युगांत – इरावती कर्वे – पुस्तक पर पॉडकास्टिकी


प्रोफेसर इरावती कर्वे, महर्षि कर्वे (भारत रत्न, डॉ॰ धोंडो केशव कर्वे ) की पुत्रवधू थीं। उन्होने बर्मा में जन्म लिया (वहीं कि नदी इरावती के नाम पर उनका नाम है) और पढ़ाई पुणे तथा जर्मनी में की। वे मानव विज्ञान शास्त्री और समाजशास्त्री थीं। उनकी मराठी पुस्तक “युगांत” पर सन 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इस पुस्तक की प्रसिद्धि के बाद, और उसको व्यापक ऑडियेंस मिले, इसके लिये उन्होने इसका अंग्रेजी अनुवाद – “Yuganta – The end of an Epoch” किया।

प्रोफेसर इरावती कर्वे और उनकी पुस्तक युगांत के अंग्रेजी/हिंदी संस्करण के कवर पेज

मूल मराठी पुस्तक का हिंदी रूपांतरण हरिभाऊ उपाध्याय जी ने किया, जो प्रो. कर्वे के देहावसान के बाद 1971 में सस्ता साहित्य मण्डल ने छापा। इस हिंदी संस्करण की प्रस्तावना काका साहेब कालेलकर की लिखी है।

हमने यह पुस्तक इण्टर्नेट आर्काइव से डाउनलोड कर पढ़ी है। मेरी पत्नीजी ने इसके हिंदी अनुवाद को तो कई बार पढ़ा है।

पुस्तक इतनी रोचक है कि हम पॉडकास्ट में नौसिखिये होने के बावजूद इस पुस्तक पर परिचयात्मक चर्चा से अपने को रोक नहीं पाये।

आप कृपया सम्बंधित पॉडकास्ट को सुनने की कृपा करें। पॉडकास्ट एप्पल पॉडकास्ट, गूगल पॉडकास्ट, स्पोटीफाई आदि अन्य प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। उसके अलावा नेट पर आप इसी पोस्ट में क्लिक कर सुन सकते हैं।

युगांत – इरावती कर्वे – पुस्तक पर पॉडकास्टिकी

आई.सी.यू. में गांव की पोखरी


कुछ साल पहले कहीं, किसी किताब में गंगा नदी की दशा दुर्दशा पर पढ़ा था – गंगा आई.सी.यू. में हैं। और लगता भी था। शिवकुटी, प्रयागराज में उनमें पानी बहुत कम होता था, रेत ज्यादा। पानी भी हद दर्जे का प्रदूषित। लाल रंग का दिखता था – लोग कहते थे कि कानपुर की टैनरियों की करतूत के कारण है। कालांतर में मैं यहां जिला भदोही के गांव में चला आया। गंगा यहां अस्वस्थ तो दिखती हैं, पर आई.सी.यू. में नहीं। यहां कोलाहलपुर या द्वारिकापुर के घाट पर कभी कभी सोंईस (मीठे जल की गांगेय डॉल्फिन) के भी दर्शन हो जाते हैं।

गंगा आई.सी.यू. में नहीं दिखतीं।

पर यहां गांव की पोखरी (जो मेरी शादी के समय में अच्छा बड़ा पोखर हुआ करता था) जरूर आई.सी.यू. में दिखा मुझे। चार दशक में वह क्या से क्या हो गया। गांव के हर व्यक्ति ने उसको अपने अपने स्वार्थ के लिये उसे उत्तरोत्तर रुग्ण बनाया है। और उसका खामियाजा अब गांव ही भुगत रहा है।

जलकुम्भी से अंटी हुई है गांव की पोखरी

मैंने गांव के आसपास 10-15 किलोमीटर के दायरे में खूब साइकिल-भ्रमण किया है। कई ताल-तलैय्ये-पोखर-गड़ही देखे हैं। बहुत से उनमें से अभी स्वस्थ और जीवंत हैं पर कई रुग्ण हैं। वे जल क्षेत्र जो गांव की आबादी के बीच हैं; उनकी दशा ज्यादा खराब है। उनमें से इस गांव – विक्रमपुर की पोखरी तो आई.सी.यू. में ही है। ज्यादा जीने की उम्मीद नहीं लगती। और आजकल उसे ले कर गांव के स्तर की राजनीति भी खूब हो रही है। अतिक्रमण और दबंगई – दोनो व्यापक दिखते हैं उसे ले कर। अतिक्रमण तो लगभग हर एक ने किया है; पर दबंगई तो उन्हीं ने दिखाई है, जिनके पास गांव की प्रभुता रहती आयी है। और पोखरी को प्रदूषित करने में सभी ने अपना (भरपूर) योगदान किया है। अत: कोई “होलियर देन दाऊ” वाला भाव रखने का अधिकारी नहीं!

