श्री राजनाथ राय के घर


GDMar164768-01
श्री राजनाथ राय की धर्म पत्नी

होली के बाद लोगों से मिलने की परम्परा निबाहने के लिये हम – मैं और मेरी पत्नीजी – आज सवेरे सैर करते हुये पास के गांव भगवान पुर में राजनाथ राय जी के घर की ओर चले गये। राजनाथ जी मेरे श्वसुर श्री (स्वर्गीय) शिवानन्द दुबे जी के अभिन्न हुआ करते थे। बताते हैं कि अपने घर से एक मुखारी मुंह में लिये मेरे श्वसुरजी उनके घर तक पहुच जाते थे सवेरे सवेरे टहलते हुये।

राजनाथ जी घर पर नहीं थे। स्वागत उनकी पत्नी और उनके पुत्रों ने किया। घर के पास ही राजनाथ जी के खेत हैं। लगभग छ-आठ बीघे। बहुत मेहनत करते है वे और उनके परिवार के लोग। उनके पास एक ट्यूबवेल भी है। पूरी सिंचित और उपजाऊ भूमि और उसमें कड़ी मेहनत – कुल मिला कर अच्छी खेती और ग्रामीण परिवार का आदर्श देखने में मिलता है उनके यहां।

उनकी पत्नी बहुत मिलनसार हैं। गांव की महिलाओं की तरह छुई-मुई नहीं। स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़तीं। सात आठ लोग भी असमय बिना पूर्व सूचना के पंहुच जायें तो उनके भोजन का इन्तजाम करने में दक्ष। बोलने बतियाने में भी अपने परिवेश के बारे में सजगता और ग्रामीण मुद्दों पर निश्चित राय के दर्शन होते हैं। मुझे वे जीजा कहती हैं और उस नाते पूरी बेकतुल्लुफ़ी दिखाती हैं। मेरे हाथों को अपने हाथों में ले कर स्वागत किया उन्होने – ऐसा किसी और महिला ने कभी किया हो – याद नहीं आता। उन्होने होली के अवसर पर न आने का उलाहना भी दिया।

भोजन कराने की बात कर रही थीं सवेरे साढ़े सात बजे। मैने एक ग्लास चाय पिलाने को कहा। हमें बैठने के लिये कुर्सियां बाहर निकालीं और खुद सामने सरसों की कटी फसल पर बैठ गयीं।

घर परिवार की बातें। खेत खलिहान की बातें। बेटे बहू से सम्बन्धों की बातें। बातो और बातों की शैली में उनका जोड़ नहीं।

श्री राजनाथ राय का घर, भगवानपुर, भदोही
श्री राजनाथ राय का घर, भगवानपुर, भदोही

करीब आधा घण्टा बैठे हम वहां। उन्होने अपनी सब्जियों की क्यारियां भी दिखाईं और चने की नयी फसल के दाने छील कर देने की पेशकश भी की। हमने कहा कि अगली बार आयेंगे, तब ले जायेंगे।

मैं संकोची जीव हूं और महिलाओं के साथ तो और भी। पता नहीं श्रीमती राय में क्या आकर्षण है कि उनके साथ बातचीत में बहुत सहजता महसूस होती है।

मिश्री पाल की भेड़ें


GDFeb164606-01गड़रिया हैं मिश्री पाल। यहीं पास के गांव पटखौली के हैं। करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं उनके पास। परिवार के तीन लोग दिन भर चराते हैं उनको आसपास।

मुझे मिले कटका रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास अपने रेवड़ के साथ। भेड़ें अभी ताजा ऊन निकाली लग रही थीं। हर एक बेतरतीब बुचेड़ी हुई। उन्होने बताया कि साल में तीन बार उतरता है उनका ऊन। इस बार करीब चालीस किलो निकला।

मिश्री पाल ने बताया – बहुत कम दाम मिलते हैं ऊन के। खरीदने वाला 8रुपये किलो खरीद ले जाता है।

यह तो बहुत कम दाम हुये। आलू के भाव। – मैने अपना मत व्यक्त किया।

GDFeb164608-01

“हां, बहुत कम है। पर और कोई काम नहीं। दिन भर चराते हैं। देखभाल करनी पड़ती है।” मिश्री पाल ने कहा कि वे भेड़ें बेचने का धन्धा नहीं करते। पर मुझे लगा कि यह गड़रिये का काम अगर भेड़ें बेचने पर आर्धारित नहीं है तो मात्र ऊन के आधार पर किसी भी प्रकार से सस्टेन नहीं किया जा सकता। गड़रिया के काम में पैसा कहां और किस मद में आता है; मैं यह सोचने में लग गया। 

मिश्री पाल के पास बैल भी हैं। बैलों को वे हल चलाने के लिये किराये पर देते हैं। आजकल किसान बैल नहीं रखते। अगर जोत बहुत छोटी है, या जगह ऐसी, जहां ट्रेक्टर नहीं जा सकता, तो वहां हल का प्रयोग करते हैं। वहां मिश्री पाल के बैल काम आते हैं।

