बाबा मिल गये उर्फ नागाबाबा जीवन गिरि


एक जगह एक शिवलिंग जैसा कुछ दिखा हाईवे के किनारे एक चबूतरे पर। चबूतरे पर उस ‘शिवलिंग’ के चारों ओर वृत्ताकार नहीं, वर्गाकार पानी निकलने का रास्ता था। पानी निकलने का मार्ग उत्तर दिशा में नहीं, पूर्व की ओर था। कोई भी शिवलिंग देखते समय आजकल विश्वेश्वर मंदिर और ज्ञानवापी की याद हो आती है। यह अजीबोगरीब ‘शिवलिंग’ देख कर मेरे मन में एक ब्लॉग पोस्ट का हेडिंग फ्लैश किया – बाबा मिल गये।

अगर वह शिवलिंग होता तो वह छोटा-मोटा स्कूप हो गया होता। पर मैंने साइकिल रोक कर जब ध्यान से वह देखा तो उसमें पूर्व की तरफ एक गवाक्ष नजार आया। गवाक्ष जिसमें दिया रखा जा सकता हो या किसी देवी-देवता के लिये अक्षत-फूल रखा जाता हो। फिर भी वह क्या था, यह मेरे लिये अभी कंफ्यूजिंग था।

पास की एक इमारत, जो मंदिर नुमा चीज थी, की ओर जा कर मैंने किसी व्यक्ति से पता करने का प्रयास किया। वहां एक साधू फर्श धो रहा था। उससे पूछा – “वह चबूतरे पर क्या है? शिवलिंग है?

उस बूढ़े साधू ने उत्तर दिया – आंधी आइ रही। धूल अऊर खरपतवार भरि ग रहा। सबेरे सवेरे धोये परत बा (आंधी आई थी। धूल और पत्तियों से फर्श बहर गया था। सवेरे सवेरे सफाई करनी पड़ रही है।)

उस बूढ़े साधू ने उत्तर दिया – आंधी आइ रही। धूल अऊर खरपतवार भरि ग रहा। सबेरे सवेरे धोये परत बा (आंधी आई थी। धूल और पत्तियों से फर्श बहर गया था। सवेरे सवेरे सफाई करनी पड़ रही है।)

यह साफ था कि बुढ़ऊ ऊंचा सुनते हैं। उन्होने अंदाज से मुझे उत्तर देना शुरू कर दिया था। मैंने उनके कान के पास जा कर जोर से अपना प्रश्न दोहराया। तब उनका उत्तर मिला – “ऊ जूतिया हौ। मेहरारुन क थान। संकर जी नाहीं। संकर जी त इहाँ हयेन ( वह जूतिया है – जूतिया माई। शंकर जी का स्थान नहीं। शंकर जी तो मंदिर में हैं)।”

मंदिर के अंदर जा कर देखा। हनुमान जी का मंदिर था। गेरू-तेल में लिपटी आदमकद हनुमान जी की प्रतिमा। उसी के बगल में एक दीर्घवृत्ताकार स्थान में शिवलिंग और नंदी थे। मंदिर की दीवार पर पूरी हनुमान चालिसा लिखी थी और दीवार का रंग-प्लास्टर उखड़ रहा था। यह तो स्पष्ट हो गया कि हनुमान जी और शंकर जी की कृपा से मंदिर बन जरूर गया है, पर उसपर लक्ष्मी जी की पर्याप्त कृपा नहीं बरस रही। इतने सारे मंदिर बन गये हैं कि लक्ष्मीजी अपने लिमिटेड फंड में कितना अलॉकेट करें इस जैसे मंदिर को।

हनुमान जी का मंदिर था। गेरू-तेल में लिपटी आदमकद हनुमान जी की प्रतिमा। उसी के बगल में एक दीर्घवृत्ताकार स्थान में शिवलिंग और नंदी थे। मंदिर की दीवार पर पूरी हनुमान चालिसा लिखी थी और दीवार का रंग-प्लास्टर उखड़ रहा था।

मेरे चित्र लेते देख कर बाबाजी बोले – कुछ दान भी करिये।

सवेरे मैं पर्स ले कर नहीं निकलता। मोबाइल से पैसा लेने की सुविधा बाबाजी के पास तो हो नहीं सकती थी। मैंने अपनी असमर्थता जताई तो बाबा जी से फिर भी जोर मारा – “दसई-पांच रुपिया दई द (दस पांच रुपया ही दे दीजिये)।”

