भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
शीला मास्टरानी अध्यापिका नहीं है। वह गांव की दलित बस्ती की महिला है। उसका पति कुशल बुनकर है। बुनकरों का प्रमुख। उसे शायद मास्टर कहा जाता हो और उसके कारण शीला को मास्टरानी का सम्बोधन मिल गया है। वैसे भी, शीला में आत्मविश्वास झलकता है।
शीला मेरी बिटिया के खेत की अधियरा है। बिटिया यहां नहीं रहती इसलिये मेरी पत्नीजी खेती का प्रबंधन देखती हैं। प्रबंधन के नाम पर कुछ खास नहीं करना होता। मौके पर यही पता करना होता है कि गेंहू या धान की फसल कितनी हुई और आधे के आधार पर कितनी फसल बिटिया की बनी। वह बताने ही शीला साल में दो-चार बार मेरी पत्नीजी से मिलती है।
कल गेहूं की फसल के बारे में बताने वह सवेरे आई थी। उस समय हम सवेरे की चाय पी रहे थे। शीला के लिये चाय बनाने को रखी गयी। इस बीच मैने उससे कालीन बुनकरी के बारे में पूछा।
शीला का पति, रमापति,’बाहर’ काम करता था। एक दशक पहले गांव वापस आ गया। महानगर ने उसे शायद व्यवसाय-वृत्ति सिखाई हो। उसके पहले यहां गांव में कालीन बुनकर का काम वह जान और कर चुका था। दोनो गुणों के योग से उसने घर पर ही गलीचे बुनने की चार खड्डियां लगाईं। उनपर सात लोग नियमित काम करते हैं। रमापति कारपेट व्यवसाइयों से कच्चे माल को लाने और बुने हुये गलीचे देने का प्रबंधन करता है। उसके अलावा वह बाबूसराय के कारपेट व्यवसायी के यहां काम भी करता है। अपनी मोटर साइकिल पर व्यवसायी के कारखाने आता-जाता है। खड्डी लगाने के जो आमदनी के आंकड़े मुझे शीला ने बताये, उसके अनुसार महीने में तीन सप्ताह के लगभग काम करने वाले कारीगर/मजदूर को 5-6 हजार रुपया महीना मिल जाता होगा। शीला और रमापति की घर के बुनाई केंद्र प्रबंधन से आमदनी 12-14 हजार प्रति माह होनी चाहिये। यह कंजरवेटिव आकलन है।
शीला ने बताया कि खड्डी बिठवाने में उसकी एक लाख के आसपास की पूंजी लगी है। इसमें कैपीटल और रनिंग दोनो प्रकार के व्यय शामिल हैं।
एक लाख की पूंजी, उद्यमिता और लगन – उस सब के बल पर शीला-रमापति दम्पति अपना परिवार पाल रहा है और सात अन्य लोगों को गांव में काम मुहैय्या करा रहा है। जितनी आमदनी वे कारीगर/मजदूर यहां गांव में पा रहे हैं, उससे दुगनी पगार अगर महानगर में मिलती तो ही पासंग में बैठती। रमापति का लोगों की जिंदगी में, उनके रोजगार में योगदान निश्चय ही बहुत ही सराहनीय है।
मैने शीला से कहा कि उनके घर पर उनकी खड्डियां देखना चाहूंगा। मैं सात – दस लोगों को नियमित कारोबार देने के लिये मैं एक दो लाख पूंजी लगाने की सोच सकता हूं। पर मुझमें वह उद्यमिता नहीं है। मैं केवल रमापति-शीला जैसे लोगों के बारे में लिख भर सकता हूं!
