भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
मेरा सवेरे सात बजे के पहले महराजगंज कस्बे के बाजार से गुजरना और राजू का सफाई काम बहुधा एक ही समय पर होते हैं। आधा-एक किलोमीटर लम्बी बाजार की सड़क से गुजरता हूं तो राजू, उसकी ठेलागाड़ी और साथ में काम करते उसके परिवार के एक दो चित्र खींचता हूं। पहले उसे अटपटा लगता था। परिवार असहज भी होता था; अब शायद आदत पड़ गयी है।
उसकी कचरे की ठेला गाड़ी, दुकानदारों का अपने दुकान/घर के आगे कचरे का डिब्बा रखना और उसके द्वारा कचरागाड़ी में डिब्बों को पलटना, कहीं कहीं झाड़ू लगाना – यह सब मेरे मन में सवाल पैदा करता था। धीरे धीरे उन सवालों के पर्याप्त जवाब मिल गये। उन जवाबों के आज यह पोस्ट लिखी जा रही है।
राजू का कहना है कि डिब्बा खाली करने के लिये हर दुकान वाला उसे पचास रुपया महीना देता है।
पहली बात – इस बाजार की साफसफाई लोगों और इस सफाई-परिवार का व्यक्तिगत उपक्रम है। नगर पंचायत या पालिका जैसी कोई संस्था का उसमें कोई रोल नहीं। बाजार में मेरे अनुमान से करीब डेढ़-दो सौ दुकानें तो होंगी ही। उनमें से कई अपने घर या दुकान के सामने झाड़ू खुद लगाते हैं। और कचरा एक डिब्बे में भर कर सामने रख देते हैं। रोज सवेरे यह सफाई परिवार चक्कर लगा कर डिब्बे अपनी कचरा ठेलागाड़ी में पलटता है। परिवार में मुझे आदमी (नाम बताया राजू) उसकी पत्नी और एक बारह साल का बच्चा नजर आते हैं। राजू का कहना है कि डिब्बा खाली करने के लिये हर दुकान वाला उसे पचास रुपया महीना देता है।
एक दुकान से मैं सफल का फ्रोजन मटर खरीदता हूं। राजू वहां दुकान के सामने झाड़ू लगा रहा है। मुझे रुकना पड़ता है। वह थोड़ी जगह साफ कर मुझे कहता है – जाईये। जगह साफ हो गयी है।
एक दुकान से मैं सफल का फ्रोजन मटर खरीदता हूं। राजू वहां दुकान के सामने झाड़ू लगा रहा है। मुझे रुकना पड़ता है। वह थोड़ी जगह साफ कर मुझे कहता है – जाईये। जगह साफ हो गयी है।
दुकानदार मुझे राजू के काम के बारे में बताते हैं – “इनके बिना तो काम ही नहीं चलता। एक दिन ये न आये और हम लोग कूड़ा एक जगह समेट कर गोलिया भी दें तो भी पूरा बाजार बजबजाता रहता है। कोई ग्राहक आना पसंद नहीं करता। इसके लिये हम लोग पांच-पांच रुपया देते हैं?”
“पांच रुपया महीना? वह तो कुछ भी नहीं है!” – मैंने कहा।
दुकानदार ने जवाब दिया – “महीने में नहीं, पांच रुपया रोज।”
बगल में चाय की दुकान वाले के पास राजू झाड़ू लगा कर चाय पीता है। उससे पूछता हूं – “कितने की चाय पीते हो?”
