गांव का नाई

दो नाऊ की गुमटियां आबाद दिखीं। उनके पास करीब चार साइकलें खड़ी थीं। कोरोना लॉकडाउन समय में दो नाई काम पर लगे थे और आधा दर्जन लोग वेटिंग लिस्ट में थे।


ट्विटर और फ़ेसबुक पर कई लोगों ने हजामत सम्बन्धी लॉकडाउन युगीय पीड़ा व्यक्त की है। उनका कहना है कि लॉकडाउन से उबर कर जब बाहर आयेंगे तो बहुत से मित्रों को उनकी शक्ल पहचान में नहीं आयेगी। कुछ का कहना है कि बाल-दाढ़ी-मूंछ इतने बढ़े होंगे कि वे भालू लगेंगे।

इसमें निश्चय ही अतिशयोक्ति है। पर यह जरूर है कि नाई की दुकान शहरों में बन्द है। गांव में उतनी दारुण दशा नहीं है।

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कोरोना और किराना

कोरोना का काल हमें कोहनिया रहा है कि हम गांव वाले बनें। किराना के सामान के प्रकार और गुणवत्ता को ले कर व्यक्तित्व में जो अफ़सरी तुनक बाकी रह गयी है (रिटायरमेण्ट के चार साल बाद भी) वह खतम होनी चाहिये। चॉकलेट की बजाय गुड़ की भेली और नूडल्स की बजाय देसी सेंवई पर सन्तोष करना चाहिये।



एक महीने का राशन इकठ्ठा कर लिया था जनता कर्फ़्यू के पहले। फ़िर लॉकडाउन हुआ। अब लॉकडाउन 2.0 होने जा रहा है। गांव से बाहर निकलने की सम्भावना ही नजर नहीं आ रही। वैसे भी महीने का एक बार सामान बनारस या इलाहाबाद के बिगबाजार/स्पैन्सर्स के स्टोर से लिया करते थे। अब वहां जाना कहां हो पायेगा?

कार में बीस लीटर तेल भरवा लिया था लॉकडाउन के पहले। उसके बाद से कार खड़ी ही है। ड्राइवर भी समझ गया है कि कहीं निकलना होगा ही नहीं। सो उसने हाजिरी लगाना बन्द कर दिया है। अब महीना बीतने पर पैसा लेने के लिये ही दर्शन दिये उसने।

एक गाड़ी आने लगी थी घर पर किराने का सामान ले कर। दो तीन बार आयी, फ़िर आना बन्द हो गया। उस गाड़ी वाले को शायद घर घर सप्लाई करना पूरता नहीं था। या यहां गांव में पर्याप्त ग्राहकी नहीं बन सकी थी। … वैसे भी सामान की क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी कि उसकी प्रतीक्षा हो।

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ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था गम्भीर संकट में नहीं लगते

कटाई करने वाले ही नहीं, ईंट भठ्ठा मजदूर, आनेवाले पेट्रोल पम्प की दीवार बनाते आधा दर्जन लोग, सूखते ताल में मछली पकड़ते ग्रामीण, ठेले वाले, किराना की दुकान में छोटे वाहन से हफ़्ते भर की खेप लाने वाले, कटाई के बाद खेत से बची हुई गेंहू की बालें बीन कर जीवन यापन करने वाले, धोबी, नाई .. ये सब काम पर लगे हैं। ग्रामीण जीवन और अर्थव्यवस्था (लगभग) सामान्य है।


टेलीवीजन जो दिखाता है वह अर्धसत्य है। उसके कर्मी उतने कुशल नहीं हैं, जितने अन्य देशों (विशेषकर) अमेरिका के हैं। वे चिल्लाचिल्ला कर टिल्ल सी बात को “बड़ी खबर, बड़ी खबर” के नाम से दिन भर बांटते रहते हैं। सरकारी फीड पर जिंदा रहने वाले परजीवी हैं – अधिकांश। एक और नौटंकी – पैनल डिस्कशन की बिसात बिछा कर रोज करते हैं। वही घिसेपिटे चेहरे जो अपने घर के ड्राइंगरूम से उन्ही की तरह बिना शिष्टाचार के चबड़ चबड़ एक दूसरे पर बोलने वाले हैं, उन पैनल डिस्कशन के घटक होते हैं। देखना बंद कर दिया है मैंने।

