भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
गांव में सोलर लाइट लग रही हैं – स्थानीय सांसद के माध्यम से. पावरग्रिड कार्पोरेशन की कार्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहद.
सड़क और गलियों के यातायात को देख कर लगाई जाएं तो जहां लगेंगी, वहां से रात में नशेड़ी लोग उसकी बैट्री चुरा लेने में समय नहीं लगाएंगे. लिहाजा यह समझौते के आधार पर किसी न किसी के दरवाजे पर लगाई जा रही हैं – जिससे सड़कें भी रोशन रहें और उस व्यक्ति का परिसर भी.
ग्रामीण मुफ्त में जहर भी मिले तो उसके लिए जद्दोजहद करेगा. यह तो सोलर लाइट है. अतः अपने अपने दरवाजे पर सोलर लाइट झटकना प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है ग्रामीण लोगों ने. कोई नशेड़ियों से सोलर लाइट की मुक्ति की बात नहीं करता. वह कठिन काम जो है.
कटका स्टेशन पर अरुण की छोटी-सी चाय की गुमटी है। आज वहीं मिले श्यामबिहारी।
परिचय देते समय उन्होंने यह नहीं बताया कि वे किसान हैं। सबसे पहले बोले—”बाईस साल बंबई में रहे। मिस्त्री का काम किया।”
फिर बताया कि अब दोनों बेटे बंबई में हैं। वही काम करते हैं। अब ठेका लेने लगे हैं। पहले वे जाते थे, अब उनकी जगह बेटे चले गए हैं।
गाँव से महानगर का प्रवास अक्सर ऐसा ही होता है। परिवार गाँव में रहता है। कमाने वाले शहर जाते हैं। कुछ साल नहीं, कई-कई दशक। फिर एक दिन उम्र जवाब देने लगती है। शहर जवान कंधों को बुला लेता है और आदमी गाँव लौट आता है। बेटे शहर संभाल लेते हैं, पिता गाँव।
श्यामबिहारी अब साठ के हैं। तीन दिन से धान की रोपाई में लगे हैं। सुबह की चाय पीने चट्टी पर आ गए थे। वहीं मुलाकात हो गई।
मैंने पूछा, “कितने बजे उठते हो?”
वे हँस पड़े।
“रात बारह बजे। रात में नींद नहीं आती। फिर थोड़ा घूम लेते हैं। बीच-बीच में सोकर नींद पूरी हो जाती है।”
उन्होंने इसे कभी बीमारी नहीं माना। गाँव में रात को निकलूँ तो शायद पाँच-सात लोग ऐसे ही मिल जाएँ—बिना किसी बेचैनी के जागते हुए। किसी की नींद टूट गई होगी, किसी को फिर आई नहीं होगी। कटका स्टेशन से गुजरती ट्रेन की सीटी भी कई बार रात का सन्नाटा चीर देती है।
रिटायरमेंट उनके जीवन में मेरी तरह कोई घटना नहीं है। न विदाई, न पेंशन, न घड़ी, न शॉल। शरीर जब तक साथ देगा, काम चलता रहेगा। शायद दस साल और। उसके बाद का जीवन कैसा होगा, यह न उन्हें मालूम है, न मुझे।
बात करते-करते उन्होंने अरुण से कहा, “चाय के पहिले एक प्लेट छोलउ द।”
सीमेंट की बेंच पर बैठकर छोला खाया। फिर कुल्हड़ में चाय मँगाई। बोले—”जल्दी द, नाहीं अकाज होये।”
कुल्हड़ खाली हुआ। फरसा फिर कंधे पर आ गया। बिना किसी जल्दबाज़ी के वे खेत की ओर चल पड़े। धान का बेहन उनकी राह देख रहा था।
उन्हें जाते देखकर लगा कि बंबई उनके जीवन का सबसे लंबा अध्याय रही होगी। पर किताब का आखिरी अध्याय शायद गांव में ही लिखा जाना है।
[पोस्ट का पुनर्लेखन दस साल बाद 2 अगस्त 26 को किया। चित्र भी बदला – एआई का बनाया हुआ। हेडर का चित्र पुराना ही है।]
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)
वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।
वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।
समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?
उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।
उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?
नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।
हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।
मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।
अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।
सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)
अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!