पुरा-वनस्पति शास्त्री डा. अनिल पोखरिया जी


बीस अप्रेल 2018 की पोस्ट, जो फेसबुक नोट्स ने गायब कर दी है। फेसबुक अपनी नोट्स की सेवा अक्तूबर 2020 से बंद कर चुका है। इस लिये मुझे हार कर अपनी कुछ पोस्टें जो फेसबुक पर थीं, ब्लॉग में उतारनी पड़ रही हैं। :-(

उनमें से एक पोस्ट डा. अनिल पोखरिया पर है। डा. पोखरिया यहां अगियाबीर की पुरातत्व खुदाई स्थल से जले हुये अनाज के सेम्पल ले कर गये थे। उन सेम्पल्स की डेटिंग करनी थी उन्हें। किस समय के बीज हैं? उससे बहुत कुछ पता चलेगा कि नियोलिथिक (उत्तर पाषाण युग का) मानव इस टीले पर कब आया? सेम्पल लिये पौने तीन साल हो गये हैं। बी.एच.यू. की पुरातत्व विभाग की टीम (डा. अशोक कुमार सिंह और डा. रविशंकर) अपनी रिपोर्ट लगभग बना चुके हैं। उन्हे इंतजार है बीजों की कार्बन डेटिंग का।

डा. पोखरिया को मैंने पिछले सप्ताह फोन किया। डा. रविशंकर से भी बात की। उनके अनुसार अभी जो अतीत की तारीख निकल कर आयी है, वह ताम्र पाषाण मानव के युग की है। पेलियोसाइंस की मदद से अभी वे अभी वे नियोलिथिक काल में स्थापित नहीं कर पाये हैं अगियाबीर को। पर दोनो सज्जन अभी भी आशावान हैं। और अभी तो अस्सी फीसदी अगियाबीर के टीले का पुरातात्विक अध्ययन बाकी है। मेरे विचार से अगियाबीर टीले की पुरातनता की तारीख को और अतीत में धकेल पाने की बजाय उस टीले में नगरीय सभ्यता के और पुख्ता प्रमाण पाना ज्यादा महत्वपूर्ण होगा। पर एक होड़ सी है अवैध उत्खनन कर मिट्टी बेच कर पैसा कमाने की जुगत में बैठे माफिया में और पुरातत्वविदों में। कौन जीतेगा?

कोई जीते, मैं तो साक्षी भर हूं। जो होगा वह ब्लॉग पर लिखने का विषय होगा।

आप इस प्रस्तावना के बाद डा. अनिल पोखारिया की अगियाबीर और गंगा तट पर किये कार्य पर पुरानी पोस्ट देखें –


डा. अनिल पोखरिया वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं बीरबल साहनी इन्स्टीट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज, लखनऊ में। वे आर्कियॉलॉजिकल साइट्स पर उपलब्ध पाषाणयुग के वनस्पति अवशेषों – मसलन जले हुये अन्न के टुकड़ों, बीजों आदि का अध्ययन कर यह पता लगाते हैं कि उस समय के मानव की फूड- हैबिट्स कैसी थीं, उस समय का वातावरण कैसा था, ट्रेड लिंक्स कैसे और कहां से थे और लोगों का आदान-प्रदान या पलायन कैसे हुआ होगा।

कल 19 अप्रेल 2018 को मिले थे पुरातत्व-वनस्पति विज्ञानी डा. अनिल पोखरिया जी।

मुझे पहले मालुम नहीं था कि विशेषज्ञता की यह – पेलियो-एथेनो-बोटनी ( Paleoethnobotany ) – भी कोई विधा है। पर अगियाबीर की नियोलिथिक/कैल्कोलिथिक पुरातत्व साइट पर कल उनसे मुलाकात के बाद लगा कि भारतवर्ष की प्रागैतिहासिक विरासत संजोने का बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं डा. अनिल और उनके प्रकार के विशेषज्ञ गण!