वह मैं कर नहीं सकता था। उनसे कहा कि अगले दिन पर्स ले कर आऊंगा तो दूंगा। फिर बाबाजी से उनका परिचय पूछा। उन्होने बताया कि उनका नाम है – नागा बाबा जीवन गिरि। जूना अखाड़ा। हनुमान मंदिर। बनारस। पच्चीस साल से यहां पर हैं। तब से जब यह सड़क नहीं होती थी। आगे बहुत जमीन थी।

उनका नाम है – नागा बाबा जीवन गिरि। जूना अखाड़ा। हनुमान मंदिर। बनारस। पच्चीस साल से यहां पर हैं।

जूना अखाड़ा के नागा साघू बहुत से मंदिरों में इधर दिखते हैं मुझे। लगता है जूना अखाड़ा थोक में साधुओं को सधुक्कड़ी का डिप्लोमा देता है और बाद में उन सबको इधर उधर छोटे-बड़े मंदिरों में खाने कमाने की फ्रेंचाइज भी प्रदान करता है। अभी भी इतना धरम करम समाज में शेष है कि एक बड़ी जमात नागा साधुओं की – जो नग्न रहने की बजाय गमछा या भगई लपेटे रहते हैं और गले में भांति भांति की कौड़ी-रुद्राक्ष-तुलसी आदि की माला आदि का मेक-अप साधे रहते हैं; आसानी से खप गयी है। इन नागा साधुओं के ग्रामीण परिवेश में सोशियो-कल्चरल-रिलीजियस कण्ट्रीब्यूशन पर एक शोध कार्य किया जा सकता है। शायद किसी बंधु ने किया भी हो।

मंगल गिरि

कभी मैं भी आसपास के आठ दस नागा बाबाओं से अपने आदान प्रदान के आधार पर कुछ लिख सकता हूं। रिटायरमेण्ट के बाद पहला साधू जो गांव में मिला था – मंगल गिरि – वह भी जूना अखाड़ा का था। उसने मुझे चिलम में गांजा भर पीने का पहली बार डिमॉन्स्ट्रेशन किया था। अब वह यहां दीखता नहीं। या यह भी हो सकता है, मैंने घूमना कम कर दिया है। … निकलो जीडी, घूमो और नागा बाबाओं का ही सही, कुछ तो अध्ययन करो।


बीमारी के बाद सुंदर


बार बार बीमार होता रहता है सुंदर शर्मा यानी हमारा घर आने वाला नाऊ। साठ से ऊपर की उम्र हो गयी। मुझसे कम उम्र होगी पर ज्यादा छीज गया लगता है। पिछली बार ढाई-तीन महीने पहले बाल काटने आया था। उसके बाद अब आना हुआ। इस बीच बीमार पड़ा था। लड़कों के पास बम्बई गया। वहां एक लड़का ऑटो चलाता है। लोन ले कर खरीदा है। बताया कि अब मोबाइल से ही पैसा पेमेण्ट मिलता है। रविवार और छुट्टी के दिन खास कमाई नहीं होती। जब सरकार चलती है, दफ्तर खुलते हैं, तब ग्राहक मिलते हैं। कभी ग्राहक बहुत मिलते हैं तो कभी कम। दूसरे लड़के की हीरा तराशने के काम में नौकरी है। पचीस हजार महीना मिलता है। उसके पास पी.एफ. की भी सुविधा है। उसके या घर वाले लोगों के बीमार होने पर इलाज की भी सहूलियत है। सुंदर का इलाज उसी के माध्यम से हुआ। सुंदर उसके परिवार में उसके डिपेण्डेण्ट की तरह दर्ज होगा।

बाल काटने के बाद वह मेरी पत्नीजी को बुलाता है और सही काटने का अप्रूवल वही देती हैं।

सुंदर का दिल का इलाज-ऑपरेशन भी हुआ और पोस्ट ऑपरेशन केयर भी फ्री में हुई। वर्ना बकौल सुंदर “ढ़ाई तीन लाख खर्चा आता”। फ्री में इलाज भी बड़े अस्पताल में हुआ और वहीं पर सभी दवायें, भोजन फ्री में मिला। अस्पताल से छुट्टी मिलते समय अठारह हजार की एक महीने की दवायें भी फ्री में मिली।

