आत्मनिर्भरता का सिकुड़ता दायरा


देश के आत्मनिर्भर होने की बात हो रही थी। फिर कोरोना की दूसरी लहर आ गयी। प्रचंड लहर – जिसमें समाज, राजनीति और अर्थतंत्र के कई किले हिल गये। देश सब देशों से सहायता स्वीकार करने लगा। मैंने पढ़ा कि देश ने दक्षिण भारत में आयी सुनामी की भयंकर आपदा में भी विदेशी सहायता को विनम्रता से मना कर दिया था; पर अब किसी भी देश की, भले ही केवल प्रतीकात्मक मदद हो, स्वीकार करने लगा।

हमारा गोलपोस्ट भारत की आत्मनिर्भरता से हट सा गया। अब हताशा ऐसी है कि लगता है आत्मनिर्भरता भारत के स्तर पर नहीं, राज्य या समाज के स्तर पर भी नहीं; विशुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर होनी चाहिये। “सम्मानजनक रूप से जीना (या मरना)” के लिये अब व्यक्तिगत स्तर पर ही प्रयास करने चाहियें।

हमारी स्वस्थ्य, शिक्षा, संचार, बिजली, पेयजल आदि अनेकानेक क्षेत्र की सुविधायें उस स्तर की नहीं हैं, जिस स्तर की होनी चाहियें। इण्डिया (शहरी) में तो कुछ हद तक दशा ठीक हो भी सकती है, भारत (ग्रामीण) में तो यह सब तनिक भी संतोषप्रद नहीं है।

इसलिये व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता की कवायद तो मेरे लिये तब से प्रारम्भ हो गयी थी, जब मैंने इण्डिया से रीवर्स माइग्रेशन कर भारत (गांव) में बसने का इरादा बनाया था।

यह 800 मीटर ट्रेंच खोदी गयी थी 2015 में बीएसएनएल द्वारा मेरे घर में ब्रॉडबैण्ड केबल डालने के लिये। पर यह जंतर चला नहीं!

मैं जब अपनी रेल सेवा की समाप्ति पर गांव में रहने की सोचने लगा था, तो इसका मुझे पूरा अहसास था। मेरे लिये यह कोई अप्रत्याशित दुस्वप्न सा नहीं था। रिटायर होने के कुछ महीने पहले ही मैंने वाराणसी के बीएसएनएल के महाप्रबंधक महोदय से मुलाकात कर अपने लिये लैण्डलाइन फोन और उसपर डाटा कनेक्शन का इंतजाम किया था। पर वह प्रयत्न बहुत कारगर रहा नहीं एक दो साल में ही स्पष्ट हो गया कि बीएसएनएल अपनी सेवाओं का रखरखाव कर ही नहीं पाता। वह उद्यम लगभग बेकार गया।

अंतत: अब घर में 40 फिट ऊंचे एक पोल पर छोटा एण्टीना लगवाया है जो 8 किमी दूर एयरटेल के टावर से लाइन‌-ऑफ‌-साइट सम्पर्क में रहता है और उससे 3एमबीपीएस का डाटा लिंंक 1100रुपये महीने के खर्चे पर मिलता है। दस हजार का एकमुश्त खर्च और महीने का किराया डाटा के बारे में आत्मनिर्भरता दे रहा है। व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता।

अपने व्यक्तिगत प्रयासों से ही संचार, जल और विद्युत के सिस्टम बने हैं। घर के ऊपर लगे सोलर पैनल, पानी की टंकियां और डाटा के लिये लोहे के पोल पर लगी है छतरी।

इसी प्रकार बिजली के इंतजाम के लिये घर का लोड कम होने पर भी मैंने 5केवीए का कनेक्शन लिया जिससे तीन फेज मिलते रहेंं। यहां जब बिजली आती भी है तो एक फेज में ही आती है। कौन से फेज में आयेगी वह तय नहीं होता। तीनों फेज होने पर हम बदल बदल कर देखते हैं और सबसे उपयुक्त फेज का चयन करते हैं। पर कई बार तो एक हफ्ता भर बिजली गुल रही। जेनरेटर के द्वारा ही काम चलाया। वह बहुत मंहगा लगा तो हार कर दो केवीए का सोलर पैनल/इंवर्टर सिस्टम लगवाया। उस सिस्टम में डेढ़ पौने दो लाख का खर्चा आया। अब बिजली के बारे में संतोषजनक व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता मिल सकी है। अब बिजली विभाग का निहोरा उतना नहीं रहा।