आज (बीस अप्रेल 2018) गंगा तट पर मैं और मेरी पत्नीजी डा. अनिल के पास पंहुच गये। अगियाबीर की खनन की ट्रेंचों में से निकली मिट्टी वहां ला रहे थे श्रमिक। गंगा के पानी में वह मिट्टी खंगाल कर उसमें से जले (या कार्बोनाइज्ड) अन्न के अवशेषों का अध्ययन करने जा रहे थे अनिल जी। उन्हें करीब 15-20 तसले मिट्टी की आवश्यकता थी इस प्रयोग की। तीन चार तसले मिट्टी ला चुके थे श्रमिक। और मिट्टी लाये जाने की प्रतीक्षा करते हुये उन्होने अपने कार्य के बारे में हमें बताया।

गंगा तट पर पुरातत्व खनन की मिट्टी टब में खंगालते डा. अनिल

करीब बीस-बाइस सालों से पुरातत्व साइट्स पर इस प्रकार का अध्ययन कर रहे हैं पोखरिया जी। अभी वे लखीसराय, बिहार के पास एक आर्कियॉलॉजिकल साइट से हो कर आये थे। उनके साथ आये सज्जन बता रहे थे कि पिछले 8-10 दिन से वे पुरातत्व साइट्स पर ही हैं। अपने कार्य के बारे में मुझे समझाने में वे बड़े सरल शब्दों में बात कर रहे थे। दो दशकों की विशेषज्ञता की रुक्षता कहीं भी परिलक्षित नहीं हो रही थी। साइट पर खुदाई करने वाले लोगों के लिये वे नाश्ते की चीजें खुद ले कर आये थे। सरकारी ब्यूरोक्रेसी में जो खुर्राटपन नजर आता है (और मैं जिसका अंग रह चुका हूं) वह उनके व्यक्तित्व में लेश मात्र भी नजर नहीं आता था। उनके साथ वार्तालाप में एक नयी विधा को जानने और नये प्रकार के विशेषज्ञ से मिलने का जो आनन्द था, वह उनके व्यक्तित्व की सरलता से और भी बढ़ गया था!

डा. अनिल ने बताया कि कार्बोनेटेड अन्न से कुछ अनुमान तो उसके आकार-प्रकार से; अर्थात अनाज की मॉर्फ़ोलॉजी से लग जाते हैं। विस्तृत अध्ययन के लिये वे इसका लैब में परीक्षण करते हैं। अन्न की आयु पता करने के लिये रेडियोकार्बन (सी-14) डेटिंग या एएमएस (एक्सीलरेटर मास स्प्रेक्टोमीट्री) डेटिंग तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। सी-14 डेटिंग की सुविधा उनकी संस्थान की लैब में उपलब्ध है। एएमएस डेटिंग के लिये सेम्पल पोलेण्ड या चीन भेजने होते हैं।

मिर्जापुर के विन्ध्य क्षेत्र में पुरातत्व स्थल के अपने अनुभव के बारे में डा. अनिल ने बताया कि वहां उन्हें शरीफा के बीज मिले। आमतौर पर धारणा यह है कि शरीफ़ा भारत में पोर्चुगीज लाये। तदानुसार यह 15-16वीं सदी में आया होना चाहिये था। पर उन्हें जो बीज मिले वे तीन चार हजार साल पहले के थे। कुछ अन्य पुरातत्व स्थलों पर भी शरीफ़ा के बीज मिले। ये बीज मानव बस्ती के आसपास मिले, जंगल में नहीं। इससे यह पता चलता है कि बहुत पहले भी किसी प्रकार यहां और योरोप के ट्रॉपिकल जलवायु स्थलों के बीच किसी न किसी प्रकार का मानवीय आदानप्रदान था। पेलियोएथनोबोटानिकल अध्ययन से यह भी पता चला है कि आज से दस हजार साल पहले लौकी एशिया-अफ़्रीका से अमेरिका पंहुची! डा. अनिल ने बताया कि इस सन्दर्भ में हाल में एक पेपर पब्लिश हुआ है।

डा. अनिल से बातचीत में ही पता चला कि अरहर की दाल गांगेय प्रदेश में पहले नहीं मिलती। ओडिसा से सम्भवत यहां आयी। इसी प्रकार कटहल दक्षिण भारत से उत्तर के गांगेय और सरयूपार इलाकों में आया।

बहुत रोचक है सभ्यताओं और उनके साथ वनस्पतियों का मानव आदान-प्रदान या पलायन से प्रभावित होना। आर्कियोबोटानी पुरातन रहस्य की कई परतें खोलती है और पुरातत्व अध्ययन को कई नये आयाम प्रदान करती है।

