वह फीचरफोन में डूबा नामिलनसार आदमी


जून के प्रारम्भ के दिन थे। कोरोना संक्रमण का दूसरा वेव थोड़ा थमा था। मैंने साइकिल ले कर दस किलोमीटर तक घूमना प्रारम्भ किया था। तब वह उमरहाँ गांव में दिखा था। एक पान गुटखा की गुमटी के पास खटिया बिछा कर लेटे हुये जियो के फीचर फोन पर कोई न्यूज चैनल देखते सुनते हुये।

दृष्य बड़ा आकर्षक लगा था। पर वह व्यक्ति बहुत कम्यूनिकेटिव नहीं था। उसने मेरी ओर देखा था और हूं हाँ करते हुये जवाब दिया था। वैसा जवाब जिसका कोई खास अर्थ नहीं होता और अपने बारे में न कोई सूचना होती थी।

जून 2021 में ली गयी और पोस्ट की गयी फोटो

खैर, मेरा ध्येय फोटो खींचना भर था। और मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि एक जियो का फीचर फोन भी न केवल समाचार का टीवी चैनल दिखा सकता है, वरन अकेले बैठे आदमी का मनोरंजन भी कर सकता है। कुछ लोगों ने टिप्पणी भी की थी कि मैं फ्री में जियो टेलीकॉम का विज्ञापन कर रहा हूं।

चित्र यद्यपि बहुत साफ नहीं था, पर मैंने उसे कई दिनों तक ब्लॉग हेडर बनाये रखा। वह आदमी मुझे कुछ अपने जैसा लगा था। अकेला।

अभी कल मैं फिर उमरहाँ की उसी गुमटी से गुजरा। वह व्यक्ति फिर वहीं था।

अभी कल मैं फिर उमरहाँ की उसी गुमटी से गुजरा। वह व्यक्ति फिर वहीं था। उसकी गुमटी खुली थी। वह खटिया पर बैठा था। हाथ में चुनौटी थी। सामने जियो का वही फीचर फोन था। उस फीचर फोन को तन्मयता से देख रहा था। शायद कोई वीडियो।

उसने मेरी ओर देखा और फिर मेरी ओर से विरक्त हो कर पुन: मोबाइल देखने लगा।

मैंने उससे यूंही बात करने के लिये पूछा – न्यूज देख रहे हैं?

“हूं, वैसा कुछ।”

उसके हाथ में चुनौटी थी। सामने जियो का वही फीचर फोन था। उस फीचर फोन को तन्मयता से देख रहा था। शायद कोई वीडियो।

“फोन जियो का है न? काफी चीजें दिखाता है?”

“ऐसे ही है।” उसने संक्षिप्त उत्तर दिया और चुनौटी कस कर पकड़ कर फोन को और तन्मयता से देखने लगा। मानो मेरी ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहता।

फिर भी एक जिद्दी की तरह मैंने बात छोड़ी नहीं। “जियो का प्लान सस्ता होगा न? कितना लगता है महीने में?”

उसने बिल्कुल उखड़ा सा जवाब दिया – “होगा। मुझे मालुम नहीं।”

उसी बंदे का फोन है। अकेला बैठा उसी के सहारे समय काटता है। पर उसी चीज के बारे में बोलना-बतियाना नहीं चाहता। मुझे लगा कि एक सामान्य से आदमी ने मुझ (रिटायर्ड ही सही) ठीकठाक से दिखने वाले व्यक्ति को बड़े जबरदस्त तरीके से स्नब किया! कभी कभी ही तुम्हें नहले पर दहला मिलता है। नौकरी-अफसरी के दौरान नहीं मिला; यहाँ गांवदेहात में मिला; जीडी! :lol:

एकाकी पर नामिलनसार आदमी। डेढ़ हजार के पुराने जियो के फीचर फोन में डूबा। यहां मेरे पास भले ही किताबें घर में ठुंसी हों। सुनने को भले ही बहुत सी सामग्री हो। देखने के लिये टीवी के अलावा दो तीन ओटीटी चैनल हों। मन में यह गहरे से बैठा हो कि मैं अंतर्मुखी व्यक्ति हूं। पर कोई घर पर आता है तो मैं पूरी तवज्जो से उससे मिलता हूं। घर में कच्छा बनियान में होता हूं तो बाकायदा प्रेजेण्टेबल ड्रेस पहन कर और सिर पर (भले ही थोड़े से बाल हों) कंघी फेर कर उनके पास जाने का प्रयास करता हूं। और आगंतुक व्यक्ति को अपनी ओर से जाने के लिये नहीं कहता, अगर कोई बहुत जरूरी काम आसन्न न हो। उसके उलट यह रुक्ष व्यक्ति ग्राहकी तलाशता गुमटी खोल कर बैठा है। कोई आश्चर्य नहीं कि उसे कोई ग्राहक न मिलता हो। दुकान चलती ही न हो।