पानी के बारे में तो शुरू से ही पता था कि गांव में कोई सिस्टम है ही नहींं। सो शुरू से ही एक बोर कर 2000लीटर के पानी स्टोरेज की टंकी रख कर घर की पानी की सप्लाई सुनिश्चित की। घर के सभी हिस्सों में पाइप्ड जल व्यवस्था किसी सरकारी प्रणाली पर नहीं; व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता के आधार पर है।

स्वास्थ्य के बारे में तो पहले से मालुम था कि सरकारी तंत्र डिफंक्ट है। गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। वहां कभी डाक्टर आते हों, ऐसा सुना नहीं। ऑग्जिलरी नर्स मिडवाइफ (ए.एन.एम.) प्रसव सम्बंधी मामलों में कुछ करती हैं। बच्चों का प्रारम्भिक टीकाकरण करती हैं और जच्चा-बच्चा को जो शुरुआती इनपुट्स मिलने चाहियें; उनका कुछ प्रबंधन करती है। इससे प्रसव और उसके आसपास की चाइल्ड मोर्टालिटी जरूर कम हुई है। पर उसके बाद बच्चे कुपोषित रहते हैं – उसका कोई इंतजाम नहीं। मैंने पता करने का प्रयास किया कि स्वास्थ्य केंद्र आयरन और क्लोरीनेशन की दवाइयाँ गांव में देता है या नहीं। पता चला कि ब्लॉक अस्पताल से इस प्राथमिक केंद्र तक वह कुछ पंहुचता ही नहीं।

बाकी किसी भी बीमारी में लोग आसपास के झोलाछाप डाक्टरों का ही सहारा लेते हैं। आधे मर्ज तो दवा की दुकान वाला ही दवायें बता और बेंच कर ठीक करता है। भला हो कि पास में एक सूर्या ट्रॉमा सेण्टर और हॉस्पीटल खुल गया, जहां मेरे पिताजी और मेरे परिवार का समय से इलाज हो पाया। अन्यथा मेरी रीवर्स माइग्रेशन की पूरी की पूरी अवधारणा ही ध्वस्त हो जाती। उसमें जितना खर्चा मेरा हुआ, वह सामान्य ग्रामीण अफोर्ड नहीं कर पायेगा। वह इन्तजाम भी प्राइवेट या व्यक्तिगत प्रयत्न के आधार पर ही हुआ। सरकार का उसमें कोई योगदान नहीं, या है भी तो न्यूनतम। अब कुछ लोगों को वहां आयुष्मान-भारत के तहद इलाज मिलता है। पर उससे झोलाछाप स्वास्थ्य उद्योग पर खास फर्क नहीं पड़ा है।

गांव में मेरे घर की छत पर आत्मनिर्भरता के प्रतीक

यही हाल शिक्षा का रहा। कोरोना काल में मैंने अपनी पोती को पढ़ाने के व्यक्तिगत प्रयोग किये। देखें ये ब्लॉग पोस्ट लिंक – एक, दो। बायजू के पैकेज पर 56हजार रुपया खर्च किया। पर अंतत: अपने लड़के के परिवार को प्रयागराज शिफ्ट करना पड़ा। यहां घर से निकलते ही दस कदम पर सरकारी स्कूल है। जहां सरकार ने खूब पैसा झोंका है। पर वहां मास्टर-मास्टरानियों में बच्चों को पढ़ाने का कोई जज्बा ही नहीं है। साल भर तक गांव के बच्चे यूं ही मटरगश्ती करते रहे हैं। यूं, जब स्कूल चलता भी था, तब भी वे मुख्यत: बंटने वाले भोजन, स्कूली यूनीफार्म, जूते, किताबें, स्टेशनरी आदि के लिये ही जाते थे। बाकी, जो मांं-बाप कुछ खर्च कर सकते हैं, वे ट्यूशन का सहारा लेते हैं। कुल मिला कर सरकारी इनपुट, शिक्षा के क्षेत्र में निरर्थक ही हैं।

सरकार फिर क्या है?