अपना प्रयोग प्रारम्भ करते हुये, डा. अनिल ने एक टब में पुरातत्व स्थल से लाई मिट्टी उंडेली। इस काम के लिये उन्होने गंगा किनारे एक प्लेटफार्म बनवाया था। उस टब को पानी से भर कर मिट्टी को अपने दस्ताने पहने हाथ से खूब हिलाया। मिट्टी के मोटे गीले ढेले हल्के मसल कर तोड़े जिससे उनके बीच के बीज अलग हो सकें। पूरी तरह मिलाने के बाद एक 0.6मिमी की छन्नी से पानी निथार कर छन्नी में राख के कण और जले (कार्बोनेटेड) बीज अलग किये। उनकी पैनी निगाहों ने कुछ दाल और जौ के बीज तत्काल ही पहचान लिये और हमें दिखाये।

जब खुदाई की मिट्टी से ऊपर उतर आया तत्व छन्नी में निथारा तो मिली यह राख और उसमें जले हुये अन्न के दाने। बायें अंगूठे पर एक दाल का दाना निकाल कर दिखाया अनिल जी ने। >3000 साल पुराना दाल का दाना!

हम जिसे मात्र मिट्टी समझ कर चल रहे थे उसमें राख और बीज भी थे, इसकी कल्पना भी नहीं थी हमें।

डा. पोखरिया ने बताया कि अपने साथ लाये कपड़े के थैलों में वे ये राख और अवशेष सुखा कर लैब में अध्ययन के लिये ले जायेंगे।

डा. अनिल ने कपड़े का थैला दिखाया जिसमें राख/अवशेष सुखा कर ले जायेंगे वे।

अपने आधे घण्टे के डिमॉन्स्ट्रेशन में डा. अनिल पोखरिया जी ने हमें बता दिया अपने कार्य करने की तकनीक का मोटा अन्दाज। बाकी, उनको मैने अपना ईमेल पता दे दिया है इस अनुरोध के साथ कि वे मुझे इस विषय में कुछ पठनीय सामग्री, छपे पेपर्स और नेट पर उपलब्ध सामग्री के लिंक्स भेज दें। अब, रिटायरमेण्ट के बाद इस प्रकार के अनूठे विषयों पर जानकारी हासिल करना ही महत्वपूर्ण हो गया है मेरे लिये। आगे जीवन में वह जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके और डा. अनिल जैसे लोगों से जितना ज्यादा से ज्यादा ग्रहण कर सकूं – यही इच्छा रहेगी भविष्य की!

मिट्टी से राख-बीज छानते डा. अनिल और अन्य पुरातत्व कर्मी

रेणु की “एक आदिम रात्रि की महक” से उभरी रेल यादें


एक सज्जन ने मुझे भुवन शोम देखने को कहा, तो दूसरे ने फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी एक आदिम रात्रि की महक पढ़ने की सलाह दी –

वात्स्यायन जी ने फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ की एक आदिम रात्रि की महक की बात की

और मुझे लगा कि वास्तव में मैंने कितना कम पढ़ा या देखा है! खैर, हिंदी समय पर ‘रेणु’ जी की कहानी मिल गयी और वही नहीं, कई और भी मैंने डाउनलोड कर इत्मीनान से किण्डल पर पढ़ीं।

हिंदी समय के पन्ने पर ‘रेणु’ जी की सात कहानियां थीं। ये सातों एक वर्ड डॉक्यूमेण्ट बना कर किण्डल पर सहेज लीं। एक पुस्तक का मजा देने वाला प्रयोग। यह अमेजन पर खरीदने पर ढाई-तीन सौ लगते!


खैर, मुद्दे की बात; रेणु की कहानी में रेलवे के छोटे स्टेशन का वातावरण तो है। करमा जैसा चरित्र मैंने देखा नहीं, शायद ध्यान देता तो मिल जाता। पर यहीं कटका स्टेशन पर लखंदर है। मास्टर साहब हजार डेढ़ हजार की एवजी में उसे रखते हैं। स्टेशन की सफाई करता है। यहां तो नहीं, पर अपनी नौकरी के दौरान कई एवजी (दिहाड़ी वाले या कॉट्रेक्ट कर्मी) बड़े स्मार्ट देखे हैं मैंने। ब्रांच लाइन पर तो ब्लॉक वर्किंग और सिगनल एक्स्चेंज भी कर लेते हैं – ऐसा सुना है। उनके अथवा चतुर्थ श्रेणी के रेगुलर कर्मचारी से यह काम कराये जाने की रिपोर्ट होने पर मास्साब नप जाते हैं। पर ब्रांच लाइन में इस तरह का रिस्क दिलेर लोग ले ही लेते हैं यदा कदा।

