गाँव के संदर्भ में लॉकडाउन क्या है?

लॉकडाउन तो तब कहा जाये जब घर ऐसा हो, जिसपर लॉक हो/लग सकता हो। गांव में वैसे घर गिनती के हैं।



लॉकडाउन से लोग समझ रहे हैँ अपने फ्लैट में टेलीवीजन के सामने, किचन में नये व्यंजन का प्रयोग करते, मेडिटेशन करते या किताब पढ़ते बंद लोग। फ्लैट का एक दरवाजा होता है। वह दरवाजा बंद यानी लॉकडाउन।

गांव का दृष्य : घर और बाहर की सीमायें कहां हैं?

गांव में वह दरवाजा कहां है? यहां प्रधानमंत्री आवास योजना में बने एक या दो कमरे हैं। उनसे अलग बना शौचालय। वहीं बाहर कहीं हैण्डपम्प। कमरे के बाहर गाय-बकरी – यहां तक कि घोड़ा भी बंधे हैं। उसके साथ जाती है गांव की सड़क। जिसपर अगर डामर बिछा है,या खडंजा है तो औरतें उसी पर कपड़े भी कचारती हैं। उसी किनारे उपले पाथती हैं। उपडऊर भी वहीं बना होता है मानो उपलों का शिवलिंग हो। यही नहीं, घर के आसपास खेत, जिसमें वह परिवार स्वामित्व के आधार पर या अधियरे के रूप में, खेती करता है, वह भी घर का ही एक्स्टेंशन होता है। और वह एक्स्टेंशन दूसरों के घर/एक्स्टेंशन से गुत्थमगुत्था हुआ होता है।

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आनेवाले कल की कुलबुलाहट – रीता पाण्डेय

उम्मीद करती हूं कि यह ऑनलाइन व्यवस्था आगे तेज गति से बढ़ेगी। ऑनलाइन पढ़ाई गरीब-अमीर-शहर-देहात के दायरे तोड़ने में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगी।


यह रीता पाण्डेय की आज की अतिथि पोस्ट है।


लॉकडाउन का दूसरा चरण चल रहा है। बीस अप्रेल के बाद बाजार कुछ खुलने की उत्सुकता सभी के चेहरे पर दिखती है। कल स्वास्थ मंत्रालय के सचिव का टीवी पर यह बयान कि संक्रमण में 40 प्रतिशत की कमी आयी है; सभी में उत्साह का संचार कर गया है। अब लोगों के मिलने जुलने पर आगे की रणनीति, अर्थव्यवस्था की आगे की गति आदि पर चर्चा होने लगी है। आगे लोगों के व्यवहार, सामाजिक संरचना आदि में कैसा परिवर्तन आयेगा, इसपर भी मंथन शुरू हो गया है।

लॉकडाउन – इंतजार खत्म होने को है।
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