Alone
अकेला आदमी। Photo by Burst on Pexels.com

कोई नमिलनसार दुकान कैसे चला सकता है? मैं समझ नहीं सकता। मैं अपने को भीषण अंतर्मुखी व्यक्ति मानता हूं। पर यह रूखा आदमी तो अंतर्मुखत्व का शीर्ष निकला। और चिड़चिड़ा भी। जियो के चुटपुटिया फोन की बजाय रामचरित मानस का गुटका लिये होता तो मैं उसे सिद्धता की सीढ़ियाँ चढ़ता व्यक्ति मानता। लेकिन, कुल मिला कर वह मुझे अव्यवहारिक, एकाकी और असफल जीव लगा।

तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग। सबसे हँस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग॥

[तुलसीदास जी कहते हैं, इस संसार में तरह-तरह के लोग रहते हैं. आप सबसे हंस कर मिलो और बोलो। जैसे नाव नदी से संयोग कर के पार लगती है वैसे आप भी इस भव सागर को पार कर लो।]


चकरी तैयार कर गया शारदा परसाद


शारदा परसाद बिंद एक दिन हमारी अम्माजी की विरासत में रखी चकरी के पल्लों की छैनी – हथौड़ी से कुटाई कर गया था। उसे नीम की सूखी लकड़ी दी थी चकरी का बेंट (लकड़ी की गुल्ली जो चकरी की कीली होती है) और मुठिया (लकड़ी का हैण्डल जिससे चकरी को घुमाया जाता है) बनाने के लिये। अगले दिन वह आया बसुला और आरी के साथ। लकड़ी छील कर लाया था; और उसका छोटा आठ साल का बालक संतोष भी साथ में था।

शारदा परसाद चकरी में बेंट (कीली) लगाता हुआ। उसका बेटा संतोष ध्यान से देख रहा है।

शारदा ने नाप से बेंट और मुठिया छीली और उसे चकरी में फिट किया। उसका बेटा ध्यान से उसका काम देखता रहा। शायद आगे यह काम करने में प्रवृत्त हो। चकरी तैयार कर उसने मूठ से घुमा कर चला कर देखा और थोड़ा सा मोटा अनाज मांगा दलने के लिये। चकरी के मुंह से साबुत चने को पाटों के बीच डाल कर चकरी चलाते हुये चने को दल कर दिखाया। मेरी पत्नीजी के मन माफिक बेंट और मुठिया का साइज छोटा किया।

शारदा परसाद बिंद – चकरी कूटने वाला

काम के तीस रुपये मांगे। यह भी कहा कि बीस देंगे, तो भी चलेगा।

चकरी को फाइनल टच देता शारदा

मेरी पत्नीजी उसपर मेहरबान थीं। बोलीं – नहीं, तुमने तीस मांगा है तो दे ही दूंगी। पर जरूरत पड़ने पर तुम्हे बुलाया तो आना पड़ेगा।

उसके लड़के को उन्होने एक पार्ले-जी बिस्कुट का पैकेट भी दिया और बगीचे से तोड़ कर 15-20 अमरूद भी। लड़के – संतोष – ने सभी अमरूद अपनी जेबों में भर लिये। बिस्कुट का पैकेट खोल कर खाया नहीं। शायद घर जा कर अपने छोटे भाई के साथ शेयर करे। शेयर करने के नाम पर मुझे अपनी एक पुरानी, छोटी पर मार्मिक पोस्ट याद हो आयी – चाय की चट्टी, मोही और माधुरी। जिसपर दिनेश राय द्विवेदी जी की टिप्पणी है – आप की बेहतरीन पोस्टों में से एक। :-)

मैंने पत्नीजी से कहा कि कोई पुराने, संतोष के नाप के कपड़े हों, तो दे दें। पर वैसे कोई आसानी से घर में दिखे नहीं। शायद एक बक्से में इस तरह के कपड़े हमें बाहर रखने चाहियें। उनके लिये बहुत से बच्चे दिख ही जाते हैं।

संतोष लगता है पिता की तरह कारीगर बनेगा

इस तरह हमारी चकरी, सात साल बाद फिर से तैयार हो गयी। एक छोटी सी चीज ठीक होने पर कितनी प्रसन्नता देती है। और यह तो एक एण्टीक पीस है। शायद कई दशकों से मेरी अम्माजी इसका प्रयोग करती रहीं। इसके साथ माँ की याद भी जुड़ी है।

अब दाल दलने के लिये गांव में औरों से मांगनी नहीं पड़ेगी। इसके उलट आस पास के लोग गाहे बगाहे मांगने आते रहेंगे और हमें ध्यान रखना होगा कि कौन ले कर गया। वर्ना गांव में चीजें गायब बड़ी सरलता से हो जाती हैं। :-)


सामुदायिक शौचालय – शोचालय


सवेरे लेवल क्रासिंग गेट पर रुकना पड़ता है। ट्रेन आ रही है। साइकिल गेट बूम के नीचे से निकाल कर पार होने की मनाही है आत्मनियंत्रण के नियम से। रेलवे की जिंदगी भर लेवल क्रासिंग गेट अनुशासन पर जोर दिया है तो अब अपने को दूसरी ओर पा कर उसका उल्लंघन करूं, यह सही नहीं लगता।