छोटे स्टेशनों पर निरीक्षण करते इस तरह के दृष्य पर ध्यान देने और उसे मोबाइल कैमरे में लेने का शौक मुझे रहा है। रेल कर्मी अपना भोजन यूं भी बना लेते हैं प्लेटफार्म पर।

छोटे स्टेशन पर पनपते प्रेम-प्यार को देखने का अवसर नहीं मिला। मेरे साथ कम से कम चार पांच लोगों की “भीड़” रहती थी। उसमें निहायत व्यक्तिगत व्यवहार के दर्शन नहीं हो पाते। हां, नौकरी के शुरुआती दिनों में, जब गोधरा-रतलाम खण्ड का विद्युतीकरण का काम चल रहा था तो तीन ब्लॉक सेक्शन जिनमें सिंगल लाइन हुआ करती थी, वहां के काम को देखने के लिये फील्ड में मुझे जाना पड़ा।

वे लगभग जंगल के बीच के अनास, पंचपिपलिया और भैरोगढ़ थे। उन स्टेशनों पर मुझे हफ्तों रहना पड़ा। अनास स्टेशन पर, रात के एक बजे, यूं ही अकेले पटरी के किनारे दो किलोमीटर निकल गया। बीच का अनास नदी का पुल भी पार किया एडवेंचर के लिये। टपक जाता तो नीचे जल विहीन अनास नदी 25 – 30 मीटर नीचे थी। तब कोई मोबाइल होते नहीं थे। स्टेशन पर हल्ला मचा कि एओएस साहब गुम हो गये हैं। वह इलाका भील जनजाति का है और उनसे शहरी मानव के सम्बंध बहुत मधुर नहीं थे। कम से कम रेल स्टाफ वैसा ही समझता था कि अगर उनके चंगुल में मैं फंसता तो छिनैती करते और वह भी बिना मारे पीटे नहीं!

रात में दो-तीन कर्मचारी साथ में आरपीएफ रक्षक को ले कर मुझे ढ़ूंढने निकले। पर तब तक मैं दूसरी ओर के कैबिन में पंहुच गया था। उन सब ने राहत की सांस ली और मुझे समझाइश दी कि वैसा एडवेंचर रात में न करूं।

भैरोगढ़ स्टेशन पर चाय की गुमटी में बैठी वह किशोरी अभी भी मुझे याद है। वह किसी रेलवे कर्मी की बच्ची थी जो बहुत से बाहर से वहां आये कर्मचारियों को चाय पिलाया करती थी। उसी पर कुछ रेणु जी जैसे कथा बुनने की सम्भावना बनती थी।

उसी दौरान मैं माही नदी के किनारे बहुत घूमा। उसके दृष्य अभी भी याद हैं। माही नदी में एक बरसाती नदी “लाड़की” आ कर मिलती थी। मेरे मन में यह भी साध बाकी रही कि चल कर लाड़की का उद्गम स्थल देखूं।

इंजीनियरिंग विभाग के पीडब्ल्यूआई साहब का रजिस्टर का पोटला लादे चतुर्थ श्रेणी का कर्मी। रेणु इस पर खूब बढ़िया कहानी लिखते!

भैरोगढ़ स्टेशन पर चाय की गुमटी में बैठी वह किशोरी अभी भी मुझे याद है। वह किसी रेलवे कर्मी की बच्ची थी जो बहुत से बाहर से वहां आये कर्मचारियों को चाय पिलाया करती थी। उसी पर कुछ रेणु जी जैसे कथा बुनने की सम्भावना बनती थी। कोई भी जवान गैंग मैन या जूनियर पी डब्ल्यू आई भी उसके प्रेम में पड़ सकता था। उसकी चमकती आंखें और भरा शरीर अभी भी मुझे याद है। उसकी चाय की बिक्री खूब होती थी।


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बहुत समय बाद; तीस साल बाद; रिटायरमेण्ट के समय मैं एक बार पुन: भैरोंगढ़ और माही नदी के समीप गया। और सांझ का दृष्य वैसा ही लगा, जैसा मेरे रेल के शुरुआती दिनों में था।