उस पोखरी पर; और उसके माध्यम से जल संरक्षण की व्यापक समस्या पर मैंने और मेरी पत्नीजी ने एक पॉडकास्टिकी की है। उसमें “मेम साहब” मेरी पत्नीजी हैं। यह सम्बोधन उन्हें मेरी रेल की अफसरी के दौरान मेरे कर्मचारी और घर के भृत्य करते थे। अब तो वह फेज खत्म हो गया है। अब तो वे इस गांव की सार्वजनिक दीदिया या फुआ (बुआ) हैं!

बहरहाल वह पॉडकास्ट सुनने का आग्रह है आप से। उसे आप गूगल पॉडकास्ट, स्पोटीफाई या अन्य पॉडकास्ट माध्यमों पर सुन सकते हैं या फिर इसी पोस्ट में ही क्लिक कर श्रवण कर सकते हैं –

ICU में गांव की पोखरी – रीता पाण्डेय के साथ मानसिक हलचल की बैठकी

फेसबुक पर टिप्पणियाँ

  • लालसा दुबे – hr jagah ka whi hal hai jija ji. hmara to niji talab hai aur usi me pure gaw ka nabdan, kchda jata h. ab kre kya.aam jnta se ldai aasan nhi hai. rhna bhi h isi gaw me. kya kre. (हर जगह का वही हाल है जीजा जी। हमारा तो निजी तालाब है और उसमें पूरे गांव का नाबदान, कचरा जाता है। आम जनता से लड़ाई आसान नहीं है। रहना भी इसी गांव में है। क्या करें।)
  • ज्ञानदत्त (प्रत्युत्तर) – हाँ, यह दुखद है। यह भी है कि निजी स्तर पर आप कुछ खास कर नहीं सकते और समाज का नेतृत्व जिनके पास है, उन्हे पर्यावरण से लेना देना तब तक नहीं, जब तक उनकी राजनीति पर आंच न आये।जब जनता ही ऐसी है तो कुछ होना सम्भव नहीं।प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छ भारत खूब कहा, पर फर्क रुपया में एक दो आना भर पड़ा है।
  • आशीष पाण्डेय – सभी गांव का लगभग यही हाल है हर जगह अवैध अतिक्रमण कर कब्जा किया जा रहा है।
  • अमित कुमार – sir har jagah logo ne ye haal kar diya hai. kahi bhi khali jamin, ya talab, pokhar dikhi to uspe kabza (सर, हर जगह लोगों ने ये हाल कर दिया है। कहीं भी खाली जमीन, या तालाब, पोखर दिखी तो उसपे कब्जा।)
  • डा. अशोक कुमार सिंह – Beautiful conversation.
  • साधना शुक्ल – Bahut badhiya.
  • रवींद्रनाथ दुबे – बहुत सुंदर वार्तालाप।

ट्विटर पर टिप्पणी


पॉडकास्टिकी और बदलती मनस्थिति


यह चित्र लैपटॉप के धुंधले से कैमरे से लिया गया है। लैपटॉप पर स्पोटीफाई का एप्प खुला है जो पॉडकास्ट सुना रहा है।

पहले ब्लॉगिंग का जुनून चढ़ा था – सन 2007 और उसके बाद के वर्षों की बात है। तब हर समय, हर परिस्थिति यूं देखी जाती थी, और उसपर विचार मन में यूं उठते थे कि इसपर ब्लॉग पर कैसे लिखा जायेगा? उसके साथ कोई चित्र पोस्ट करना जरूरी होगा या नहीं? रेलवे के काम के अलावा जिंदगी ब्लॉगमय हो जाती थी। … सोवत जागत सरन ब्लॉग की।

अब पिछले कुछ दिन से वैसा ही पॉडकास्ट के साथ हो रहा है। जिंदगी पॉडकास्टमय हो रही है। श्रवण/वाचन ग्राह्यता का एक मुख्य घटक बन रहा है!

