बांस के कारीगरों के समीप

करीब एक दर्जन घर हैं धईकारों के। वे सब बांस के सामान बुनते हैं। रीता पाण्डेय ने एक महिला, बदामा, से बातचीत की। एक उसौनी खरीदी।


मैंने पास के गांव – वह बड़ा गांव है, कस्बे जैसा – गिर्दबड़गांव की धईकार बस्ती के बारे में पहले भी लिखा है। अब, जब तय किया कि पत्नीजी के साथ भ्रमण किया जायेगा, तो गंगा तट के बाद दूसरा स्थान मैंने उस बस्ती को चुना। उस बस्ती के लोग बांस की ग्रामीण अंचल में प्रयोग होने वाली वस्तुयें बनाते हैं – उसौनी, चंगेरी, छिंटवा, झऊआ, बेना आदि।

धईकार बस्ती में रीता पाण्डेय, एक झऊआ देखती हुई।

धईकार बस्ती में मैं अपनी पत्नीजी को ले जाकर वह सब दिखाना चाहता था कि वे उनके काम की मेहनत और कलात्मकता का अनुभव करें और अपनी ओर से एक प्रयास करें।

गिर्दबड़गांव के छोर पर जो तालाब है, उसके किनारे पेड़ के नीचे एक व्यक्ति झऊआ बना रहा था। बड़ा झऊआ। उसी में वह बैठ कर बुन रहा था। पास में रेडियो रखे था जिसमें तेज आवाज में कोई भोजपुरी में महाभारत की कथा का लोकगायन चल रहा था। एक व्यक्ति पास में बैठा उसका बनाना देख रहा था। एक काली बकरी बालू को ढ़ंकने के लिये बने कर ईंट के स्तूप पर बैठी थी। रोचक लग रहा था दृष्य।

करीब एक दर्जन घर हैं धईकारों के। वे सब बांस के सामान बुनते हैं। रीता पाण्डेय ने एक महिला, बदामा, से बातचीत की। एक उसौनी खरीदी। बदामा के पास उसका बेटा सोनू भी था। वह बाबूसराय के पास सिंघापुर में पढ़ता है। वह बांस की कारीगरी के कम में नहीं लगा।

  • badamaa , dhaikar
  • rita pandey in dhaikar basti
  • badama and sonu

बगल के एक घर से एक छोटा झऊआ खरीदा। उस घर के आदमी ने अपने यहां बुने जा रहे एक बड़े झऊआ का हिस्सा दिखाया। उसके घर के दरवाजे के पास ही उसकी पत्नी बांस की पतली तीलियां छील रही थी। फोटो लेता देख आदमी ने कहा ‘आपन मोंहवा कैमरा के सामने कई ले (अपना मुंह कैमरे के सामने कर ले)’ पर महिला ने अपना घूंघट और लम्बा कर लिया।

  • Rita purchasing jhauaa
  • dhaikar man showing part wowen jhaua
  • bamboo pealing lady
  • dhaikar lady working in home

हम करीब बीस मिनट रहे वहां। और भी घरों में जा कर देखा जा सकता था। पर रीता इतना ही अनुभव लेना चाहती थीं बस्ती का। घर जा कर बांस की बनी वस्तुओं पर चर्चा हुई। यह सोचा गया कि एक बार फिर वहां जा कर उन लोगों से विस्तार से बातचीत करेंगे। रीता पाण्डेय का उस बस्ती से परिचय होना ही ध्येय था इस बार जाने का।

यह रीता पाण्डेय का अपना गांवदेहात है। बचपन यहीं था। पर तब जो घर-समाज था, वह बेटियों को घर के बाहर नहीं निकलने देता था। पत्नीजी बताती हैं कि उनके बब्बा घर के दालान में बैठते थे और मजाल है कि कोई महिला-स्त्री घर के बाहर यूं ही निकल जाये। इस लिये तब उनका इन सब बस्तियों से कोई परिचय नहीं था। अब, छ दशक बाद वे यह सब देख रही हैं। उनकी बजाय मैं उनके गांवदेहात को कहीं ज्यादा देख और अनुभव कर चुका हूं।