राजू – “आठ साल हो गये यहां काम करते हुये। अब तक तो मैंने एक भी पैसा नहीं दिया चाय पीने का।” राजू ने बताया कि वह बनारस का रहने वाला है। यहां के किसी गांव का नहीं। किराये के घर में रहता है। दो हजार रुपया तो किराया ही लग जाता है।
राजू मुझे सीधा लगता है पर उसकी पत्नी तेज तर्रार है। कुछ मेक-अप भी किये है वह और पान से ओठ लाल हैं। सीधा तन कर चलती है। आत्मविश्वास से भरी। (पीली साड़ी में दांये झाड़ू लिये खड़ी है)।
राजू मुझे सीधा लगता है पर उसकी पत्नी तेज तर्रार है। कुछ मेक-अप भी किये है वह और पान से ओठ लाल हैं। सीधा तन कर चलती है। आत्मविश्वास से भरी। मुझे रतलाम की गीता बाई याद आती है। वह कोयला ट्रांसशिपमेण्ट करने वाली लेबर की नेता थी। तीन सौ लेबर उसके कहे पर चलते थे। दबंग महिला थी वह। वैसी ही लगती है राजू की पत्नी। मुझसे कहती है – “झुट्ठै फोटो खींचते हो। उससे क्या होगा? लोगों को बताओगे भी हमारे बारे में तो कोई कुछ देगा थोड़े ही। कोई मकान, कोई राशन थोड़े ही देगा। दो हजार रुपया तो मकान का किराया लग जाता है। कितनी मंहगाई है।…कोई नौकरी तो दोगे नहीं हमको।”
राजू उसे चुप कराने की कोशिश करता है। पर इस बात को तो वह भी दोहराता है कि जिंदगी मुश्किल है। मकान किराया और खर्चे पूरा करना कठिन काम है। मैं मिली हुई जानकारी से मोटा हिसाब लगाता हूं – सवेरे के इस काम से परिवार दस-बारह हजार कमाता होगा। वह भी तब जब हर दुकानदार उसकी सेवाओं का पैसा देता हो। कई शायद न भी देते हों।
मेरे पास सवेरे की सैर के समय और कोई काम नहीं है। दफ्तर-काम का बोझ भी सिर में नहीं घुमड़ता। मन-दिमाग में खाली जगह राजू, उसकी बीवी, उसका काम और जिंदगी की मुश्किलें आदि से भर जाती हैं। यह लिख कर वह मन से निकाल दूंगा। अगले दिन के लिये कोई नया विषय, कोई नया पात्र सामने आयेगा। :-)
मैं हूं तो मन है, मन है तो पात्र हैं। पात्र हैं तो लेखन है! यही जिंदगी है मुझ रिटायर्ड की! :lol:
प्रेमसागर ने द्वादशज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में सहारनपुर जा चुके हैं। अब शक्तिपीठ पदयात्रा में, पूर्वोत्तर का भ्रमण सम्पन्न कर, वे हरियाणा, पंजाब और हिमांचल के शक्तिपीठों के दर्शन को निकलना है। उसमें पहला पीठ है कुरुक्षेत्र का भद्रकाली शक्तिपीठ। यह सहारनपुर से निकटतम है। इसलिये प्रेमसागर ने पदयात्रा का यह चरण सहारनपुर से प्रारम्भ किया।
कल रात वे सहारनपुर के सत्कार होटल में थे। वहां के कर्मियों के साथ उनका एक चित्र है। आज सवेरे सत्कार होटल से प्रारम्भ किया आगे का सफर। इस खण्ड में वे लगभग 400-500किमी की यात्रा तय करेंगे और उसमें आधे से अधिक हिस्सा हिमांचल प्रदेश के पर्वतीय स्थलों का होगा।