सरकार का रोल इतना है कि घर से निकलने पर मुझसे कोई छिनैती नहीं करता। अस्सी-नब्बे पार्सेण्ट लोग सड़क पर बांये चलते हैं। पुलीस को डायल करने पर वह आ जाती है। उसके बाद भले दोनो पार्टियों से पैसा खाती हो, पर उसके भय से कुछ नियम पालन होता है। राशन वाला लोगों को; थोड़ा बहुत काट कर ( कोटेदार बड़ी बेशर्मी से कहता है – आखिर हमारा भी तो पेट है!); राशन दे देता है। सरकारी मदद का पैसा लोगों के खाते में आ जा रहा है। … इसी तरह के आठ दस और लाभ हैं सरकार होने के। बाकी, फलाना एमएलए दबंग है, ढिमाका एमपी दागी है। फलाने राज्यसरकार के मंत्री के (कोरोनाकाल में) लड़के की शादी झकाझक हुई। उनका मकान जैसा बन रहा है कि पूछो मत … ऐसा ही सब सुनने में आता है। इन सब को हम इसलिये झेलते हैं कि हम ही लोगों ने इनको जिताया है। मोदी जी के नाम पर लैम्प-पोस्ट को भी वोट दिये थे। सोचते थे की मोदी-योगी की सरकार आने पर फर्क पड़ेगा, पर उत्तरोत्तर एक मायूसीयुक्त उदासीनता मन में घर करती जा रही है।

मैं उत्तरोत्तर और सोचता हूं। आयुष बनाम आईएमए के डाक्टर्स और आयुर्वेद बनाम एलोपैथी का टण्टा मात्र बौद्धिक क्लास का मानसिक मनोविनोद है। बाबा रामदेव का एलोपैथी और उसके डाक्टरों को लुलुहाना और डाक्टरों का उनकी अप्रमाणिक दवा पद्धति को गरियाना गांव के स्तर पर कोई मायने नहीं रखता जहां कोई पैथी नहीं है। न लोगों के पास पैसा है, न दवाई, न ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, न अस्पताल के बिस्तर और न डाक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ। आदमी अपने हाल पर है। और तो और आम ग्रामीण के पास वैज्ञानिक सोच और जानकारी का भी घोर अभाव है।

क्या किया जा सकता है कोरोना की अगली वेव के लिये? यह तो लगता है कि सरकार चाहे जितना कहे, उसके बस की है नहीं। स्वास्थ्य और प्रशासनिक मशीनरी इतनी जर्जर है कि उसमें किसी आमूलचूल परिवर्तन की अपेक्षा की नहीं जा सकती। जो कुछ करना होगा, अपने स्तर पर करना होगा। वैसे ही, जैसे अपने घर के लिये ट्यूब वेल का पानी, सोलर बिजली, छतरी वाला डाटा-संचार सिस्टम का इंतजाम मैंने किया था।

अपने स्तर पर ही स्वास्थ्य जानकारी इकठ्ठा करनी होगी। दवाओं का इंतजाम करना होगा। किसी अच्छे डाक्टर/संस्था से टेलीमेडिसन सलाह का सिस्टम सेट करना होगा, अपने पूरे परिवार का समय रहते प्राइवेट तौर पर टीकाकरण कराना होगा और अगर उपयुक्त लगे तो समय रहते एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर तथा एक पृथकवास कमरे का इंतजाम घर में ही करना होगा। गांव में दवा की दुकान वाला इंजेक्शन लगा सकता है। अन्यथा खुद ही सीखना होगा इण्ट्रावेनस इंजेक्शन लगाना। यह पूरा सिस्टम एक लाख का खर्चा मांगता है। वह करने पर शायद कुछ कहने भर को स्वास्थ्य आत्मनिर्भरता आ पाये। वर्ना, उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे बैठना बहुत त्रासद है।

अब कुछ न कुछ सोचना होगा इस दिशा में। अभी तक घर में फर्स्ट-एड किट होते थे। उसमें ऑक्सीमीटर तो जुड़ ही गया है। कई अन्य उपकरण और जानकारी भी जोड़ने की जरूरत अब महसूस हो रही है। यह सांसत का दौर पता नहीं कितने साल और चले।

आत्मनिर्भरता का ‘सर्किल ऑफ कंसर्न’ और ‘सर्किल ऑफ इंफ्लुयेंस’ दोनो कम कर अपना और अपने परिवार का इंतजाम करना एक प्राथमिकता लगती है। वह करने से आसपड़ोस का भी कुछ भला हो जाये तो सोने में सुहागा।

आखिर जीडी, तुम झोलाछाप डाक्टरों से बेहतर काम अपने खुद के लिये तो कर ही सकते हो। वही करो!