आनन्द ले रही हैं पत्नीजी इस तरह घूम कर! 🙂


गांव के कारीगरों में प्रयोगधर्मिता के अभाव की समस्या –

मैंने पहले भी कोशिश की है कि वे शहरी मानुस की जरूरतों के अनुसार कुछ बनायें; पर वे कोई नया प्रयोग करने को तैयार नहीं दिखे। बड़ी मुश्किल से एक तैयार भी हुआ था, उसे दो सौ रुपये बयाना भी दिया, पर बार बार जाने पर कुछ बनाया नहीं। मुझे बयाना का पैसा भी नहीं मिला – वह वापस मांगने की मैंने कोशिश भी नहीं की थी। वे इतने गरीब लगते हैं कि कोई भी पैसा उनकी बचत में तो जाता नहीं, जिसे वह वापस करे।

गांव के कारीगर और गांव वाले व्यापक रूप में भी; प्रयोगधर्मी नहीं हैं। धईकार ही नहीं, कोई कुम्हार, कोई लुहार, खाती, कोई किसान कुछ भी नया करना नहींं चाहता। किसान तो गेंहू, धान, सरसों की फसल लेने में लगा है। बाकी सब का हाल भिन्न भिन्न पोस्टों में मैं पहले कार चुका हूं।

फल की टोकरी बांस की बन सकती है।

हम मचिया बनवा पाये; पर उसके लिये डेढ़ महीने तक बहुत मेहनत की मेरी पत्नीजी ने (और मैंने भी)।

हमने सोचा कि शहरी लोग क्या इस्तेमाल कर सकते हैं बांस के बने (बुने) सामान के रूप में? बहुत से विचार मन में आये। मसलन डाइनिंग टेबल पर रखी जाने वाली फ्रूट बास्केट जो आजकल प्लास्टिक की मिलती है, बांस की बन सकती है और शायद मंहगी भी न हो। पर हमें यह नहीं लगता कि ये धईकार बस्ती वाले कोई प्रयोग करेंगे। पहले मैं उनसे पूछ चुका हूं; पर उनका सपाट जवाब है कि बांस की छोटी रिंग बनाना मुश्किल काम है! 😦


अरे वह क्रियेटिव – फन ही नहीं, देने की प्रसन्नता की आदत विकसित करना भी था।

आनंद को केंद्र में रख कर अपनी आदतें ढालने की एक सयास कोशिश की जा रही है। विचार यह है कि हम उसे पैसा खर्च कर, सामान खरीद कर, मार्केटिंग कर या इधर उधर की बतकही/परनिंदा कर नहीं, विशुद्ध प्रसन्नता की आदतें विकसित करने से करेंगे।


जीवन की मोनोटोनी दूर करने का दौर है। मेरी पत्नी जी सवेरे एक स्पीकर पर म्यूजिक लगा कर घर के ड्राइंग कक्ष में ही घूमने का काम कर रही हैं। करीब पौना घण्टा का हल्का व्यायाम। सर्दियों में घर के बाहर निकलना नहीं हो पा रहा साइकिल ले कर। मेरी पत्नीजी भी मॉर्निंग वॉक पर नहीं निकल रहीं। इस लिये यही किया जा रहा है। वे संगीत सुनते हुये घर में घूमती हैं और मैं कान पर हेड-फोन लगा कर स्टेशनरी साइकिल चलाता हूं। काम भर का व्यायाम हो ही जाता है।

पॉडकास्ट सुनते स्टेशनरी साइकिल चलाना। इनसेट में सस्ती वाली साइकिल।

उसके बाद घर में प्लास्टिक के जितने खाली, बिना इस्तेमाल के पड़े डिब्बे हैं; उन्हें कबाड़ी को देने की बजाय, काट कर पेण्ट कर आकर्षक छोटे गमले बना रही हैं। दिन में जब समय मिलता है, बाहर पोर्टिको में बैठ कर गमले रंगने का काम कर रही हैं।

मेरी पत्नीजी का पेण्ट करने का सामान। घर में छोटे बड़े डिब्बे काट काट कर उनके गमले बन रहे हैं।