शीला का चित्र खींचने के लिये मेरी पत्नीजी आगे आईं।
गांवदेहात में दो-चार प्रतिशत लोग रमापति-शीला जैसे हों तो रोजगार की समस्या का निदान हो जाये। उनके लिये पूंजी की उपलब्धता तो सरकार देख ही सकती है।
शीला मास्टरानी की बातचीत में अदब, सजगता और आत्मविश्वास सब है। वह गांवदेहात में कम ही नजर आता है। मुझे उसके चित्र की आवश्यकता थी, उसके बारे में लिखने के लिये। चित्र खींचने के लिये मेरी पत्नीजी आगे आईं। चित्र खिंचवाने में शीला में, आमतौर पर जो झिझक ग्रामीण महिलाओं में होती है, नहीं थी। उसका आत्मविश्वास मुझे अच्छा लगा।
अपने संकल्पों की देशाटन यात्राओं से निपट कर लगभग छ महीनों से प्रेमसागर अपने गांव में हैं। बिहार में जीरादेई-सिवान के आसपास, उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा है उनका गांव। मेरे मन में कौतूहल था यह जानने का कि उनके मन में पुन: यात्रा की सनक उठती है या नहीं। उनसे पूछने की देर थी, और उन्होने अपनी सोच उधेड़ कर रखनी शुरू कर दी – “कुछ समय बाद निकलना है भईया। प्रयाग से गुड्डू मिश्रा जी भी कह रहे थे। साल में एक बार पंजाब से पाकिस्तान की हिंगलाज देवी के शक्ति पीठ तक बड़ा जत्था जाता है। उसी में शामिल हो कर बलूचिस्तान तक जाना है।”
प्रेमसागर की जो आदत बन गयी है उसके अनुसार वे दिन भर चल तो सकते हैं, पर ठहरने के लिये उन्हे बिस्तर और भोजन की जरूरत तो होती ही है। देश के अलग अलग हिस्सों में इसपर खर्च भी अलग अलग है। पर मोटे अनुमान से रोज 800-1000 रुपये का खर्च तो बैठता ही है। उसका इंतजाम शुरुआत में चलने के कारण ही हुआ। आखिर कितने लोग हैं जो नित्य चालीस-पचास किलोमीटर चल सकते हैं। वह भी दिनों-महीनों तक। अनजान जगहों में। वह लोगों को अभूतपूर्व लगा। उसके साथ प्रेमसागर ने अनुभवों को मुझे प्रेषित किया और मैने उसपर लिखा। जुगलबंदी ने काम चलाया। पर अब वह कठिन प्रतीत होने लगा है। जुगलबंदी हाँफने लगी। पढ़ने वालों को भी वह रुटीन लगने लगा।
वे एक समूह में चलने वाले पदयात्री होते तो शायद इतनी मुश्किल नहीं होती। तीन चार लोग हों तो कहीं भी मंदिर के ओसारे में रुक सकते। वे मिल कर भोजन बना सकते। और उनके पास शेयर करने के लिये कहीं ज्यादा रोचक ट्रेवलॉग हो सकते थे। वैसा होता नहीं दीखता। प्रेमसागर एकाकी पदयात्री रहे हैं। और अपनी प्रवृत्ति बदलना, समूह की तलाश करना कठिन काम है।
तब प्रेमसागर को क्या करना चाहिये? मेरे ख्याल से प्रेमसागर को लंबी यात्राओं की परिकल्पना करने की बजाय अपनी गांव की दिनचर्या कुछ इस प्रकार की बनानी चाहिये जिसमें धर्म, आस्था और यायावरी सब सध जाती हो।
प्रेमसागर के गांव से घाघरा नदी 14 किमी की कौव्वा उड़ान दूरी पर है।
मैने गूगल मैप पर उनके गांव की लोकेशन देखी। उनका गांव घाघरा/सरयू नदी से चौदह किलोमीटर कौव्वा उड़ान की दूरी पर है। प्रेमसागर को प्रति सप्ताह (हर सोमवार) या प्रति मास (हर अमावस्या) नदी तक जा कर जल ले कर आना चाहिये और गांव के शिवालय में शंकर भगवान को अर्घ्य देना चाहिये। इसमें यात्रा का ध्येय भी सिद्ध होगा, धर्म भी सधेगा और उनकी कांवर यात्रा का चरित्र भी सतत बरकरार रहेगा।