ट्विटर स्पेसेज पर आजतक रेडियो वालों का बेबाक बुधवार


कल बुधवार को आजतक वालों ने ट्विटर स्पेसेज का प्रयोग कर एक कार्यक्रम किया – बेबाक बुधवार। उसमें चर्चा थी – आयुर्वेद और एलोपैथ : दोस्त या दुश्मन। आजतक के ‘तीन ताल‘ पॉडकास्ट के तीन लोग इसमें बेबाक चर्चा करते हैं और चूंकि ट्विटर पर ढेरों श्रोता जुड़ने की सहूलियत है, प्रोग्राम भागवत कथा टाइप हो जाता है। कल पहली बार तीनताल के सूत्रधार कुलदीप मिश्र ‘सरदार’ ने मुझे भी निमंत्रण दिया। वहां चिकित्सा पद्यतियों पर इन बंधुओं और अनेक विद्वान एलोपैथ-आयुर्वेद वालों को सुनने का मौका मिला। कुलदीप मिश्र जी ने मुझे भी बोलने का आमंत्रण दिया। मैंने अंतत: कुछ बोला भी।

कुलदीप मिश्र जी द्वारा भेजा बेबाक बुधवार का निमंत्रण

कल डेढ़ सौ से ज्यादा श्रोता थे। वक्ताओं में रिसर्चक लोग, डाक्टर, आयुर्वेदाचार्य, स्वास्थ्य पत्रकार आदि बड़े सुधीजन थे। सबके पास कहने को बहुत कुछ था। और ये तीनतालिये (कमलेश कुमार सिंह ‘ताऊ’, पाणिनी आनंद ‘बाबा’ और कुलदीप मिश्र ‘सरदार’) खुद भी जम के बोलते हैं और औरों को भी अपनी बलबलाहट निकालने का पूरा अवसर देते हैं! लोगों ने अपने विचार एलोपैथी और आयुर्वेद पर पूरे दम-खम से रखे। खूब लम्बी चली चर्चा। रात नौ बजे शुरू हुई और जब कथा की समाप्ति हुई तो तारीख बदल गयी थी।

ट्विटर स्पेस पर चल रही बेबाक बुधवार की चर्चा का स्क्रीन-शॉट

आयुर्वेद और एलोपैथ पर चर्चा का विषय था; पर चर्चा आयुर्वेद खिलाफ एलोपैथ पर बार बार खिसकती रही और कुलदीप/कमलेश/पाणिनी को बार बार उसे विषय पर वापस लाने की गुहार लगानी पड़ी। दोनो पक्षों के लिये विलेन बने थे बाबा रामदेव। एलोपैथिये बबवा को लेकर आयुर्वेद की लत्तेरेकी-धत्तेरेकी करने का अवसर नहीं छोड़ना चाहते थे और आयुर्वेद वाले बाबा जी से आयुर्वेद को अलग कर देखने की बात कहते रहे। पर इस सब के बीच आयुर्वेद-ऐलोपैथ की प्रणली-पद्ध्यति को ले कर बड़े काम की बातें भी सामने आयी।

ऐलोपैथ की ‘तथाकथित’ साइन्टिफिक अप्रोच और आयुर्वेद के व्यापक क्लीनिकल प्रयोग के अभाव, एविडेंस बेस न होने और दवाओं के निर्माण में उपयुक्त मानकीकरण न होने पर विचार आये। इतने विचार आये और दवाओं की गुणवत्ता को ले कर इतने संशय जन्मे कि मेरे जैसा गांवदेहात में कोने में बैठा व्यक्ति और विभ्रम (कंफ्यूजन) ग्रस्त हो गया। ज्यादा ज्ञान की डोज भी कंफ्यूजन पैदा करती है! :lol:

बेबाक बुधवार सुनने के चक्कर में; सामान्यत: रात नौ बजे आधा घण्टा रामचरित मानस पढ़ कर दस बजे तक सो जाने वाला मैं रात डेढ़ बजे तक जागता रहा। इस ट्विटर स्पेस की चर्चा में इतना रस मिला कि एक रात की नींद की ऐसी-तैसी करा ली मैंने। पर बहुत आनंद आया कार्यक्रम में। मैं आपको भी सलाह दूंगा कि अपने बाकी रुटीन दांये बांये कर ट्विटर स्पेस पर यह कार्यक्रम हर बुधवार को अवश्य सुना करें। मैं कुलदीप मिश्र जी को भी अनुरोध करूंगा कि वे इस कार्यक्रम की रिकार्डिंग एक पॉडकास्ट के रूप में आजतक रेडियो पर उपलब्ध करा दिया करें। इससे हमारे जैसे सीनियर सिटिजन एक रात की नींद बरबाद करने से बच सकेंगे।

