सुंदर नाऊ

सुंदर एक निहायत सामान्य नाऊ है। सीधा सादा। ओल्ड फैशंड। वैसे गांव में नया फैशन भी क्या होता है? मेरे घर में बाल काटता रहा है पिछले चार साल से। पिताजी थे तो हर हफ्ते आता था। उनकी दाढ़ी एक बार बनती थी सप्ताह में। रविवार को आता था। उसका बहुत इंतजार रहता था पिताजी को। न आने पर बैचैन हो जाते थे। सुंदर के लिये नहीं, दाढ़ी बनवाने के लिये। कई बार तो उसके देर करने पर अकेले घर से निकल नाई की दुकान पर जाने का उपक्रम किया था उन्होने। पर डिमेंशिया ग्रस्त पिताजी पर कड़ी नजर रखी जाती थी और उन्हें अनुनय विनय से और न मानने पर जोर देकर भी घर में रखा जाता था। अगर सुंदर एक दिन नहीं आता था तो मैं उनकी शेविंग करने की कोशिश करता या ड्राइवर के साथ उन्हे नाई की दुकान पर भेजता था।

पर सुंदर ने नागा बहुत कम किया। रेलवे स्टेशन पर अपनी गुमटी वाली नाई की दुकान में वह जितना कमाता; उससे काफी ज्यादा हमारे घर पाता था।


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पिताजी के देहावसान के बाद सुंदर की जरूरत नियमित नहीं रह गयी। मैं और मेरा लड़का, दोनो अपनी शेविंग खुद कर लेते हैं। मेरे बाल सुंदर ही काटता है, पर उम्र बढ़ने के साथ साथ बाल पतले और कम घने होते जा रहे हैं। केश कर्तन अप्रासंगिक होता जा रहा है। दो-तीन महीने में एक बार बाल कटवाने की जरूरत पड़ती है। लड़के को (या ज्यादा कहें तो उसकी पत्नी को) सुंदर का पुरनिया स्टाइल बाल काटना पसंद नहीं है। अगर विकल्प होता है तो वह बाहर सैलून पर जा कर बाल कटवाता है।

“बफर (बफे)भोज होये तो दो तीन मन की पूड़ी छनाये के बाद ही शुरू करना चाहिये। ताजा गरम देने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये। पूड़ी ठण्डी भी रहे तो कोई फरक नहीं। खाना तो इत्मीनान से हो।”

सुंदर शर्मा, नाऊ

मेरे बाल कटवाने के लिये अब सुंदर का तकाजा करना पड़ता है। इधर उधर दिखने पर मैं या मेरा ड्राइवर अशोक सुंदर को बोलते हैं आने के लिये। पर कभी सुंदर नहीं आता तो कभी हम बटोही (साइकिल) के साथ भ्रमण पर निकले होते हैं। इस कारण बाल बढ़ते चले जाते हैं। कनपटी को छूते हैं और फिर कनपटी को ढ़ंकने लगते हैं। बाल का बढ़ना बोझ सा लगने लगता है। सिर पर बालों का बोझ सामान्य से ज्यादा होने पर अकल भी कुंद होती है – ऐसा अहसास मुझे होता है। अलबर्ट आइंस्टाइन के बारे में मेरी सोच है कि वे और भी जोरदार वैज्ञानिक होते अगर उनके पास नियमित आने वाला नाऊ होता। भले ही सुंदर की तरह सीधा सादा गंवई नाऊ होता!