प्रेमसागर के घर के आसपास कई छोटी बड़ी नदियां हैं। हर नदी की अपनी कथायें हैं। “फलानी नदी तो उस रास्ते में पड़ती है जब रामचंद्र जी विवाह के बाद बारात के साथ मिथिला से अयोध्या लौट रहे थे। बारात प्यासी थी और राम जी ने एक ही बाण मार कर पानी का सोता सृजित कर दिया था। वह बाणगंगा मेरे गांव से तीन किलोमीटर दूर है।” – प्रेमसागर ने बताया। इसी प्रकार अन्य नदियों की अपनी अपनी कथायें हैं। समय के साथ ये नदियां अब सूख गयी हैं या बरसाती नदियों में तब्दील हो गयी हैं। उन नदियों की यात्रा और उनका ऐतिहासिक-पर्यावरणीय विवरण प्रेमसागर दे सकते हैं। इसके लिये ऐसा नहीं कि उन्हें बहुत शोध करना होगा। यह जो चला/देखा/सुना/अनुभव किया के आधार पर ही किया जा सकता है।
प्रेमसागर के घर के आसपास कई छोटी बड़ी नदियां हैं। हर नदी की अपनी कथायें हैं।
हमारे आसपास का बहुत सा मिथक, इतिहास और लोक जीवन ऐसा है जिसको लिखा जा सकता है। प्रेमसागर उसका निमित्त बन सकते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्राओं और शक्तिपीठ यात्राओं ने प्रेमसागर के व्यक्तित्व का यह देखने और रिपोर्ट करने का पक्ष मांज दिया है। उस गुण का प्रयोग होना चाहिये।
मेरे कहने पर प्रेमसागर एक दिन निकले अपने आसपास को देखते-सहेजते हुये। सवेरे की गोल्डन-ऑवर की रोशनी में चित्र भेजे। कई तरह के दृश्य। साइकिल सम्भाले उनके पिताजी हैं। प्रेमसागर का कहना है कि उनके पिताजी अब भी पांच-सात किलोमीटर साइकिल चलाते हैं। रोज। उनके परिवेश में जिउतिया की चौरियां दिखती हैं। खेतों में फसल है और कऊड़ा तापते लोग हैं। चाय की दुकान वाला है। सब कुछ सामान्य सा है पर कौन कहता है कि सामान्य अभूतपूर्व नहीं होता। प्रेमसागर को वह अभूतपूर्व पक्ष उभारना चाहिये। भौगोलिक यात्रा की जगह जीवन की यात्रा का पक्ष सामने आना चाहिये।
देखते हैं, प्रेमसागर क्या करते हैं। वे गांव के शिवाला पर घाघरा नदी से जल ला कर शंकर जी को चढ़ाने का रुटीन बनाते हैं या नहीं। या फिर पुन: किसी लम्बी यात्रा पर निकलना चाहते हैं? (बहुत से लोग प्रेमसागर जी के बारे में पूछते रहे हैं। सो मैंने यह पोस्ट लिखी। उनके बारे में बहुधा मैं सोचता रहा हूं। लिखने का अवसर नहीं बना था…)
पिछले नौ-दस सप्ताह से हम – मेरी पत्नीजी और मैं – चक्रीय ताल अर्थात सरकेडियन रिदम (Circadian Rhythm) के आधार पर दिनचर्या (मुख्यत: भोजन) को नियमित करने का प्रयास कर रहे हैं। उस प्रक्रिया में शरीर और स्वास्थ्य में बहुत अनुकूल और सुखद परिवर्तन हो रहे हैं।
इस विधा (सरकेडियन रिदम और इंटरमिटेंट फास्टिंग) का नाम हम काफी अर्से से सुनते आ रहे थे, पर अंतत प्रेरित हुये भारतीय मूल के वैज्ञानिक सच्चिदानंद पण्डा जी के यूट्यूब पर उपलब्ध सामग्री के द्वारा। सच्चिदानंद पण्डा जी अमेरिका के साल्क इंस्टीट्यूट में जीवविज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके बारे में जो सामग्री मुझे नेट पर दिखती है उससे लगता है कि वे नोबेल प्राइज मटीरियल हैं। कभी उन्हें नोबेल मिलता है तो मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत प्रसन्नता होगी।
वे विद्वान हैं और सरल भी। उनका उच्चारण बनावटी अंग्रेजी का नहीं है, उसमें उडिया पुट है जो मुझे आकर्षित करता है। उनके नाम में पण्डा है जो बताता है कि वे उत्कल के ब्राह्मण हैं जिनके पूर्वज उत्कल के राजा द्वारा वाराणसी से पुरी ले जाये गये रहे होंगे जगन्नाथ मंदिर के प्रतिष्ठा-यज्ञ में श्रोत्रिय के रूप में। और (सम्भवत:) यूपोरियन मिश्र, द्विवेदी, तिवारी, शुक्ल और पाण्डेय किसी न किसी प्रकार से उड़िया ब्राह्मणों से जुड़े हैं। अन्य उपनाम तो यथावत मिलते हैं पर उत्कल मेंं पंडा और अवध-पूर्वांचल में पाण्डेय सम्भवत: एक ही हैं – सरयूपारी जीन! वाराणसी/प्रयाग और पुरी का एक हजार साल पुराना सम्बंध तो है ही, कम से कम!
