वर-माहेश्वर के साथ है।

मण्डलेश्वर के साथ नाम जुड़ा है मण्डन मिश्र का। वे महान मीमांसक थे जो शास्त्रार्थ में आदिशंकर से पराजित हो कर उनके शिष्य बने। माहेश्वर प्राचीन काल में (जिसका इतिहास केवल ग्रंथों में मिथकीय उल्लेख में मिलता है) कार्तवीर्य अर्जुन या सहस्त्रबाहु अर्जुन (या मात्र अर्जुन नाम में ही); हैयय वंश के प्रतापी राजा की राजधानी माहिष्मती थी। अर्थात माहेश्वर वैसा ही प्राचीन स्थल/नगर है जैसा उज्जैन या वाराणसी। सहस्त्रबाहु अर्जुन के बारे में प्रसिद्ध है कि उसने अपनी हजार भुजाओं से नर्मदा के जल को रोक दिया था। अब शायद उस युग में सहस्त्रार्जुन ने बांध जैसा कुछ बनाया हो अपने कुल की रानियों के स्नान – विहार के लिये।

रामायण में सहस्त्रबाहु अर्जुन का कई बार उल्लेख होता है। तुलसीदास जी ने रावण की महिमा घटाने के लिये दो बार उनका उल्लेख किया है। रावण की सभा में हनूमान और अंगद जब दूत बन कर जाते हैं, तो रावण का उपहास करने के लिये यह उल्लेख करना नहीं भूलते कि उसे सहस्त्रार्जुन ने बांध कर अपने किले के कोने में कैद कर लिया था और फिर पुलस्त्य ऋषि के आग्रह पर छोड़ा था। एक बार परशुराम जनक की सभा में कहते हैं कि उन्होने सहस्त्रार्जुन का वध किया था, और वे यहां भी उनका नाश करने से चूकेंगे नहीं, अगर उन्हें यह नहीं बताया गया कि पिनाक किसने तोड़ा है। कुल मिला कर रावण के संदर्भ में और परशुराम के संदर्भ में सहस्त्रबाहु अर्जुन का बार बार उल्लेख मिलता है। प्रेमसागर ने राजराजेश्वरी मंदिर घूमते समय सहस्त्रार्जुन की प्रतिमा का भी चित्र भेजा। वह माहेश्वर की प्राचीनता का सबसे बड़ा हस्ताक्षर है। हैहय सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) के बारे में अनेक प्राचीन महाभारतकालीन या उससे पहले के काल को दर्शाते हुये उपन्यासों में बार बार पढ़ा था, वह माहेश्वर का था और प्रेमसागर वहांं आजकल डेरा डाले हैं – यह अनुभूति रोमांचक है।

श्री राजराजेश्वर सहत्रार्जुन

सहस्त्रार्जुन के अलावा अधिकांश चित्र होल्कर वंश के मराठा स्थापत्य और अहिल्याबाई होल्कर के हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर का (इस्लामी अतिक्रमण के बाद) पुनरोद्धार का कार्य, मुझे वहां एक ब्राह्मण ने बताया था कि रानी अहिल्याबाई ने ही कराया था। वाराणसी के भी कई मंदिरों का पुन: उद्धार रानी अहिल्याबाई द्वारा कराया गया था। सम्भवत: काशी विश्वनाथ मंदिर का भी। उनका नाम आदर से लिया जाता है हिदू मंदिरों के पुनर्स्थापन के लिये।

रानी अहिल्याबाई होल्कर की प्रतिमा के पास प्रेमसागर।

वहां के म्यूजियम और आसपास के कई चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं। सभी अच्छे हैं। उनमें तोप, पालकी, तलवारें, संदूक, मूर्तियां, नर्मदा किनारे घाट और इमारतेंं- बहुत कुछ हैं। उनके बारे में मैं विस्तार से लिख पाता अगर मैंने वह स्थान देखे होते या प्रेमसागर से विस्तृत बातचीत हुई होती। इस कोण से यह ट्रेवलॉग – अगर इसे ट्रेवलॉग माना जाये तो – कमजोर प्रतीत होता है। मैं केवल चुने हुये चित्र नीचे स्लाइड-शो में लगा दे रहा हूं।