आज प्रेमसागर ने यात्रा के दौरान पूर्वी यमुना नहर, यमुना नदी और पश्चिमी यमुना नहर पार की। सवेरे जो चित्र उन्होने छ किमी की यात्रा करने पर भेजे थे उसमें सहारनपुर से गुजरती पूर्वी यमुना नहर भी थी। नक्शे में सहारनपुर से गुजरती कोई पतली सी पांवधोई नदी भी दिखती है। पर शायद एक शहर से गुजरती बेचारी नदी कोई छोटा-मोटा नाला भर बन गयी होगी, जिसको कोई नोटिस ही न करे। पांवधोई सम्भवत: पांवधोने लायक भी न बची हो (जनसत्ता के एक लेख के अनुसार सहारनपुर की पांवधोई नदी गंदे नाले में बदल गयी थी, पर लोगों की जागरूकता से उसे बुरी हालत से मुक्त कराने में कुछ हद दक सफलता पाई है। लेखक हैं अतुल कनक)। जैसे बहुत से जीवजंतु और पौधे विलुप्त होने के कगार पर हैं, उसी तरह कई नदियां या तो इतिहास बन चुकी हैं या बनने जा रही हैं।
सहारनपुर से गुजरती पूर्वी यमुना नहर। यह 1400किमी नहरों का जाल बनाती है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सींचती है। पूर्वी नहर शाहजहांंके काल में बननी शुरू हुई और 1830 में अंग्रेज कम्पनी के शासन में चालू हुई।
पर यमुना नहरों का अतीत भी है और वर्तमान भी। दिल्ली में नजफगढ़ और ओखला के बीच यमुना भले ही प्रदूषित, बजबजाती, फेन उगलती जहरीली नदी हो; यहां उसकी नहरें और वह स्वयम जीवंत लगीं।
यम की भगिनी यमुना, किसी बड़ी घटना-दुर्घटना के बाद घर्घर नाद कर बहती सरस्वती के जल का एक बड़ा हिस्सा अपने में समाहित करने वाली यमुना तक न जाया जाये। सन 1335 में फीरोजशाह तुगलक ने पश्चिमी यमुना नहर को बनाया था। हो सकता है कि उसके पहले भी यह नहर किसी रूप में रही हो। पर नहर का अस्तित्व 9 शताब्दियों तक तो है ही। सन 1750 तक यह नहर गाद भरने से मृतप्राय हो चुकी थी। उसके बाद अंग्रेजों ने इसे फिर बनाया। उपलब्ध सामग्री में कई तिथियां और कई बांध इस नहर के संवर्धन में जुड़ते हैं। अंतत: जुड़ता है बीसवीं सदी के अंत में बना हथिनीकुण्ड बांध – जो पश्चिमी और पूर्वी दोनो नहरों को जल उपलब्ध कराता है।
पश्चिमी यमुना नहर। यमुनानगर के समीप। इसका इतिहास 1335 के फिरोज बिन तुगलक शासन तक तो जाता ही है।
पूर्वी नहर शाहजहांंके काल में बननी शुरू हुई और 1830 में अंग्रेज कम्पनी के शासन में चालू हुई। इसको ले कर भी कई बांधों के नाम आते हैं। जहां पश्चिमी नहर हरियाणा के अम्बाला, जींद, हिसार, सोनीपत, भिवानी, रोहतक आदि जिलों को सींचती है, पूर्वी नहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और गाजियाबाद को सींचती है। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की खेती किसानी की उन्नति का बड़ा हिस्सा इन नहरों और इनसे निकली छोटी नहरों के जाल को जाता है। पश्चिमी नहर 85किमी लम्बी है और उसके जाल की लम्बाई जोड दी जाये तो चार सौ किमी होगी। पूर्वी नहर की कुल लम्बाई 1400किमी है।
प्रेमसागर की यात्रा में इन नहरों का कोई विशेष स्थान नहीं है। उन्हें तो अपने इक्यावन पीठ देखने, सम्पन्न करने हैं। मेरा मन इन नहरों पर अटक जाता है। मैं ताजेवाला, हथिनीकुण्ड, डाकपत्थर, पथराला आदि नामों से परिचय पाने का प्रयास करता हूं। मन होता है कोई एक ऐसी पुस्तक तलाशूं जो भारत के जल प्रबंधन का भूत-वर्तमान आदि अच्छे से बताती हो।
यमुना नदी। प्रेमसागर के अनुसार नदी में पानी दोनो नहरोंं से कम ही है। पर पानी साफ है।