सच्चिदानंद पण्डा जी, यूट्यूब से
सच्चिदानंद पण्डा जी की चक्रीय ताल – सरकेडियन रिद्म – पर आम जनमानस के लिये दो पुस्तकें हैं। वे दोनो मैने पढ़ी हैं। उनकी मधुमेह विषयक पुस्तक को ऑडीबल पर शुरू से अंत तक सुना भी है। अब उनके एप्प “माई सरकेडियन क्लॉक (myCircadianClock)” पर रजिस्टर कर पिछले 68 दिनों से दस घण्टे के भीतर भोजन सीमित करने के प्रयोग में भाग भी ले रहा हूं।
पंडा जी की पुस्तकें
मैं और मेरी पत्नीजी सवेरे चार-पांच बजे उठते हैं। पैदल चलने और साइकिल चलाने के बाद सवा सात बजे पहली चाय पीते हैं। शाम सवा पांच बजे अंतिम भोजन कर रात साढ़े नौ बजे सोने चले जाते हैं। रिटायरमेण्ट का लाभ यह है कि गांव में रहते हुये हमारी दिनचर्य्या नियमित है। देर रात तक क्लब में शरीक होने या घर के बाहर डिनर पर जाने की कोई बाध्यता नहीं है। हम बड़ी सरलता से अपना भोजन नियत समय में समेट पा रहे हैं। और भोजन भी घर का ही बना होता है।
जब हमने प्रारम्भ किया था तो 11-12 घण्टे में अपना भोजन सीमित कर रहे थे। धीरे धीरे हमने अपने भोजन को और भी संकरी समय खिड़की में समेटा। अब लगभग पौने दस घण्टे में भोजन कर रहे हैं। नित्य चौदह घण्टे से अधिक का उपवास हो रहा है।
यह सब परिवर्तन हम क्यों कर रहे हैं? उस सवाल के उत्तर देने के लिये पहले चक्रीय ताल के सिद्धांत पर जाया जाये। सच्चिदानंद पंडा जी का कहना है कि पृथ्वी पर दिन रात का चक्र होने के कारण जीव उसी के आधार पर सोने जागने का अपना चक्र चलाते हैं। प्रत्येक कोशिका में एक घड़ी है जो दिन रात के क्रम का आकलन करती है और उसी आधार पर कोशिका का संचालन होता है। जैसे किसी शहर की सभी घड़ियां शहर के क्लॉक टावर से मिलाई जाती थीं, वैसे ही शरीर की कोशिकाओं की घड़ियां दिमाग में उपस्थित मास्टर-क्लॉक से सिक्रोनाइज होती हैं। आधुनिक युग में जब हम दिन और रात का अनुशासन नहीं मान रहे तो यह हमारा यह मास्टर क्लॉक ही गड़बड़ा गया है। उस मास्टर घड़ी की गड़बड़ी से पेट की समस्यायें, अनिद्रा, तनाव, मधुमेह और यहां तक की केंसर भी – ये सभी उपजते हैं। पंडा जी के चूहों पर किये गये प्रयोग से यह सामने आया है कि अगर भोजन को नियत समय-खिड़की में अनुशसित कर दिया जाये तो मास्टर क्लॉक की सही मरम्मत की जा सकती है। जीवन सुधर सकता है। कालांतार में सीमित आधार पर मनुष्यों पर किये गये प्रयोग से यह धारणा सही प्रमाणित हुई है।
मैं अपना जीवन देखता हूं। रेलवे अधिकारी के रूप में दशकों से मेरी नौकरी अनियमित समय काम करने की रही। मेरा सवेरा पांच बजे शुरू होता था और देर रात तक फोन पर लगे रहना होता था। उसके अलावा भी कभी भी मुझे किसी अनहोनी घटना पर निर्णय देने के लिये रात में जगा दिया जाता था। और वैसी घटनायें होती ही रहती थीं। मेरा सरकेडियन रिद्म तो बहुत ही टूट गया था और यह टूटन दशकोंं से थी और अब भी है।