(प्रेमसागर के माहेश्वर भ्रमण के चित्र)

प्रेमसागर को खूब सहयोग मिला है वन विभाग के लोगों का; इतना की उन्हें या मुझे कल्पना भी नहीं थी। उनके साथ भ्रमण पर गये कई लोगों के साथ उनके चित्र हैं। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे लोगों के नाम – बांये से दांये के क्रम में लिख कर भेज दें। पर वह वे यह पोस्ट लिखने तक नहीं कर पाये। लोगों के नाम और नामों के सही सही हिज्जे लेना और याद रखना प्रेमसागर का प्लस प्वाइण्ट नहीं है। मेरा भी, मेरे जीवन के पूर्वार्ध में, नहीं था। पर मैंने लोगों से उनका नाम बार बार सही उच्चारण के साथ पूछना, उनके सामने बोलना और मौका पाते ही उसे नोटबुक में दर्ज करना सीखा। उससे मेरी यह कमजोरी कुछ सीमा तक दूर हुई और मैं कुछ बेहतर ब्लॉग लिख पाया। वैसे अभी भी मेरी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। अभी भी किसी किताब के बीस तीस पन्ने पढ़ जाने के बाद ही लगता है कि यह किताब तो शायद पहले पढ़ रखी है। और कई बार अपना खुद का पुराना लिखा पढ़ने पर सोचता हूं कि किसने लिखा होगा! :lol:

खैर उन वन विभाग के बंधुओं का चित्र मैं नीचे लगा दे रहा हूं। उनके नाम मिले तो कैप्शन में सम्पादित कर जोड़ दूंगा। उसके इंतजार में पोस्ट रोके रखना उचित नहीं लगता।

माहेश्वर भ्रमण पर वन विभाग के लोगों के साथ प्रेमसागर

प्रेमसागर को अगले दिन भी भ्रमण का प्लान बताते समय मैंने उन्हे कहा कि एक दो दिन जो माहेश्वर में गुजारने हैं, उनका प्रयोग वे घूमने में नहीं चुपचाप बैठ आराम करने, शरीर को विराम देने और मनन करने में लगायें। आगे मध्यप्रदेश के पश्चात उनकी यात्रा किस स्वरूप में होने जा रही है, उसपर विचार करें। सामने नर्मदा तट पर पैदल हो आया करें और अगर उनके जल में सूर्योदय-सूर्यास्त दिखता है, उसे निहारें। मेरे ख्याल से प्रेमसागर ने वही किया। अपने आराम का बैकलॉग पूरा किया। अपनी टांगों को वांछित विश्राम दिया। आगे किन किन चीजों की जरूरत होगी, उनका इंतजाम किया। दो-तीन दिन इस प्रकार व्यतीत किये। यूं कहें तो अपने शरीर की बैटरी री-चार्ज की। अब आगे की यात्रा के लिये वे तैयार हैं।

पिछले तीन दिन पूरा आराम किया है प्रेमसागर ने। यूं कहें तो अपने शरीर की बैटरी री-चार्ज की। अब आगे की यात्रा के लिये वे तैयार हैं।

कल देखते हैं उनकी आगे की यात्रा कहां की और कैसे होती है। आगे की यात्रा में मैं राग से नहीं, विराग से जुड़ूंगा; या कम से कम वैसा प्रयास करूंगा। उनके लोकेशन शेयर करने में देर करने पर खीझना, उनके फीडबैक में कमी-बेसी पर अप्रसन्नता व्यक्त करना, उनके डिजिटल माध्यम के प्रयोग में कमी पर बार बार टोकना आदि बंद करूंगा। वह मेरा बहुत समय और ऊर्जा लेता है। इससे सम्भव है कि ब्लॉग पोस्टों का स्वरूप भी बदले और आवृति भी। यह भी सम्भव है कि कुछ बेहतर होने और लिखा जाने लगे।

हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

बडवाह से माहेश्वर


प्रेमसागर 1 नवम्बर को बड़वाह से माहेश्वर के लिये रवाना हुये। रास्ता लगभग नर्मदा के उत्तरी भाग के समांतर चलता है। सवेरे साढ़े पांच बजे निकले। उन्हें छोड़ने के लिये वन कर्मी – भगवान जी केवट और एक अन्य आये। चित्र देख कर लगता है कि हल्की सर्दी प्रारम्भ हो गयी है। एक नदी के चित्र से भी लगता है कि सवेरे सवेरे नदी के जल के समीप ठण्डी हवा भाप की तरह उड़ती नजर आ रही है। नवम्बर का महीना और नदी घाटी का इलाका; कुछ सर्दी तो हो ही गयी होगी। आसपास को देखते हुये प्रेमसागर ने बताया कि दोनो ओर उन्हें खेती नजर आती है। जंगल नहीं हैं। गांव और घर भी बहुत हैं। लोग भी दिखाई देते हैं। रास्ता वीरान नहीं है। भय की कोई बात ही नहीं। … भय की बात उन्होने इसलिये की कि चोरल-बड़वाह के बीच सुनसान जंगल में उनके साथ लूट का हादसा हो चुका था।

एक नदी के चित्र से भी लगता है कि सवेरे सवेरे नदी के जल के समीप ठण्डी हवा भाप की तरह उड़ती नजर आ रही है।

प्रवीण जी से इस इलाके के बारे में बात की तो उन्होने बताया कि अगर प्रेमसागर त्र्यंबकेश्वर के लिये निकलते हैं तो माहेश्वर से सैंधवा पड़ेगा। और इस पूरे इलाके में वन नहीं है। आबादी अधिक है, और उसने खेती के लिये वन समाप्त कर दिये हैं। वन विभाग जो वन लगाने का काम भी करता है, उसे पशु चर जाते हैं। कुछ बड़े भी हो पाये तो लोग जलावन लकड़ी के लिये काट लेते हैं। यह आबादी और वन के बीच सतत जद्दोजहद है, जिसमें लोगों की बसावट हावी है। पर इलाके में हॉर्टीकल्चर के बहुत सफल प्रयोग हुये हैं। केला पपीता नींबू की खेती व्यापक पैमाने पर की जा रही है। टिश्यू कल्चर की इन फलदार वृक्षों की प्रजातियां लोग लगा रहे हैं और लाभ भी कमा रहे हैं।

प्रेमसागर ने रास्ते में केले की खेती देखी। केले के खेत कोई बाड़ लगा कर सिक्योर नहीं किये गये थे खुले में ही थे। केले के अलावा एक जगह पपीते के 10-15 पेड़ दिखे। किसी ने शुरुआती प्रयोग किया होगा। व्यापक तौर पर पपीता लगा नहीं दिखा। एक जगह 20-25 अमरूद के छोटे पेड़ थे, शायद कोई बौनी किस्म के होंगे। बैलगाड़ियों में कपास लदी जाती दिखी। एक जगह ट्रक में भी कपास लादी जा रही थी। लोगों ने बताया कि बड़वाह में कपास मण्डी है। इसके अलावा किसान छोटी छोटी दुकानों में भी ले जा कर अपनी कपास बेचते हैं। छोटी दुकानों वाले जमा कर बड़वाह मण्डी ले जाते होंगे। कपास की खेती किसानों को समृद्धि देती होगी। यह जानना अच्छा लगा कि गेंहू-धान की मोनो कल्चर की दकियानूसी खेती में ही नहीं फंसा है किसान। खेतों की जोत बड़ी है तो खेती सार्थक तरीके से हो रही है। नर्मदा घाटी होने के कारण जमीन उपजाऊ है ही और जल की भी समस्या नहीं।