निकोलस क्रिस्टॉफ का एक लेख है न्यूयार्क टाइम्स में। शीर्षक है – Life and Death in the ‘Hot Zone’। जरा देखिये और पढ़िये। उसमें एक डॉक्यूमेण्ट्री है। उसका स्तर देखिये। क्रिस्टॉफ कहते हैं कि रिपोर्टिन्ग वैसी ही कर रहे हैं वे लोग, जैसे युद्ध के संवाददाता करते हैं।

हमारे यहां कोरोना वायरस पर युद्ध स्तर की रिपोर्टिंग करने वाले संवाददाता विरले हैं। गिनेचुने। … यह मत मैने आजकल की रिपोर्टिंग देख कर नहीं बनाया। पहले भी ऐसा सोचता रहा हूं। हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्ण युग में हिन्दी के कई पत्रकार हिन्दी ब्लॉग लिखा करते थे; उस समय उनके स्तर को बहुत बारीकी से ऑब्जर्व किया था मैने। और बहुत से घटिया थे। स्नॉब और स्तरहीन। प्यूट्रिड!


ग्रामीण जन जीवन की बहुत रिपोर्टिन्ग मीडिया में नहीं है। मैं सर्च करता हूं तो अन्दाज लगता है कि 20-30 करोड़ के आसपास लोग खेती-किसानी या उससे सम्बन्धित कार्य पर निर्भर हैं। और वह दिखता भी है। पर मीडिया रिपोर्ताज में वह गायब है।

“कहां कोरोना? इस ओर कोई कोरोना नहीं है। इस तरफ़ तो गेंहू की कटाई की धूल है।”

खडंजे की खराब सड़क से गुजरते हुये एक गेंहू की कटाई करने वाले के पास रुकता हूं। सोशल डिस्टेंसिंग के नॉर्म के आधार पर उससे दूरी बनाये बनाये पूछता हूं – यह मास्क काहे पहन रखा है?

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रवींद्रनाथ दुबे – एन.आर.वी. और शहर-गांव का द्वंद्व

रवींद्रनाथ जी अपने गांव से हर समय किसी न किसी प्रकार जुड़े रहे हैं। वे मेरी तरह “बाहरी” नहीं हैं।


अगर एन.आर.आई. होते हैं – नॉन रेजिडेण्ट इण्डियन तो वे लोग जो गांव छोड़ कर लम्बे अर्से से मेट्रो शहरों में रहने लग गये हों और जिनकी अगली पीढ़ी वहीं पली-बढ़ी हो; वहीं के सपने देखती हो; वहीं के आचार-विचार-व्यवहार जीती हो; उन लोगों को एन.आर.वी. – नॉन रेजिडेण्ट विलेजर (Non Resident Villager) कहा जा सकता है। इस गांव के श्री रवींद्रनाथ दुबे जी को उस श्रेणी में रखा जा सकता है।

श्री रवींद्रनाथ (सुभाष) दुबे जी

आज रवींद्रनाथ जी गांव (विक्रमपुर) से लसमणा की प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पर सवेरे की सैर करते मिल गये। मैँ साइकिल से वापस लौट रहा था और वे आगे जा रहे थे। बोले कि बड़े डरते डरते घर से निकले हैं। हाइवे पर उन्हे आशंका थी कि कोरोनावायरस सम्बंधी लॉकडाउन में कहीं कोई पुलीस वाला न मिले और अपनी लाठी के जोर पर अभद्रता न कर बैठे। उनके पास एक बढ़िया चमकती बेंत वाली छड़ी थी। पैण्ट और बंडी पहने थे। साफ और सुरुचिपूर्ण वेश। उनका चेहरा सवेरे की सूरज की रोशनी में चमक रहा था। वे अत्यंत शरीफ और सरल लगते हैं। बहुत ही प्रिय और मोहक व्यक्तित्व है उनका।

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गाँव देहात और गंगा तट का एकांत

सुबह शाम सूरज की किरणें, गंगा नदी का बहाव, बबूल के झुरमुट और उनके झाड़ों पर उखमज (पतिंगे) वैसे ही हैं, जैसे थे। किसी आयरस-वायरस का कोई प्रभाव नहीं।


सामाजिक दूरी में प्रकृति से दूरी बनाना शामिल नहीं है। शहरों में सड़कें वीरान हैं तो वन्य जीव उनपर विचरने चले आ रहे हैं – ऐसी खबरें आये दिन आ रही हैं। सामाजिक अलगाव जो रिक्तता उपजाता है, प्रकृति उसे भरने के लिये पंहुच जाती है।