मेरे बब्बा प्राइमरी के हेड मास्टर थे। गांव में घर के आसपास ही उनकी जिंदगी चली। सवेरे भोर में उठते थे और दिन में एक बार ही भोजन करते थे। एकादशी को अलोना (बिना नमक का भोजन) किया करते थे। बिजली नहीं थी तो सूरज की रोशनी ही उनकी गतिविधियां चलाती थी। वे अपने समय के हिसाब से लम्बा जिये – अठ्ठासी साल। ज्यादा भी चलते, पर नब्बे के दशक के आते आते गांव में कुटुम्ब व्यवस्था का क्षरण होने लगा था और उनकी पर्याप्त देखभाल करने वाला नहीं था। तब वे हमारे पास शहर आये और शहरी जीवन उन्हें रास नहीं आया। गांव में उनका वही नियमित जीवन रहता तो वे शतायु जीवन पाते। उनकी मास्टर क्लॉक बहुत सही काम करती थी। वैसे भी वे घड़ी का प्रयोग नहींं करते थे। सूरज की रोशनी और उसमें छाया की लम्बाई से ही समय का आकलन किया करते थे।
अपने बब्बा – पण्डित महादेव प्रसाद पाण्डेय की तर्ज पर अगर मेरा भी सरकेडियन रिद्म सही हो जाये और मेरे पास वर्तमान चिकित्सकीय बैक-अप भी रहे तो शतायु जीवन सम्भव है। बावजूद इसके कि रेलवे की तनाव भरी अनियमित जिंदगी ने अनिद्रा, तनाव, उच्च रक्तचाप और मधुमेह प्रसाद के रूप में थमा दिये हैं, पर अब भी जीवन पटरी पर लाया जा सकता है। और इस विषय में सच्चिदानंद पंडा जी की रिसर्च आकर्षक लग रही है।
और मेरी पिछले दस सप्ताह में चक्रीय ताल की जद्दोजहद उसका प्रमाण देती है। पता नहीं सच्चिदानंद जी को उनकी रीसर्च में मेरी केस-स्टडी सहायक होगी या नहीं; पर मेरा प्रयोग कुछ प्रकार से अनूठा जरूर है –
मेरे जीवन के चार दशक रेल परिचालन की चौबीसों घण्टे की काम में डूबी जिंदगी में सरकेडियन रिद्म बुरी तरह टूटा रहा है। पिछले तीन दशक मैं नित्य नींद की दवा के बल पर रहा हूं। ये दशक उच्च रक्तचाप के भी रहे हैं और दो दशक से डायबीटीज और थायराइड की दवा भी चलती रही है। कम से कम आधा दर्जन बार मैं एक सप्ताह या उससे अधिक समय के लिये अस्पताल में भांति भांति की व्याधियों से भरती रहा हूं। कई बार तो अस्पताल में मेरे सिरहाने फोन और परिचालन-कण्ट्रोल फोन भी दिया गया था जहां से मैं ट्रेनों के परिवहन से अवगत रहूं और आवश्यकता पड़ने पर निर्णय भी दे सकूं। बहुधा कार्य अस्पताल में भी पछियाये गया! मैं शिफ़्ट ड्यूटी में कभी नहीं रहा। उसके उलट मैं चौबीसों घण्टे की ड्यूटी पर पूरी कामकाजी जिंदगी बिताता रहा। :lol:
मेरी पत्नीजी याद करती हैं कि तीन दशक पहले अस्पताल में मैं सरवाइकल दर्द में भरती था। मेरी परिचालन की पोजीशन शीटें, जो नित्य ट्रेन-परिचालन का तीस पन्ने का दस्तावेज हुआ करता था, मेरे कण्ट्रोल का चपरासी अस्पताल के कमरे में देने आया। डाक्टर साहब ने देख लिया और वह पोजीशन चपरासी से छीन कर जोर से चिल्लाये – तुम लोग अपने साहब को अस्पताल में भी नहीं छोड़ रहे हो। आगे से अस्पताल में घुसना मत!