रास्ते का खेत

जल की गुणवत्ता के बारे में कहा जा सकता है कि नर्मदा में जल पर्याप्त है और स्वच्छ भी है। प्रवीण जी ने बताया कि पॉल्यूशन कण्ट्रोल बोर्ड नियमित गुणवत्ता के आंकड़े देता है। उसे देख कर नर्मदा के जल की गुणवत्ता के बारे में संतोष किया जा सकता है। अमरकण्टक से ले कर होशंगाबाद और उसके बाद भी पर्याप्त वन हैं। उस क्षेत्र से नर्मदा की ट्रिब्यूटरी नदियां पर्याप्त जल नर्मदा में लाती हैं। डैम बनने से ऐसा नहीं हुआ है कि नदी मरने लगी हो। हाइड्रो-बिजली उत्पादन के लिये नदी में जल छोड़ा ही जाता है। अतिरिक्त जल से नहरों के माध्यम से सिंचाई से भी समृद्धि आयी है। कुल मिला कर, प्रवीण जी के अनुसार, नर्मदा जल की दशा और मध्यप्रदेश की समृद्धि में सही तालमेल बना हुआ है।

रास्ते में मिली नहर या नदी

प्रेमसागर को रास्ते में गाडुलिये लोहार भी दिखे। वे घुमंतू लोग ऊंट के काफिले में जा रहे थे। मैंने यहां भदोही में उन घुमंतू लोगों से जो बातचीत की है, उसके अनुसार वे गुना, मध्यप्रदेश में बसाये गये हैं। वहां से वे देश के भिन्न भिन्न भागों में यात्रा करते रहते हैं। उन घुमंतू लोगों पर लिखना-कहना तो एक पुस्तक/अध्ययन का विषय है। कोई अच्छी पुस्तक उनपर लिखी हाथ नहीं लगी मुझे!

प्रेमसागर को रास्ते में गाडुलिये लोहार भी दिखे। वे घुमंतू लोग ऊंट के काफिले में जा रहे थे।

माहेश्वर के पहले मण्डलेश्वर में नर्मदा किनारे रेस्ट हाउस है, वन विभाग का। बहुत रमणीय स्थान पर रेस्ट हाउस है। आगे की दुरुह यात्रा के पहले यह स्थान अच्छा है कुछ दिन रुक कर अपने शरीर की थकान दूर करने और अब तक की यात्रा पर मनन करने के लिये। मैंने प्रेमसागर को यही सलाह दी कि आसपास के स्थलों को ज्यादा देखने जाने का लालच छोड़ कर दो तीन दिन विशुद्ध आराम करें। तीन ज्योतिर्लिंगों की पैदल कांवर यात्रा अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। उससे उनमें पर्याप्त आत्मिक, आध्यात्मिक और लौकिक परिवर्तन हुये हैं। उन्हे बहुत सहायता भी मिली है और बहुत श्रम भी करना पड़ा है। उन्होने कई रूढ़ियों को तोड़ा भी है और कई नयी तकनीकें भी सीखी हैं।

प्रेमसागर के अनुभव और व्यक्तित्व विकास से मुझे ईर्ष्या होती है। उनके माध्यम से मैंने भी मानसिक यात्रा कर ली है इतनी सारी पोस्टों को लिखने के लिये। … मैं सोचता था कि मुझे भी समय चाहिये यह सब आत्मसात करने के लिये। यह तो तय किया है कि आगे की यात्रा का विवरण लिखना फिलहाल मैं जारी रखूंगा। पर उसे लिखने की प्रकृति और आवृति में कुछ परिवर्तन करना होगा। मुझे लगता है कि लेखन में प्रवाह ज्यादा होना चाहिये, जानकारी ज्यादा होनी चाहिये, पर व्यक्तिगत आसक्ति कम होनी चाहिये। पर यह सब कैसे होगा, अभी मुझे स्पष्ट नहीं है।

मण्डलेश्वर में रेस्ट हाउस से दिखता नर्मदा का दृश्य

फिलहाल अभी प्रेमसागर मण्डलेश्वर में ही हैं। सुबह शाम नर्मदा दर्शन और स्नान कर रहे हैं। उनके माहेश्वर-मण्डलेश्वर विश्राम के बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा।

हर हर महादेव! जय हो; नर्मदे हर!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

गौ-गंगा-गौरीशंकर के सतीश सिंह भारत देख चुके साइकिल से!