लड़के की ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर की नौकरी का लाभ वास्तव में बहुत है। वर्ना सुंदर का इलाज हो ही नहीं पाता। आज सुंदर मेरे बाल काट रहा था। वर्ना या तो बहुत बीमार रहा होता या फिर.. क्या हुआ होता उसकी कल्पना भी दुखद है। मुझे लगा कि आयुष्मान जैसी चिकित्सा बीमा योजना वास्तव में बहुत कारगर सुविधा होगी। बशर्ते उसका सही सही और व्यापक क्रियान्वयन हो।

सप्ताह भर सुंदर अस्पताल में भर्ती रहा। बताता है कि हाथ की कलाई के पास दो चीरे लगाये थे और एक तार डाल कर उसी से इलाज किया था। दस पंद्रह घण्टा आपरेशन चला होगा। उसकी सुध नहीं है सुंदर को। उस समय उसे बेहोशी की दवा दी गयी थी। घर का कोई आदमी उसके पास नहीं था। पिछले महीने बाईस तारीख को वह वापस लौटा है गांव। महीना भर होने को आया। अब तबियत ठीक है। अब थोड़ी बहुत जजमानी भी निपटा दे रहा है वह। वैसे जजमानी का ‘पौरुख’ नहीं है। ज्यादा जगह छोटे भाई का लड़का है, वही जाता है। अभी घर ने जजमानी का परित्याग नहीं किया है। करने का इरादा भी नहीं झलका सुंदर की बात से। मेरे घर बाल काटने भी इसी लिये चला आया है सुंदर।

बाल काटने के बाद वह मेरी पत्नीजी को बुलाता है और सही काटने का अप्रूवल वही देती हैं। उसके बाद वह मेरी कनपटी के बेतरतीब उगे बाल काट कर चम्पी-अनुष्ठान करता है – यद्यपि उसके हाथों में बहुत जोर नहीं है। चम्पी के बाद झाड़ू ले कर वह फर्श पर बिखरे कटे बाल समेटता है। पत्नीजी उसे उसक मेहनताना देती हैं। मेरा मन होता है कि उसकी बीमारी के मद्देनजर उसको ज्यादा – डबल – दे दिया जाये; पर वह पत्नीजी को पसंद नहीं आता। वे रेट नहीं बिगाड़ना चाहतीं। सुंदर को अलग से कभी दे दिया जाये वह उन्हें मंजूर है।

लड़के की ऑर्गेनाइज्ड सेक्टर की नौकरी का लाभ मुझे स्पष्ट होता है। मुझे यह भी दिखता है कि सरकारी नौकरी की बदौलत में पेंशन याफ्ता हूं और मुझे काम करने की बाध्यता नहींं।उसके उलट दिल का ऑपरेशन करवा कर लौटने के महीना भर बाद ही सुंदर को काम में जुटना पड़ रहा है जब कि उसकी उम्र भी साठ पार की हो चुकी है। आशा करता हूं कि आगे सुंदर की जितनी भी जिंदगी है; जितने भी साल या दशक उसे जीना है; वह स्वस्थ जिये। जिंदगी न केवल लम्बी हो वरन काम करने लायक हो। वह पिछ्ले कुछ सालों में बार बार बीमार पड़ा है। कुटुम्ब का सहारा उसे मिलता रहा है। पर दैनिक जीवन जीने के लिये उसे उद्यम तो करना ही पड़ा है। वह करता रहे तो शायद जिंदगी सरलता से चल जाये। मैं सुंदर शर्मा की जिंदगी सरल, सहज और रीजनेबली कम्फर्टेबल हो; उसकी कामना करता हूं। सुंदर से अगली मुलाकात जुलाई-अगस्त में होगी। तब तक मेरे बाल एक बार और बढ़ कर कटने लायक हो जायेंगे।

सुंदर के औजार

इस बीच जब भी सुंदर से राह चलते मुलाकात होती है, मैं उसके स्वास्थ्य पार निगाह डालता हूं और वह मेरे बालों पर। कई बार वह टिप्पणी करता है – “अबहियाँ त ढेर नाहीं बढ़ा हयें। अबअ न कटाये।”

वह और में एक हेयर कटिंग से दूसरी तक अपनी मुलाकात टालते हैं। पर मेरे और उसके बीच एक बॉण्ड तो बन ही गया है। :-)

वह और में एक हेयर कटिंग से दूसरी तक अपनी मुलाकात टालते हैं। पर मेरे और उसके बीच एक बॉण्ड तो बन ही गया है।