माही नदी किनारे शाम। चित्र 2015 का है।

पंचपिपलिया, जैसा नाम है, बड़े बड़े पीपल के वृक्षों से आच्छादित था। कहा जाता है कि भीम की पत्नी हिडिम्बा यहीं की थी। वहां मैं एक सप्ताह रहा। वह भी जंगल और ऊबड़ खाबड़ इलाका। पर हिडिम्बा तो क्या, किसी नारी की छाया भी नहीं दिखी। मेरे भीतर के रेणु को जगाने के लिये न सही मन था और न माहौल। मैं एक शुष्क रेल यातायात सेवा का सहायक ऑपरेशन अधीक्षक था। जिसे अपने विभाग में अपनी ‘धाक’ जमाने की ज्यादा फिक्र थी। :-(

फणीश्वर नाथ रेणु तो क्या, किसी भी स्तर का कथाकार बनने के गुण मुझमें नहीं थे। आगे विकसित होंगे? राम जाने! लेकिन ट्विटर पर वात्स्यायन जी ने जब कहानी पढ़ने के लिए अनुशंसा की थी तो इस लिए तो कदापि नहीं की होगी कि मैं अपने आप को रेणु जी से तुलना कर देखने लिखने लगूं।

उस कहानी ने इतनी यादें ताजा कीं, वही बहुत है। कहानी का ध्येय वही होता है!


मेरी रेलवे की यादों को कुरेदती फिल्म भुवन शोम


मैंने दूसरी पारी की शुरुआत के विषय में लिखना प्रारम्भ किया तो एक सजग किंतु अनाम पाठक ने ट्विटर पर टिप्पणी की –

एग्रेरियन महोदय ने कहा कि मैं समय निकाल कर भुवन शोम देखूं

मैंने फिल्में बहुत ही कम देखी हैं। कई बार तो दशकों बीत गये बिना किसी फिल्म को देखे। जब नौकरी ज्वाइन की थी तो इस तरह के किस्से सुने थे कि फलाने साहब सिनेमा देखने गये और बीच में ही अनाउंसमेण्ट कर उन्हें रेलवे की एमरजेंसी से निपटने के लिये सीधे कण्ट्रोल रूम में पंहुचने को कहा गया।

वह छोटा शहर (रतलाम) था। आपको ट्रेन कण्ट्रोल को बता कर जाना होता था कि कहां जा रहे हैं और आपको कैसे सम्पर्क किया जा सकता है। मोबाइल का जमाना नहीं था। बहुधा आप अगर रेलवे के तंत्र के बाहर हैं तो रेलवे नियंत्रण कक्ष से किसी न किसी को रवाना किया जाता था किसी भी एमरजेंसी की दशा में।

और वह मण्डल (रतलाम) ऐसा था कि एमरजेंसियाँ होती ही रहती थीं। ट्रेनों का पटरी से उतरना, वैगनों का ऊंचाई पर अन-कपल होना, रेलखण्ड का घण्टे भर से ज्यादा बिना सूचना के किसी अनहोनी से बंद रहना या फिर सीधे सीधे सवारी गाड़ी की दुर्घटना आम थे। दिल्ली और बम्बई से ट्रेने‍ सपाट रेल पर चलती चली आती थीं पर रतलाम – गोधरा खण्ड, जो सत्तर प्रतिशत गोलाई, टनल और ग्रेडियेण्ट पर था, वहां असली दिक्कत होती थी परिचालन की। … सो मैंने सिनेमा देखना ही बंद कर दिया। वही आदत अभी तक कायम है।

भुवन शोम में उत्पल दत्त

खैर, एग्रेरियन महोदय की सलाह पर मैंने “भुवन शोम” खोजी। किसी ओटीटी प्लेटफार्म पर नहीं मिली। यू-ट्यूब पर थी पूरी डेढ़ घण्टे की फिल्म। डाउन लोड की और देर रात तक देखी मोबाइल पर। काली-सफेद, 35 एमएम का पर्दा वाली फिल्म। धीरे चलने वाली। मारधाड़ विहीन। पर क्या गजब फिल्म! मृणाल सेन और उत्पल दत्त तो कालजयी हैं! बनफूल (बलाई चंद मुखोपाध्याय) की कहानी पर बहुत जानदार फिल्म बनाई है उन्होने।

भुवन शोम में पक्षियों की तलाश में गंवई पोशाक में उत्पल दत्त और गौरी (सुहासिनी मुळे)

