रामपुर (छद्म नाम) के सैंतालीस प्रतिशत लोग काम के हिसाब से अनपढ़ हैं। प्रौढ़ शिक्षा एवम बेसिक कर्मठता योजना अधिकारी की एक रिपोर्ट में रामपुर के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट बनाई है। इसके अनुसार लगभग आधे नागरिक अखबार नहीं पढ़ सकते, नौकरी आदि के फार्म नहीं भर सकते अथवा दवा की बोतलों पर लिखे निर्देश नहीं समझ सकते।
इस अध्ययन में अधिकारी महोदय ने बताया है कि लगभग 20,000 काम के हिसाब से अनपढ़ प्रौढ़ लोगों में किये सर्वेक्षण के अनुसार आधे से ज्यादा के पास हाई स्कूल पास होने का प्रमाण पत्र है …
बायोडाइजेस्टर टॉयलेट – प्रयोग पर फीडबैक

मैने एक पोस्ट तीन महीने पहले लिखी थी – बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस और बायोडाइजेस्टर टॉयलेट। इसमें रेलवे द्वारा बुंदेलखण्ड एक्सप्रेस में नये प्रकार के टॉयलेट्स प्रयोग में लाने के बारे में था। मैने लिखा था –
(यह बायोडाइजेस्टर) बैक्टीरिया सियाचिन ग्लेशियर पर सेना के टॉयलेट्स का ठोस अपशिष्ट पदार्थ क्षरित करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। इतनी सर्दी में अपशिष्ट पदार्थ क्षरित करने में अन्य कोई जीवाणु काम नहीं करता।
अब यह बेक्टीरिया रेलवे प्रयोग कर रहा है अपने ट्रेनों के टॉयलेट्स में। ट्रायल के तौर पर बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस के 23 कोच इसके प्रयोग के लिये तैयार हैं और 17 जनवरी से चल भी रहे हैं।

मुझे इसके प्रयोग के बारे में मेरे मित्र श्री अशोक मिश्र ने बताया था जो उत्तर-मध्य रेलवे के कोच और वैगनों के मुख्य अभियंता (Chief Rolling Stock Engineer) हैं।
श्री मिश्र से मैने अब उनसे इस तकनीक के कार्य करने के बारे में फीडबैक देने का अनुरोध किया।
सामान्यत: कोई भी नया प्रयोग एक दो महीने में दम तोड़ने लगता है। पर श्री मिश्र ने बताया कि उन्होने स्वयं बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस के रेक का निरीक्षण ग्वालियर में किया था। कुल तीन डिब्बों में एक एक टॉयलेट (कुल तीन) में मल डिस्पोजल रुका हुआ पाया गया। इनमें लोगों द्वारा फैंके गये पॉलीथीन के बैग और कपड़ा आदि पाये गये। एक एक लीटर की प्लास्टिक की बोतल भी फैंकी मिली।
निश्चय ही, इस प्रकार की चोकिंग होने पर बायोडाइजेस्टर काम ही नहीं कर सकता। उल्टे यह भी सम्भव है कि बेक्टीरिया अपशिष्ट के अभाव में मर ही जाये!
[पर सन्तोषप्रद बात यह थी कि नब्बे प्रतिशत टॉयलेट्स में यह प्रणाली ठीक ठाक कार्य कर रही थी। और सम्भवत: रेलवे कई अन्य गाड़ियों में यह प्रणाली लगाने की सोच रही है। उत्तर-मध्य रेलवे भी इस प्रणाली के अन्य गाड़ियों में प्रयोग के पक्ष में है।]
मुझे विश्वास नहीं हुआ कि लोग प्लास्टिक या बोतल फैंक सकते हैं टॉयलेट्स में। अत: मैने मिश्र जी से अनुरोध किया कि वे मुझे चित्र उपलब्ध करायें इन टॉयलेट्स के। और वाकई, चित्र देख कर लोगों की सिविक सेंस पर खीझ होती है।
आप एक कमोड का चित्र देखें, जिसमे बोतल डाली हुई पाई गई (बाकी चित्र नहीं लगा रहा पोस्ट पर, चूंकि वे कहीं ज्यादा अरुचि उपजाते हैं मन में!)