चारधाम यात्रा सम्पन्न – बद्रीनाथ को जल अर्पण किया प्रेमसागर ने


यात्रा कठिन है और असल समस्या शायद पैसों की है। प्रेमसागर के साथ मैंने डिजिटल यात्रा की है करीब दो हजार किलोमीटर की। उससे भी ज्यादा की। उनके साथ एक बार लूट भी हुई और बीच में यह भी लगा कि स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पर कभी इस प्रकार की समस्या नहीं आयी। रात को खुले में रहा नहीं जा सकता पहाड़ की एक हजार मीटर की ऊंचाई पर। कमरे या डॉर्मेट्री में बिस्तर के डेढ़ दो हजार मांगते हैं। उतना देना अखर रहा है प्रेमसागर को। सोच रहे हैं कि तीन दिन की यात्रा किसी तरह दो दिन में पूरी हो सके। एक बार बस बद्रीनाथ के दर्शन हो जायें, उसके बाद तो बस पकड़ कर सीधे ऋषिकेश/हरिद्वार पंहुचेंगे वे। वहां पंहुचने पर समस्या नहीं होगी। फिर हरिद्वार से गाड़ी पकड़ कर बनारस आने पर तो सब दिक्कत खतम!

नंदप्रयाग से आगे की यात्रा में पहली चाय की दुकान वाले सज्जन

लोग मैदान की गर्मी से बेहाल पहाड़ की तरफ रुख कर रहे हैं। पारा उनचास डिग्री तक चला गया है। प्रेमसागर को पारा चढ़ने से नहीं, पहाड़ में हर सुविधा के बेतहाशा पैसे लगने और देने पर दिक्कत हो रही है। नंद प्रयाग के आसपास उन्हें गुफायें दिखीं। गुफा देखते ही मन होने लगा कि ठहरने को ऐसी एक गुफा मिल जाये तो कितना अच्छा हो। उन्होने बताया कि इन गुफाओं में तो तपस्वी लोग नहीं रहते – शायद पुलीस या फोर्स वाले गुफाओं पर कब्जा नहीं जमाने देते। पर गंगोत्री-गोमुख में कई गुफाओं में तपस्वी रहते हैं। वहां एक गुफा में रहते बाबा को प्रेमसागर ने कहा था कि उनके लिये भी एक गुफा जुगाड़ दें। पर तपस्वी ने उत्तर दिया कि उन्हीं लोगों को कम पड़ रही है गुफायें, एक और को कहां से एडजस्ट किया जाये। :lol:

बकौल प्रेमसागर ये गुफायें हैं बड़े काम की। गर्मियों में ठण्डी और सर्दियों में गर्म रहती हैं। कितना बढ़िया हो कि शहर में तीन बीएचके फ्लैट की बजाय जोशीमठ के आसपास वन बीएचके गुफा मिल जाये। तब वहां रह कर एक बीएचके गुफा के जीवन पर पुस्तक लेखन का यत्न किया जाये। :-)

नंदप्रयाग से आगे पड़ी एक गुफा।

मैदान की आबादी दौड़ रही है हिमाचल-हिमाद्रि की ओर। और उन्हीं भर से हिमालय नहीं भर गया; बाबाओं की भी भरमार से त्रस्त हो गया है! :-)

जैसा प्रेमसागर मुझे बताते हैं – केदार या बद्रीनाथ उनके लिये धार्मिक पर्यटन नहीं, एक यात्रा की अनिवार्यता है, जो उन्हें संसाधनों की कमी के बावजूद पूरी करनी है। इसलिये जितनी जल्दी पूरी हो जाये उतना अच्छा। जरूरत से क्षण भी अधिक प्रेमसागर वहां रुकने वाले नहीं लगते।

मौसम खराब होता रहता है। वे सोचते है‍ कि आगे की यात्रा कम से कम समय मे‍ पूरी कर ले‍, पर मौसम कभी कभी साथ नही‍ देता। वे एक दिन पहले मुझे कहते है‍ कि कल 35 किमी चलने का प्रयास करेंगे पर चल मात्र पच्चीस, या उससे कम ही, पाते हैं। पच्चीस किलोमीटर भी कम नही‍ है पहाड़ पर चलना।

नंदप्रयाग से पहले प्रेमसागर के पास तीन लीटर पीने का पानी था; जो यात्रा के श्रम के कारण खत्म हो गया। “भईया, बिना पानी के एक कदम चलना कठिन हो रहा था। ऐसे में एक कार से जाते लोगों को उन्होने हाथ से इशारा किया। कार कुछ आगे जा कर रुकी। उन लोगों ने पास आ कर एक लीटर पानी की बोतल दी। मानो अमृत दिया। “महादेव ने ही उनके जरीये कृपा की…” प्रेमसागर ने दिन भर की गतिविधियों का विवरण देते बताया।