और फिल्म भी मेरे पुराने विभाग, रेलवे के इर्दगिर्द है। रेल की सम्भवत: यातायात सेवा का अफसर है भुवन शोम (उत्पल दत्त)। काम के बोझ से उकता कर एकबार पक्षियों के शिकार पर निकलता है। छोटे से स्टेशन पर टिकेट कलेक्टर है साधू मेहर। उसकी चार्जशीट लगभग तय कर चुका है भुवन शोम। भ्रष्टाचरण के सिद्ध चार्ज में वह नौकरी से हाथ धो बैठेगा।

पक्षियों की तलाश में उत्पल दत्त जिस गांव में जाता है वहां उसकी सहायता को मिलती है लड़की गौरी (सुहासिनी मुळे), जिसका गौना साधू मेहर से होने वाला है। सरल, निश्छल गौरी उत्पल को बहुत प्रभावित करती है और वापस जा कर वह अधिकारी साधू मेहर को बुला कर डांट लगाता है, पर उसकी चार्जशीट रद्द कर देता है।

भयभीत, पर भ्रष्ट साधू मेहर। उसको उत्पल दत्त डांटता है, पर चार्जशीट रद्द कर देता है।

फिल्म सरकारी अफसर की मोनोटोनी, ऊब, मानवीय सम्वेदना और अपनी कड़े अफसर की ओढ़ी इमेज के अनुसार स्वयम को प्रमाणित करने की चाह (या जिद) को बखूबी दर्शाती है। उत्पल दत्त की जगह लगभग पूरे फिल्म के दौरान मैं अपने को देखता रहा। और उसने बहुत सी यादें कुरेद दीं। (बाई द वे; कुरेदना, सुरसुरी या गुदगुदी का एक प्रसंग भी फिल्म में है जिसमें गाड़ीवान बैलोंंको उनके पृष्ठ भाग में सुरसुराता-खोदता है जिससे वे तेज दौड़ें।)

शिकार करने गया उत्पल दत्त। उनकी गोली से कोई चिड़िया नहीं मरती!

मुझे याद हो आयीं अपने द्वारा दी गयी या निपटाई चार्जशीटें। जब मैंने असिस्टेण्ट डिविजनल ऑपरेशंस सुपरिण्टेण्डेण्ट (एओएस) के रूप में ज्वाइन किया था तो मेरी टेबल पर सौ से ज्यादा चार्जशीटें थीं; जिन्हे मेरे पहले वाले अफसर जारी कर गये थे और वे पेण्डिंग थीं। वे सभी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की चार्जशीटें थीं। नौकरी से गायब रहना, हुक्म न मानना, दारू पी कर ड्यूटी करना, मारपीट, एक से ज्यादा पत्नी होना, यात्रियों से अभद्र व्यवहार आदि अनेक विषय उनमें दर्ज थे।

ट्रेन ऑपरेशंस का जो बोझ था, उसके सामने इन चार्जशीटों का निपटारा करना अंतिम वरीयता रखता था। विभाग में मेरे ऊपर के अफसर इस बात की फिक्र नहीं करते थे कि कितनी चार्जशीटें मैंने निपटाईं। उनकी वरीयता ट्रेन का परिचालन थी। केवल एस्टेब्लिशमेण्ट अधिकारी के रिपोर्ट पर, जिसमें हर अफसर के नाम के आगे उनके पास पैण्डिंग चार्जशीटों के आंकड़े होते थे, मण्डल रेल प्रबंधक जरूर कहा करते थे। एक दो डिस्प्लेजर नोट भी दिये उन्होने। पर चूंकि व्यक्तिगत रूप से वे मुझे बहुत पसंद करते थे; उनके डिस्प्लेजर नोटों की ज्यादा फिक्र नहीं करता था मैं।

और फिक्र करता भी तो क्या? मेरे पास यातायात परिचालन की चौबीसों घण्टे की ड्यूटी के आगे समय ही नहीं बचता था कि चार्जशीटों का निपटारा करूं। मैंने काम के बोझ में अपने परिवार की ओर भी बहुत कम ध्यान दिया। उसका उलाहना मेरा परिवार अब भी देता है और वह अब भी मुझे कचोटता है।