प्रेमसागर तो यमुनानगर पंहुच कर तीस पैंतीस चित्र और अपने दिन भर के अनुभव बता कर छुट्टी पा गये हैं। मैं नहरों में अटका हूं! :lol:
शाम को प्रेमसागर ने मुझे बताया – “सवेरे भईया जहां चाय पी, वह मोनू होटल था। किसी मुसलमान सज्जन का। बड़े भले लोग थे वे। मैने एक फोटो भी ले लिया है।”
“दोपहर में एक मंदिर में रहा। वहां नहा धो कर आया तो उन्होने भोजन के लिये भी आग्रह किया। सान-ध्यान, भोजन कर दोपहर में दो घण्टा वहीं सो भी गया।”
सरस्वती शुगर मिल। जैसा बोर्ड पर लिखा है यह डिस्टिलरी। प्रेम सागर ने बताया कि कुछ महीने बाद डिस्टिलरी चालू होगी।
“गन्ना, धान और गेंहूं की खेती होती है भईया। पापूलार के पेड़ काफी लगाये हुये हैं। इण्डस्ट्री भी दिखीं। चीनी की फेक्टरी तो सड़क के साथ मीलों लम्बाई में है। नाम है सरस्वती शूगर लिमिटेड। सहारनपुर का इण्डस्ट्रियल एरिया तो डेढ़ किमी रास्ते से अलग है। वहां नहीं जा पाया। पर रास्ते में रिजॉर्ट बहुत दिखे। भईया, लगता है यहां लोग शाहखर्च हैं। बताया कि रिजॉर्ट की एक दिन की शादी आदि के लिये बुकिंग का किराया डेढ़ दो लाख होता है। और काफी लोग रिजॉर्ट का इस्तेमाल करते हैं।” – अपने तरीके से प्रेमसागर पूर्वी और पश्चिमी उत्तरप्रदेश का आर्थिक अंतर समझ रहे थे और मुझे बता भी पाये। हरियाणा भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसा है।
एक और आने वाला रिजॉर्ट। “रास्ते में रिजॉर्ट बहुत दिखे। भईया, लगता है यहां लोग शाहखर्च हैं। बताया कि रिजॉर्ट की एक दिन की शादी आदि के लिये बुकिंग का किराया डेढ़ दो लाख होता है। और काफी लोग रिजॉर्ट का इस्तेमाल करते हैं।”
“तीन नदियां मिली भईया” – प्रेमसागर ने कहा। वे दो यमुना नहरों और बीच में यमुना नदी की बात कर रहे थे। उनके विवरण के अनुसार यमुना नदी का पानी साफ तो है, पर कम है। नहरों में पानी ज्यादा है। पूर्वी नहर का पानी साफ है पर पश्चिमी नहर का मटमैला।
आज प्रेमसागर कुल 38 किमी चले। आगे उन्हें कुरुक्षेत्र, जलंधर, चिंतपूर्णी, ज्वालाजी और बज्रेश्वरी मंदिर कांगड़ा तक की यात्रा करनी से। सीधे लाइन बनाने के हिसाब से शाम के यमुनानगर के पड़ाव से यह यात्रा 384किमी की होती है पर पैदल पथ दुरुह भी है और टेढ़ा भी। कम से कम 412किमी तो चलना ही होगा। ज्यादा भी।
यात्रा के पहले चरण में प्रेमसागर 2220 किलोमीटर पैदल चले। अब यह दूसरा चरण है! उसमें 38 किलोमीटर आज चल चुके। चरैवेति, चरैवेति!!!
हर हर महादेव।
ॐ मात्रे नम:
प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें। ***** प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103 कुल किलोमीटर – 3121 मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
कुछ लोग, कुछ विषय बहुत प्रिय हैं। इतने प्रिय कि उनके बारे में लिखना कठिन होता है। वे कोई एक घटना, एक प्रसंग, एक रिपोर्ट या एक अनहोनी तो हैं नहीं। वे समग्र चरित्र या प्रबंध हैं। उनपर क्या लिखा जाये और कितना लिखा जाये?!
