कोलाहलपुर में केवट नहीं हैं। उनके पास नावें नहीं हैं। धन्धा भी मछली पकड़ने का नहीं है उनका। अधिकांश मजदूरी करते हैं, खेतिहर हैं या बुनकर। सवेरे गंगा किनारे वे शौच, दातुन और स्नान के लिये आते हैं। नहाने के बाद कुछ धर्मपारायण हनुमान जी या शिवजी के मन्दिर जाते हैं तो पास ही मेंContinue reading “मछली पकड़ना और फोटोग्राफ़ी”
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गड़ही, बेलपत्ता और बाबा विश्वनाथ
सवेरे वे बच्चे गड़ही के पानी में गीला कर रहे हैं गठ्ठर। उसके बाद उनकी माँ यह ले कर बनारस जाएगी। गदौलिया में बाबा विश्वनाथ मंदिर के पास बेलपत्ता की सट्टी लगती है। वहां बेच कर वो वापस लौटती है।
कोलाहलपुर और मुर्दहिया
कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं। मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। परContinue reading “कोलाहलपुर और मुर्दहिया”