ट्रेन आने में देर हुई। लगता है कुछ जल्दी ही बंद कर दिया गेट। या फिर मालगाड़ी ठीक रफ्तार से नहीं आ रही। इस दौरान करीब दस लोग ऐसे गुजरे पास से जो प्लास्टिक की बोतल, लोटा या किसी डिब्बे में पानी लिये थे। वे जा रहे थे सवेरे निपटान के लिये। निपटान के लिये बरसात के मौसम में रेल की पटरी के बगल में बैठना सबसे मुफीद रहता है। उनमें से करीब आधा दर्जन लोगों ने मुझसे जीजा पालागी, फूफा पालागी, चच्चा परनाम किया। सब का नमस्कार कर जवाब भी दिया मैंने। किसी से ओपन एयर डीफेकेशन पर बात नहीं की। यह तो बहुत सामान्य सर्वमान्य कृत्य है। उसपर क्या टोकना?

इस दौरान करीब दस लोग ऐसे गुजरे पास से जो प्लास्टिक की बोतल, लोटा या किसी डिब्बे में पानी लिये थे। वे जा रहे थे सवेरे निपटान के लिये।

अधिकांश लोग बीपीएल की जद में हैं। लगभग सभी को सरकार ने आवास दिये हैं। किसी किसी ने दो आवास भी पा लिये हैं परिवार को दो भाग में दिखा कर। और हर एक को शौचालय भी मिल गया है। पर जाते सभी बाहर ही हैं शौच के लिये।

सरकार ने सफाई और शौचालय पर जो ध्यान दिया है, वह अभूतपूर्व है। पर उसका कोई फायदा दिखता नहीं।

अब एक नया उपक्रम नजर आता है। गांव गांव में सामुदायिक शौचालय बने हैं। जहां एक सफाईवाले का भी शायद प्रावधान है। मेरी एक फेसबुक पोस्ट पर एक टिप्पणी भी थी कि इस मद में तीन महीने के लिये अठारह हजार रुपये आये थे। जो मिलबांट कर बराबर हो गये। एक भी दिन सामुदायिक शौचालय नहीं खुला।

सामुदायिक शौचालय विक्रमपुर, ताले में बंद

सामुदायिक शौचालय में बहुत पैसा बरबाद हो रहा है। प्रधान से ले कर विधायक, सांसद और कहीं कहीं मुख्यमंत्री तक के नाम भी शिलापट्ट पर शोभित हो रहे हैं। पर किसी की भी रुचि इन्हें फंक्शनल करने की नहीं है।

सामुदायिक शौचालय ग्राम उमरहाँ, ताले में बंद

सवेरे साइकिल सैर के दौरान कई जगह नाक दबा कर या सड़क पर बिखरे ताजा शौच से बचते हुये निकलना होता है। आजकल जब खेतों में पानी लगा है, लोग सड़क या रेल की पटरी पर ही धावा बोले हुये हैं। वह तो सूरज निकलने के बाद ही साइकिल सैर में निकलता हूं, अन्यथा भोर में निकलूं तो सड़क के किनारे महिलायें भी गार्ड ऑफ ऑनर देते खड़ी हो जाती हैं। वह उनके लिये हो न हो, अपने लिये असमंजस की स्थिति बन जाती है।

और बच्चों का क्या कहा जाये। उनको तो वे लोग भी जो घर में बनाये शौचालय का प्रयोग करने लगे हैं, बाहर ही भेजते हैं बच्चों को। और बच्चे तो दिन में कभी भी सड़क किनारे बैठे दिख जाते हैं। कहीं कहीं तो माँ या दादी भी उनको शौच कराने ले कर निकली होती हैं। सार्वजनिक रूप से शौच करा कर उनका शरीर का नीचे का हिस्सा धोते और नेकर पहनाते दिखना आम है।

बच्चे तो दिन में कभी भी सड़क किनारे बैठे दिख जाते हैं

और इलाके होंगे देश के जहां फर्क पड़ा होगा स्वच्छ भारत मिशन से या ओपन डीफेकेशन मुक्त अभियान से; यहां तो कोई असर नहीं नजर आता। और पैसा बरबाद हो गया है, बेशुमार! :-(

अभी तक तो पांच साल में कोई विधायक या सांसद मुझे दिखा नहीं (आम आदमी के पास आने की उनको क्या जरूरत?!) पर अब चुनाव आने को हैं। अब शायद नजर आयें। अगर दिखे तो पूछने का मन है कि क्या किया आपने जी? इन सामुदायिक शौचालयों का सफेद हाथी बनाया पर वे एक भी दिन चले नहीं, उसको क्यौं नहीं देखा?

वैसे मुझे लगता है मेरे पास कोई आयेगा नहीं। उन्हें मेरे वोट की दरकार नहीं है। और जो वोट देते हैं; उनके लिये सामुदायिक शौचालय कोई मुद्दा है ही नहीं।


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