[ई-स्वामी की भावनाओं के अनुसार चित्र हटा दिया है।]
निषादराज
सप्तसिन्धु के आर्यों के पास जीवन का आनन्द लेने के लिये समय की कमी नहीं थी। … वह कामना करते थे –
कल्याण हो हमारे घोड़ों, भेड़ों, बकरियों, नर-नारियों और गायों का। (ऋक 1/45/6)
इन्ही अपने पशुओं को ले वह चराते थे। राजा और उनमें इतना ही अंतर था कि जहां साधारण आर्य परिवार में पशुओं की संख्या कुछ सौ होती थी, वहां राजाओं के पास हजारों हजार होती थी।
सप्तसिन्धु (पंजाब) के आर्य तो अब वैसे नहीं रहे। पर यहां मेरे घर के पास गांगेय निषाद हैं। उनके कर्म क्षेत्र में मैं विचरता हूं सवेरे। और मुझे यह मानना चाहिये कि उनके जीवन में आनन्द लेने के लिये समय की कमी न होगी। गंगा जीवन यापन के सरल व विविध साधन देती हैं इनको।
उस बालू में गंगातट पर बने खेत में पगडण्डी है। खेत में कोई नहीं है, इस लिये मैं ट्रेस-पासिंग कर लेता हूं। बीचों बीच है मड़ई। उसके अन्दर कुछ सामान है – एक गिलास, पानी भरा मिट्टी का पात्र, चप्पल और सोने के लिये टाट का बिछौना। पास में है एक चूल्हा, ईंट जमा कर बनाया हुआ। कुछ राख, एक अधजली लकड़ी। पीछे की तरफ पके कोंहडे के खोल – जो बीज निकाल कर छोड़ दिये गये हैं। सुरती और जर्दायुक्त सुपारी के पाउच भी बिखरे हैं। आशिकी ब्राण्ड। पाउच पर छपा है – इससे केंसर होता है। बिच्छू की आकृति बनी है। कैंसर है तो केंकड़े की आकृति बननी चाहिये! अच्छा है बिच्छू की बनी है। कौन केवट केकड़े से डरेगा!
रात में जो वहां सोया होगा, निश्चय ही खेत राखने के साथ साथ पिकनिक नुमा आनन्द भी लिया होगा उसने। बहुत कुछ वैसे जैसे सप्तसिन्धु के आर्य लेते रहे होंगे!
खेत में भ्रमण कर बहुत कुछ दीखता है। बाजार में बेचने के लिये बोया गया है – कोन्हड़ा, लौकी और नेनुआ। इसके अलावा अपने उपयोग भर के लिये इस निषाद ने प्याज, टमाटर, करेला और पुदीना भी लगा रखा है। मन प्रसन्न करने को अपने आप उग आये गेन्दे के फूल भी हैं। किनारे बह रही हैं गंगाजी। और उसपार आने जाने के लिये इस व्यक्ति ने अपनी नाव लंगर लगा रखी है। गंगा-उसपार बो रखे हैं खीरा और ककड़ी। पूरी विविधता है भोज्य पदार्थ की।
रुकिये, यही नहीं, खेत में पगडण्डी के पास मुझे मछली पकड़ने का जाल भी दीखता है। स्वस्थ शरीर के लिये हाई क्वालिटी प्रोटीन का भी नैसर्गिक इंतजाम है इस निषाद के पास। और क्या चाहिये एक व्यक्ति को?! अगर लोक संग्रह की हाही नहीं हो तो यह जीवन समस्त आनन्द दे सकता है!
आप थोड़ा और घूमें आस पास तो कछार में बनती, ले जाई जाती मदिरा के भी दर्शन हो जायेंगे। वह भी कई निषादों का प्रमुख उद्यम है। आमोद का साधन भी।
इस निषाद के पास एक नाव है। कई के पास दो भी हैं। निषादराज के पास कितनी होती होंगी जी? शायद पच्चीस, पचास। या शायद मोटरबोट होती हो!
गंगामाई अगर हिन्दू गर्व और शर्म के सहारे से स्वस्थ हो गयीं और उनका पानी स्वच्छतर होता गया तो अगले जन्म में मैं बनना चाहूंगा शिवकुटी का निषादराज! और लिखूंगा मॉडीफाइड ऋचा –
कल्याण हो हमारी कुटी, सब्जियों, सोमरस, नर-नरियों और हमारी यंत्रचलित नावों का। कृपा बनी रहे गंगा मां की और स्वच्छ जल में पुष्ट हों हमारी मछलियां; हमारे जाल में आने को आतुर!