बनारस में फुटपाथ वाली दुकान से सीमेण्ट के गमले खरीदे थे, उनपर भी पेण्ट हुआ है।

मचिया बनाना – उसमें लगे सामान को जुटाना, पेण्ट करना/कराना और राजबली, रामसेवक, अशोक से तालमेल बिठाना – इस सब में अपना समय लगाया है।

Rita Pandey painting machiya
मचिया पेण्ट करते हुये रीता पाण्डेय

तीन साल से ‘मनी’ नामक बिजनेस गेम खरीदा है। वह यह पढ़ कर खरीदा था कि नियमित खेलने से डिमेंशिया/पार्किंसन रोग से बचाव होता है। पर आज तक उसका प्रयोग नहीं किया। अब सोचा जा रहा है कि उसे नियमित खेला जाये।

रामचरित मानस पढ़ने का नियमित कार्य प्रारम्भ किया है हम दोनो ने। जुगलबंदी में एक चौपाई/दोहा वे पढ़ती हैं; एक मैं। बीच में तुलसी का लिखा कोई गूढ़ प्रसंग आता है तो हम लोग बीच में रुक कर उसका अर्थ भी देखते हैं। पोद्दार जी का मानस अनुवाद भी अपने पास रखते हैं। ज्यादा नहीं, शाम के समय बीस दोहे का पठन/वाचन करते हैं। उसके बाद दो दो किशमिश के दानों का प्रसाद भी लेते हैं। मन में है कि इस कार्य के लिये एक डिब्बे में लाचीदाना और कच्ची मूंगफली दाने रखेंगे – प्रसाद के लिये।

ब्लॉगिंग और/या विविध विषयक वीडियो और पॉडकास्ट – यह सब लिखने, पढ़ने, देखने आदि को अपनी आदत में लाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

आनंद को केंद्र में रख कर अपनी आदतें ढालने की एक सयास कोशिश की जा रही है। विचार यह है कि हम उसे पैसा खर्च कर, सामान खरीद कर, मार्केटिंग कर या इधर उधर की बतकही/परनिंदा कर नहीं, विशुद्ध प्रसन्नतादतें (प्रसन्नता-आदतें) विकसित करने से करेंगे।

Kottu Vellaku Deepam
रघुनाथ जी का उपहार – कोट्टु वेल्लकू दीपम

रघुनाथ जी के लिये मचिया बनाने-बनवाने का उद्यम उसी प्रकार की एक प्रसन्नतादत है! इसमें दूसरी प्रसन्नतादत अपने में ‘देने का भाव’ लाना है। हमने उसकी भी गहन अनुभूति की! हमने रघुनाथ दम्पति से मचिया देने के बदले कुछ पाने की बात सोची ही नहीं थी। पर हमें कई चीजें बहुमूल्य मिलीं –

  1. श्रीमती गीतांजलि और श्री रघुनाथ जी से आत्मीय सम्पर्क
  2. रघुनाथ जी द्वारा मेरी बिटिया और दामाद को उनके घर आने का निमंत्रण
  3. रघुनाथ दम्पति द्वारा भेजा जाने वाला रिटर्न-गिफ्ट। उन्होने जो भेजने की सोची, वह इतना सुरुचिपूर्ण है कि हम उसे किसी भी दशा में मना नहीं कर सकते।
  4. यह समझ में आना कि गांव में रहते हुये भी अनेकानेक लोगों से – और बहुत उत्कृष्ट लोग हैं दुनियाँ में – जुड़ाव अपने में सघन प्रसन्नता का भाव विकसित करते हुये भी सम्भव है। उसमें किसी भी प्रकार की कोई उकताहट या ड्रजरी नहीं है!

यह देने का भाव या प्रसन्नता की आदत हमें कायम रखनी है। हमने तय किया है कि आगे कुछ महीने तक हम मचिया बनाने/देने का प्रयास जारी रखेंगे। ज्यादा नहीं, हर महीने एक मचिया देने की आदत। जिससे हमारे ऊपर आर्थिक बोझ भी न पड़े और प्रसन्नता-आदत भी संतृप्त होती रहे।

इस प्रसन्नतादतों के विकास की प्रक्रिया में जो कुछ होगा, उसे ब्लॉग पर साझा करने का प्रयास भविष्य में होता रहेगा! 🙂

रीता पांड़े के पेंट किए गमले