दारू पी कर ड्यूटी करना मेरी निगाह में बहुत बड़ा गुनाह था। शायद इस लिये भी कि मैंने कभी शराब छुई नहीं। मैंने दो तीन कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया इस चार्ज पर। और बहुत हल्ला मचा। यूनियन वाले भी चिल्लाये। मेरे सीनियर (जो बहुत कुशल अधिकारी थे पर बहुत ज्यादा शराब के शौकीन भी थे) ने मुझसे कहा – “यार, तुम तो गजब अफसर हो। दारू पीने पर नौकरी ले लेते हो।” जाहिर है, उन्होने सभी मामलों में अपील पर नौकरी से निकालने की सजा रद्द कर दी, पर थोड़ा बहुत प्रसाद तो देना ही पड़ा कर्मचारियों को!

लेकिन मेरे व्यक्तित्व की प्रारम्भिक सालों की कड़ाई ज्यादा टिकी नहीं। मैं यह समझ गया कि चार्जशीट देना दुधारू तलवार है। उससे अपना भी काम बहुत बढ़ता है। चार्जशीट देने की बजाय मौके पर डांटना, फटकारना, फजीहत कर भूल जाना कहीं बेहतर है। और, इसके उलट कर्मचारियों को उनकी गलती बता कर सुधारना और भी बेहतर।

डांटने फटकारने के लिये मुझे “थानेदारी” भाषा सीखनी पड़ी। भीषण अपशब्द तो मेरी भाषा में नहीं आये, पर व्यंग और आवाज की पिच बढ़ाने से वह प्रभाव डालने में अधिकांशत: सफल रहा।

समय के साथ व्यक्तित्व के खुरदरे पत्थर घिस कर पर्याप्त चिकने बन गये। समय ने और मेरे बेटे की दुर्घटना ने मुझे बहुत सिखाया।

मेरे जूते उतारने के पौने दो साल पहले जब मैं गोरखपुर में परिचालन विभाग का अध्यक्ष बना तो मेरे पूर्ववर्तियों द्वारा अनुशासनात्मक प्रक्रिया के लगभग तीस अपील के मामले पेण्डिंग थे। पहले के कई विभागाध्यक्ष उन्हे बिना निपटाये चले गये थे। अपने गोपनीय सचिव रमेश चन्द्र श्रीवास्तव जी की विशेष सहायता से (उन्होने नियमों, धाराओं और पूर्व में निपटाये मामलों को बड़ी दक्षता से नत्थी कर मुझे निर्णय लेने में सहायता की) एक एक कर उन अपीलों का निपटारा किया। येे अपील कर्मचारी के लिये विभागीय सुप्रीम कोर्ट के समान थीं। मुझसे ऊपर कहीं सुनवाई उनके लिये सम्भव नहीं होती।

मैंने लगभग हर एक मामले में सहृदयता खुले दिल से दिखाई। कुछ उसी तरह, जिस तरह उत्पल दत्त ने साधू मेहर की चार्जशीट फाड़ कर दिखाई थी। मेरा यह कृत्य मेरे रेल के प्रारम्भिक दिनों से 180 डिग्री उलट था। मैं अपने में काफी बदलाव ला चुका था।

मुझे सहृदय बनाने के लिये कोई रेल के इतर घूमने और वहां किसी गौरी (सुहासिनी मुळे) से मिलने का अवसर नहीं मिला; पर समय के थपेड़ों ने वह काम बखूबी किया। हां, वह सब इतना धीरे धीरे हुआ कि मुझे पता भी न चला। रिटायर होने के बाद जब मैंने अपने व्यवहार का विश्लेषण किया तो पाया कि दो ढाई दशकों में वह बदलाव आया। वह ऐसे आया कि मैं अपने तनाव, शरीर और मन की उपेक्षा और रोज रोज की चिख चिख से अपने को असम्पृक्त नहीं कर सका। अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।

पर जो होना था, वह हुआ! अपनी गलतियां सुधार कर नये सिरे से दूसरी पारी खेली जा सकती है, पर पहली पारी फिर खेलने को तो नहीं मिलती, किसी को भी।

“अगर वह सीख लेता – और उसके प्रति सचेत रहता – तो आज कहीं बेहतर शारीरिक/मानसिक दशा में होता। नींद के लिये दवाई लेने की आदत छूट चुकी होती। हाइपर टेंशन, मधुमेह आदि न होते और एक दशक में चार बार अस्पताल में भरती होने की नौबत न आती।”

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