कृपया गड़ौली धाम के बारे में “मानसिक हलचल” ब्लॉग पर पोस्टों की सूची के लिये “गड़ौली धाम” पेज पर जायें।
Gadauli Dham गड़ौली धाम

मैं ओ.एस. बालकुंदन फाउण्डेशन की गतिविधियों की टोह लेने के लिये निकला आज साइकिल सैर में। कमहरिया और अगियाबीर के बीच गडौली पंचायत में यह स्थान – जहां बहुत बड़े स्तर पर गौ-गंगा-गौरीशंकर की थीम पर बहुत कुछ बनने जा रहा है – मेरे लिये कौतूहल का विषय है। बड़े बड़े राजनीति से जुड़े लोग वहां अपने जुगाड़ में चक्कर मार रहे हैं, ऐसा मुझे पता चला। मेरा तो कोई राजसिक ध्येय नहीं है, पर अपने साइकिल भ्रमण क्षेत्र में कुछ होने जा रहा है, इसकी जानकारी होनी चाहिये, वह कौतूहल मन में है।

गौ-गंगा-गौरीशंकर से जनता को जोड़ने के लिये भण्डारा कार्यक्रम जो 14 अक्तूबर 21 को हुआ।

वैसे बताया गया कि सुनील ओझा जी हैं जो इस प्रॉजेक्ट के काम धाम नियन्ता हैं। गौ-गंगा-गौरीशंकर की इस विशाल प्रॉजेक्ट की परिकल्पना उनकी है या प्रधानमंत्री जी की; यह मुझे नहीं मालुम। पर वृहत स्तर पर वाराणसी और प्रयाग के बीच कुछ बनने जा रहा है। इसके पीछे जो भी व्यक्ति या विचारधारा हो, वह छुद्र-संकीर्ण या तात्कालिक/व्यवसायिक मात्र लाभ का ध्येय रखने वाले की नहीं हो सकती।

मै ऊपर के तीन पैराग्राफ में जो लिख चुका हूं, वह अगर पढ़ने वाले को स्पष्ट न हो रहा हू, तो उसमें गलती मेरी है। मुझे खुद नहीं मालुम इस प्रॉजेक्ट का ध्येय। मैं सोचता था कि कोई व्यवसायी अपना पैसा लगा कर इलाके के टूरिस्ट पोटेंशियल का दोहन करना चाहता है। पर उसमें गौशाला या अस्पताल जैसी चीज का निर्माण फिट नहीं बैठता। कौन व्यवसायी इस तरह की चीज में पैसा फंसायेगा?

गौरीशंकर की जो 108 फिट ऊंची प्रतिमा का परिकल्पित चित्र लिये सतीश सिंह।

जो मुझे पता चला है उसके अनुसार कमहरिया-देवकली-अगियाबीर के एक बड़े इलाके में; गंगा किनारे; निम्न विकसित होने जा रहे हैं –

  • गंगा तट पर त्रिशूल की दो भुजाओं की नोकों में से एक (प्रयाग छोर) पर गौरीशंकर की 108 फुट की प्रतिमा और दूसरी नोक (वाराणसी छोर) पर महादेव मंदिर।
  • त्रिशूल की बीच की नोक पर एक ओपन एयर थियेटर।
  • गंगाजी पर विस्तृत घाट और नदी के दूसरी ओर टूरिस्ट स्पॉट।
  • गौशाला और कृष्ण जी की प्रतिमा
  • वृद्धाश्रम – नंदन वन।
  • आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और ध्यान केंद्र आदि

सतीश सिंह वहां मिले। वे पास के गांव कमहरिया के हैं। रोज वहां जो हो रहा है, वह बताने के लिये वे सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं। उनसे मैं कुछ दिन पहले मिल चुका हूं। वे गौरीशंकर की जो 108 फिट ऊंची प्रतिमा बनने जा रही है, उस प्रतिमा के (कल्पना अनुसार बनाये) चित्र की आरती कर रहे थे। सतीश प्रॉजेक्ट के लिये प्रतिबद्ध व्यक्ति हैं। सरल आदमी। राजनैतिक दंदफंद से असंपृक्त। इस तरह के कार्य की देखरेख के लिये ऐसा ही व्यक्ति चाहिये। सही आदमी चुना है सही जगह के लिये; उसने जो भी ट्रस्ट का देख रेख करने वाले हैं।

