
मानिक सेठ की महराजगंज, जिला भदोही में किराने की दुकान है। नोटबन्दी के बाद उनकी पहली दुकान थी, जहां मैने कैशलेस ट्रांजेक्शन का विकल्प पाया। पच्चीस नवम्बर की शाम थी। नोटबन्दी की हाय हाय का पीक समय। वे पेटीएम के जरीये पेमेण्ट लेने को तैयार थे। मैने अपने मोबाइल से पेमेण्ट करना चाहा पर इण्टरनेट का सिगनल नहीं मिला। मानिक ने कहा कि वे वाई-फाई ऑन कर सकते हैं। खैर, रिलायंस जियो मौके पर जिन्दा हो गया और मैने महराजगंज कस्बे में पहला वेलेट के माध्यम से कैश लेस पेमेण्ट किया। इसके पहले ऑन लाइन खरीद, मोबाइल रीचार्ज या टेलीफोन का बिल पेमेण्ट मैं ऑनलाइन किया करता था। वह नोटबन्दी के पहले भी होता था। पर फुटकर खरीद में पहला गंवई प्रयोग था।
इस लिये मैं मानिक सेठ को भूल नहीं पाया।
एक बार और उनकी दुकान पर गया। मानिक वहां नहीं थे। उनके बड़े भाई थे। उन्होने बताया कि छोटा भाई ही पेटीएम-वेटियम जानता है। वही अपने मोबाइल से करता है। बाहर गया हुआ है, इसलिये कैशलेस पेमेण्ट नहीं हो पायेगा।
आज, लगभग एक महीने के बाद सवेरे अपने साइकल-भ्रमण के समय बाजार पंहुच गया। दुकाने नहीं खुली थीं। मुझे टॉर्च के लिये बैटरी लेनी थी। देखा; माणिक दुकान का ताला खोल रहे थे। मैने इन्तजार किया। सवेरे मैं अपना मोबाइल लिये हुये नहीं था, अत: पेमेण्ट तो कैश से किया पर माणिक से पूछा – कैशलेस ट्रांजेक्शन कैसे चल रहे हैं?
“ज्यादा नहीं। लोग ढर्रा बदलना नहीं चाहते। मैं खुद इण्टरनेट, फेसबुक, ऑनलाइन खरीद और वेलेट का प्रयोग करता हूं। पर आसपास लोग नहीं करते। करीब डेढ-दो हजार रुपये महीने का ट्रांजेक्शन हो जाता है; वेलेट और ऑनलाइन खरीद को ले कर।”
तब भी अच्छा है। लोगों को सिखाइये। लोगों के बारे में फ़ेसबुक पर बताइये।
उसमें झंझट है। लोग सीखना नहीं चाहते। और यहां की बात फ़ेसबुक में लिखना रिस्की है। मैं अपने बारे में फेसबुक पर लिखता नहीं। कोई जानकारी नहीं देना चाहता। क्या पता क्या लफ़ड़ा हो जाये। बाहर हो आया हूं। वहां की कोई यार-दोस्त इधर-उधर की फोटो डाल दे या कुछ लिख ही दे तो बैठे बिठाये मुसीबत हो जाये।
मैने माणिक को अपना फेसबुक पर लिखा दिखाया। जिसमें अपने परिवेश के बारे में (और अपने बारे में भी) जैसा है, वैसा लिखा है। और यह भी बताया कि मुझे तो कोई कभी झमेला नहीं हुआ। मैने सुझाव दिया कि माणिक अपने परिवेश – बाजार, दुकान और लोगों की सोच के बारे में पोस्ट करें।
माणिक ने हां-हां तो की; पर जैसा मुझे लगा कि जवान आदमी बहुत कन्वीन्स्ड नहीं है। आखिर मैं अपनी और उसकी तुलना तो नही कर सकता। जवान आदमी की अपनी उमंगे हैं, अपने भय।
पर माणिक मुझे ऊसर गंवई जीवन में नये प्रकार के जीव मिले। शायद भविष्य में भी उनसे सम्पर्क रहे।