यहाँ, गांवदेहात में, कोविड19 के कारण लोग सतर्क हैं, पर अपना कामधाम किये जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था के रुक जाने का हाहाकार शहर में ज्यादा है। गांव में तो लोग सरसों की कटाई-दंवाई कर चुके। अरहर कट रही है। गेंहूं की फसल तैयार है और कहीं कहीं किसान ने कटाई शुरू भी कर दी है।

अरहर की खेप ले जाने को सड़क पर खड़ा ठेला (सगड़ी)।

भेड़-बकरी चराने वाले उसी तरह चरा रहे हैं, जैसे पहले चराते थे। गांव का किराने के सामान वाला वैसे ही दुकान खोलता है, जैसे पहले खोलता था। पाही पर चाय बनाने और समोसा तलने वाला भी अपनी गुमटी पर बैठता है। डण्डा फटकारने वाली पुलीस का यहां कोई हस्तक्षेप नहीं।

एक गेंहू के खेत में मुझे आवाज से लगा कि वहां फसल कटाई चल रही है। पर ध्यान से देखने पर पता चला कि एक नीलगाय का झुण्ड खेत में है और खड़ी फसल चर रहा है। मेरे पास कैमरा नहीं था और मोबाइल के कैमरे से मात्र अहसास सा ही दर्ज हुआ उस झुण्ड के कद्दावर पुरुष-नीलगाय का।

खेत में बायें जो धब्बा दिख रहा है, वह कद्दावर नीलगाय है। मुझसे उसकी दूरी 15 मीटर रही होगी।

बच्चों पर सोशल अलगाव का ज्यादा असर नहीं पड़ा है। वे खाली पड़े खेतों और सड़कों पर आइस पाइस, कबड्डी या क्रिकेट खेलते दिख जाते हैं। सुबह भी और शाम को भी।

बाकी, सुबह शाम सूरज की किरणें, गंगा नदी का बहाव, बबूल के झुरमुट और उनके झाड़ों पर उखमज (पतिंगे) वैसे ही हैं, जैसे थे। किसी आयरस-वायरस का कोई प्रभाव नहीं।

केवल कुछ वयस्क लोग दिखते हैं मुँह ढंके।

(पोस्ट के चित्र लेने की कवायद में किसी व्यक्ति के पास आने का न प्रयास किया गया और न कोई आसपास आया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हुआ।)


गांव में रिहायश – घर के परिसर की यात्रा : रीता पाण्डेय

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!


रीता पाण्डेय (मेरी पत्नीजी) कोरोनावायरस के लॉकडाउन समय में नित्य एक – दो पन्ने लिख रही हैं। किसी भी विषय में। शायद रोज लिखना ही ध्येय है। भला हो इस कोविड19 के कठिन समय का कि यह लेखन हो रहा है। मेरे जिम्मे उस लेखन को टाइप कर ब्लॉग में प्रस्तुत करने का काम रहता है। वह करने में भी एक आनंद है।

प्रस्तुत है, रीता पाण्डेय की आज की पोस्ट –

पति के रिटायरमेंट के बाद, अगले ही दिन, हमारे रहने की जगह बदल गयी। घर में उनकी दिनचर्या में बहुत बदलाव आया। पर मेरी दिनचर्या लगभग वैसी ही रही। आखिर, मैं तो रिटायर हुई नहीं थी; और होना भी नहीं चाहती।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है। आजकल कोरोनावायरस के लॉकडाउन के समय में उसी परिसर में मेरी यात्रा होती है। सुबह की चाय का ट्रे बाहर बराम्दे में रखने के बाद जब नजर घुमाती हूं तो लाल गुड़हल के फूल आमंत्रित करते हैं। कुछ फूल भगवान के चरणों में समर्पित करने के लिये रख लिये जाते हैं तो कुछ डाल पर मुस्कराने के लिये छोड़ दिये जाते हैं।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है।

उसके पास बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन। अचानक अमरूद पर नजर जाती है। दो साल पहले लगाया था। तेजी से बढ़ा है पौधा। पिछली साल दो बार फल दिये थे। अभी उसमें फिर फूल खिलने की तैयारी हो रही है।

बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन।

अमरूद की तरफ ही पपीता है। वह भी फल देता रहा है और देने को तैयार हो रहा है। कलमी आम के वृक्ष तो कई हैं पूरे परिसर में। दो-तीन साल पहले लगाये गये। उनकी ऊंचाई ज्यादा नहीं बढ़ेगी। पर उनपर भी बौर आये हैं और अब टिकोरे लग रहे हैं। सामने की क्यारियों में कोचिया कुछ उदास करते हैं, पर उन्ही के साथ गमलों में लगाये कोचिया स्वस्थ हैं। उन्हे देख प्रसन्नता होती है। चम्पा के पत्ते तो पूरी तरह झड़ चुके हैं। अब उनका कलेवर बदल रहा है।

गुड़हल की कई किस्में हैं। कई रंग।

फागुन से पीला गुड़हल भी खिलने लगा। गुलाब तो अपने शवाब पर है! हल्का गुलाबी अमेरिकन गुड़हल पर भी कलियां लगने लगी हैं।

पीले अलमण्डा की बेल ऊपर तक चली गयी है। अचानक नजर गयी तो उसकी फुनगी पर कुछ फूल भी नजर आये। इस बार भयानक बारिश और उसके बाद कड़ाके की लम्बी चली सर्दी में कई पौधे गल-मर गये। ऐसा लगा कि कई पौधे नर्सरी से लाकर फिर से लगाने पड़ेंगे। पर पाया है कि अपराजिता फिर से हरियरा गयी है और झुलसी तुलसी में नये पत्ते आ गये हैं।

कुछ ही वर्षों में पेड़ और बेलें घर को आच्छादित कर देंगे।

घर के पीछे की ओर भी कई पौधे हैं। कई बेलें। वहां एक लीची का पौधा भी लगाया है। गंगा के इस इलाके में चलेगा या नहीं, अभी देखना बाकी है। नीबू का झाड़ हरा भरा है। उसमें कई फूल लगे पर फल लगने के पहले ही झर गये। शायद अगले सीजन में लगें, जब झाड़ और बड़ा हो जायेगा। दिया तो गंधराज कह कर दिया था नर्सरी वाले नें। देखें, क्या निकलता है!

नीम के किशोर वृक्ष हर तरफ हैं। उनके सारे पत्ते झर चुके हैं और नये आ रहे हैं। कुछ ही दिनों में ये हरे भरे हो जायेंगे। केले का एक गाछ है। पिछली बार उनके पेड़ पर प्राकृतिक तरीके से पके केलों का स्वाद ही निराला था। और फल कई दिन रखने पर सड़े-गले नहीं थे।

केले का गुच्छा।

घर के पीछे एक नल है। नौकरानियों के लिये एक प्रकार का पनघट। वे यहां हाथ पांव धोने, नहाने, कपड़ा कचारने, नाश्ता-भोजन करने और बतकही/पंचायत के लिये आती हैं। आजकल यह कोरोनावायरस के लॉकडाउन के कारण वीरान जगह है। इस जगह पर अब बर्तन भर मांजे-धोये जा रहे हैं।

इसी नल के पास एक पारिजात – हारसिंगार – का वृक्ष है। उसकी बगल में चार साल की उम्र का पलाश। पलाश के फूल इस साल देर से आये हैं। हमारे इस पलाश में तो पहली बार ही आये हैं। अभी नया नया पेड़ बना है ये पलाश।

पहली बार फूला है पलाश

घर की इस यात्रा में और भी छोटे मोटे पड़ाव हैं। पीछे चारदीवारी में खेत की ओर जाने का एक छोटा गेट है, जिससे गेंहू का खेत दिखता है। उसके आगे सागौन के पेड़ हैं। घर के ऊपर – दूसरी मंजिल के ऊपर सोलर पैनल है। वहां खड़े हो कर गांव का हराभरा दृष्य बहुत सुंदर लगता है।

घर के पोर्टिको में गमले हैं। उनमें लगे पौधे अपनी आवश्यकता अनुसार मुझे बुलाते रहते हैं। किसी को पानी चाहिये होता है, किसी को धूप या किसी को छाया। कोई कोई तो मानो बात करने के लिये ही बुलाता है। वे हरे भरे होते हैं तो मन प्रसन्न होता है। कोई बीमार हो जाता है तो मन खिन्न होता है। बिल्कुल किसी परिवार के सदस्य की दशा देख कर।

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!