पॉडकास्ट श्रवण बनने से मेरा डिफॉल्ट मोड – हेडफोन के साथ

अब सब कुछ सुनने के मोड में आता जा रहा है। स्पोटीफाई का प्रीमियम अकाउण्ट हो गया है। उसके गाने वाला सेगमेण्ट उपेक्षित है, पर पॉडकास्ट वाला भाग खूब प्रयोग हो रहा है। अमेजन ऑडीबल का भी सबस्क्रिप्शन चल रहा है। उसमें भी कई पुस्तकें और कई सीरियल लिये खरीदे गये हैं।

अमेजन ऑडीबल पर सेपियंस

कई पुस्तकें – भांति भांति के सोर्सेज से टैब पर भी भर ली गयी हैं। लैपटॉप भी पुस्तकों से लबालब है। कैलीबर अकाउण्ट में दो तीन हजार पुस्तकें होंगी। मोबाइल, टैब, किण्डल और लैपटॉप पुस्तकों और पठन सामग्री से परिपूर्ण हैं। उनको पढ़ने के लिये कई कई पुनर्जन्म लेने पड़ेंगे। :lol:

ऑडीबल पर सेपियंस सुना जा रहा है। साथसाथ किण्डल पर वही पढ़ा और हाइलाइट किया जा रहा है।

पुस्तकें अद्योपांत नहीं पढ़ी जा सकतीं तो Blinkist (ब्लिंकिस्ट) का पुस्तक संक्षेप का अकाउण्ट भी है। वह साल भर में तीन हजार का किराया लेता है और उसमें पुस्तक संक्षेप पढ़ा भी जा सकता है और सुना भी जा सकता है।

Blinkist पर पुस्तक सार संक्षेप। उसे पढ़ा, सुना और किण्डल पर स्थानांतरित किया जा सकता है।

डिजिटल रूप से उपलब्ध सभी पुस्तकों या पुस्तक सार को पढ़ा भी जा सकता है और सुना भी जा सकता है। मैं दोनो क्रियायें एक साथ करता हूं। मसलन मैं युवाल नोवा हरारी की “सेपियंस” पढ़ रहा हूं – अंग्रेजी में नहीं, हिंदी में। मैंने अमेजन ऑडीबल पर उसका ऑडियो खरीदा है। वह मोबाइल पर सुनता रहता हूं। किण्डल पर किण्डल अनलिमिटेड (जिसका सबस्क्रिप्शन मैंने लिया हुआ है) पर “सेपियंस” उपलब्ध है। सो वह डाउनलोड कर रखी है। एक ओर सेपियंस का ऑडियो कान में लगा रहता है, दूसरी तरफ किण्डल पर सेपियंस के पन्ने सुने अनुसार देखता, हाईलाइट करता और पलटता रहता हूं। इससे पठन जल्दी भी हो जाता है और ग्रहण भी ज्यादा ही होता है। पढ़ने की यह तकनीक शायद लम्बी चलेगी!

अपना खुद का पॉडकास्ट करने के लिये अपनी आवाज सुनने की मनस्थिति बन रही है। अपने उच्चारण में खामियाँ नजर आने लगी हैं। मोबाइल से या माइक से मुंह की कितनी दूरी होनी चाहिये, उसकी तमीज बन रही है। जो शब्द गुड़गुड़ा कर, अस्पष्ट कहने की आदत है, उसपर अंकुश लग रहा है। जैसा प्रवीण पाण्डेय जी ने कहा – अपना बोला सुनना, अपना लिखा पढ़ना, अपना समझाया हुआ स्वयम समझना … इससे जो सुधार के सूत्र-संकेत मिलते हैं, उससे वर्तनी, लेखनी और तर्क; तीनों समृद्ध होते हैं।

मैं उसमें यह भी जोड़ूगा कि यह करने के साथ साथ आप बेहतर व्यक्ति भी बनते हैं!

सो श्रवण, पठन और पॉडकास्टन से बेहतरी की ओर कदम रखने की कोशिश की जा रही है! :lol:


धीरेंद्र और मेरा “बैठकी” का मानसिक हलचल पर पोस्ट किया पिछला पॉडकास्ट जो मरण चर्चा और पुनर्जन्म सिद्धांत पर है; नीचे दिया गया है –


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