सुरेश चाहते हैं कि मैं छोटी से छोटी बात पर लिखता हूं; राह में मिले हर छोटे-छोटे करेक्टर पर; तो उनपर भी कुछ लिखूं। मैं कई बार कोशिश करता हूं। कुछ चित्र एक फोल्डर में इकठ्ठे करता हूं। उनका फेसबुक प्रोफाइल देखता हूं। पर लिखना नहीं हो पाता। पता नहीं क्यों?
सुरेश पटेल
सुरेश बार बार मेरा ध्यान खींचते हैं। मैं बक्सर से गुजरती सोन नहर की बात करता हूं तो वे मिर्जापुर-शोणभद्र जिले की नहर की बात करते हैं। वह भी पुरानी नहर है। सिंचाई परियोजना का महत्वपूर्ण अंग। मेरे साथ वे वहां चल सकते हैं। सुरेश चुनार का तिलिस्म मेरे सामने बार बार रखते हैं, अपने घर आने का निमंत्रण भी दोहराते हैं। पर न जाना होता है, न देखना और न लिखना। सुरेश के बारे में सोचना बारबार होता है।
मैं जब रिटायर हो कर गांव में आया था तो अपेक्षा थी कि गांव मुझे अपनापन देगा। कुछ ही दिनों में साफ हो गया कि अपने निर्णय में – गांव में आ कर रहने में – मैंने बड़ी गलती की थी। यहां मेरे लिये स्थान नहीं था। स्थान मुझे खुद बनाना था। उस एकाकी समय में (और मुझे बड़ा ही विचित्र लगता है कि कैसे कोई मिल जाता है) जो अनूठे चरित्र मुझे मिले वे थे सुरेश पटेल। वे मेरी फेसबुक (और शायद ब्लॉग) के माध्यम से मेरा गांव में रीवर्स माइग्रेशन देख रहे थे। गांव में आने पर मुझे लगभग हर पोस्ट पर उनकी टिप्पणियां नजर आने लगी थीं। उनमें मेरे आसपास के बारे में यूं लिखा – कहा होता था मानो यह नौजवान 100-200 मीटर की दूरी से मुझे परख रहा हो।
कई लोग – लगभग 2-3 सौ लोग, जो मुझे मेरे लेखन के कारण नहीं, मेरे पद के कारण मुझसे सोशल मीडिया पर जुड़े थे, वे एक एक कर गायब हो रहे थे। पर जो जुड़ रहे थे, उनमें मैं सुरेश पटेल को ही याद करता हूं। वह जुड़ाव आज भी है। और समय के साथ ज्यादा ही हुआ है।
गांव में आने के बाद कुछ ही महीने बीते थे कि एक दिन सुरेश मिलने आये। औरों को तो घर की लोकेशन बतानी पड़ती थी। लोग इधर उधर भटक कर मेरे यहां पंहुचते थे। गांव में मेरे बारे में पूछते थे तो लगभग सभी बोलते थे कि ऐसा कोई पांड़े इधर रहता नहीं। यह तो दूबे लोगों का गांव है। मैं तो पर्सोना-नॉन-ग्राटा (persona non grata) था गांव के लिये। पर सुरेश को घर की लोकेशन बतानी नहीं पड़ी। उन्होने कहा – “बाऊजी, मैं आ रहा हूं”; और आ गये। उस घटना को सात साल बीत चुके हैं।