नंदप्रयाग में नंदाकिनी (नीचे) और अलकनंदा का संगम

तेरह मई की शाम को प्रेमसागर कर्णप्रयाग में थे। अलकनंदा और पिण्डर नदी के संगम स्थल पर। चौदह की शाम वे नंदप्रयाग पंहुच गये थे। वहां नंदाकिनी और अलकनंदा का संगम है। नंदाकिनी का रंग नीला-हरा है और अलकनंदा का सफेद-मटमैला। वे उत्तरोत्तर अनेक नदियों के संगम स्थल से गुजरेंगे। अनेक प्रयाग आयेंगे। सभी तीर्थ हैं और सभी दर्शनीय। हिमालय का चप्पाचप्पा दर्शनीय है।

अगले दिन वे पीपलकोटी पंहुच कर रहने के लिये कोई जगह तलाश रहे थे। पर यात्रियों की भीड़ के कारण कमरा/बिस्तर मिलना कठिन था। मिल भी रहा था तो दो हजार रुपये के आस पास। अंतत: कुछ आगे जा कर एक स्थान मिला जहां मोलभाव/छूट के बाद आठ सौ लगे। प्रेमसागर के पास धन की समस्या होगी जरूर। उन्होने बार बार मुझसे कहा कि जल्दी से जल्दी वे बद्रीनाथ दर्शन कर वहां से अगली बस पकड़ना चाहते हैं।

पर्यटक – और धार्मिक पर्यटक भी – बद्रीनाथ दर्शन कर वहां से हेमकुण्ट या फूलों की घाटी देखने का मन बनाते हैं। इतनी दूर हिमाद्रि के गोद में आना वंस इन लाइफटाइम जैसा अनुभव होता है। व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा समेटना चाहता है। अगली बस पकड़ कर लौटने की नहीं सोचता। मैने प्रेमसागर से पूछा – क्या सरकार बिना पैसे के चलने वाले तीर्थयात्री के लिये कोई सुविधा नहीं देती। कम से काम रात गुजारने और सादा भोजन का जुगाड़। प्रेमसागर ने कहा कि वैसा कुछ नहीं दिखा। उत्तराखण्ड के मंत्री साहब का कोई सिफारिशी पत्र लाये तो उसे सरकारी गेस्ट हाउस में जगह मिल सकती है, ऐसा सुना है। पर वह चिठ्ठी पाना कोई खेल नहीं होगा। आम आदमी कहां से पायेगा?

सोलह मई को प्रेमसागर कुछ अस्वस्थ लगे। सवेरे देर से उठे और देर से यात्रा प्रारम्भ की। दिन में अठारह किलोमीटर ही चल पाये। दोपहर में मुझे बताया कि किसी स्थान पर उन्होने डेरा डाला है। इस जगह से जोशीमठ 18-20 किमी दूर है और उसके आगे 38किमी है बद्रीनाथ। जितना जल्दी वे चलना चाह रहे हैं, समय उतना ज्यादा लगता जा रहा है।

चित्र कम ले पा रहे हैं प्रेमसागर और यात्रा भी ड्रैग कर रही है। फिर भी वातावरण ही मनोरम है और कुछ चित्र लुभावने खिंच पा रहे हैं। रास्ते में चाय की दुकान, मिले यात्री – फेसबुकर्स – के साथ चित्र हैं। एक भाई-बहिन यतेंदर और नीरजा शर्मा के साथ उनका चित्र है। प्रेमसागर कहते हैं कि वे मुझे ट्विटर या फेसबुक पर जानते हैं।

नीरजा शर्मा और यतेन्दर के साथ प्रेमसागर

किसी प्रकार से चारधाम यात्रा सम्पन्न हो, इसकी आस है उन्हें। यात्रा उनके लिये अनिवार्य कृत्य है; उत्फुल्लता का कारक नहीं। पता नहीं यात्रा जब खत्म हो जायेगी, तब प्रेमसागर क्या करेंगे? खैर अभी तो उन्हें बद्रीनाथ के बाद हरिद्वार हो कर वाराणसी लौटना है और वहां से देवघर। फिर बारहों ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न होने पर एक बार गोमुख का जल ले कर रामेश्वरम जाना है। वह जाना रेलगाड़ी से होगा। कुल मिला कर अभी महीना भर लगेगा इस यात्रा-यज्ञ के सम्पन्न होने में।

उसके बाद क्या करेंगे प्रेमसागर? घर परिवार वालों को बैठ कर रोज रोज अपनी यात्रा कि कथायें सुनायेंगे या कहीं कोई आश्रम बना कर बाबाजी के रूप में स्थापित हो जायेंगे? दोनो ही दशाओं में मेरा सम्पर्क शायद ही रहे। हमारा साथ महीने भर का शेष है!