सतीश जी से बातचीत के दौरान मैंने जिक्र किया प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा का। उसी सिलसिले में सतीश जी ने बताया कि वे भी भारत-भ्रमण की लम्बी यात्रायें कर चुके हैं। वह भी अपनी साइकिल से। साइकिल से 1996 से यात्रायें करते रहे हैं। सबसे पहले वे वैष्णो देवी तक गये थे। उन्हें यात्रा प्रारम्भ की तारीख याद है – दस अगस्त 1996। उसके बाद साइकिल से मैहर-चित्रकूट की यात्रा किये। सन 2001 में वे पशुपति नाथ की साइकिल यात्रा किये। ये सभी यात्रायें बिल्कुल अन-प्लाण्ड तरीके से हुईं। लोगों ने कहा कि डीएम से प्रमाण पत्र ले कर यात्रा करो, पर वह सब नहीं हुआ। जब मन किया साइकिल उठाये और एक दो साथी साथ में तैयार कर चल दिये।

सन 2001 के बाद क्या क्या यात्रायें की?

सतीश जी ने कहा – “आप विधिवत पूछ रहे हैं तो मैं अपनी डायरी खोल कर बताऊंगा। मैंने उसमें मोटा मोटा विवरण लिखा हुआ है। उसमें पूरी यात्रा का विवरण नहीं है, पर डायरी देख कर वह सब याद आ जायेगा। जिस साइकिल पर मैंने 1996 में यात्रा की है, वही आज भी मेरे पास है। घर बार को छोड़ छाड़ यात्रायें करने के कारण घर में भी मुझे अलग थलग मान लिया गया है। और अब तो इस स्थान पर काम-धाम में राम गया हूं। सांसारिक लोग इस तरह के आनंद को समझ नहीं पाते। दुनियादारी, उसकी उपलब्धियों की कीमत होती है। लोगों के लिये मेरी तरह का जीवन यह सिरफिरा होने की निशानी है!”

सन 1996 से आजतक यात्रायें कर चुकी साइकिल के साथ सतीश सिंह। आज भी इसी साइकिल से चलते हैं वे।

मेरे साथ गुन्नीलाल पांड़े जी थे। उन्होने मेरे बारे में बताया कि सरकारी नौकरी, उसकी प्रभुता के बाद शहर में न रह कर मैं साइकिल ले कर मौज में घूम-देख रहा हूं। सतीश जी को मेरी और अपनी वृत्ति में साम्य नजर आया। मुझे भी लगा, और उनसे कहा भी, कि उनसे आगे बार बार मिल कर उनकी यात्राओं और उनकी जीवन शैली के बारें में समझने और लिखने का मन है। प्रेमसागर छूटेंगे – या उनके साथ साथ सतीश सिंह के बारे में लिख कर ब्लॉग समृद्ध होगा।

मैं जब वहां से घर के लिये रवाना हुआ तो लगा कि आजकल भगवान मुझे लम्बी यात्रा करने वालों के उदाहरण दिये चले जा रहे हैं। पतले दुबले सतीश सिंह की छवि मन में बनी रही। उन्हीं की याद करते हुये मैंने अगियाबीर-द्वारिकापुर का नाला साइकिल घसीटते हुये पार किया। साइकिल सतीश और मैं – साथ साथ बने रहे। अब सतीश से सम्पर्क होता रहेगा।

वहां गया था मैं गौ गंगा गौरीशंकर के बारे में जानकारी लेने और लौटा सतीश से आत्मीय भाव ले कर!

कर्मठ हैं सतीश। टेण्ट और परिसर की साफसफाई, देखरेख में दत्तचित्त लगे रहते हैं।

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