बढ़ती उम्र में धर्म का आधार


सही मायने में वानप्रस्थ का अनुभव तो मैने किया ही नहीं। अभी भी राजसिक वृत्ति पीछा नहीं छोड़ती। लोगों, विचारों और परिस्थितियों की सतत तुलना करने और एक को बेहतर, दूसरे को निकृष्ट मानने-देखने की आदत जीवन से माधुर्य चूस लेती है।

चक्रीय ताल की दिनचर्या


आगे के जीवन के बारे में नजरिया बदला लगता है। पहले जीवन की दीर्घायु के लक्ष धुंधले लगते थे; अब उनमें स्पष्टता आती जा रही है। नकारात्मकता को चिमटी से पकड़ कर बाहर निकालने की इच्छा-शक्ति प्रबल होती जा रही है।

बनियान में छेद


साबुन की बट्टी के ऑप्टिमल खर्च पर भी एक शोध करना है। अभी तीन बनियान नई खरीदी हैं जिनका प्रयोग पोस्ट स्वावलम्बन युग में होगा। उनकी दीर्घजीविता और उनके छेदों के आकार प्रकार पर भी अध्ययन होगा।

Design a site like this with WordPress.com
Get started