17 मई 2022 –

सवेरे साढ़े आठ बजे प्रेमसागार ने बताया कि वे अठारह किमी चल चुके। असल में कोई शॉर्टकट मिल गया। जिसमें आधी दूरी चलने से वे दूने चलने का लाभ ले पाये। सवेरे वे जोशीमठ पंहुच गये हैं। तीन बार चाय पी चुके हैं। चाय भी सस्ती मिली यहां – दस रुपया कप। पहले तो तीस रुपये तक की मिल रही थी। जोशी मठ के आगे भी शॉर्टकट का उपाय बताया है राह चलते लोगों ने। उसी का प्रयोग कर वे अपेक्षा करते हैं कि आज ही बद्रीनाथ पंहुच जायें। जोशी मठ से हिमाद्रि की शुरुआत हो गयी है। सभी कुछ हिम-आच्छादित दिखने लगा है। जैसा गंगोत्री-गोमुख और यमुनोत्री मे दीखता था। आज प्रेमसागर में जोश और उत्साह दिख रहा है। जब भी किसी शॉर्टकट का वे प्रयोग करते हैं, तो उनके बीच सहज उत्फुल्ल्ता मैंने पायी है। आज भी वैसा ही लगा।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

अभी दोपहर सवा दो बजे प्रेमसागर ने सूचना दी कि उन्होने बद्रीनाथ के दर्शन कर लिये हैं। वे वीडियो कॉल कर मंदिर के बाहर निकलते दिखाना चाहते थे, पर खराब नेटवर्क के कारण वह नहीं कर पा रहे। अब वे कुछ जलपान कर बद्रीनाथ से रवाना होंगे। उनका सामान पीपलकोटी के आगे दो किमी बाद एक लॉज में रखा है। बोलेरो जाती हैं बद्रीनाथ से। उससे वे पीपलकोटी पंहुच कर सामान ले कर रुद्रप्रयाग के रास्ते हरिद्वार जायेंगे। हरिद्वार से ट्रेन पकड़ कर बनारस।

पहाड़ का उनका मिशन – केदारनाथ ज्योतिर्लिंग और चारधाम पदयात्रा का मिशन पूरा हुआ।

बद्रीनाथ धाम पर प्रेमसागर

बद्रीनाथ धाम के चित्र देख कर लगता है कि वहां बेतहाशा भीड़ है। कोरोना प्रोटोकॉल जैसा कुछ नहीं है। कोई लाइन-कतार जैसा भी नहींं है। धर्म और श्रद्धा वश लोग-लुगाई एक साथ बिना किसी सेग्रिगेशन के, पिले पड़े हैं दर्शन के लिये।

मैंने प्रेमसागर को बधाई दी। उन्होने मेरी पत्नी और मुझे चरणस्पर्श कहा। बद्रीनाथ की व्यवस्था, साफसफाई और वहां के सामान्य रखरखाव के बारे में मैं पूछना चाहता था, पर वह फिर कभी होगा। स्टीफन एल्टर ने अपनी पुस्तक सेक्रेड वाटर्स में बद्रीनाथ की अव्यवस्था और भीड़ की बात की थी। वही अब भी दीखता है। खैर, प्रेमसागर ने किसी असुविधा या अव्यवस्था की बात नहीं की। पर वे वहां बहुत ज्यादा रुके भी नहीं। जलपान कर निकल लिये।

मेरा लैपटॉप खराब हो गया है। कल विवेक – मेरे दामाद – आये थे। वे ले कर बोकारो गये हैं। ठीक करा कर भेजेंगे। यह पोस्ट पुराने लैपटॉप, जिसका कीबोर्ड और स्पीकर काम नहीं करता; और रह रह कर स्क्रीन हैंग कर जाता है; पर किसी तरह टाइप कर पोस्ट कर रहा हूं। जिस तरह प्रेमसागर को यात्रा का जुनून है, उसी तरह लिखने और पोस्ट करने का मेरा जुनून है। दोनो में तालमेल बना रहना चाहिये।

जय बदरी विशाल। जय केदार। हर हर हर हर महादेव!


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