रिटायरमेण्ट के बाद यद्यपि मैने सारा तनाव छोड़ गांव में रीवर्स माईग्रेशन किया और एक साइकिल ले कर गांव-गंगा भ्रमण का रूटीन बनाया पर दवाओं ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। रेलवे अस्पताल से मंझले साइज का एक थैला भर दवायें हर महीना मुझे मिलती हैं। मेरी और मेरी पत्नीजी की दवायें। उनमें अधिकांश मेरे लिये होती हैं।
सन 2023 के उत्तरार्ध में मैने तय किया कि बहुत हुआ। मैने नींद की दवा लेना बंद कर दिया। भीषण विथड्रॉवल सिम्प्टम्स हुये। पर वह सब मैने झेला। कई रातें अनिद्रा में गुजरीं। पर अंतत: दवा से अपना पीछा छुड़ा लिया। मेरी नींद बिना दवा के चार घण्टे की हुआ करने लगी। चार घण्टा नींद मानक से पूरी तरह अपर्याप्त है, पर यह भी मेरे लिये एक बड़ी उपलब्धि थी।
अब चक्रीय ताल के दस सप्ताह के अनुशासन से नींद में एक पायदान आगे का लाभ हुआ है। मेरी नींद चार घंटे से बढ़ कर छ घण्टे से अधिक की हो गयी है। किसी किसी दिन तो आठ घण्टे भी सरलता से सो पा रहा हूं। उठने पर मेरी ऊर्जा का स्तर कहीं बेहतर है। रात में नौ बजे बिस्तर पर जाने के पंद्रह मिनट में नींद आ जा रही है। पहले घण्टों नींद आने की प्रतीक्षा किया करता था। इनसोम्निया की समस्या समाप्त ही हो गयी है।
मेरा वजन भी, कई दशकों में पहली बार सामान्य की सीमा में आया है। रेल सेवा के दौरान यह 74 किलो हुआ करता था। एक बार तो 78 किलो तक भी गया। सन 2015 में रिटायरमेण्ट के समय 71-72 किलो था। धीरे धीरे गांव की जिंदगी में यह 68 किलो पर स्थिर हुआ। चक्रीय ताल के प्रयोग में शुरू में तेजी से वजन कम हुआ। शायद समय-कुसमय चरने पर अंकुश लगने से। उसके बाद कम होने की रफ्तार धीमी हुई पर अब भी वजन कम हो रहा है। इस समय मेरा वजन 63किलो है। चालीस साल में पहली बार मेरा बीएमआई 24 पर आया है, जो सामान्य वजन और ऊंचाई का अनुपात है। मैं Obase से Overweight होते हुये अब Normal Weight की सीमा में आ गया हूं। इस वजन कम होने के लाभ मुझे दिख रहे हैं। नींद बेहतर है, व्यग्रता लगभग मिट गई है और शरीर में ऊर्जा का स्तर बेहतर हुआ है।
बेहतर नींद, व्यग्रता में कमी और वजन का सामान्य स्तर पर आ जाना – इन सब का लाभ मुझे मेरे मधुमेह (डायबीटीज) के आंकड़ों मेंं हुआ है। मेरा फास्टिंग शूगर 126-130एमजी/डीएल हुआ करता था। अब यह 110 से कम रहने लगा है। एक दिन तो यह 95 भी रिकार्ड किया मैने। मेरा तीन महीने का औसत एचबीएवनसी आंकड़ा 6.4 या उससे अधिक होता था। दो दिन पहले यह 6.2 आया। आगे तीन महीने बाद ही सही लाभ का आंकड़ा बन पायेगा, पर अब मुझे लगता है कि दो तीन महीने बाद मेरी मधुमेह और रक्तचाप की दवायें कम हो सकेंगी!
आगे के जीवन के बारे में नजरिया बदला लगता है। पहले जीवन की दीर्घायु के लक्ष्य धुंधले लगते थे; अब उनमें स्पष्टता आती जा रही है। आशावादिता में अभूतपूर्व सुधार है। नकारात्मकता को चिमटी से पकड़ कर बाहर निकालने की इच्छा-शक्ति प्रबल होती जा रही है।
रेलवे अस्पताल से मंझले साइज का एक थैला भर दवायें हर महीना मुझे मिलती हैं। मेरी और मेरी पत्नीजी की दवायें। उनमें अधिकांश मेरे लिये होती हैं।
चक्रीय ताल के ये लाभ और लोगों को भी हो रहे होंगे। बिना किसी खर्चे के यह सब होने के कारण स्वास्थ्य उत्पादों और दवा कम्पनियों को निश्चय ही कष्ट हो रहा होगा। एक स्टडी सामने आ रही है कि चक्रीय ताल के प्रयोग से दिल की बीमारी बढ़ने की सम्भावना है। यह स्टडी बिना किसी पीयर रिव्यू के और अपर्याप्त तथा संदिग्ध आंकड़ों पर आर्धारित है। मेरे ख्याल से यह सब चक्रीय ताल की सही अवधारणा से लोगों को भ्रमित करना और सरकेडियन रिद्म के शोध को डीरेल करना है।
मैं और मेरी पत्नीजी सच्चिदानंद जी की रीसर्च से बम बम हैं। पंडा जी की जय हो! :-)
[पोस्ट के हेडर और सच्चिदानंद पंडा जी विषयक चित्र उनसे सम्बंध इंटरनेट सामग्री के स्क्रीनशॉट हैं]