मेरे बाल काटता सुंदर नाऊ

कोरोना काल में सुंदर को हाथ और उपकरण साबुन से मल मल कर धोने और उसके बाद मुंह पर कस कर गमछा लपेट कर ही बाल बनाने दिया जाता था। अब संक्रमण कुछ थमने के साथ थोड़ी ढील हो गयी है। हाथ और उपकरण तो धो-पोंछ कर साफ करता ही है। उपकरण के नाम पर केवल कैंची और तोड़ कर आधा ब्लेड लगाने वाला उस्तरा भर उसका होता है। उसकी कटोरी-कंघी की बजाय घर की कटोरी-कंघी उपयोग की जाती है। शरीर के ऊपरी भाग पर गमछा/शॉल भी घर का ही लपेटा जाता है। अब वह मुंह पर गमछा नहीं लगाता। उससे कई बार कहा है कि हमारे घर के उपयोग के लिये एक कैंची और उस्तरा खरीद कर ले आये। पैसे हम देंगे। पर वह ऐसा करता नहीं। शायद अपने उपकरण पर ही हाथ सेट है उसका।

अभी काफी बिजी रहा है सुंदर। दो एक लोग सर्दी के मौसम में टपक गये तो उनके कर्मकाण्ड में वह लिप्त हो गया। कल बमुश्किल समय निकाला उसने हमारे घर के लिये। बाल काटते समय बतियाता रहा। लगभग मोनोलॉग।

“तेरही में बफर भोज (बफे खाना) रखते हैं पर पूड़ी के लिये बहुत मशक्कत करनी होती है। पांत बैठी हो तो पूड़ी देर से आने पर लोग पानी पीते बैठे रहते हैं; पर बफर में तो बहुत धक्की धक्का हो जाता है। अब फलाने के यहां तो मैंने खाया ही नहीं। बदन में वैसे भी अब जोर नहीं है। खाने में लगता तो धक्का लात खाता। बफर भोज होये तो दो तीन मन की पूड़ी छनाये के बाद ही शुरू करना चाहिये। ताजा गरम देने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये। पूड़ी ठण्डी भी रहे तो कोई फरक नहीं। खाना तो इत्मीनान से हो।”

बाल काटने के बाद वह मेरी पत्नीजी को बुलाता है – “बहिन आई क देखि ल। नाहीं त बाद में कहबू कि ठीक नाहीं कटा रहा।” बहिन (मेरी पत्नी पूरे गांव की बहिन-फुआ/बुआ हैं :-D ) आ कर बारीकी से निरीक्षण करती हैं और तब अप्रूवल होता है। पत्नी द्वारा यह लास्ट इंस्पेक्शन की सुविधा केवल गांव में ही हो सकती है। :-)

बाल काटने के बाद सुंदर सिर की मालिश अनुष्ठान की रस्म अदायगी करता है। “अब जोर नाहीं बा। उमर होई गई बा।” वह यह कहने से मालिश की गुणवत्ता के बारे में कोई शिकायत का विकल्प ही खत्म कर देता है। बदले में मैं उसे कान के अंदर और कान पर उगे बालों को ठीक से साफ करने की हिदायत देता हूं। पूरा बाल काटना पंद्रह मिनट में खतम हो जाता है। उसके बाद मेरे लड़के का नम्बर लगता है।

उसके बाद मेरे लड़के का नम्बर लगता है।

आज बाल कटाने के बाद दो तीन महीने तक सुंदर की जरूरत नहीं रहेगी। कभी कभी सोचता हूं कि पिताजी की तरह हफ्ते में एक बाद सुंदर से हजामत बनवाना शुरू कर दूं। पर अभी तक किसी नाई से अपनी दाढ़ी नहीं बनवाई। उम्र बढ़ने पर शायद नाऊ की जरूरत पड़े दाढ़ी बनाने के लिये। पर तब तक तो सुंदर भी फेज आउट हो जायेगा। उसके परिवार के लोग तो बम्बई में सैलून मेंं काम करते हैं। तब – आज से दस पंद्रह साल बाद – कोई नया सिस्टम बनाना होगा। तब तक सुंदर जैसे लोग गांव में रहेंगे, बचेंगे भी या नहीं। तब गांव गांव रहेगा कि छोटा मोटा सबर्ब हो जायेगा?

पर काहे इतना लम्बा सोचा जाये!? अभी तो सुंदर शर्मा आ ही रहे हैं!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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