वैसे कार्यक्रम इतना अच्छा होता है कि एक रात की नींद बर्बाद की जा सकती है। :-)

आप आजतक रेडियो को ट्विटर पर फॉलो करें और बुधवार रात नौ बजे पालथी मार कर तीन घण्टा ट्विटर पर अपनी टाइमलाइन खोल कर आजतक रेडियो के चिन्ह को क्लिक कर सुनना प्रारम्भ करें। मजा भागवत पुराण सुनने जैसा आयेगा। पक्का। यह कार्यक्रम हर बुधवार रात 9 बजे रखा गया है। दो बुधवार हो गये हैं इस कथा के शुरू हुये। बकिया, कमलेश कुमार सिंह जी के कथा आयोजक लोग कथा के बाद चन्नामिर्त-पंजीरी आदि नहीं बांटते, यही गड़बड़ है! :lol:


आजतक रेडियो के तीन ताल पॉडकास्ट पर एक पोस्ट अलग से लिखूंगा। वह कुछ दिनों बाद।


छ्ठ्ठन, नये ग्राम प्रधान


छठ्ठन जी मिलने आये। उनकी पतोहू ग्राम-प्रधान बनी है। वह तो इसलिये कि सीट अनुसूचित महिला के लिये थी।

अत: डी-फेक्टो प्रधान छठ्ठन जी ही हैं। वे रेलवे में गेटमैन थे। कुछ समय पहले उन्होने वीआरएस ले लिया और उनकी जगह पर उनके छोटे बेटे को नौकरी मिल गयी। वे भी (रिटायर्ड) रेलवे मैंन हैं और उनका लड़का भी रेलवे में है; इसलिये उनसे लगाव सा है। मैं आशा भी करता हूं कि उनमें रेलवे के अनुशासित जीवन का कुछ प्रभाव होगा ही। वे खुद बताते हैं कि गेटमैन की ड्यूटी करते हुये उनको सड़क यातायात वालों की खरीखोटी सुनने का अनुभव है और वे जानते हैं कि नम्रता से ही काम निकलता है, अकड़ से नहीं।

प्रधानी के काम-धाम और कोरोना तथा गांव की स्वास्थ्य सजगता पर हमने चर्चा की। उनमें भी लीक से हट कर कुछ करने का जज्बा दिखा। उनके लोग गांव का डाटा-बैंक तैयार करने लगे हैं। रजिस्टर बना लिया है। लोगों के किस प्रकार के काम किये जाने हैं, या किये जा सकते हैं, उसके बारे में वे अपना ध्यान देने लगे हैं।

Chhatthan Village Pradhan
छठ्ठन, नये ग्रामप्रधान

मैंने उनको इस प्रकार की गतिविधियों में सक्रिय सहयोग देने की बात उनसे बार बार कही। स्वास्थ्य विभाग वालों से सम्पर्क करने, जिला या ब्लॉक प्रशासन या रेलवे से सम्पर्क करने की जरूरत में मेरे सहयोग की आवश्यकता पड़े, तो वह भी मैं करने को तैयार हूं। अपना कम्यूटर-प्रिण्टर उनकी सहायता के लिये उपलब्ध करा सकता हूं। कोई चिठ्ठी ड्राफ्ट करनी हो, वह भी कर सकता हूं। मैं सिर्फ यह चाहता हूं कि वे और उनकी टीम वाले वास्तव में गांव की जनता की भलाई के लिये काम करें। छठ्ठन जी के साथ उनका पोता भी साथ था। उस लड़के की अम्मा जीती हैं प्रधानी का चुनाव। जो कुछ हम लोगों ने कहा-सुना, उसका उस बालक पर भी कुछ प्रभाव पड़ा ही होगा।

छठ्ठन जी के जाने के बाद पत्नीजी ने मुझसे कहा – बहुत ज्यादा प्रवचन देते हो। अब वह तुम्हारे कोई कर्मचारी तो हैं नहीं। जबरी इतना करने का एजेण्डा बताने लगते हो। इतना भी न कहा करो कि अगला आपसे कन्नी काटने लगे! आगे कभी मिलने से भी कतराये।

बहरहाल, छठ्ठन जी से सम्पर्क हुआ है। अगले पांच साल में; उनके द्वारा और उनके साथ जो कुछ मेरे मस्तिष्क में गांव को ले कर चला करता है; उसमें से दस प्रतिशत भी जमीनी हकीकत बन पाया तो धन्य होने जैसी बात होगी!


Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free