सुरेश नौजवान थे। लड़के ही। एक साठ साल के व्यक्ति से एक नौजवान का ऐसा लगाव हो सकता है – मैं कल्पना नहीं कर सकता था। मुझे पहली बार लगा कि यह व्यक्ति शायद एक अफसर रहे को अपने पास से देखना चाहता हो और एक बार देख कर कि उसमें कोई खास बात, कोई ठसक नहीं है, फिर नहीं आयेगा। पर मैं गलत सोच रहा था। पहली बार मेरा साक्षात्कार हो रहा था ऐसे व्यक्ति से जो कृत्रिम सोशल मीडिया से भी अपनत्व सृजित कर रहा था! और उस अपनेपन ने मुझे गहरे से सिंचित कर दिया।
सुरेश मेरे लिये अपने बगीचे की सब्जियां लाये थे। और बहुत सारी थीं! इतनी कि हमें अपने पड़ोस वालों को भी बांटनी पड़ीं। सब्जी उगाने के अलावा सुरेश पावरलूम से साड़ियां बनाने का काम भी करते थे। मैं एक सेल्फमेड ऑन्त्रेपिन्योर से मिल रहा था।
उसके कुछ महीने बाद सुरेश का विवाह हुआ था। हम उनके रिसेप्शन में उनके गांव – यहां से लगभग चालीस किमी दूर अदलपुरा-चितईरोड (वाराणसी) के बीच उनका गांव है – गए। उनके घर का परिवेश ग्रामीण था। और वहां भी मुझे आश्चर्य हुआ कि कैसे सुरेश कैसे सामान्य गंवई अनपॉलिश्ड नौजवान के उलट इतने विनम्र और तहजीब वाले हैं। मुझे आज तक उत्तर नहीं मिला है। शायद वे इतना दूर (42किमी) न होते और यदा कदा उनके यहां मैं साइकिल चलाते पंहुचता होता तो उत्तर जान पाता।
फिलहाल तो मैं सुरेश को ही जानता हूं। उनकी जड़ों से परिचय अधिक नहीं है। उनके बालक का चित्र देखा है। बड़ी और भावयुक्त आंखें हैं बालक की। चित्र शायद चार साल पुराना है। अब तो स्कूल जाता होगा बालक!
कोरोना काल में सुरेश से सम्पर्क यदा कदा मैसेज या फोन से हुआ। कोरोना की त्रासदी से उनका गांव भी प्रभावित था। उनका पावरलूम का व्यवसाय भी बंद हुआ। बिजली मंहगी होने से वह चलाना घाटे का व्यवसाय हो गया था। अब वे मुख्यत: किसान हैं। सब्जियां उगाने वाले किसान। खुद उगाते हैं और खुद ही ले कर सवेरे सवेरे बनारस की मण्डी जाते हैं – चेनुआं सट्टी।
सुरेश मुझे वर्तमान सरकार के काल में हुये परिवर्तन के बारे मे बताते हैं। “बाऊजी, पुलीस भी अब कायदे की हो गयी है। पहले हम सब्जी ले कर चेनुआं सट्टी जाते थे तो रास्ते पड़ते हर थाने पर सौ रुपये का चढ़ावा लगता था। अब वह खतम हो गया है।”
आसपास के जिलों, स्थानों की अच्छी जानकारी लगती है सुरेश की। अगली सर्दियों में उनके साथ भ्रमण करने का इरादा है! वे नहरें, प्रपात और चुनार के किले का तिलस्म देखना है!
आसपास के जिलों, स्थानों की अच्छी जानकारी लगती है सुरेश की। अगली सर्दियों में उनके साथ भ्रमण करने का इरादा है! वे नहरें, प्रपात और चुनार के किले का तिलस्म देखना है!