देहात में बहुत से लोग; जिनके पास जमीन नहीं है; भेड़, बकरी, सूअर, गाय, भैंस आदि पाल कर उनके दूध, ऊन, मांस आदि से अपना जीवन यापन करते हैं। उनके रहन सहन को देख कर लगता है कि उन्हें गरीब तो जरूर माना जायेगा; पर आर्थिक आधार पर कम जोत वाले किसानों की अपेक्षा बहुत विपन्न हों – वैसा भी नहीं है। मुझे लगा कि कभी पटखौली जा कर मिश्री पाल का जीवन देखना चाहिये।

कितनी ही अच्छी पुस्तके गड़रियों के घुमन्तू जीवन के आधार पर लिखी गयी हैं। कई देशों और महाद्वीपों में यात्रा करते गड़रिये। मिश्री पाल वैसे तो नहीं हैं; पर छोटे मोटे स्तर पर घुमन्तू तो हैं ही।

मैं मिश्री पाल का चित्र ले चलने लगा। सांझ हो गयी थी। मिश्री पाल भी अपने गांव लौट रहे होंगे अपने रेवड़ के साथ। वे और उनके साथी डण्डा फटकारते हुये, हट्ट-हट्ट की ध्वनि निकालते अपनी भेड़ें साधने में लग गये।

GDFeb164604-01


उमादास


GDFeb164437गुरु द्वारा दिया नाम उमादास। गृहस्थ नाम ॐ प्रकाश शुक्ल। बांसगांव, देवरिया के रहने वाले। कृशकाय शरीर। पर्याप्त स्फूर्ति। साधू।

उमादास नाम गुरु का दिया है। गुरु का नाम भी बताया उन्होने। बनारस के हैं गुरूजी।

चाय की चट्टी पर अचानक दिखे। चट्टी वाले अरुण से मैने उनके बारे में पूछा – कौन हैं?

“होंगे कोई बाबा। आते जाते रहते हैं।” अरुण ने उनके बारे में अनभिज्ञता जताई।  अपने पिताजी के समय से चट्टी पर इस तरह के बाबा लोगों का सत्कार करते रहे हैं अरुण और अन्य भाई लोग। बिना पूछे कि कौन कहां के हैं। मैं अरुण से भी प्रभावित होता हूं और बाबाजी से भी। सरल से जीव लगते हैं बाबा जी। पास के हैण्डपम्प से पानी ले कर खड़े बाबा से बतियाने लगता हूं।

अपना मुकाम पहले गोरखपुर बताते हैं। ज्यादा पूछने पर देवरिया और उसके आगे तिखारने पर बांसगांव। बाईस जनवरी को चले हैं। मईहर तक जा कर लौटेंगे। कुल 125 दिन की यात्रा का अनुमान है। पैदल ही चलते हैं उमादास। रोज लगभग 5 कोस। जहां जगह मिली वहां विश्राम कर लेते हैं और जहां जो भोजन मिला, वही कर लेते हैं। पास में एक कपड़े में रोल किया कम्बल-चद्दर है। एक झोले में अन्य सामान। एक कमण्डल भी है – जो शायद साधू होने का प्रतीक है। अन्यथा उनके पास एक ग्लास भी दिखा, जिसमें पानी पी रहे थे वे।

GDFeb164438

उम्र नहीं पूछी; पर मेरी उम्र के तो होंगे ही। शायद ज्यादा भी। स्वस्थ होने के कारण मुझसे जवान लगते थे।

अपनी अवस्था का अनुमान देते हुये बताते हैं उमादास – “शरीर का क्या भरोसा? अपना पता और तीन चार लोगों का मोबाइल नम्बर अपने झोले में रखा हूं।”

झोले से निकाल कर गीता की प्रति और उसमें लिखे मोबाइल नम्बर/पता आदि दिखाया उन्होने। बोला कि गीता और रामायण साथ में ले कर चलते हैं।

अपना खाना भी बना लेते हैं?

“नहीं, जो मिला वही कर लेता हूं। कभी अगर कुछ न मिला तो दो टिक्कड़् सेंक लेता हूं।”

पहले भी कभी यात्रा की है?

“पन्द्रह साल पहले चित्रकूट तक गया था इसी तरह। अकेले। एक बार मैरवा गया था। पैदल ही। अकेले। नेपाल नहीं गया। पहाड़ नहीं चढा हूं।”

अपनी दशा या देश-काल से कोई शिकायत नहीं लगी उमादास को। प्रसन्नमन ही दिखे। उन्हे मैने चलते समय एक जून के भोजन के पैसे दिये। बडी सहजता से स्वीकार किये उन्होने।

वापसी में अपने साथ चलते राजन भाई से मैने कहा – एक उमानाथ हैं। अगली जून के भोजन की फिक्र नहीं और मैं हूं; जो अगले साल भर के लिये अन्न संग्रह की जुगत में हूं। एक वाहन, एक वाहन ड्राइवर काइन्तजाम कर रहा हूं। मैं असन्तुष्ट हूं। उमानाथ संतुष्ट हैं और प्रसन्न भी।

अपना अपना भाग्य। अपनी अपनी दशा।

GDFeb164442


Design a site like this with WordPress.com
Get started