मैंने उन्हें कहा था कि बिजली वाली साइकिल पता करें मेरे लिये बनारस में उन्होने पता भी कर लिय अगले दो तीन दिनों में, पर मैं ही ढीला पड़ गया। बिजली की साइकिल अगर कभी खराब हो गयी तो उसे ठीक करने वाला कोई लोकल कारीगर नहीं मिलेगा। एक-दो साल में जब बिजली की साइकिलें आम हो जायेंगी तो उसे ले कर सुरेश के गांव तक मैं चक्कर लगाया करूंगा। अभी मेरा दायरा 10किमी तक का है। तब वह 40 किमी का हो जायेगा – सुरेश के घर तक का! आशा है अगली सर्दियों तक तो वैसा हो ही जायेगा।
मैं यह जो लिख रहा हूं, वह तो रेण्डम लेखन है। बेतरतीब। सुरेश के प्रति जो स्नेह, लगाव है वह झलक ही नहीं रहा है। पर सुरेश के खुद के लगाव के शब्द मेरे पास हैं। वे मेरे पास आते थे तो वापस जा कर एक दो पैराग्राफ लिख भेजते थे। मैं उनमें से एक नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं। उससे पता चलेगा कि कितना अनूठा इंसान है सुरेश! –
प्रिय बाउजी ‘ आज आप से सन 2023 साल की दुसरी मुलाकात आप के आवास हुई। कल जब मै घर से निकला मामा के यहां शादी में जाने के लिए तो मामा के घर की छवि मन में कम और आप की घर ही छवि ज्यादा बन रही थी कि बाउजी ऐसे बैठे होगें या साइकिल चला कर घुमने निकले होगें आदि ऐसी बातें सोचते हुए मै अपनी बाइक से बढता जा रहा है बढता जा रहा था। फिर जब मै ओवर ब्रिज के पास पहुंचा जहां से आपके घर के तरफ सड़क मुडती है वहां मै ओवर ब्रिज के उपर करीब 2 मिनट रुका और सोचा कि क्यों न एक सेल्फी खिचकर बाउजी को भेजा जाए। फिर मेरे मन और हृदय में द्वंद्व युद्ध होने लगा कि सेल्फी ली जाए या नहीं यह सोचते हुए मै ओवर ब्रिज से नीचे उतर गया और उस पेट्रोल पंप के पास पहुंचा जहां की कुछ तस्वीरें आपने एक दिन पहले पोस्ट की थीं। और फिर वही सोचा क्युं न यहाँ से सेल्फी खिचकर आप को भेजी जाए और कहा जाए कि देखिए मै आ गया … फिर मेरे मन कर दिया। कि छोड़ो जब कल आना ही है आपके पास तो क्या सेल्फी खिचकर भेजना। यह सोचते हुए मै मामा के घर चला गया। और शाम को 5बजे के बाद आपको मैसेज किया कि बाउजी कल मै आ रहा हूं आप के पास। यकीनन बाउजी जब आपने कहा कि स्वागत है तब मन हृदय और रोम रोम से बस एक ही आवाज आने लगी कि एक बार फिर आपसे गले लगने का मौका मिला या यूं भी कह सकते हैं आपने दिया। फिर अगले दिन सुबह जब आपको फोन किया कि मै 15 से 20 मिनट में आ रहा हूं तब उस समय आपकी आवाज (आइए आइए) सुन कर भी बहुत बहुत अच्छा लगा बाउजी। घर पहुचने पर जो आदर सत्कार आप और मम्मी जी देते हैं न बाउजी उतना तो कोई अपना भी नहीं करता 😢। जब मै आपके घर निकलकर चलता हूं न पुरे रास्ते भर बाउजी आप का चेहरा आंखो के सामने रहता है और वो गीत है न – अकेला गया था मै ना आया अकेला मेरे संग संग आया तेरी यादो का मेला – कुछ ऐसा भी मेरे साथ होता है। घर आने बाद एक दो दिन तक तो बस आप का ही चेहरा आखों के सामने रहता है फिर धीरे धीरे धुंधली होती चली जाती है!… न जाने ये कौन सा रिश्ता है बाउजी जो आपसे जुड गया है लिखना तो दिल आप के बारे में बहुत कुछ चाहता है बाउजी मगर आखों मे नीद आ रही है। बाकि फिर कभी। शुभ रात्री बाउजी; सादर चरण स्पर्श॥
मैने इस तरह का इमोशनल जुड़ाव कुछ महान लेखकों के पाठकों के संस्मरणों में पढ़ा था। मुझे अपने में वैसी लेखनी का कोई मुगालता नहीं है। पर सुरेश के कथन में इतना अपनापन है कि भीग जाता हूं। सुरेश की पंक्तियों की बराबरी करता कुछ कह ही नहीं सकता। और शायद यही कारण है कि मैं अब तक कुछ लिख नहीं पाया।
आगमी सर्दियों में अगर हम साथ साथ घूमे तो शायद लिखूं। फिलहाल तो सुरेश और उनके परिवार को आशीर्वाद दे कर यह लेख समाप्त करता हूं।